geeta manas
Friday, December 1, 2017
Tuesday, May 5, 2015
अनुक्रमणिका
विषय पृष्ठ संख्या
१.गीता सुगीता कर्तव्या
२.प्रथम संस्करण में दिये पूज्य मनीषी सन्तों के आशीर्वचन
३.भाव भूमि
४.श्री विष्णु स्तवन
५.प्रेरणा
६.गुरुवन्दना
७.योगेश्वर वन्दना
८.मंगलाचरण
९ .विषय प्रणयन
१०.यथा अर्थ विवेचन
११.जीवन ही महाभारत
१२.गीता माहत्म्य
१३.प्रार्थना
१४.श्रीकृष्ण स्तुति
१५.आवाहन
१६.प्रथम अध्याय ( संशय-विषादयोग )
१७.द्वितीय अध्याय ( कर्म जिज्ञासा )
१८.तृतीय अध्याय ( शत्रु विनाश प्रेरणा )
१९.चतुर्थ अध्याय ( यज्ञ कर्म स्पष्टीकरण )
२०.पंचम अध्याय ( यज्ञभोक्ता महापुरुषस्थ महेश्वर )
२१.षष्ठम अध्याय ( अभ्यास योग )
२२.सप्तम अध्याय ( समग्र जानकारी )
२३.अष्टम अध्याय ( अक्षरब्रह्म योग )
२४.नवम अध्याय ( राजविद्या जागृति )
२५.दशम अध्याय ( विभूति वर्णन )
२६.एकादश अध्याय ( विश्वरूप दर्शन )
२७.द्वादस अध्याय ( भक्तियोग )
२८.त्रयोदश अध्याय ( क्षेत्र-क्षत्रज्ञविभाग योग )
२९.चतुर्दश अध्याय ( गुणत्रय विभाग योग )
३०.पञ्च दशअध्याय ( पुरुषोत्तम योग )
३१.षोडश अध्याय ( देवासुर सम्पद् विभाग योग )
३२.सप्तदश अध्याय ( ॐ तत्सत् तथा श्रद्धात्रय विभाग योग )
३३.अष्टदश अध्याय ( संन्यास योग )
३४.आरती गीता मानस
३५.आरती सदगुरु
३६. शब्द संकेत
गीता सुगीता कर्तव्या
सहृदय सुधी गीता साधक श्री उदयभानु तिवारी से मेरा परिचय पूर्व
परिचित साहित्य साधक से भिन्न रूप में , पहली बार हुआ. क्रमशः उनसे बढ़ते
हुये संबंधों ने उनके व्यक्तित्व की अनेक विशेषतायें उदघाटित कीं और आज
वे मेरे निकट और आत्मीय व्यक्ति बन गये हैं. उनमें जो मुख्य बात
मैने अनुभव की वह है उनके व्यक्तित्व में एक लय / उसे सहज रूप से ऊपर से
नहीं देखा जा सकता क्योंकि उसके ऊपर एक सुदृढ़ कवच है बाह्य -रूप से गतिशील
ऊर्जा का / वे एक साथ त्वरा ओर सजकता से अनेक काम निपटा लेते हैं और
ज्यों के त्यों स्फूर्त बने रहते हैं / पर ध्यान से देखें तो उसमें भी
एक लय दृष्टिगोचर होती है / हाँ यह अवश्य है कि भीतरी लय बाहरी गति की
तुलना में अधिक गहरी और स्थाई है /
दूसरी बात जो मुझे दिखाई दी वह है ''आ नो भद्रः क्रतवो यन्तु
विश्वतः '' विश्व के सभी सात्विक , शाश्वत एवं कल्याणकारी विचार मेरे पास
पहुँचे / वे फिर नई बात को सुनने, समझने, स्वीकार करने और उसका उपयोग करने
के लिये सर्वात्मना तत्पर हो जाते हैं /
मुख्य-रूप से इन वैयक्तिक विशेषताओं का उल्लेख कर और ध्यान
में रख कर मैं उनकी ''श्री गीता मानस ''को समझने का प्रयत्न करना
चाहता हूँ / यहाँ यह टिप्पणी करना भी आवश्यक प्रतीत होता है कि
भारतीय -परम्परा में दो प्रमुख धाराएँ प्रवाहित होती रही हैं / उन
धाराओं से हमारा वैचारिक और व्यवहारिक,दोनों प्रकार का व्यहार गहरे रूप
में प्रभावित होता रहा है / वे हैं शास्त्र -धर्मी और लोक-धर्मी
चिंतन और परम्पराएँ / कोई भी महत्वपूर्ण कृति समाज में इन दोनों धाराओं
