Sunday, May 3, 2015

​                  अथ तृतीयोsध्यायः 
दोहा;-
योगेश्वर के ध्यान में ,मन का कर संयोग /
अब तीजे अध्याय में लिखूँ कर्मणा योग // 

                 अर्जुन उवाच 
श्लोक;-
ज्यायसी  चेत्कर्मणस्ते  मता  बुद्धिर्जनार्दन /
तत्किं  कर्मणि घोरे  मां नियोजयसि केशव //१//

दोहा;-
बोले  अर्जुन  कृष्ण  से , हे   केशव   सर्वज्ञ /
ज्ञान श्रेष्ठ अरु मान्य है ,यदि कर्मों से विज्ञ //
चौपाई;-
तो मुझसे यह महाभयंकर / कर्म कराते क्यों योगेश्वर //

श्लोक;-
व्यामिश्रेणेव  वाक्येन  बुद्धिं  मोहयसीव  मे /
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोsहमाप्नुयाम् //२//

चौपाई;-
बोलतआप वचनसब मिश्रित / मनमोहे,है बुधि अतिचक्रित // 
साधन एक सुनिश्चित करिये / मम  कल्याण करे सो कहिये //

                           श्रीभगवानुवाच
 श्लोक;-
लोकेsस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ /
ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् //३//

चौपाई;-
यह सुनकर बोले  मधुसूदन / हे निष्पाप  पाण्डु  के  नन्दन  // 
दो प्रकार की निष्ठा जग में / कही  गई  पहले  तव  हित  में //
ज्ञानयोग को प्रथम सुनाया / फिर निष्काम कर्म समझाया //
ज्ञानमार्ग  से   ज्ञानी  जाये /  उसमे  परमसिद्धि  वह  पाये //
जो  निष्काम  कर्म  अपनाते / योगसिद्धि  उसमें  ही  पाते //
                                ज्ञानयोग 
जो गुण जिसके  अन्दर स्थित / उस गुण  से वहप्राणी प्रेरित //
मन ,इन्द्रिय  तन  पूर्ण क्रियायें / कर्तापन अभिमान न लायें //
ब्रह्मस्थित चित  आठों  यामा  / ज्ञान योग उसका  है  नामा // 
सांख्ययोगकह कुछ जन जाने / कुछ  संन्यासयोग कहमाने //

                         निष्कामकर्मयोग 
दोहा;- 
कर्तव्यकर्म जो   जन करहिं,फलासक्ति को त्याग /                 
बुद्धियोग , मत्कर्म   वह  , मनमें   जगे  न  राग //
कुछ तदर्थ ,निष्काम कुछ , कहते  समता  योग /
कर्म   योग   यह  जानिये , यही  सिद्धि  संयोग //
                          निष्कर्मता 
जिस स्थिति  को प्राप्त कर,होते कर्म अकर्म /
वह स्थिति  निष्कर्मता , योगी  जाने  मर्म //

चौपाई;-
जहाँ कर्म ,फल नहिं उपजाये / वह निष्कर्म स्थिति कहलाये //

श्लोक;-
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोsश्नुते /
सन्न्यसनादेव    सिद्धिं   समधिगच्छति //४//

चौपाई;- 
कर्मारम्भ  किये  बिन  कोई / पुरुष  कबहुँ  योगी  नहिं होई //
या  अंतिम स्थिति नहिं पाये / जहँ  निष्कर्म योगि हो जाये // 
और  न   यज्ञकर्म   परित्यागी / मोक्ष  सिद्धि  पाये  वैरागी //

श्लोक;-
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत /
कार्यते   ह्यवशः   कर्म  सर्वः  प्रकृतिजैर्गुणैः //५//

चौपाई;-
कोई भी नर किसी काल में / क्षण  भर  भी  उस अन्तराल में //
कर्मकिये  बिन  रहे   न   कोई / वचन  सत्य  संदेह  न  होई //
परवश प्रकृतिजनित गुण द्वारा / कर्मबाध्य है यह जग सारा //

श्लोक;-
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य  आस्ते मनसा स्मरन् /
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स  उच्यते //६//

दोहा;-
मन्दबुद्धि नर जो करे ,इन्द्रिय दमन बलात् /
विषयरती मन से रहे , वह दम्भी  कहलात //

श्लोक;-
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेsर्जुन / 
कर्मेन्द्रियैः  कर्मयोगमसक्तः  स  विशिष्यते //७//

चौपाई;-
किन्तु पार्थ निज मनसे जो नर / सर्वइन्द्रियाँ राखे वश कर //
अनासक्त   हो   इन्द्रिय   द्वारा  /  करते  कर्मयोग  आचारा //
वह विरक्त योगी अरु ध्यानी / है  वह  श्रेष्ठ  तत्व  विज्ञानी //

