Sunday, April 19, 2015

                  अथ चतुर्थोsध्यायः  
दोहा;-
अब अतिगूढ रहस्यमय गीता में जो ज्ञान /
वरणहुँ  जैसा  जानते , योगिराज, विद्वान //

                  श्रीभगवानुवाच 
श्लोक;-
इमं  विवस्वते  योगं   प्रोक्तवानहमव्ययम् /
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेsब्रवीत् //१//

दोहा;-
भगवन बोले पार्थ  सुन ,यह अविनाशी योग /
प्रथम सुनाया सूर्य को ,तव हित नव  संयोग //
चौपाई;-
वैवस्वत  मनु  को  रवि  द्वारा / कहा  गया  यह  योग  दुबारा //
मनु  के  सुत  इक्ष्वाकु  नृपाला / सुना जनक से योग निराला // 
एहिविधि पार्थपरन्तप ज्ञानी / नृपकुलरीति नृपन्हसुत जानी // 

श्लोक;-
एवं  परम्पराप्राप्तमिमं  राजर्षयो  विदुः /
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप //२//

चौपाई;-
अनुक्रम प्राप्त योग कर ज्ञाना / फिर सब राजऋषिन्ह ने जाना //
तदोपरान्त  काल बहु  गयऊ / प्रायः  योग   लुप्त  महि  भयऊ //
दोहा;-
पाय  जगदगुरु  प्रेरणा , जो  हैं  विश्वाधार /
कहहुँ गूढ़ भावार्थ अब,योगी मत अनुसार // 
चौपाई;-
स्वयं प्रकाशित ब्रह्म  दिनेशा / रहे  नित्य  सबके  हिय  देशा //
कृपा  दृष्टि  कर  प्रभु  जब  हेरें  / योग  सुसंस्कार  हिय  प्रेरें //
जब  हरि जाप श्वास  में आये / तबहिं कल्प आरम्भ कहाये //
श्वास श्वास हो  नाम प्रसारित / अन्तर्मन को करे प्रकाशित // 
श्वासा संस्कार जब पाये / हरि ,रवि योग  कथन  कहलाये //
जाप श्वास से मन में आये / जानहु रवि मनु योग सिखाये //
मनमें जगे योग जिज्ञासा / प्राप्ति  हेतु  मन  करे  प्रयासा //
मन ही मनु इच्छा इक्ष्वाकू / योग सिखाये यह मन ताकू //
जब आराधन गति में आये / ऋषि राजर्षि श्रेणि नर पाये //
योग  शक्ति  जब  बढे  अपारा / होवे  ऋद्धि सिद्धि संचारा //
दोहा;-
योग क्रिया की पूर्णता, करे कर्म से मुक्त /
पाय परम पद आत्मा , होय ब्रह्म संयुक्त //

श्लोक ;-
 स एवायं मया तेsद्य योगः  प्रोक्तः  पुरातनः /
भक्तोsसि मे सखा चेति रहस्यं  ह्येतदुत्तमम् //३//

चौपाई;-
तू मम भक्त सखा अति  प्यारा / इससे  योग  पुरातन  न्यारा //
वही  आज  फिर  तुझे   सुनाया / गूढ़  रहस्य  न  कोई  पाया //
गोपनीय विषयक यह ज्ञाना / बिन ममकृपा नजानहिं आना //

                             अर्जुन उवाच 

श्लोक;-
अपरं भवतो जन्म  परं  जन्म  विवस्वतः /
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति //४//

चौपाई;-
बोले  अर्जुन  पुनि  कर  जोरे / उपजा  संशय  कछु  मन  मोरे //
सूर्य  जन्म  है  बहुत  पुराना / आदिकल्प  से सब जग जाना //
जन्म अबहिं  का तव  गिरिधारी / समझे  कैसे  बुद्धि  हमारी //
आदिकल्पमें निज मुखसे कह / योग सुनाया था रवि को यह //

हे   माधव   हे   कृष्ण  मुरारी / मेरे   मन  कौतूहल  भारी //
मुझ में  पुरा  सुरा  संचारा / है अबहीं  का  जन्म  तुम्हारा //
तब  हे  केशव  यदुकुल  भानू / मैं  इसको  कैसे सच मानू //
भजन पूर्व तुमने ही न्यारा / योग रहस्य कहा अतिप्यारा //

                         श्रीभवानुवाच 

श्लोक;-
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन /
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं  वेत्थ  परन्तप //५// 
                    