में रच-बस कर ही स्वीकार्य हो पाती हैं/ यह बात श्रीमद् भगवद् गीता पर भी
समान रूप से लागू होती है /जहाँ उस पर लिखे गये भाष्यों ,टीकाओं
,टिप्पणियों की एक वैविध्यपूर्ण , प्रतिभा -प्रकर्ष सम्पन्न और
सिद्धातों की निर्णायक भूमिकाओं के आश्रय शास्त्र धर्मी रूप में वृहद श्रृंखला प्राप्त होती है , वहीं दूसरी ओर भारतीय और विदेशी भाषान्तरों,काव्यानुवादों के रूप में भी प्रचुर साहित्य मिलता है
/ इसके अतिरिक्त एक और प्रकार का साहित्य भी पर्याप्त मात्रा में
उपलब्ध है जिसमें प्रचलित भाषान्तर अनुवाद के साथ व्याख्या और विशेष
विश्लेषण पूर्ण विचार बिन्दुओं को समाहित किया गया है / तीसरे वर्ग में
भी नये-नये विचारऔर विचार करने के प्रयत्न भिन्न-भिन्न सन्दर्भों के आधार पर
किये गये हैं / वे आधुनिकयुग की संवेदना एवं प्रतिपादन शैली के उत्तम
उदाहरण के रूप में विद्वत् समाज में स्वीकर किये जा रहे हैं. इनमें
विनोबा, धर्मानंद, कौसाम्बी, महर्षि बावरा, ओशो और स्वामी अड़गड़ानन्द जी
प्रमुख हैं.
श्री उदयभानु तिवारी द्वितीय एवं तृतीय प्रकार के साहित्य से
प्रभावित रहे हैं / बाल्यावस्था से ही उनके मन में श्री रामचरित मानस का
राग-बन्ध सुदृढ़ हो गया था और स्वामी अड़गड़ानन्द जी की यथार्थ गीता
में प्रतिपादित पात्रों ,घटनाओं और तत्व संदर्भों के मनोवैज्ञानिक एवं प्रतीकात्मक व्याख्यानों ने उन्हें प्रभावित किया था परिणामतः उन्होंने श्री गीता मानस का पुनःप्रणयन करना, अपने कवि और विचारशील व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति की दृष्टि से आवश्यक समझा /
''श्री गीतामानस '' श्री रामचरित मानस की छन्द
रचना
से प्रभावित गीता -व्याख्या है ,जिसे वे सर्व ग्राह्य रूप में सहज मानते
हैं / इसमें कोई संदेह नहीं है की श्री तिवारी जी ने अपनी इस कृति में ,यथा
संभव लयात्मकता की रक्षा करते हुये गीता के तत्त्व-चिंतन को नये
संदर्भों में प्रस्तुत किया है /
उन्होंने अपने प्रतिपादन के आधारभूत सिद्धान्तों को स्पष्ट करते हुये लिखा है कि ;-
दोहा ;-
मानुष तन कुरुक्षेत्र है , कौरव असुर प्रवृत्ति /
पाण्डव देवी सम्पदा , पाण्डु पुण्य की वृत्ति //
कुन्ती है कर्तव्य अरु, भ्रम ही भीष्म महान /
धर्म युधिष्ठिर जानिये , भाव भीम बलवान //
चौपाई;-
अर्जुन है मन कर अनुरागा / ब्रह्मज्ञान जेहि रुचिकर लागा //
नियम नकुल सतसँग सहदेवा , द्वैताचार द्रोण गुरुदेवा //
मनअनुरक्ति ही अश्वत्थामा/ सात्विकता का सात्यकिनामा //
इसी
तरह अन्य पात्रों के संबंध में उन्होंने प्रतीकात्मकता का उपयोग करते
हुये और कुरुक्षेत्र को मनुज शरीर मानते हुये श्री अड़गड़नन्द जी के आधार पर
यज्ञ की व्याख्या करते हुये कहा गया है कि ;-
दोहा ;- ब्रह्म प्राप्ति की साधना, जहाँ चित्त रमजाय /
उस विशेषविधि को कहहिं, यज्ञ विज्ञ समुदाय //
कर्मफल पर यह टिप्पणी दृष्टव्य है ;-
चौपाई;-
फल का कारण बनने वाले / हैं अतिदीन कृपण मति वाले //
'' प्राणों का प्राणों का प्राणों में हवन ''गीता का महत्वपूर्ण वक्तव्य है -उसको श्री तिवारी जी ने समझाते हुये कहा है ;-
