Monday, November 3, 2014

               अथ षोडशोsध्यायः  
दोहा;-
बने भक्त हित  सारथी,जगगुरु  कृपानिधान /
दैवी ,आसुर  सम्पदा,नर गुण करात बखान //

                  भगवानुवाच
श्लोक;-   
अभयं     सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः /
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् //१//

दोहा;-
भय से रहित विशुद्ध चित ,तत्त्वज्ञान में ध्यान /
योगसुस्थिति,हरि भजन,और सात्विक   दान //

चौपाई;-
इन्द्रिय निग्रह,यज्ञाचरणा / सुश्रुत,वेद्ध्यन नित करना // 
धर्महेतु तप अरु आराधन/सहज इन्द्रियाँ,तन,अन्तर्मन //

श्लोक;-
अहिंसा  सत्यमक्रोधस्त्यागः शांतिरपैशुनम् /
दया   भूतेष्वलोलुप्त्वं   मार्दवं   ह्रीरचापलम् //२//

चौपाई;-
सत्य,अहिंसा, क्रोधविहीना / अरु  कर्तत्त्व  भाव  से  हीना // 
चंचलतापरित्याग ,अनिंदा / दयावन्त प्रमुदित स्वच्छंदा //
एन्द्रिय विषयों के संयोगा  / अनासक्त,परित्यागहिं भोगा //
मन आत्मा के संग विराजे /  शास्त्र  विरुद्ध  आचरणलाजे //
मृदुल चित्त  ईश्वर में  लीना /  व्यर्थ  कामनाओं  से  हीना //
 
श्लोक;-
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता /
भवन्ति   सम्पदं   दैवीमभिजातस्य  भारत //३//

चौपाई;-
क्षमा, तेज,धृति ,परमपुनीता / मान, द्रोह से रहित विनीता //
ये दैवी सम्पद गन अर्जुन / असुरवृत्ति  के  गुण  आगे  सुन //

श्लोक;-
दम्भो दर्पोsभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च /
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् //४//

चौपाई;-
अहंकार, मद अरु अभिमाना / क्रोध निठुरता अरु अज्ञाना //
ये लक्षण रहते जिन जिन में / असुर सम्पदा लेकर  जन्में //
        
श्लोक;-
दैवी  संपद्विमोक्षाय   निबन्धायासुरी  मता /
मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोsसि पाण्डव //५//

चौपाई;-
मुक्ति हेतु सब दैवी सम्पद / वृत्ति आसुरी सब बंधन प्रद //
इससे शोक न कर तू अर्जुन / दैवी सम्पद युत  तेरे गुण //

श्लोक;-
द्वौ भूतसर्गौ लोकेsस्मिन्दैव आसुर एव च /
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे  श्रृणु //६//

चौपाई;-
हे भारत इस सृष्टि सृजन में / दो स्वभाव के प्राणी जन्में //
एक देव सम सदगुण युक्ता / दूजे  असुर  प्रकृति संयुक्ता /    
दोहा;-
दैव प्रकृति के लक्षण , कहे  सहित  विस्तार /
अब मुझसे सुन आसुरीप्रकृति पुरुष  आचार //

श्लोक;-
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं  च  जना  न विदुरासुराः /
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते //७//

चौपाई;-
जो जन असुरप्रकृतिअभिमानी/प्रवृति,निवृतिके भी नहिंज्ञानी//
इससे  आत्म शुद्धि  नहिं उन में /  ना ही श्रेष्ठ  आचरण  जन्में// 
और न  सत्य वचन  वे  भाखें / कपट  भाव  अपने  मन  राखें// 

श्लोक;-
असत्यमप्रतिष्ठं    ते   जगदाहुरनीश्वरम् /
अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम् //८//