दोहा;-
पार्थ   परन्तप   सृष्टि  में , जितने  जन्म  हरेक /
मेरे   अरु   तेरे   हुये , जग   में   जन्म   अनेक //
मैं  उन  सब  को  जानता , तू  उनसे  अनजान /
प्रकृति गुणों के वश हुआ ,बिसरगया सब ज्ञान //

श्लोक;-
अजोsपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोsपि सन् /
प्रकृतिं   स्वामधिष्ठाय    सम्भवाम्यात्ममायया //६//
       
चौपाई;-
मैं अविनाशी रूप  अजन्मा / प्राणिजगत  कर ईश  सृजन्मा //
तदपि पार्थ मानुषतन धरके / निजआधीन प्रकृति को करके //  
धर साकार रूप की छाया / महि में  प्रगटूँ  कर  निज  माया //  

श्लोक;-
यदा  यदा  हि  धर्मस्य  ग्लानिर्भवति  भारत /
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् //७//

चौपाई;-
होय धर्म  की जब जब हानी / भक्तों के मन  उपजे  ग्लानी //
बढ़हिं अधर्मी जन  कुविचारी / जागहिं असुर वृत्तियाँ सारी //
तब तब धर साकार स्वरूपा / प्रगट करूँ निज रूप  अनूपा //    

श्लोक;-
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् /
धर्मसंस्थापनार्थाय  सम्भवामि  युगे  युगे //८//

चौपाई;-
पापकर्मरत   कर   संहारा /  करने  साधु  पुरुष  उद्धारा //
धर्म स्थापन हेतु जगत में / प्रगटूँ मैं अर्जुन हर युग में //  

श्लोक;-
जन्म कर्म च मे  दिव्यमेवं  यो  वेत्ति  तत्त्वतः /
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोsर्जुन //९//

चौपाई;-
जन्मकर्ममम दिव्यधनंजय / निर्मलऔरअलौकिकअव्यय //
जिसनेमुझे तत्त्वसेजाना / तनतज जन्म धरहिं नहिं आना //    
उसकी दिव्य आत्मा ज्योती / मुझमें  लीन  सदा को होती //

                      ब्रह्मतत्त्वज्ञानी  
सदासच्चिदानन्दघन  , अज   अविनाशी   रूप /
सब  भूतों  की  परमगति , आश्रय  श्रेष्ठ  अनूप //
सर्व  शक्ति   के  पुंज  हरि , करने   जग  उद्धार /
धर्म  स्थापन  हित धरहिं ,परमपुरुष  अवतार //
निज माया के योग से ,दिव्य  अलौकिक  रूप /
प्रगटकरहिं  इससृष्टि में ,अदभुत सगुणस्वरुप //
पतितों के  पावन सुहृद , ईश्वर सम नहिं आन /
ऐसा हिय से   मानते ,जो   मनुष्य  मतिमान //
कर अनन्यचितचिंतवन,प्रीति न हृदयसमात /
अनासक्त  हो  सृष्टि  में ,जो  बरतत दिन रात //
वही  मनुज  परब्रह्म  को , परमतत्त्व से जान /
परमेश्वर  को  तत्त्व  से, और  न  जाने  आन //

श्लोक;-
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः /
बहवो  ज्ञानतपसा  पूता  मद्भावमागताः //१०//

चौपाई;-
पहले भी जिन योगीजन के / विनशे  क्रोध  राग भय मन के //
प्रीति अनन्य ,अमिय रस सानी / रहे सुस्थित मुझ में ज्ञानी //
मम आश्रित यों भक्त अनेका / ज्ञानरूप तप कर चित  एका //
भये  पुनीत देह  तज  आये / मम  स्वरुप  में  आन  समाये // 

श्लोक;-
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् /
मम वर्त्मानुवर्तन्ते  मनुष्याः  पार्थ  सर्वशः//११//

चौपाई;-
भक्तभजहिं जेहि विधि से मोहीं / मैं भी भजूँ उसीविधि ओहीं // 
क्योंकि पार्थ सबविधि जग सारा / करे मार्गअनुसरण हमारा //

श्लोक;-
काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धि यजंत इह देवताः /
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति  कर्मजा //१२//

चौपाई;- 
जो  फल  आकांक्षी   जन   रहते /  वे  देवों  की  पूजा   करते //
क्योंकि कर्म उत्पन्न सिद्धि ही / शीघ्र उन्हें मिलजातीं सबही //