दोहा ;-
प्राण वायु वह वायु है ,प्राणि करहिं जेहि पान /
बाहर निकली वायु को , जानो वायु अपान //
चौपाई ;-
प्राणवायु जब अन्दर जाये / ता में भाव , कुभाव समाये //
जब साधक मन करे निरोधा / हो संकल्पों में अवरोधा //
योग-अग्नि संकल्प जलाये / प्राणवायु ही अन्दर जाये //
विषय तरंग प्रवेश न पायें / और न अन्दर छोभ बढ़ायें //
ब्रह्म समर्पित मन हो जाये / सिवा इष्ट कुछ ध्यान न आये //
यह क्षमता जब साधक पाये / प्राण -प्राण में हवन कहाये //
अपान में हवन पर कवि की अभिव्यक्ति है ;-
चौपाई ;-
अंदर से संकल्प न आयें / मन में नहिं स्फुरण जगायें //
हो एकांत योग में लागे / ब्रह्म प्राप्ति में मन अनुरागे //
यह स्थिति जब मन की आये / वह अपान में होम कहाये //
क्या हैं सात्विक ज्ञान ;-
चौपाई ;-
जिस सुबुद्धि से युक्त हुआ नर / भिन्न-भिन्न भूतों में ईश्वर //
एक भाव में स्थित देखे / व्याप्त ब्रह्म सब जग में लेखे //
इस तरह के अनेक प्रतीकात्मक एवं मनोवैज्ञानिक विचार श्री
उदयभानु तिवारी '' मधुकर '' ने श्री गीता मानस में सरल और सुबोध
बनाकर प्रस्तुत किये हैं / उनके इस ग्रन्थ के अनुशीलन से यह भी स्पष्ट
होता है कि उन्होंने पूर्वाचार्यों से अतिरिक्त अपने मौलिक विचार भी इस
कृति में विशेष रूप से दिये हैं , जिससे यह रचना उपयोगी ,आकर्षक एवं नवीन
बन गई है /
मेरी यह सुबद्ध धारणा है कि उनकी यह कृति सामान्य जन को
आकर्षित तो करेगी ही,साथ ही विज्ञ जनों को भी प्रमुदित करेगी /
मेरी हार्दिक शुभकामना है कि यह कृति सुधी विद्वानों एवं गीता-रसिकों का कण्ठ हार बने /
आचार्य-कृष्णकान्त चतुर्वेदी
पूर्व संस्कृत विभागाध्यक्ष
रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय ,जबलपुर
पूर्व निदेशक कालिदास अकादमी ,उज्जैन
प्रथमसंस्करण में मनीषियों के आशीर्वचन
दोहा;-
''श्रीकृष्ण भाषित यही , आत्मतत्व का ज्ञान /
आभूषित रस , छन्द से , नव रस रत्न महान //
परमब्रह्म परमात्म ने , कृपा प्रकाश दिखाय /
गीता मानस में दिया अदभुत रस बरसाय //
पढ़ यह अनुपम काव्य कृति,होकर अति अभिभूत /
देते आशिष मुदित मन , आत्मस्थित अवधूत //''
प्रकाश वन अवधूत
श्री शैलेश्वरधाम शैलवारा,सिहोरा,जबलपुर
''ऐसे सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ का पद्यानुवाद मानस की शैली में
प्रणीत कर सर्व साधारण के लिये सुगम बनाया है , मानस की तरह ज्ञेय है
/आपके इस प्रयास के लिये मैं अपनीशुभकामनायें
प्रेषित करता हूँ और पाठकों के बीच अधिकाधिक प्रसार के लिये भगवान से प्रार्थना करता हूँ / शेष ईश्वरेक्षा सर्वोपरि / ''
स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि जी महाराज
( निवृत्त जगद् गुरु शंकराचार्य ,ज्योतिर्मय शाखा )
भारत माता मन्दिर
समन्वय कुटीर ,सप्त सरोवर ,हरिद्वार
''पं. उदयभानु तिवारी 'मधुकर ' ने उपनिषदों के सारभूत गीतारूपी
नवनीत का आस्वादन लोकभाषा के माध्यम से सामान्य जन को भी कराने का