चौपाई;- 
कहहिं असुरनर बुद्धि विहीना /यह जग मिथ्या आश्रयहीना//
केवल  स्त्री   पुरुष  सँयोगा /  रचित  सृष्टि बिन ईश्वर योगा//
मूल काम, बाकी सब मिथ्या / इसके सिवा और है ही क्या//

श्लोक;-
एतां  दृष्टिमवष्टभ्य  नष्टात्मानोsल्पबुद्धयः /
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोsहिताः//९//

चौपाई;-
क्रूरकर्मरत  ,     परअपकारी  /   वृत्तिआसुरी     पापाचारी //
असत ज्ञान का आश्रय लेकर / नष्ट स्वभावी मन्दबुद्धि नर //
केवल जगत अहित के हेता / होहिं समर्थ जान निज चेता //

श्लोक;-
काममाश्रित्य   दुष्पूरं   दम्भमानमदान्विताः /
मोहाद् गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेsशुचिव्रताः//१०//

चौपाई;-
दम्भ,मान,मद से युत वे नर / अति दुसाध्य इच्छायें लेकर //   
निजअज्ञान वशीकृत होकर/ मिथ्या सब सिद्धांत ग्रहण कर //
भृष्ट आचरण धारण करते / कर्म अशुभ कर  जगत विचरते // 

श्लोक;-
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः/
कामोपभोगपरमा   एतावदति   निश्चिताः //११//

चौपाई;-
अन्तहीन उनकी इच्छायें / मृत्युकाल तक मुक्ति न पायें //
विषयभोग में वे लिपटाने / इतना  ही  सुख  है यह माने //

श्लोक;-
आशापाशशतैर्बद्धाः      कामक्रोधपरायणाः /
ईहन्ते  कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान् //१२//

चौपाई;-
आशरूप सत फाँसी बंधन / बँधे पुरुष वे ! कुन्ती  नन्दन //
दोहा;-
काम क्रोध में लिप्त नर ,विषय भोग के हेत /
नीति त्याग अन्याय से ,धन संग्रह कर लेत //

श्लोक;-
इदमद्य  मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् /
इदमस्तीदमपि   मे  भविष्यति  पुनर्धनम् //१३//

दोहा;-
नित मन में चिंतन करहिं ,यह पाया मैं आज /
आगे वह हो जायेगा , पूर्ण   मनोरथ     काज //
चौपाई;-
धन इतना है पास हमारे / यह हो और लालसा धारे //

श्लोक;-
असौ  मया  हतः  शत्रुर्हनिष्ये  चापरानपि /
ईश्वरोsहमहं  भोगी सिद्धोsहं बलवान्सुखी //१४//

चौपाई;- 
मारा गया शत्रु यह  मुझसे / हतूँ  अन्य  भी  इसी  तरह से //
सब  ऐश्वर्य  भोगने  वाला  /  मैं  ही   ईश्वर जगत निराला //
मैं सब सिद्धियुक्त बलवाना / सुखी जगत में ज्ञान निधाना //

श्लोक;-
आढ्योsभिजनवानस्मि कोsन्योsस्ति सदृशो  मया /
यक्ष्ये    दास्यामि    मोदिष्य    इत्यज्ञानविमोहिताः//१५//
अनेकचित्तविभ्रान्ता                  मोहजालसमावृताः /
प्रसक्ताः       कामभोगेषु      पतन्ति      नरकेsशुचौ //१६//

चौपाई;-
मैं बड़धनी वृहद परिवारा / मो  सम  को  अस  करे विचारा //
दूँगा दान करूँ मख भारी / मुदित होउँ  लख  खुशियाँ  सारी //
इसप्रकार अज्ञान विमोहित/बहुविधि भ्रमित लोभ से प्रेरित //
ऐसे मोहासक्त  असुर  नर  / गिरहिं अपावन नरकहिं जाकर// 

श्लोक;- 
आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः /
यजन्ते     नामयज्ञैस्ते     दम्भेनाविधिपूर्वकम् //१७//