श्लोक ;-
चातुर्वर्ण्यं   मया    सृष्टं   गुणकर्मविभागशः /
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् //१३//

चौपाई;- 
मैंने  चारों   वर्ण   बनाये / गुण   अरु   कर्म   वर्ग   ठहराये //
शूद्र,वैश्य ,क्षत्रिय अरु ब्राह्मण/ कर्म प्रवृत्त किये सब तत्क्षण // 
 मैं  अविनाशी  सब  जग  भर्ता / सृष्टि सृजनकर्ता , संहर्ता //
तब भी सत्य जान ले मन में / रहूँ अकर्ता अखिल भुवन में //

जो अव्यक्त  ब्रह्म  में  स्थित / उनकी   सेवा   में   रहते   नित //
करहिं  नित्य  साधक  सतसंगा / जागे  विरति मोह  हो भंगा //
ब्रह्म   साधना  में  अनुरागे / ब्रह्म  कथा  अति  रुचिकर  लागे //
तामस  गुण   जब   सकल  सिराये / शूद्रवर्ण  से  ऊपर  आये //
पुनिराजसगुण करहिं प्रवेशा /कछु गुणसत्त्व  जगहिं हियदेशा // 
आत्मिक धन अर्जन अनुरागे / इन्द्रिय  संयम  में  मन लागे //
साधन की जब क्षमता  आये / वैश्य  वर्ण   वह जन  कहलाये //
कर्म प्रवृति से चित नहिं फेरें /अटल  स्वभाव  ब्रह्म  हिय  हेरें //
सब  भावों  में  स्वामी  भाऊ / तिर्गुण  काटे  सहज  स्वभाऊ //
यह क्षमता जब वह  जन पाये /क्षत्रि  वर्ण  साधक  कहलाये //
जब अति सूक्ष्मकर्म  होजायें /सत्त्व छोड़ गुण सकल बिलायें //
दोहा;-
इन्द्रि दमन अरु मनसमन ,सरल चित्त हरि ध्यान / 
सहजहिं लगे  समाधि सो ,विप्र  वर्ण  हिय  जान //
प्राप्त   करे   वह    ध्यान    में ,  ईश्वरीय    निर्देश /
जब  इससे   ऊपर   उठे , हरि   में   करे   प्रवेश //

श्लोक;-
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा /
इति मां योsभिजानाति कर्मभिर्न  स  बध्यते //१४//

दोहा;-
कर्मों के फल में  नहीं , मम  आकांशा  होय /
इससे मुझको कर्म भी ,लिप्त करें नहिं कोय //
चौपाई;-
मोहिं तत्त्व से जो जन जाने / कर्मबंध नहिं बँधहिं सयाने //

श्लोक;-
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः /
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् //१५//   

चौपाई;-
हुये  मुमुक्षु पुरुष जो  पहले / कर्म किये ऐसे ही सुनले //
तू भी पूर्व पुरुष की भाँती / किये कर्म ही कर  संगाती //

श्लोक;-
किं   कर्म   किमकर्मेति कवयोsप्यत्र   मोहिताः /
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेsशुभात् //१६//

चौपाई;-
क्या है कर्म, अकर्म  जगत में/होते भ्रमित बुद्ध इस मत में //
इससे यह सब तुझे  सुनाऊँ / कर्म तत्व  का  ज्ञान  कराऊँ //
जिसे जान तव मोह  नशाये / मुक्ति  कर्म  बंधन  से  पाये //

श्लोक;-
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः /
अकर्मणश्च बोद्धव्यं  गहना  कर्मणो गतिः //१७//

चौपाई;-
कर्म  अकर्म   स्वरूपहिं  जाने /  और  विकर्म  रूप  पहचाने //   
क्योंकिअर्जुन कर्मनकीगति / है अतिगहन नजानहिं दुर्मति //

श्लोक;-
कर्मण्यकर्म   यः  पश्येदकर्मणि  च  कर्म  यः /
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् //१८//

चौपाई;-
जो कर्मों में लखे अकर्मा / अरु अकर्म में देखे कर्मा //
सर्व कर्मकर्ता वह योगी / नर में श्रेष्ठ  ब्रह्म  संयोगी //

श्लोक;-
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः /
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं  बुधाः //१९//

दोहा;-
लौकिक वैदिक कर्म सब , शास्त्रयुक्त विधि होय /       
कर्म करे तज  कामना , मन  संकल्प  न  कोय //
भस्म हुये  ज्ञानाग्नि  में , जिसके  कर्म  समग्र /
उस नर को सब  विज्ञ  भी, कहते  पंडित  अग्र //