श्लोक;-
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः /
शरीरयात्रापि च  ते  न  प्रसिद्ध्येदकर्मणः //८//

चौपाई;-
कर कर्त्तव्य कर्म अस जानी / शास्त्रविहित  जस  करते  ज्ञानी //
अकर्मण्य  होने  से  जग  में /  कर्म  श्रेष्ठ  मानव   जीवन  में //
कर्म कियेबिन तव जीवन का / नहिं निर्वाह सिद्ध हो तन का //

श्लोक;-
यज्ञार्थात्कर्मणोsन्यत्र लोकोsयं कर्मबन्धनः/
तदर्थं   कर्म  कौन्तेय  मुक्तसङ्गः  समाचर //९//

चौपाई;-
यज्ञकर्म अतिरिक्त, मनुज के / शेष कर्म बन्धन इस जग के //
अन्य कर्मरत सब नर वृन्दा / उलझें  जन्म  मृत्यु  के  फंदा //
इससे अनासक्त ही  रह  कर /  यज्ञ  हेतु  कर्तव्य  कर्म  कर //

श्लोक;-
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा   पुरोवाच  प्रजापतिः /
अनेन  प्रसविष्यध्वमेष वोsस्त्विष्टकामधुक् //१०//

चौपाई;-
विधि ने जब यह जगत रचाया / मख के सहित प्रजहिं उपजाया //
प्रजहिं  कहा   यज्ञों  के  द्वारा / हो  विवृद्धि   तव   वचन  हमारा //
होगा  यज्ञ  तुम्हार   सहायक / इच्छित   भोग  ऐश्वर्य  प्रदायक //

प्रजा  मूल  उदगम   पमेश्वर / उसमें  प्रविशे   जो   योगी   नर //
महा पुरुष है  वही   प्रजापति / ब्रह्मा  है  बुद्धी   की   परिणति //
होय  यन्त्रवत   बुद्धि  न   डोले / उस  वाणी   में  ईश्वर  बोले // 

श्लोक;-
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः /
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ //११//

दोहा;-
सबमिल  उन्नत कीजिये, देवों को कर यज्ञ /
सर्वदेव  तुम  को  करें , उन्नत और  गुणज्ञ //
आपस में उन्नत करें ,देव मनुज निःस्वार्थ /
होय परम कल्याण जो ,कर्म करहु परमार्थ //
चौपाई;-
करहु यज्ञ निज को कर अर्पित ,दैवी सम्पद गुण हो अर्जित //
तब समृद्धि स्वयं तुम पाओ / जितनी  दैवी  शक्ति  जगाओ //

श्लोक;-
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दासयन्ते यज्ञभाविताः /
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो   यो   भुङ्क्ते  स्तेन  एव सः //१२//

चौपाई;-
उन्नति पाय यज्ञ से सुरगण / तुमको बिन मागे ही तत्क्षण //
निश्चित  ही देंगे इच्छित फल / भोग,ऐश्वर्य रूप में प्रतिफल //
एहिविधि देवों  से  जो  पाये / अर्पण  बिना  भोग  में  लाये //
अथवा पूर्णसिद्धि बिन पाये / वह स्थिति  उपभोग में लाये //
निश्चय ही वह चोर कहाये / भृष्ट  होय  पथ  च्युत  हो जाये //

श्लोक;-
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो   मुच्यन्ते  सर्वकिल्बिषैः /
भुञ्जते  ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् //१३//

चौपाई;-
यज्ञ अवशेष अन्न जो खाते / वे  जन  पाप  मुक्त  हो  जाते //

जब निष्काम कर्म नर करते / सर्व  कर्मफल  संचित  रहते //
वहफल ब्रह्म अन्न कहलाये / उस फल  को जो जो भी पाये //
वे जन पापमुक्त हो  जायें / भवसागर  में  पुनि  नहिं आयें // 

निज तन पोषण अन्न पकायें  / वे पापी नर पापहिं खायें //

यज्ञ सकाम पुरुष जो करते / कर्मों  के फल  शेष  न  बचते //
नश्वर तन हित  कर्म पचाते  / भोग ,काम में जन्म गवाँते //
वे  पापायु  पुरुष  कहलायें  / अरु  प्रत्यक्ष  पाप  ही  खायें //

श्लोक;-
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः /
यज्ञाद्भवति   पर्जन्यो   यज्ञः   कर्मसमुद्भवः //१४//
कर्म    ब्रह्मोद्भवं   विद्धि   ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् /
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् //१५//

