Monday, May 4, 2015

                    विषय प्रणयन 
दोहा;-
कुरुक्षेत्र रण  भूमि में , निज  मुख  श्री भगवान / 
भक्त जानि अतिपरमप्रिय, दिया पार्थ को ज्ञान //
जेहि पुराणमुनि व्यास ने, अन्तः में कर ध्यान /
लिखा  लोक कल्याण हित, गीता शास्त्र महान //
सो   अद्वैत   विवेचनी  ,  सुधा  वर्षिणी  अम्ब /
अष्टादश  अध्याय   से  , युक्त  योग  अवलम्ब //
हे जग तारिणि भगवती , गीता मन अभिराम /
तव चिंतनकर ध्यानमें,पुनि पुनि करहुँ प्रणाम //

चौपाई;- 
सुरभित सरसिज नयन विशाला / श्रेष्ठबुद्धि  हे व्यास कृपाला // 
पुनि पुनि बन्दहुँ पद मुनि राया/नमन करत मन अतिहर्षाया //
तेलपूर्ण दीपक भारत में  / ज्ञान  प्रकाश  किया जन हित  में //
भक्त   कल्पतरु   अन्तर्यामी /  ज्ञान भाव  स्थित  हे  स्वामी //
गीता   अमृत   दोहन  कर्ता  / करहुँ  प्रणाम  कृष्ण जगभर्ता //
हे   वसुदेवपुत्र   यदुनंदन  /   कंस   और   चाणूर   निकन्दन //
मातु    देवकी   आनँद   दाता / जगदगुरु  हे   त्रिभुवन  त्राता //
जयजयजय तिरुपति योगेस्वर/ तुमहिं प्रणाम करहुँ विश्वेश्वर //
भीम,द्रोण तट रण सरिता के/ अति अगाधजल जयद्रथ जाके //
कुटिल मीन  गाँधार  नरेशा / शल्य  ग्राह  रण सरित  प्रदेशा //
कृपाचार्य तेहि  सरि की धारा /  कर्ण  उफान  महा  बरिआरा //
घोर मकर जिमि अतिबलधामा/ जहँ विकर्णअरु अश्वत्थामा //
दुर्योधन   है  भवँर  विशाला  /  डूबे  जिसमें  सकल  नृपाला //
सो  रण  सरिता  दुर्गम भारी  / नाविक जिसके कृष्ण मुरारी //

दोहा;-
निश्चय सो सरि  लाँघेउ , सहजहिं  पाण्डु  प्रवीर /
करहिं  सुरक्षा  भक्त  की , नित्य  कृष्ण  यदुवीर //
शब्द व्यास के अति विमल , पद्म समान सुगंध /
जिससे गीता तत्त्व  की, निकले अति शुचि गंध //
    
चौपाई;-
भिन्न भिन्न अति सरस प्रसंगा / जिसके केशर,हरिरसरंगा //
कथा ब्रह्म की ज्ञान विकाशा / श्रवण करत हिय करे प्रकाशा //
मुदमंगलमन सज्जनवृन्दा / पियहिं मधुपबन रसमकरन्दा //
सो   भारत-पंकज   अघहारी  /  है   कल्याणी   मंगलकारी // 
मूक कृपा से जिसकी बोले /  पंगु  चढें  गिरिवर बिन डोले //
ऐसे  परमानन्द  प्रदायक / श्रीकृष्ण प्रभु  त्रिभुवन  नायक //
  
दोहा;-
उन्हें करूँ पुनि पुनि नमन,चरण कमल धरि शीश /
कृपादृष्टि   प्रभु   कीजिये ,  विनय  करूँ  जगदीश //

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