श्लोक;-
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः /
कर्मण्यभिप्रवृत्तोsपि नैव किञ्चित्करोति  सः //२०//

दोहा;-
सर्व कर्म  अरु  कर्मफल , सबसे  हुआ  विरक्त /
भव आश्रय  से  हीन  नित , रहे  ब्रह्म  में  तृप्त //
ऐसा नर सब  कर्म में , प्रवृत  हुआ  भी  पार्थ /
 करे न किंचित कर्म वह , यह है परमयथार्थ //  

श्लोक;-
निराशीर्यतचित्तात्मा        त्यक्तसर्वपरिग्रहः /
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् //

चौपाई;-
 मन,इन्द्रिय सँग तन जो जीता / भोगों में नहिं राखे प्रीता //
आशा, ममता रहित विरागी / केवल कर्म  करे तनु  लागी //
कर्म प्रवृत होकर भी नर वह / पाप  न पावे, रहता निस्पृह //

श्लोक;-
यदृच्छालाभसन्तुष्टो  द्वन्द्वातीतो  विमत्सरः /
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते //२२//

चौपाई;-
 बिन अभिलाष स्वयं मिल जाये / जो संतुष्टि उसी में पाये //
 ईर्षा   जिनके  मन  से  रीते / हर्ष, शोक  द्वन्द्वादिक  बीते //
सिद्धि,असिद्धि उभय सम जानी / रहे एकरस में जो ज्ञानी //
वह कर्मों में  भी  रत  रहके / रहते  नहिं  कर्मों  में  बँधके //

श्लोक;-
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः /
यज्ञायाचरतः   कर्म    समग्रं   प्रविलीयते //२३//

चौपाई;-  
जिसकी सब आसक्ति नशानी / तन अभिमान मुक्त जो ज्ञानी //
चित्त  रहे  नित  ममता  हीना /  ब्रह्मज्ञान  में   ही   लवलीना //
जग  हित  यज्ञकर्म  वे  करते / कर्म  शेष  नहिं  उनके  रहते //

श्लोक; -
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् /
ब्रह्मैव तेन  गन्तव्यं  ब्रह्मकर्मसमाधिना //२४//

दोहा;-
जिस मख अर्पण ब्रह्म है,होम,अग्नि,हवि ब्रह्म /
आहुतिकर्ता   ब्रह्म   है ,  पाये   आहुति   ब्रह्म //
यज्ञकर्म स्थित  हुआ , जो  पाले  निज  धर्म /
उसे प्राप्य  फल  ब्रह्म  ही , योगी  जाने  मर्म //

श्लोक;-
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते /
ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति //२५//

चौपाई;-
एक अन्य योगी सुरगण का / पूजन  रूप  यज्ञ  अरु व्रत का //
अनुष्ठान    श्रद्धा   से   करते /  देव   अर्चना   में   रत   रहते //
कुछयोगी जो जानहिं मनमें / वह अधियज्ञ प्रतिष्ठित तनमें //
ध्यानयोग में स्थित  होकर / ब्रह्मस्वरुप  अग्नि  में  वे  नर //  
हवन आत्मा का नित करते / ब्रह्म ध्यान में ही रत  रहते //

श्लोक;-
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति /
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति //२६//

चौपाई;-
और अन्य कुछ  योगाचारी / श्रवण  समेत  इन्द्रियाँ  सारी //
संयमरूप अग्नि में नर ते / हवन ध्यान में  रह  कर  करते //     
एक और जो  योगी  होवे / शब्दादिक  सब  विषयों  को वे //
इन्द्रियरूपअग्नि में जारहिं / ब्रह्मभाव सबजगत निहारहिं //

श्लोक;-
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे /
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते //२७//

चौपाई;-
कुछ योगीजन ध्यान लगायें / इन्द्रि,प्राण की पूर्ण क्रियायें // 
 ज्ञान  प्रकाशित संयम द्वारा / करते  योग अग्नि  में छारा //

श्लोक;-
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा    योगयज्ञास्तथापरे /
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः//२८//  

सवैया;-
द्रव्य संबंधित यज्ञ करे कोई करते हैं यज्ञ तपस्या  से  भारी /
योगस्वरूपका यज्ञ करे कोई योगी समाधीलगाय के न्यारी //
औ कितने यतनी नर तो अहिंसादिक तीक्ष्ण व्रतादिकधारी /
स्वाध्याय के रूप करें ज्ञानयज्ञ कहें पार्थ योग सुदर्शनधारी //

