ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीमद् भगवद् गीता माहात्म्य
चौपाई;-
अति सुपुनीत शास्त्र यह गीता /नित्य पढ़हिं जो भक्त सप्रीता //
विष्णु अमरपद हरि का पावें/भवभय,दुख तेहिनिकट न आवें//
जो निशिदिन यह गीता गाये/ प्राणायाम सविधि अपनाये//
वर्तमान अरु पूर्व जन्म के / विनशहिं पाप दोष सब उनके//
जिमि निर्मलजल से कर मज्जन/तनकी शुद्धि करहिं साधकजन//
वैसे ही गीता जल पावन / जगत अशुद्धि विकार नशावन//
गीता मानस पढ़े विचारे / भाव सहित फिर मन में धारे//
यह कर्तव्य कर्म निज जानी / करे अवश्य पुरुष जो ज्ञानी//
पद्मनाभ हरिमुख से निःसृत/ जिससे है यह विश्व प्रकाशित//
उसमें जो ज्ञानी रम जाये / उसे न अन्य शास्त्र मन भाये//
कुन्तीसुतहिं भक्त निज जानी / गूढ़ तत्त्व हरि कहा बखानी//
अमियरूप गीता गंगाजल / पान करे सो मति हो निर्मल//
दिव्य पुरुष में जाय समाये / मुक्ति पुनर्जन्मों से पाये//
सर्वोपनिषद धेनु यह गीता / तासु अमियपय परम पुनीता//
अर्जुन वत्स कीन्ह पय पाना/ दोहक स्वयं कृष्णभगवाना//
गीतामृत पयपियहिं सुधीरा/होय विमलमति विरुजशरीरा//
दोहा;-
देवकी नन्दन कृष्ण ने ,निज मुख किया बखान //
एकमेव सब शास्त्र में , गीता शास्त्र महान //
योगेश्वर श्रीकृष्ण ही , सब देवों के देव /
महामंत्र यह नाम है , देव न जाने भेव //
कर्म एक ही श्रेष्ठ है , ॐ कृष्ण का जाप /
''उदयभानु'' उस ब्रह्म को, भजे मिटें भव ताप //
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