पुण्य कार्य किया है / दोहा चौपाई आदि छन्दों में निबद्ध यह गीता मानस श्रीरामचरितमानस की शैली में लिखी गई है , जो लोगों की न केवल आध्यात्मपिपासा को ही शान्त करेगी बल्कि उनकी बल्कि उनकी दैनन्दिन समस्याओं के समाधान का मार्ग भी प्रशस्त करेगी / ''
महामंडलेश्वर श्रीमहंत स्वामी रामचन्द्रदास जीमहाराज
नरसिंह पीठाधीस्वर
श्री नृसिंह मन्दिर ,शास्त्री ब्रिज ,जबलपुर
''इसी अनादि - अविच्छिन्न तथा स्वाभाविक परम मांगलिक क्रम
में सम्पूर्ण वैदिक वाङ्गमय की सारभूता श्रीमद् भगवद् गीता का प्राकट्य
'गीता मानस के रूप में हुआ है / जिसका सम्पूर्ण कलेवर चौपाई ,दोहा एवं
छन्दों से रामचरित मानस के समान ओत -प्रोत है / इस अनुपम प्राकट्य
से अब गीता मानस सर्वजन सुलभ -सुग्राह्य एवं व्यापक रूप में मुमुक्षु
जनों के लिए वरदान सिद्ध होगी / यद्यपि भगवद् गीता के अन्यान्य भी
पद्यात्मक एवं गद्यात्मक अनुवाद तथा व्याख्यान हुए हैंजो श्लाघनीय तथा उपादेय हैं परन्तु यह तो मानस के समान चौपाई, दोहा एवं छन्दों में संग्रथित होने के कारण बेजोड़ है / जैसे मानस की सहजता, सरसता,अनुपम प्रेरकता अद्वितीय है,वैसा ही लाभ मानवता को''गीता मानस''के द्वारा प्राप्त होगा, ऐसा मेरा परम विश्वास तथा सर्वावतारी भगवान श्रीराम जी के चरणों में प्रार्थना भी है /
डॉ.स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज
श्रीमठ ,पंचगंगा ,वाराणसी
''गीता मानस की रचना कर पं.उदयभानु तिवारी '' मधुकर ''ने
बड़ा पुनीत कार्य किया है / गीता के गूढ़ तत्वों को उन्होंने बहुत ही
सहज,सरल छन्दों में निबद्ध कर गेयरूप
में प्रस्तुत किया है / ''
डॉ. स्वामी श्यामदास जी महाराज
गीता धाम, जबलपुर
''गीतामानस में कवि ने भगवान श्रीकृष्ण जी की सरस,सहज और प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति को सरल हिन्दी में तुलसीकृत श्रीरामचरित मानस की भाँति जन-जन के हृदय तक पहुँचाने का जो कार्य किया है वह प्रशंसनीय है / रस, छन्द स्वर ,लय , ताल की अधिष्ठात्री माँ शारदा अपने इस लाडले पुत्र पर अपनी अहैतुकी कृपा सदा सर्वदा बनाये रखें / ''
स्वामी मुकुन्ददास जी महाराज
स्वयं-भू सिद्धपीठ
श्री गुप्तेश्वर महादेव मन्दिर ,जबलपुर
भाव भूमि
श्रीमद्भगवद् गीता परमात्मा
की दिव्य वाणी है परमात्मा के पूर्ण अवतार भगवान श्री कृष्ण ने अपनी
सम्पूर्ण करुणा ,सम्पूर्ण ज्ञान गीता के रूप में अपने विषाद ग्रस्त सखा
अर्जुन के ह्रदयमें सम्प्रेषित कर दिया/ सरलता ,सहजता ,सरसता और प्रेम की
तरलता से संयुक्त गीता ज्ञान लोगों के ह्रदय पर अपना अमिट प्रभाव छोड़ देता
है / इस अमर काव्य में वैदिक ज्ञान का सम्पूर्ण सार सन्निहित है / गीता
सभी युगों में मनुष्य मात्र की प्रत्येक समस्या का समुचित समाधान देती है
,मानवता के लिये सार्वकालिक ,सार्वदेशिक ,सार्वजनीन ज्ञान,आचार तथा भक्ति
का मार्ग प्रशस्त करतीहै / यह सर्व धर्म-सद् भाव की प्रेरक है / देश काल , जाति, वर्ग,सम्प्रदाय