श्लोक;-
अपाने  जुह्वति  प्राणं  प्राणेsपानं  तथापरे / 
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः//२९//
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु  जुह्वति /
सर्वेsप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः //३०//

दोहा;-
दूजे   कितने  योगिजन , प्राणायामी  यग्य / 
करहिं अपानहिं वायु में ,प्राणवायु का हव्य //                  
प्राणवायु में अन्य जन ,कर अपान का होम /
पावहिं  ते   नर  यज्ञ  में, ब्रह्मस्वरूपी  सोम //
चौपाई;-
अरु  कितने नियमित आहारी / प्राणायाम प्रवृत व्रतधारी //
प्राण ,अपान रोक गति, केते / प्राण , प्राण में आहुति देते // 
ये  साधक  यज्ञों  के  ज्ञाता / करें  यज्ञ  से  पाप  निपाता // 
                     प्राणों का प्राणों में हवन 
दोहा;-
प्राणवायु  वह वायु है,प्राणि करहिं जेहि पान /
बाहर निकली  वायु को, जानो  वायु  अपान // 
चौपाई;-
प्राणवायु  जब   अंदर  जाये / ता  में   भाव  कुभाव  समाये //
जब साधक  मन  करे  निरोधा / हो  संकल्पों  में  अवरोधा //
योग  अग्नि  संकल्प  जलाये / प्राण  वायु  ही  अंदर जाये //
विषय तरंग  प्रवेश  न  पावें / और  न  अंदर  क्षोभ  बढ़ावें //
ब्रह्म समर्पित मन हो जाये / सिवा इष्ट कुछ ध्यान न आये // 
यह क्षमता जब साधक पाये / प्राण, प्राण में  हवन कहाये //

                    अपान  का अपान  में हवन 
अंदर  से  संकल्प  न  आयें /मनमें  नहिं  स्फुरण  जगायें //
 हो एकांत योग  में  लागे / ब्रह्म  प्राप्ति  में  मन  अनुरागे //
यह स्थिति जब मन की आये /वह अपान में होम कहाये //

श्लोक;-
यज्ञशिष्टामृतभुजो  यान्ति  ब्रह्म  सनातनम् /
नायं लोकोsस्त्ययज्ञस्य कुतोन्यःकुरुसत्तम //३१//

हे कुरुश्रेष्ठ यज्ञ जेहि  रचता / वह  अवशेष  सोम  ही  बचता //
यह अनुभव जो योगी  पाते / ब्रह्म  सनातन  में  मिल  जाते //
यज्ञविमुख नर जन्म नशावें / इसजग में भी सुख नहिं पावें //
फिर परलोक पुरुष को  ऐसे /  सुखदायक  हो  सकता  कैसे //  

श्लोक;-
एवं   बहुविधा   यज्ञा   वितता   ब्रह्मणो   मुखे /
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे //३२//

चौपाई;-
एहिविधि और यज्ञ बहु  सारे / वेदवाणि  में  सब  विस्तारे //
तन ,मन इन्द्रि  क्रियाओं द्वारा / यज्ञ विधान पूर्ण हो सारा //
इसविधि इसे तत्व से  जाने / शास्त्रविहित कर्मादिक ठाने // 
तब तू सर्व  कर्म  बंधन  से / मुक्त होय  कर यज्ञ, यतन से //

श्लोक;-
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप /
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते //३३//

दोहा;-
द्रव्ययज्ञ   से   श्रेष्ठ  है ,  ज्ञानयज्ञ   हे  पार्थ /
यज्ञ करे परमार्थ हित ,सो नर  होय कृतार्थ //
होहिं समाहित ज्ञान में,पुरुष  कर्म सम्पूर्ण /
तत्वदर्शिऋषि जानते,जो हैं सबविधि पूर्ण //

श्लोक;-
तद्विद्धि   प्रणिपातेन    परिप्रश्नेन    सेवया /
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः//३४//

चौपाई;-
ब्रह्मतत्वदर्शी  जो  ज्ञानी / सुन  उनसे   ज्ञानामृत   वाणी //
ब्रह्मतत्व ज्ञानिन्ह के धामा / जाय  करे  जब  दंडप्रणामा //
तजछलकपट करे जो सेवा / होहिं प्रसन्न विज्ञ मुनिदेवा //
करेहु प्रश्न तब विनय सुनाई / तत्वज्ञान वे कहहिं बुझाई //