छन्द;-
है  जन्म  दैवी  सम्पदा  का  ब्रह्मरूपी  अन्न  से //
होती कृपा की वृष्टि उस, परब्रह्म  के  सौजन्य से //
वह वृष्टि होती यज्ञ से, अरु  पूर्व  संचित कर्म से //
उन सर्व कर्म समष्टि की, उत्पत्ति वैदिक धर्म से //
दोहा;-
वेदो  की   उत्पत्ति   को , अविनाशी  से  जान /
धर्मशास्त्र अरु वेद सब , करहिं जासु गुणगान //
इससे  होता  सिद्ध  यह , जो  व्यापक  सर्वज्ञ /
वह  परमाक्षर  ब्रह्म  ही ,  रहे  प्रतिष्ठित  यज्ञ // 

श्लोक;-
एवं   प्रवर्तितं   चक्रं   नानुवर्तयतीह   यः /
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पर्थ स जीवति //१६//

दोहा;-
भारत  इस  नर  लोक  में , सृष्टिचक्र   अनुकूल /
करहिं न जो कर्त्तव्य निज,चलहिं सदा प्रतिकूल //
इन्द्रिय द्वारा वे  सदा , रहहिं  लीन  निज  भोग /
पाप आयु  नर सृष्टि के , व्यर्थ जियहिं वे  लोग //

श्लोक;-
यस्त्वात्मरतिरेव   स्यादात्मतृप्तश्च  मानवः /
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते //१७//

चौपाई;-
आत्मा में जो रमण करे नर / तृप्त होय आत्मा में रह कर //
आत्मतुष्ट जग में जो होई / उस नर हित कर्तव्य न कोई //

श्लोक;-
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह  कश्चन /
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः//१८//

चौपाई;-
इसजग में वह निष्पृह रहता / उसहित कर्म अर्थ नहिं रखता //
नहिं  अकर्म  से  उसे   प्रयोजन / अन्तःस्थित  रहता अर्जुन //
प्राणिजगत से स्वारथ नाता /  नहिं राखे किंचित वह ज्ञाता //

श्लोक;-
तस्मादसक्तः सततं  कार्यं कर्म समाचर /
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः//१९//

चौपाई;-
सो आसक्ति रहित हो निस्पृह / सब विधि तू कर्त्तव्यव्रती रह //
कर्म  करे   आसक्ति  न  आये / सो  नर  परमब्रह्म  को  पाये //

श्लोक;-
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जानकादयः /
लोकसङ्ग्रहमेवापि   सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि //२०//

चौपाई;-
योग जनक का रूप प्रदाता /योगयुक्त नर  जनक कहाता // 
प्रथममहर्षि ब्रह्मविज्ञानी / मुनि,जनकादि  हुये जो ज्ञानी //
अनासक्त   हो   कर्मों   द्वारा /  परमसिद्धि   पाई  संसारा //
इससे लोकसंग्रहण लखकर / तू  है कर्मयोग्य,हो तत्पर //

श्लोक;-
यद्यदाचरति   श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो   जनः / 
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते //२१//

चौपाई;-
जो आचरण श्रेष्ठ  नर  करते / वैसा अन्य  पुरुष  अनुसरते //
जोभीकर्म ग्यानिजन करते / वे सब शास्त्र सुसम्मत रहते //
वह प्रमाण जो देकर जाते / वही जगत  व्यवहार  में आते //

श्लोक;-
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन /
नानवाप्तमवाप्तव्यं   वर्त  एव   च    कर्मणि //२२//

दोहा;-
मुझको कहुँ तिहुँलोक में , है  कर्त्तव्य न कोय /
प्राप्य न ऐसी वस्तु जो ,मोहिं प्राप्त नहिं होय //
चौपाई;-
तदपि कर्मव्रत पालन करता / नित्य कर्म अनुसार बरतता //

श्लोक;-
यदि ह्यहं  न वर्तेयं जातु  कर्मण्यतन्द्रितः /
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः //२३//

चौपाई;-
यदि सतर्क नहिं रहूँ यथारथ / करूँ कर्म व्यवहार न पारथ //
तब तो बड़ी हानि हो जाये / नर मम पथ अनुसारहिं धाये //

श्लोक;-
उत्सीदेयुरिमे  लोका  न  कुर्यां   कर्म  चेदहम् /
सङ्करस्य च कर्ता  स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः //२४//

चौपाई;-
जो नहिं रहौं कर्मव्रत धारी / नष्ट भ्रष्ट हों मानुष झारी //
संकरता कारक कहलाऊँ / सर्वप्रजा नाशक बन जाऊँ // 