चौपाई;-
रहें मदान्ध मान अरु धन से /समझें श्रेष्ठ स्वयं को  मन से//
नाममात्र को,शास्त्रविहीना / करहिं दम्भसे मख विधिहीना//

श्लोक;-
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः /
मामात्मपरदेहेषु   प्रद्विषन्तोsभ्यसूयकाः //१८//

चौपाई;- 
अहंकार , बल , दर्प , कामना / क्रोध आदि से युक्त भावना //
इनके वशीभूत हो कलुषित /निज में अरु पर तन में स्थित //
मुझ  ईश्वर   से  वे  अज्ञानी / करहिं  द्वेष  परनिंदक  प्राणी // 

श्लोक;-
तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् /
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु //१९//

दोहा;-
हैं  जितने  क्रूरात्मा , द्वेषी  इस  संसार /
उनको आसुर योनि में , डारूँ बारम्बार //

श्लोक;-
असुरीं योनिमापन्ना मूढ़ा जन्मनि जन्मनि /
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् //२०//

चौपाई;-
अर्जुन वे अतिमूढ़ असुरनर / बहुत जन्म तक मोहिं न पाकर //
जन्म अनेक नीचगति पाते / फिर अतिअधम योनि में जाते //

श्लोक;-
त्रिविधं     नरकस्येदं     द्वारं     नाशनमात्मनः /
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्  //२१//

चौपाई;
काम क्रोध अरु लोभ लुभायें  / तीनों नरक द्वार कहलायें // 
पार्थ आत्महिं यही नशायें / उसे अधोगति  में  ले  जायेँ //
इससे जब तीनों को त्यागे / तब ही मन मुझमें अनुरागे //

श्लोक;-
एतैर्विमुक्तः    कौन्तेय      तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः /
आचरत्यात्मनःश्रेयस्ततो याति परां गतिम् //२२//

चौपाई;- 
जो त्रय  नरकद्वार  बतलाये /  इनसे  मुक्ति  पुरुष  जो  पाये //
कौन्तेय  वह  निज  हित   लागी  / सद्आचरण करे वैरागी //
जिससे उस सदगति को पाये / जो मम  परमधाम कहलाये //

श्लोक;-
यह  शास्त्रविधिमुत्सृज्य  वर्तते  कामकारतः /
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् //२३//

चौपाई;-
जोनर तजकर शास्त्रविधाना/करहिं आचरण निज मनमाना//
उनके कर्म व्यर्थसब जायेँ / सिद्धि न सुख न परमगति पायेँ//

श्लोक;-
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ /
ज्ञात्वा  शास्त्रविधानोक्तं   कर्म   कर्तुमिहार्हसि //२४//

दोहा;-
इस कारण हे पार्थ तू , बस  इतना  ही  जान /
अकर्तव्य ,कर्तव्य क्या , इसके शास्त्र प्रमाण //
ऐसा मन में जान के ,शास्त्र विहित सब कर्म /
करना ही तुझको उचित इसे मन निज  धर्म //  
    
दैव, असुर दो सम्पदा ,लक्षण सहित सुनाय /
पूर्ण हुआ इस योग  का , सोलहवाँ  अध्याय // 

इस प्रकार श्रीमद् भगवद् गीता रूपी उपनिषद एवं ब्रह्मविद्या तथा  योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण  और   अर्जुन   के   संवाद  में  उदयभानु  तिवारी 'मधुकर' कृत  महाकाव्य ''गीतामानस''में देवासुर सम्पद् विभाग योग नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ /   
    
   
                                हरिॐ तत्सत् 
        
                  // अथ सप्तदशोsध्यायः // 
चौपाई;- 
सात्विक   राजस  तामसी , कौन  यज्ञ   तप  दान /
भेद कहहिं समझाय हरि ,विधिवत सहित विधान //

                           अर्जुन उवाच
श्लोक;-
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः /
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः //१// 