 श्लोक;-
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि  पाण्डव /
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि //३५//

चौपाई;-
जिसेजान सबभ्रम मिटजाये / फिर तू पार्थ मोह नहिं पाये //
सारे  भूत   ज्ञान  के  द्वारा / तू  निःशेष  भाव  धर  न्यारा //
पहले  अपने  में  ही  देखे / फिर  मुझ  परमब्रह्म  में  देखे //   
  
 श्लोक;-
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः /
सर्वं  ज्ञानप्लवेनैव   वृजिनं  संतरिष्यसि //३६//

चौपाई;-
अन्य पापियों से भी भारी / पापवंत यदि क्रिया तुम्हारी //
तब भी ज्ञान  नाव यदि  पाये / पापसिंधु  निश्चय  जाये //  

श्लोक;-
यथैधांसि  समिद्धोsग्निर्भस्मसात्कुरुतेsर्जुन /
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा //३७//

चौपाई;-
द्रव्ययज्ञ की सब समिधायें / अग्निज्वालमें ज्यों जलजायें //
त्यों  ही  ज्ञानअग्नि  भी  सारे / कर्महिं  योगयज्ञ  में  जारे //

श्लोक;-
न   हि   ज्ञानेन   सदृशं    पवित्रमिह   विद्यते /
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालनात्मनि विन्दति //३८//

चौपाई;-
ज्ञान समान और नहिं जग में / करे पुनीत न संशय इसमें //
दोहा ;-
उसको कितने काल से,योगक्रिया कर नित्य /
शुद्ध आत्म हो आप ही , नर  पाये  वह सत्य //

श्लोक;-
श्रद्धावाँल्लभते   ज्ञानं    तत्परः   संयतेन्द्रियः /
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति //३९//

चौपाई;-
जोश्रद्धा से युक्त जितेन्द्रिय / साधनप्रवृत , विवेकी, सक्रिय //
बन जिज्ञासु ब्रह्म को ध्याये / वह नर  तत्वज्ञान  पा  जाये //
ज्ञान पाय वह नर ततकाला / पाये परमशान्ति तेहिकाला //

श्लोक;-
अज्ञाश्चाश्रद्दधानश्च   संशयात्मा   विनश्यति /
नायं लोकोsस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः//४०//

चौपाई;-
जो जन यज्ञविधान  न जाने / वह अनभिज्ञ  कर्म  यदि ठाने //
श्रद्धारहित , विवेक  विहीना / संशययुक्त   न   ज्ञान   प्रवीना // 
परमारथ  से   भटके  वह  नर / पार  न  पाये  रहकर  तत्पर //
उस हित पार्थ नहीं  परलोका / और न सुख ही है एहि लोका //

श्लोक;-
योगसन्नयस्तकर्माणं  ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम् /
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति  धनञ्जय //४१//

चौपाई;-
कर्मयोग   से   जिसने  सारे /  कर्म ,  ब्रह्म   अर्पण  कर   डारे //
विमल विवेक  बुद्धि  के  द्वारा /  नाश  किया  है  संशय  सारा //
अन्तःकरण स्ववश में जिसके / उसे कर्म नहिंबाँधहिं  जगके // 
श्लोक;-
तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः/
छित्त्वैनं   संशयं   योगमातिष्ठोत्तिष्ठ    भारत //४२//

चौपाई;-
इसकारण  हे  भारत  भूषण / योगस्थित हो  हर  हिय  दूषण //
हियस्थित निजसंशय रिपुका/ जो अज्ञान जनित बिनबपुका //
दोहा;-
ज्ञानरूप    तलवार    से ,  उस    संशय  को   मार /
कर्मयोग     व्रतधार     हो ,  युद्ध      हेतु     तैयार //
ज्ञान   कर्म   संन्यास   का,  पूर्ण   हुआ   अध्याय /
पढ़अनुदिन जन विमलमति, योग्यपात्र बन जाय //

 इस प्रकार श्रीमद् भगवद् गीता रूपी उपनिषद एवं ब्रह्म विद्या तथा   योगशास्त्र विषयक  श्रीकृष्ण  और  अर्जुन  के   संवाद   में  उदयभानु  तिवारी''मधुकर''  कृत  महाकाव्य ''गीतमानस'' में यज्ञकर्म स्पष्टीकरण नामक चौथाअध्याय पूर्ण हुआ /

                                       हरि ॐ तत्सत् 

No comments:

Post a Comment