श्लोक;-
सक्ता: कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत /
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् //२५//

चौपाई;-
कर्मासक्त पुरुष अज्ञानी /  कर्म  करें  ज्यों,  भारतज्ञानी //
वैसेई अनासक्त मतिधीरा / कर्म  करें जग पुरुष गँभीरा //
मन नहिं रहे महात्वाकांक्षा / करे लोक संग्रह आकांक्षा //

श्लोक;-
न  बुद्धिभेदं     जनयेदज्ञानं     कर्मसंज्ञिनाम् /
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् //२६//

चौपाई;-
शास्त्रविहित सब कर्म  कराते / कर्मासक्ति त्याग  नहिं   पाते //
ऐसे   जो   नर    हैं   अज्ञानी /  उनको   परतत्व   के   ज्ञानी //
जो   हैं  ब्रह्मरूप   में   स्थित / अटल   और  मर्मज्ञ प्रतिष्ठित //
उन्हें चाहिये अज्ञानिन्ह की / मति में स्थिति करें न भ्रमकी //
उनके मन  न अश्रद्धा  लाये / शास्त्रविहित   सब  करे,कराये // 

श्लोक;-
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः /
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति  मन्यते //२७//

चौपाई;-
अर्जुन  सर्व  कर्म  संसारा / होते  प्रकृति  गुणों  द्वारा //
दोहा;-
तदपि जासु  अन्तःकरण , मोहे दम्भहिं  आन /
मैं   कर्ता  यों   मानता ,  वही    पुरुष  अज्ञान //                     
श्लोक;-
तत्त्ववित्तु    महाबाहो   गुणकर्मविभागयोः /
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते //२८//

चौपाई;-
किन्तु महाबाहो हे अर्जुन / गुण अरु कर्म भेद ज्ञाता जन //      
जो निर्लिप्त आत्मा जाने / बरतत सब गुण में गुण माने //
ऐसा पुरुष तत्व गुण ज्ञाता / मोहासक्त होय नहिं  ताता //     

श्लोक;-
प्रकृतेर्गुणसम्मूढ़ाः    सज्जन्ते     गुण     कर्मसु /
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् //२९//

चौपाई;-
जो  अपूर्ण   नासमझ  अजानी / या  जो  अल्पबुद्धि  अज्ञानी //
प्रकृति गुणों  हैं अति मोहित / नर गुण कर्मशक्ति से क्षोभित //
उनको पूर्ण कर्म विज्ञानी / करें न  विचलित  पण्डित  ज्ञानी //

श्लोक;-
मयि सर्वाणि कर्माणि सन्नस्याध्यात्मचेतसा /
निराशीर्निर्ममो  भूत्वा  युध्यस्व  विगतज्वरः //३०//

चौपाई;-
मुझ में निज मन करके अर्पित / सर्व कर्म कर मुझे समर्पित //
तज संताप,आश अरु ममता / उठ कर युद्ध शोक क्यों करता //

श्लोक;-
ये   मे   मतमिदं  नित्यमनुतिष्ठन्ति  मानवाः /
श्रद्धावन्तोsनसूयन्तो मुच्यन्ते तेsपि कर्मभिः //३१//

चौपाई;- 
दोषदृष्टि  से  रहित  हुये  नर /  श्रद्धाभाव   भक्तियुत  होकर //  
निशिदिन जो मम मत अनुसरते / वे विमुक्त कर्मों से रहते //

श्लोक;-
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् /
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि      नष्टानचेतसः //३२//

चौपाई;-
किन्तु दोष जो मुझमें  लखते /  मेरे  मत अनुसार न चलते //
उनको तुम विमूढ़ ही जानो / ज्ञान विमोहित नाशित मानो //                                                                 
श्लोक;-
सदृशं    चेष्टते    स्वस्याः   प्रकृतेर्ज्ञानवानपि /
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति //३३//

दोहा;-
निज स्वभाव परवश हुये , कर्म करें सब जीव /
करहिं चेष्टा ज्ञानि जन , जैसी  प्रकृति सजीव // 

चौपाई;-
फिर भी जगत प्रकृति के आगे / किसी हठी का जोर न लागे //

श्लोक;-
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ /
तयोर्न  वशमागच्छेत्तौ  ह्यस्य  परिपन्थिनौ //३४//

चौपाई;-
सब इन्द्रिय विषयों में निश्चित / राग,द्वेष छिप कर हैं स्थित //
होवे नहिं नर वश में  उनके / बाधक  दुश्मन  वे  सतपथ  के //