दोहा;-
श्रद्धायुत जो नर करहिं ,त्याग शास्त्रविधि यज्ञ / 
उनकी  स्थिति   कौन  सी , हे  केशव   सर्वज्ञ //
सत,राजस या तामसिक,उन्हें सहित विस्तार /
कहिये  मुझसे  आप  ही ,  इसके   जाननहार //

                श्रीभगवानुवाच

श्लोक;  
 त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा /
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां श्रुणु //२//

दोहा;- 
श्रद्धा   देह  स्वभावजा , इसके   तीन   प्रकार /
सात्त्विक,राजस ,तामसी,सो सुन पाण्डुकुमार //  

श्लोक;-
सत्त्वानुरूपा  सर्वस्य  श्रद्धा   भवति  भारत /
श्रद्धामयोsयं  पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव  सः//३//

चौपाई;- 
निज स्वरुप अनुरूप सृजन में /श्रद्धा होती अन्तर्मन में //
जो जिस दैवी श्रद्धा से युत / है वह उसी  वृत्ति  से संयुत //
श्रद्धाभक्ति भक्त  की  जैसी / वैसा  स्वयं  वृत्ति  हो  वैसी //

श्लोक;- 
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः/
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः //४//

चौपाई;- 
सात्त्विक नर पूजहिं सुर देवा / राजस ,यक्ष दैत्य की सेवा //
शेष तामसी जो नर रहते / वे  सब  भूत  प्रेत  को  भजते //

श्लोक;-  
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते  ये तपो जनाः /
दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः //५//

चौपाई;-
जो मानव तज शास्त्रविधाना/ तपहिं घोरतप निज अज्ञाना //
दम्भ अहंकारों से संयुत / बल, अभिमान  कामना  से  युत // 
  
श्लोक;- 
कर्शयन्तः       शरीरस्थं       भूतग्राममचेतसः /
मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् //६//

चौपाई;-
पंचभूत तनधारी सबको / और ह्रदय में स्थित  मुझको //
दारुण दुख दाता अज्ञानी / असुर स्वभाव जान वे प्रानी //

श्लोक;- 
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः /
यज्ञस्तपस्तथा   दानं  तेषां  भेदमिमं  श्रुणु //७//

चौपाई;- 
सबहिं भोज्यप्रिय,त्रिविध प्रकार/ जैसाजो निजरुचि अनुसारा //
उसी प्रकार यज्ञ ,तप,दाना / त्रिविध  भाँति  के  करूँ बखाना //
पृथक पृथक सब भेद बताऊँ / मुझ  से सुन अब ज्ञान कराऊँ //

 श्लोक;- 
आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः/
रस्याःस्निग्धाःस्थिरा हृद्या आहाराःसात्त्विकप्रियाः//८//

दोहा;- 
आयु ,बुद्धि,आरोग्य,बल ,सुख अरु प्रीति अपार /
देते  चिकने   रसमयी , सात्विक  खाद्य  अहार //

चौपाई;-  ,   
अस स्वभाव से प्रियआहारा / सात्त्विकपुरुषहिं अधिक पियारा //

श्लोक;-  
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः/
आहारा   राजसस्येष्टा  दुःखशोकामयप्रदाः//९//

चौपाई;- 
उष्ण,अम्लयुत,कटु अरु खारा / रूक्ष,विदाही,तीक्ष्ण अहारा //
दुख, चिंता  अरु  रोग  बढ़ाते / राजस  पुरुषों  को  ये  भाते // 

 श्लोक;-     
यातयामं  गतरसं  पूति  पर्युषितं  च   यत् /
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् //१०//

चौपाई;- 
एक  प्रहर  पहिले  का  बासा / अपरिपक्व, रसहीन, कुवासा //
जूठनयुक्त,अपावन भोजन / अतिप्रिय उनको जो तामसजन //

