विषय प्रणयन
दोहा;-
कुरुक्षेत्र रण भूमि में , निज मुख श्री भगवान /
भक्त जानि अतिपरमप्रिय, दिया पार्थ को ज्ञान //
जेहि पुराणमुनि व्यास ने, अन्तः में कर ध्यान /
लिखा लोक कल्याण हित, गीता शास्त्र महान //
सो अद्वैत विवेचनी , सुधा वर्षिणी अम्ब /
अष्टादश अध्याय से , युक्त योग अवलम्ब //
हे जग तारिणि भगवती , गीता मन अभिराम /
तव चिंतनकर ध्यानमें,पुनि पुनि करहुँ प्रणाम //
चौपाई;-
सुरभित सरसिज नयन विशाला / श्रेष्ठबुद्धि हे व्यास कृपाला //
पुनि पुनि बन्दहुँ पद मुनि राया/नमन करत मन अतिहर्षाया //
तेलपूर्ण दीपक भारत में / ज्ञान प्रकाश किया जन हित में //
भक्त कल्पतरु अन्तर्यामी / ज्ञान भाव स्थित हे स्वामी //
गीता अमृत दोहन कर्ता / करहुँ प्रणाम कृष्ण जगभर्ता //
हे वसुदेवपुत्र यदुनंदन / कंस और चाणूर निकन्दन //
मातु देवकी आनँद दाता / जगदगुरु हे त्रिभुवन त्राता //
जयजयजय तिरुपति योगेस्वर/ तुमहिं प्रणाम करहुँ विश्वेश्वर //
भीम,द्रोण तट रण सरिता के/ अति अगाधजल जयद्रथ जाके //
कुटिल मीन गाँधार नरेशा / शल्य ग्राह रण सरित प्रदेशा //
कृपाचार्य तेहि सरि की धारा / कर्ण उफान महा बरिआरा //
घोर मकर जिमि अतिबलधामा/ जहँ विकर्णअरु अश्वत्थामा //
दुर्योधन है भवँर विशाला / डूबे जिसमें सकल नृपाला //
सो रण सरिता दुर्गम भारी / नाविक जिसके कृष्ण मुरारी //
दोहा;-
निश्चय सो सरि लाँघेउ , सहजहिं पाण्डु प्रवीर /
करहिं सुरक्षा भक्त की , नित्य कृष्ण यदुवीर //
शब्द व्यास के अति विमल , पद्म समान सुगंध /
जिससे गीता तत्त्व की, निकले अति शुचि गंध //
चौपाई;-
भिन्न भिन्न अति सरस प्रसंगा / जिसके केशर,हरिरसरंगा //
कथा ब्रह्म की ज्ञान विकाशा / श्रवण करत हिय करे प्रकाशा //
मुदमंगलमन सज्जनवृन्दा / पियहिं मधुपबन रसमकरन्दा //
सो भारत-पंकज अघहारी / है कल्याणी मंगलकारी //
मूक कृपा से जिसकी बोले / पंगु चढें गिरिवर बिन डोले //
ऐसे परमानन्द प्रदायक / श्रीकृष्ण प्रभु त्रिभुवन नायक //
दोहा;-
उन्हें करूँ पुनि पुनि नमन,चरण कमल धरि शीश /
कृपादृष्टि प्रभु कीजिये , विनय करूँ जगदीश //
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