Sunday, May 3, 2015

                         ॐ श्रीपरमात्मने नमः

                 श्रीमद् भगवद् गीता माहात्म्य

चौपाई;- 
अति सुपुनीत शास्त्र यह गीता /नित्य पढ़हिं जो भक्त सप्रीता //
विष्णु अमरपद हरि का पावें/भवभय,दुख तेहिनिकट न आवें//
जो  निशिदिन  यह गीता  गाये/ प्राणायाम सविधि अपनाये//
वर्तमान अरु पूर्व जन्म के  / विनशहिं  पाप  दोष  सब उनके//
जिमि निर्मलजल से कर मज्जन/तनकी शुद्धि करहिं साधकजन//   
वैसे ही गीता  जल  पावन / जगत अशुद्धि  विकार नशावन//
गीता मानस पढ़े विचारे / भाव  सहित  फिर  मन  में  धारे//
यह कर्तव्य कर्म निज जानी / करे  अवश्य  पुरुष जो ज्ञानी//
पद्मनाभ हरिमुख से निःसृत/ जिससे है यह विश्व प्रकाशित//    
उसमें जो ज्ञानी  रम जाये /  उसे  न  अन्य शास्त्र मन भाये//
कुन्तीसुतहिं भक्त निज जानी / गूढ़ तत्त्व हरि कहा बखानी//
अमियरूप गीता गंगाजल  / पान करे सो मति  हो निर्मल//
दिव्य  पुरुष  में  जाय  समाये / मुक्ति  पुनर्जन्मों  से  पाये//
सर्वोपनिषद धेनु यह गीता / तासु अमियपय परम पुनीता//
अर्जुन वत्स कीन्ह पय पाना/ दोहक स्वयं कृष्णभगवाना//      
गीतामृत पयपियहिं सुधीरा/होय विमलमति विरुजशरीरा//

दोहा;-
देवकी नन्दन कृष्ण ने ,निज मुख किया बखान //
एकमेव  सब   शास्त्र   में ,  गीता  शास्त्र  महान //
योगेश्वर    श्रीकृष्ण   ही ,  सब   देवों   के   देव /
महामंत्र   यह   नाम   है ,  देव   न   जाने  भेव //
कर्म  एक  ही  श्रेष्ठ  है  ,  ॐ   कृष्ण  का   जाप /
''उदयभानु''  उस  ब्रह्म  को, भजे  मिटें भव ताप //    

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