भाव भूमि
श्रीमद्भगवद् गीता परमात्मा
की दिव्य वाणी है परमात्मा के पूर्ण अवतार भगवान श्री कृष्ण ने अपनी
सम्पूर्ण करुणा ,सम्पूर्ण ज्ञान गीता के रूप में अपने विषाद ग्रस्त सखा
अर्जुन के ह्रदयमें सम्प्रेषित कर दिया/ सरलता ,सहजता ,सरसता और प्रेम की
तरलता से संयुक्त गीता ज्ञान लोगों के ह्रदय पर अपना अमिट प्रभाव छोड़ देता
है / इस अमर काव्य में वैदिक ज्ञान का सम्पूर्ण सार सन्निहित है / गीता
सभी युगों में मनुष्य मात्र की प्रत्येक समस्या का समुचित समाधान देती है
,मानवता के लिये सार्वकालिक ,सार्वदेशिक ,सार्वजनीन ज्ञान,आचार तथा भक्ति
का मार्ग प्रशस्त करतीहै / यह सर्व धर्म-सद् भाव की प्रेरक है / देश काल , जाति, वर्ग,सम्प्रदाय
में निहित ईश्वरीय ज्ञान को महत्ता देती है तथा भगवान के विविध
रूपों का दिग्दर्शन कराती है / परमप्रभु की कृपा से गीता द्वारा मुझे जिस
परमानन्द की अनुभूति हुई उसे जन-जन के ह्रदय तक पहुँचाने की
आकुलता ने मुझे गीतामानस की रचना के लिये प्रवृत्त किया /
श्रीमद् भगवद् गीता का पद्यानुवाद करना मेरे लियेकोई सहज कार्य नहीं था,तथापि परमात्मा की महतीअनुकम्पा पूर्वजों के आशीर्वाद , पूर्व संचित पुण्यों और पूज्य सन्तों ,महात्माओं के चरणों की कृपा से ही यह संभव हो सका /मेरे पूज्य पितामह श्री रघुवरप्रसाद जी तिवारी बचपन में मुझसे सस्वर रामचरित मानस का गायन कराते थे ,वे ही संस्कार और स्वर ताल मेरे हृदय को झंकृत करते रहे /कविता और संगीत में रुचि के कारण विभिन्न रागों ,विभिन्न छन्दों में प्रकृति,सौंदर्य ,श्रंगार आदि से जुडी लोकशैली के गीत तथा कवितायें भी मैने लिखीं /तत्पश्चात शिवस्तोत्र,दुर्गास्तुति,चौंसठ योगिनी स्तुति , महाकाली स्तुति, महाकाली आरती ,शारदा स्तुति , नर्मदा स्तुति , लक्ष्मी स्तुति , गणेश स्तुति ,श्री हनुमान स्तुति,भजन आदि रचनायें विविध छन्दों में पूर्ण हुईं /
इसके बाद अचानक अन्तःकरण में अलौकिक दिव्य शक्ति की प्रेरणा जागृत हुई / विचार और शव्द संयोजन की अपूर्व सामर्थ्य का आभास हुआ / संकल्पना शक्ति जागी , लगा कि शब्दब्रह्म के माध्यम से ज्ञान , कर्म और भक्ति का विवेचन विश्व के सम्मुख रखा जाये / उस परमप्रकाश पुंज के दिग्दर्शन में गीता का अनुपम पीयूष असंख्य लोगों में बाँटा जाये ,जो संजीवनी बन कर जन-जन के शुष्क ,संतृप्त और नीरस मानस में नव जीवन का संचार कर लौकिक तथा पारलौकिक सुख शान्ति प्रदान करे तथा समाज में आध्यत्मिक एवं दार्शनिक चेतना जागृत कर सके / अतः मैं अपनी छुट पुट रचनाओं को विराम दे , मूल संस्कृत भाषा में रचित जन कल्याणकारी ,मोक्षदायी ,श्रीमद् भगवद् गीता का अमृत प्रसाद लोक रंजक सहजभाषा में श्रीरामचरितमानस की शैली तथा छन्दविधान में दोहा ,चौपाई ,छन्द ,सोरठा , सवैया आदि रूप में लाने के लिये ,चिंतन मनन करने लगा / अंतःकरण में बंशी के दिव्य स्वर का संधान होते ही रोम -रोम पुलकित हो गया और मैं भीतर उठते मनोभावों को लिपिबद्ध करने लगा / भाव की अभिव्यक्ति में अवधी , बुन्देली तथा ब्रजभाषा के शब्दों का भी स्वभाविक रूप से प्रयोग हुआ /
अन्तर्मन में उठती अनेक जिज्ञासाओं के समाधान तथा विचारों को
सात्विक प्रवाह प्रदान करने में मैंने पूज्य स्वामी अड़गड़ानन्द जी महाराज
को मानस गुरु मान कर उनकी यथार्थ गीता कृति के माध्यम से अपना मार्ग
प्रशस्त किया /
यथार्थ गीता पढ़ कर मन ने स्वीकार किया यह महाभारत चित्रण योग साधक का वृत्ति युद्ध है जिसे गीता के तेरहवें श्लोक में स्पष्ट किया है कि यह शरीर ही वह क्षेत्र है /
यथार्थ गीता पढ़ कर मन ने स्वीकार किया यह महाभारत चित्रण योग साधक का वृत्ति युद्ध है जिसे गीता के तेरहवें श्लोक में स्पष्ट किया है कि यह शरीर ही वह क्षेत्र है /
अतःअर्थ के साथ प्रतीकात्मक पात्र भी दर्शाये गये हैं /
श्रीमद् भगवद् गीता के प्रति भारतीय परम्परा का आकर्षण