में निहित ईश्वरीय ज्ञान को महत्ता देती है तथा भगवान के विविध
रूपों का दिग्दर्शन कराती है / परमप्रभु की कृपा से गीता द्वारा मुझे जिस
परमानन्द की अनुभूति हुई उसे जन-जन के ह्रदय तक पहुँचाने की
आकुलता ने मुझे गीतामानस की रचना के लिये प्रवृत्त किया /
श्रीमद् भगवद् गीता का पद्यानुवाद करना मेरे लियेकोई सहज कार्य नहीं था,तथापि परमात्मा की महतीअनुकम्पा पूर्वजों के आशीर्वाद , पूर्व संचित पुण्यों और पूज्य सन्तों ,महात्माओं के चरणों की कृपा से ही यह संभव हो सका /मेरे पूज्य पितामह श्री रघुवरप्रसाद जी तिवारी बचपन में मुझसे सस्वर रामचरित मानस का गायन कराते थे ,वे ही संस्कार और स्वर ताल मेरे हृदय को झंकृत करते रहे /कविता और संगीत में रुचि के कारण विभिन्न रागों ,विभिन्न छन्दों में प्रकृति,सौंदर्य ,श्रंगार आदि से जुडी लोकशैली के गीत तथा कवितायें भी मैने लिखीं /तत्पश्चात शिवस्तोत्र,दुर्गास्तुति,चौंसठ योगिनी स्तुति , महाकाली स्तुति, महाकाली आरती ,शारदा स्तुति , नर्मदा स्तुति , लक्ष्मी स्तुति , गणेश स्तुति ,श्री हनुमान स्तुति,भजन आदि रचनायें विविध छन्दों में पूर्ण हुईं /
इसके बाद अचानक अन्तःकरण में अलौकिक दिव्य शक्ति की प्रेरणा जागृत हुई / विचार और शव्द संयोजन की अपूर्व सामर्थ्य का आभास हुआ / संकल्पना शक्ति जागी , लगा कि शब्दब्रह्म के माध्यम से ज्ञान , कर्म और भक्ति का विवेचन विश्व के सम्मुख रखा जाये / उस परमप्रकाश पुंज के दिग्दर्शन में गीता का अनुपम पीयूष असंख्य लोगों में बाँटा जाये ,जो संजीवनी बन कर जन-जन के शुष्क ,संतृप्त और नीरस मानस में नव जीवन का संचार कर लौकिक तथा पारलौकिक सुख शान्ति प्रदान करे तथा समाज में आध्यत्मिक एवं दार्शनिक चेतना जागृत कर सके / अतः मैं अपनी छुट पुट रचनाओं को विराम दे , मूल संस्कृत भाषा में रचित जन कल्याणकारी ,मोक्षदायी ,श्रीमद् भगवद् गीता का अमृत प्रसाद लोक रंजक सहजभाषा में श्रीरामचरितमानस की शैली तथा छन्दविधान में दोहा ,चौपाई ,छन्द ,सोरठा , सवैया आदि रूप में लाने के लिये ,चिंतन मनन करने लगा / अंतःकरण में बंशी के दिव्य स्वर का संधान होते ही रोम -रोम पुलकित हो गया और मैं भीतर उठते मनोभावों को लिपिबद्ध करने लगा / भाव की अभिव्यक्ति में अवधी , बुन्देली तथा ब्रजभाषा के शब्दों का भी स्वभाविक रूप से प्रयोग हुआ /
अन्तर्मन में उठती अनेक जिज्ञासाओं के समाधान तथा विचारों को
सात्विक प्रवाह प्रदान करने में मैंने पूज्य स्वामी अड़गड़ानन्द जी महाराज
को मानस गुरु मान कर उनकी यथार्थ गीता कृति के माध्यम से अपना मार्ग
प्रशस्त किया /
यथार्थ गीता पढ़ कर मन ने स्वीकार किया यह महाभारत चित्रण योग साधक का वृत्ति युद्ध है जिसे गीता के तेरहवें श्लोक में स्पष्ट किया है कि यह शरीर ही वह क्षेत्र है /
यथार्थ गीता पढ़ कर मन ने स्वीकार किया यह महाभारत चित्रण योग साधक का वृत्ति युद्ध है जिसे गीता के तेरहवें श्लोक में स्पष्ट किया है कि यह शरीर ही वह क्षेत्र है /