श्लोक;-
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् /
स्वधर्मे   निधनं   श्रेयः   परधर्मो   भयावहः //३५//

चौपाई;-
सदाचरणयुत अन्य धरम से / विगुण धर्म निज उत्तम सबसे //
पार्थ स्वधर्म कर्म रत रह कर / मरना  भी  जग में  श्रेयस्कर // 
भयदाई   है   धर्म   पराया / शास्त्रों   ने   भी   यही   बताया //

                           अर्जुन उवाच 
श्लोक;-
अथ   केन   प्रयुर्क्तोsयं   पापं  चरति  पूरुषः /
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः //३६//

चौपाई;-
ज्ञानोपदेश ब्रह्म मुख वाणी / सुन कह पार्थ जोरि जुगपाणी //
क्यों  हे केशव कृपानिधाना / अनचाहे  फिर  नर  अज्ञाना //
किससे  विवश हुआ एहिभाँती / प्रेरित पाप करे दिन राती //

                       श्रीभगवानुवाच        
श्लोक;-
काम    ऐष    क्रोध   ऐष   रजोगुणसमुद्भवः /
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् //३७//

चौपाई;-
सुन जिज्ञासु वचन यदुनंदन / पुनि बोले हे कुन्ती नन्दन //
रजगुण से उत्पन्न काम है / इसी काम का क्रोध नाम  है //
यह  अतृप्त  बहु  भोगी  पापी / समझ  इसे  बैरी  संतापी // 

श्लोक;-
धूमेनाव्रियते   वन्हिर्यथादर्शो  मलेन  च /
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् //३८//

दोहा;-
धूम्र ढँके ज्यों आग को , दर्पण ढाँके मैल /   
गर्भ ढँका रह जेर से , अन्धकारमय गैल //
चौपाई;-
उसीप्रकार काम के द्वारा / ज्ञान ढँका रहता है सारा //

श्लोक;-
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा /
कामरूपेण  कौन्तेय  दुष्पूरेणानलेन  च //३९//

चौपाई;-
पावकसम यह कामकराला / कबहुँ न शान्त होय यह ज्वाला //
ज्ञानिन्ह के रिपु मनसिज द्वारा /  ज्ञानाच्छादित  रहता सारा //

श्लोक;-
इन्द्रियाणि मनो बुद्धरस्याधिष्ठानमुच्यते /
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य  देहिनम् //४०//

चौपाई;-
बुद्धि ,इन्द्रियाँ अरु मन सबके / स्थल कहे गये मनसिज के // 
इनसे  ढाँके  ज्ञानहिं  कामा / भटकत  जीव  मोह की यामा //

श्लोक;-
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ /
पाप्मानं प्रजहि  ह्येनं  ज्ञानविज्ञाननाशनम् //४१//

चौपाई;-
इससे अर्जुन सबसे  पहले / सभी इन्द्रियाँ  वश  में  करले //  
फिर विज्ञान,ज्ञान का नाशक / पापी-कामशत्रु जो त्राशक //
उसको निश्चित अपने बल से / मार डाल  पहले ही सबसे //  

श्लोक;-
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः /
मनसस्तु परा  बुद्धिर्यो  बुद्धेः  परतस्तु  सः //४२//

चौपाई;-
भौतिक तन से श्रेष्ठ इन्द्रियाँ / बलशाली अरु सूक्ष्म शक्तियाँ //
इनसे  ऊपर  मन  को  जानो / मन से  बुद्धि  श्रेष्ठ  है  मानो //
उससे   भी  आतम   है  उत्तम /  यह  ब्रह्मांश परम सर्वोत्तम //
                                               
श्लोक;-
एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा  संस्तभ्यात्मानमात्मना /
जहि   शत्रुं   महाबाहो    कामरूपं    दुरासदम् //४३// 

दोहा;-
महाबाहु  ! यों  बुद्धि  से , परे   आत्मा   जान /
वशकर मनको बुद्धिसे, जित रिपु काम महान //
कर्मयोगयुत  ज्ञान  का , यह  तीजा  अध्याय /
पढ़ पढ़ कर जिज्ञासुमति ,कर्म प्रवृत हो जाय // 

 इस प्रकार श्रीमद् भगवद् गीता रूपी उपनिषद एवं ब्रह्म विद्या तथा   योगशास्त्र विषयक  श्रीकृष्ण  और  अर्जुन  के   संवाद   में  उदयभानु  तिवारी''मधुकर''  कृत  महाकाव्य ''गीतमानस'' में शत्रुविनाश प्रेरणा  नामक तीसराअध्याय पूर्ण हुआ /


                                       हरि ॐ तत्सत्  
     
  

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