श्लोक;-    
अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते /
यष्टव्यमेवेति  मनः समाधाय  स सात्त्विकः//११//

चौपाई;- 
यज्ञकर्म,कर्त्तव्य समझ नर / विधिवत कर्मों के फल तजकर //
जब एकाग्र चित्त  से  करते / सात्त्विक यज्ञ  उसी  को  कहते // 

श्लोक;-  
अभिसन्धाय तु  फलं दम्भार्थमपि चैव यत् / 
इज्यते   भरतश्रेष्ठ  तं  यज्ञं  विद्धि  राजसम् //१२//

चौपाई;- 
किन्तु पार्थ जो दम्भ समेता / करहिं यज्ञ नर फल के हेता //
उसको राजस मख तू जाने / दम्भ आचरण हित जब ठाने //

श्लोक;- 
विधिहीनमसृष्टान्नं  मन्त्रहीनमदक्षिणम् /
श्रद्धाविरहितं    यज्ञं   तामसं   परिचक्षते //१३//

दोहा;- 
बिना मंत्र बिन दक्षिणा ,अन्न किये बिन दान /
विधि विहीन ,श्रद्धारहित ,यज्ञहिं तामस जान //

श्लोक;- 
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं  शौचमार्जवम् /
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप  उच्यते //१४//

चौपाई;- 
गुरु ,आचार्य,देव,ब्राह्मणजन / और तत्त्वविद,ज्ञानी पूजन //
ब्रह्मचर्य,शुचिता,ऋजु रहना / सत्य अहिंसा पालन करना //    
ये शरीर के तप हैं अर्जुन / अब वाणी तप के  लक्षण  सुन //

श्लोक ;-
अनुद्वेगकरं वाक्यं  सत्यं  प्रियहितं  च  यत् /
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ् मयं तप उच्यते //१५//     

चौपाई;-
जो मन  में  उद्वेग न  लाये /  हितकारी , प्रिय, सबको  भाये //
सत्य सुभाषण,हरिजिज्ञासा/ आत्म सुचिंतन,जप,अभ्यासा //   
ये सब वाणी के तप अर्जुन / अब  मानस के तप आगे  सुन //

श्लोक;- 
मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः /
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो        मानसमुच्यते //१६//

चौपाई;- 
सौम्यभाव,हरिचिन्तन में रत / मन का निग्रह मौनशील व्रत //
इष्टदेव बिन कुछ नहिं ध्याये / मन  प्रसन्नता झलक दिखाये //
अन्तर्मन सब भाँति पुनीता / ये  मानस  तप  जान  विनीता //

श्लोक;- 
श्रद्धया  परया  तप्तं   तपस्तत्त्रिविधं   नरैः /
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते //१७//

चौपाई;- 
बिन फल आकाँक्षी नर द्वारा / उपर्युक्त तप त्रिविध प्रकारा //
किये पूर्ण श्रद्धा से जायें / वे  सब  सात्त्विक  तप कहलायें //

श्लोक;- 
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् /
क्रियते तदिह  प्रोक्तं  राजसं  चलमध्रुवम् //१८//

चौपाई;- 
बिनसम्मान,मान या पूजन/ अथवा स्वारथ हित साधकजन //

दोहा;- 
जो तप करते दम्भ से ,उसे अनिश्चित मान /
है फलदाई क्षणिक वह ,तप राजस तू जान //

श्लोक;-
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः / 
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम् // १९//

चौपाई;-   
जो तप करहिं मूढ़मति हठ  से / मन,वाणी या  देह  कष्ट  से //
अथवा पर अनिष्ट हित  करते / उस तप को तामस तप कहते //

श्लोक;-
दातव्यमिति     यद्दानं    दीयतेsनुपकारिणे /  
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् //२०//

चौपाई;- 
प्रत्युपकार भावना तज नर / देशकाल अरु पात्र परख कर //
दान करे विधिवत सम्मानी /निज कर्त्तव्य कर्म मन जानी //
सुन वह सात्त्विक दान कहाये /जो सुपात्र के हित  में जाये //