अतःअर्थ के साथ प्रतीकात्मक पात्र भी दर्शाये गये हैं /
श्रीमद् भगवद् गीता के प्रति भारतीय परम्परा का आकर्षण
प्राचीनकाल से रहा है / यही कारण है कि इस पर लिखी गई टीकाएँ , भाष्य ,
व्याख्यान , संसार की सर्वाधिक लोकप्रिय भाषाओं में उपलब्ध हैं / यह
स्थिति भारत के और एशिया महाद्वीप के अन्य किसी ग्रंथों की नहीं है /
परिणामतः आज उसका अनुवाद करने वाले या उसके भाव को प्रगट करने वाले
व्यक्ति के सामने वही कठिनाई आती है जो जगदगुरुआदिशंकराचार्य
के सामने आई थी जिसको उन्होंने गीता की एक विशेषता के रूप में कहा कि
गीता का अर्थ जानना अत्यंत कठिन है उन्होंने कहा है कि ;-
''गीता तत्त्वं परम दुर्विज्ञेयार्थम्''
अतः मुझे भी गीता मानस के इस नये संस्करण को प्रस्तुत करते हुये दो कठिनाइयों का अनुभव हुआ कि इतने विपुल सहित्य के सामने मैं क्या छोड़ूँ और क्या लिखूँ /
श्रीमद् भगवद् गीता पर जो भी नये विचार और विश् लेषण अभी तक आयें हैं उनमें से किसका आश्रय लूँ /
इसके अतिरिक्त एक और दबाव मन में रहा कि नये भावों को देते समय ऐसा न हो कि यह पूरा ग्रंथ लोगों के लिये कठिन हो जाये / इन सभी बातों को ध्यान में रख कर मैने
अतः मुझे भी गीता मानस के इस नये संस्करण को प्रस्तुत करते हुये दो कठिनाइयों का अनुभव हुआ कि इतने विपुल सहित्य के सामने मैं क्या छोड़ूँ और क्या लिखूँ /
श्रीमद् भगवद् गीता पर जो भी नये विचार और विश् लेषण अभी तक आयें हैं उनमें से किसका आश्रय लूँ /
इसके अतिरिक्त एक और दबाव मन में रहा कि नये भावों को देते समय ऐसा न हो कि यह पूरा ग्रंथ लोगों के लिये कठिन हो जाये / इन सभी बातों को ध्यान में रख कर मैने
वर्तमान संस्करण में सरलता के साथ एक नये दृष्टिकोण को रखा है /
मैं रामचरित मानस की लयबद्धता के बाहर नहीं आ सकता और आना भी नहीं चाहता अतः परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्द जी के विचारों को यथा सम्भव लयबद्ध करके प्रस्तुत किया है / इसका यह अर्थ नहीं है कि भगवद् गीता के पूर्व प्रचलित पारम्परिक अर्थों की मैनें उपेक्षा की है बल्कि उनको भी गीता मानस में यथा स्थान दिया गया है / हो सकता है कहीं-कहीं शास्त्रीय और संस्कृतनिष्ठ शब्दों के यथावत प्रयोग की विवशता वश लयबद्धता में कुछ बाधा उत्पन्न हुई हो किन्तु गीता के मूल स्वर या भाव की उपेक्षा कहीं भी नहीं हुई है ऐसा प्रयत्न किया गया है /
यह मेरा विचार है कि गीता मानस का पाठ लोगों को रुचिकर लगेगा और वे उसका सस्वर गायन कर आनन्द का अनुभव करेंगे /
गीता मानस के अन्त में शब्द संकेत ,कठिन शब्दों के भावार्थ हेतु दिये गये हैं , ताकि पाठक आसानी से भावार्थ समझ सकें / अध्याय का सार एवं मीमांसा की अभिव्यक्ति तिरछेअक्षरों में की गई है /
// श्रीकृष्णार्पणमस्तु //
डॉ उदयभानुतिवारी ''मधुकर''