प्राचीनकाल से रहा है / यही कारण है कि इस पर लिखी गई टीकाएँ , भाष्य ,
व्याख्यान , संसार की सर्वाधिक लोकप्रिय भाषाओं में उपलब्ध हैं / यह
स्थिति भारत के और एशिया महाद्वीप के अन्य किसी ग्रंथों की नहीं है /
परिणामतः आज उसका अनुवाद करने वाले या उसके भाव को प्रगट करने वाले
व्यक्ति के सामने वही कठिनाई आती है जो जगदगुरुआदिशंकराचार्य
के सामने आई थी जिसको उन्होंने गीता की एक विशेषता के रूप में कहा कि
गीता का अर्थ जानना अत्यंत कठिन है उन्होंने कहा है कि ;-
''गीता तत्त्वं परम दुर्विज्ञेयार्थम्''
अतः मुझे भी गीता मानस के इस नये संस्करण को प्रस्तुत करते हुये दो कठिनाइयों का अनुभव हुआ कि इतने विपुल सहित्य के सामने मैं क्या छोड़ूँ और क्या लिखूँ /
श्रीमद् भगवद् गीता पर जो भी नये विचार और विश् लेषण अभी तक आयें हैं उनमें से किसका आश्रय लूँ /
इसके अतिरिक्त एक और दबाव मन में रहा कि नये भावों को देते समय ऐसा न हो कि यह पूरा ग्रंथ लोगों के लिये कठिन हो जाये / इन सभी बातों को ध्यान में रख कर मैने
अतः मुझे भी गीता मानस के इस नये संस्करण को प्रस्तुत करते हुये दो कठिनाइयों का अनुभव हुआ कि इतने विपुल सहित्य के सामने मैं क्या छोड़ूँ और क्या लिखूँ /
श्रीमद् भगवद् गीता पर जो भी नये विचार और विश् लेषण अभी तक आयें हैं उनमें से किसका आश्रय लूँ /
इसके अतिरिक्त एक और दबाव मन में रहा कि नये भावों को देते समय ऐसा न हो कि यह पूरा ग्रंथ लोगों के लिये कठिन हो जाये / इन सभी बातों को ध्यान में रख कर मैने
वर्तमान संस्करण में सरलता के साथ एक नये दृष्टिकोण को रखा है /
मैं रामचरित मानस की लयबद्धता के बाहर नहीं आ सकता और आना भी नहीं चाहता अतः परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्द जी के विचारों को यथा सम्भव लयबद्ध करके प्रस्तुत किया है / इसका यह अर्थ नहीं है कि भगवद् गीता के पूर्व प्रचलित पारम्परिक अर्थों की मैनें उपेक्षा की है बल्कि उनको भी गीता मानस में यथा स्थान दिया गया है / हो सकता है कहीं-कहीं शास्त्रीय और संस्कृतनिष्ठ शब्दों के यथावत प्रयोग की विवशता वश लयबद्धता में कुछ बाधा उत्पन्न हुई हो किन्तु गीता के मूल स्वर या भाव की उपेक्षा कहीं भी नहीं हुई है ऐसा प्रयत्न किया गया है /
यह मेरा विचार है कि गीता मानस का पाठ लोगों को रुचिकर लगेगा और वे उसका सस्वर गायन कर आनन्द का अनुभव करेंगे /
गीता मानस के अन्त में शब्द संकेत ,कठिन शब्दों के भावार्थ हेतु दिये गये हैं , ताकि पाठक आसानी से भावार्थ समझ सकें / अध्याय का सार एवं मीमांसा की अभिव्यक्ति तिरछेअक्षरों में की गई है /
// श्रीकृष्णार्पणमस्तु //
डॉ उदयभानुतिवारी ''मधुकर''
मैं रामचरित मानस की लयबद्धता के बाहर नहीं आ सकता और आना भी नहीं चाहता अतः परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्द जी के विचारों को यथा सम्भव लयबद्ध करके प्रस्तुत किया है / इसका यह अर्थ नहीं है कि भगवद् गीता के पूर्व प्रचलित पारम्परिक अर्थों की मैनें उपेक्षा की है बल्कि उनको भी गीता मानस में यथा स्थान दिया गया है / हो सकता है कहीं-कहीं शास्त्रीय और संस्कृतनिष्ठ शब्दों के यथावत प्रयोग की विवशता वश लयबद्धता में कुछ बाधा उत्पन्न हुई हो किन्तु गीता के मूल स्वर या भाव की उपेक्षा कहीं भी नहीं हुई है ऐसा प्रयत्न किया गया है /
यह मेरा विचार है कि गीता मानस का पाठ लोगों को रुचिकर लगेगा और वे उसका सस्वर गायन कर आनन्द का अनुभव करेंगे /
गीता मानस के अन्त में शब्द संकेत ,कठिन शब्दों के भावार्थ हेतु दिये गये हैं , ताकि पाठक आसानी से भावार्थ समझ सकें / अध्याय का सार एवं मीमांसा की अभिव्यक्ति तिरछेअक्षरों में की गई है /
// श्रीकृष्णार्पणमस्तु //
डॉ उदयभानुतिवारी ''मधुकर''
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