श्लोक;- 
यत्तु  प्रत्युपकारार्थं  फलमुद्दिश्य  वा  पुनः /
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् //२१// 

चौपाई;- 
दान करे पर दिया  न  जाये  /  या  जो  दान  क्लेश  पहुंचाये //
अथवा प्रत्युपकार भाव धर/ करहिं दान फलके हित जब नर //
स्वार्थ  भाव   दाता   मन  आये / वही  दान  राजस  कहलाये //

 श्लोक;- 
अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते /
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् //२२//

चौपाई;- 
देशकाल स्थिति बिन जाने / तिरस्कार युत, बिन सम्माने //
दानकुपात्रहिं जोजन  करते / तामसदान शास्त्र सब  कहते //   

श्लोक;-  
ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः /
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च    विहिताः पुरा //२३//

दोहा ;-
ॐ तत् सत्  उस ब्रह्म के ,तीनों नाम प्रधान /
विप्र ,वेद ,यज्ञादि की  , रचना  इनसे  जान // 

श्लोक;-   
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपः क्रियाः /
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् //२४//

दोहा;- 
इसकारण सब वेदविद् ,क्रिया ,यज्ञ ,तप ,दान /
प्रथम ॐ उच्चार नित , करते  सहित विधान //

श्लोक;- 
तदित्यनभिसन्धाय     फलं     यज्ञतपःक्रियाः /
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः//२५//

चौपाई;- 
त् का अर्थ वही परमेश्वर / जगत व्याप्त ,अक्षर,अखिलेश्वर // 
उसी ब्रह्म का ही यह सब है / उसको  ही  यह  सब  अर्पण है //
यही भावना मन धारण कर / दान,यज्ञ,तप के फल तजकर //
सारे  कर्म  शास्त्र  अनुसारा  /  होहिं  मुमुक्षु  पुरुष  के  द्वारा //

 श्लोक;-
सद्भावे  साधुभावे   च   सदित्येतत्प्रयुज्यते /
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते //२६//

चौपाई;- 
त् ही सत्य ब्रह्म कहलाये  / सत्यश्रेष्ठतम भाव दिखाये //
वही सनातन अमृतरूपा / हिय स्थित त्रिभुवन कर भूपा //
जहँ हों मंगलकाज पुनीता / त् सम्पुट दें विज्ञ विनीता //

श्लोक;- 
यज्ञे तपसि  दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते /
कर्म     चैव    तदर्थोयं    सदित्येवाभिधीयते //२७//

चौपाई;- 
यज्ञ,दान,तपमें जो स्थित / वह ही त् सब कहहिंतत्त्ववित् //
उस हित कर्म किया जो जाये / निश्चय वह त् ही कहलाये //
  
श्लोक;-  
अश्रद्धया हुतं दत्तं  तपस्तप्तं  कृतं  च  यत् /
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह //२८// 

दोहा;- 
हे  भारत  श्रद्धा रहित , हवन  तपस-तप दान / 
और अन्य शुभ कर्म जो ,उन्हें असत ही जान //
बिन श्रद्धा विश्वास के / करहिं  जो कर्म अनंत /
नहिं फलदाई  लोक  में ,  नहीं  मृत्यु  पर्यन्त // 

ॐ तत् सत् त्रय ब्रह्म की / व्याख्या कर गुण  गाय /
पूर्ण   हुआ    उपदेश   का  ,   सप्तदशो    अध्याय //

इसप्रकार श्रीमद् भगवद् गीता रूपी उपनिषद एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन  के  संवाद  में  उदयभानु  तिवारी  ''मधुकर''  कृत  महाकाव्य 'गीतामानस'में ॐ तत् सत् श्रद्धात्रय विभाग योग नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ /


                                हरिः ॐ  तत् सत्