मैं रामचरित मानस की लयबद्धता के बाहर नहीं आ सकता और आना भी नहीं चाहता अतः परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्द जी के विचारों को यथा सम्भव लयबद्ध करके प्रस्तुत किया है / इसका यह अर्थ नहीं है कि भगवद् गीता के पूर्व प्रचलित पारम्परिक अर्थों की मैनें उपेक्षा की है बल्कि उनको भी गीता मानस में यथा स्थान दिया गया है / हो सकता है कहीं-कहीं शास्त्रीय और संस्कृतनिष्ठ शब्दों के यथावत प्रयोग की विवशता वश लयबद्धता में कुछ बाधा उत्पन्न हुई हो किन्तु गीता के मूल स्वर या भाव की उपेक्षा कहीं भी नहीं हुई है ऐसा प्रयत्न किया गया है /
यह मेरा विचार है कि गीता मानस का पाठ लोगों को रुचिकर लगेगा और वे उसका सस्वर गायन कर आनन्द का अनुभव करेंगे /
गीता मानस के अन्त में शब्द संकेत ,कठिन शब्दों के भावार्थ हेतु दिये गये हैं , ताकि पाठक आसानी से भावार्थ समझ सकें / अध्याय का सार एवं मीमांसा की अभिव्यक्ति तिरछेअक्षरों में की गई है /
// श्रीकृष्णार्पणमस्तु //
डॉ उदयभानुतिवारी ''मधुकर''
Monday, May 4, 2015
श्री विष्णु स्तवन
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं,
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् /
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं,
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् //
यं ब्रह्मा वरुणेन्द्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवै,
र्वेदैः साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः //
ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो,
यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः //
प्रेरणा
दोहा;-
रस छन्दों में बाँधने , गीता के उपदेश /
कैसे आई प्रेंरणा , कवि के ह्रदय प्रदेश //
पढ़ यथार्थ गीता विमल ,मनहिं मिला सन्देश /
हो जाओ सदगुरु शरण , मेटहिं दुख योगेश //
चौपाई;-
जबसे गुरु अनुकम्पा पाई / ॐ नाद स्वर गूँज समाई //
उदित ज्ञान रवि कीन्ह प्रकाशा / संसृति मूल अविद्या नाशा //
जाबालीऋषि आश्रम पावन / गुप्त गुफा जहँ परम सुहावन //
ज्योतिर्लिंगों में शिव धामा / स्वयं प्रकट गुप्तेसवर नामा //
एकदिवस तेहि मन्दिर जाई / कीन्ह प्रणाम शिवहिं मनलाई //
शब्दब्रह्म में मन अनुरागा / विकसे कवि कृति कुसुम तड़ागा //
उठी प्रथम स्तोत्र तरंगा / बही स्तवन निर्मल गंगा //
शिव प्रेरित शारद हिय आई / शब्द सलिल सरि दीन्ह बहाई //
उमा , रमा ,जननी ब्रह्माणी / पवनतनय, काली महारानी //
गणपति,सिद्ध ब्रह्ममयजानी / सबकी स्तुति कर निजवाणी //
पुनि रेवापद वन्दन कीन्हा / श्रेष्ठ काव्य में गीतहिं चीन्हा //
भृगुआश्रम प्रभु प्रेरि पठावा / जहँ योगेश्वर दर्शन पावा //
मन सदगुरु चिंतन में लागा / गीतामृत रस बरसन लागा //
छन्द, सोरठा सुन्दर दोहा / कवित सवैयों ने मन मोहा //
चौपाई अति सरस सुहाई / वह तरंग वाणी में आई //
जो छन्दों में रस बरसाये / चुन चुन मधुकर शब्द सजाये //
सरस भाव मानस से आई / सो गीता मानस कहलाई //
दोहा;-
यंत्ररूप यह देह है , अभियन्ता करतार /
निज को करता मानता ,मायावी संसार //
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