Monday, November 3, 2014

               अथ षोडशोsध्यायः  
दोहा;-
बने भक्त हित  सारथी,जगगुरु  कृपानिधान /
दैवी ,आसुर  सम्पदा,नर गुण करात बखान //

                  भगवानुवाच
श्लोक;-   
अभयं     सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः /
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् //१//

दोहा;-
भय से रहित विशुद्ध चित ,तत्त्वज्ञान में ध्यान /
योगसुस्थिति,हरि भजन,और सात्विक   दान //

चौपाई;-
इन्द्रिय निग्रह,यज्ञाचरणा / सुश्रुत,वेद्ध्यन नित करना // 
धर्महेतु तप अरु आराधन/सहज इन्द्रियाँ,तन,अन्तर्मन //

श्लोक;-
अहिंसा  सत्यमक्रोधस्त्यागः शांतिरपैशुनम् /
दया   भूतेष्वलोलुप्त्वं   मार्दवं   ह्रीरचापलम् //२//

चौपाई;-
सत्य,अहिंसा, क्रोधविहीना / अरु  कर्तत्त्व  भाव  से  हीना // 
चंचलतापरित्याग ,अनिंदा / दयावन्त प्रमुदित स्वच्छंदा //
एन्द्रिय विषयों के संयोगा  / अनासक्त,परित्यागहिं भोगा //
मन आत्मा के संग विराजे /  शास्त्र  विरुद्ध  आचरणलाजे //
मृदुल चित्त  ईश्वर में  लीना /  व्यर्थ  कामनाओं  से  हीना //
 
श्लोक;-
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता /
भवन्ति   सम्पदं   दैवीमभिजातस्य  भारत //३//

चौपाई;-
क्षमा, तेज,धृति ,परमपुनीता / मान, द्रोह से रहित विनीता //
ये दैवी सम्पद गन अर्जुन / असुरवृत्ति  के  गुण  आगे  सुन //

श्लोक;-
दम्भो दर्पोsभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च /
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् //४//

चौपाई;-
अहंकार, मद अरु अभिमाना / क्रोध निठुरता अरु अज्ञाना //
ये लक्षण रहते जिन जिन में / असुर सम्पदा लेकर  जन्में //
        
श्लोक;-
दैवी  संपद्विमोक्षाय   निबन्धायासुरी  मता /
मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोsसि पाण्डव //५//

चौपाई;-
मुक्ति हेतु सब दैवी सम्पद / वृत्ति आसुरी सब बंधन प्रद //
इससे शोक न कर तू अर्जुन / दैवी सम्पद युत  तेरे गुण //

श्लोक;-
द्वौ भूतसर्गौ लोकेsस्मिन्दैव आसुर एव च /
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे  श्रृणु //६//

चौपाई;-
हे भारत इस सृष्टि सृजन में / दो स्वभाव के प्राणी जन्में //
एक देव सम सदगुण युक्ता / दूजे  असुर  प्रकृति संयुक्ता /    
दोहा;-
दैव प्रकृति के लक्षण , कहे  सहित  विस्तार /
अब मुझसे सुन आसुरीप्रकृति पुरुष  आचार //

श्लोक;-
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं  च  जना  न विदुरासुराः /
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते //७//

चौपाई;-
जो जन असुरप्रकृतिअभिमानी/प्रवृति,निवृतिके भी नहिंज्ञानी//
इससे  आत्म शुद्धि  नहिं उन में /  ना ही श्रेष्ठ  आचरण  जन्में// 
और न  सत्य वचन  वे  भाखें / कपट  भाव  अपने  मन  राखें// 

श्लोक;-
असत्यमप्रतिष्ठं    ते   जगदाहुरनीश्वरम् /
अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम् //८//

चौपाई;- 
कहहिं असुरनर बुद्धि विहीना /यह जग मिथ्या आश्रयहीना//
केवल  स्त्री   पुरुष  सँयोगा /  रचित  सृष्टि बिन ईश्वर योगा//
मूल काम, बाकी सब मिथ्या / इसके सिवा और है ही क्या//

श्लोक;-
एतां  दृष्टिमवष्टभ्य  नष्टात्मानोsल्पबुद्धयः /
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोsहिताः//९//

चौपाई;-
क्रूरकर्मरत  ,     परअपकारी  /   वृत्तिआसुरी     पापाचारी //
असत ज्ञान का आश्रय लेकर / नष्ट स्वभावी मन्दबुद्धि नर //
केवल जगत अहित के हेता / होहिं समर्थ जान निज चेता //

श्लोक;-
काममाश्रित्य   दुष्पूरं   दम्भमानमदान्विताः /
मोहाद् गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेsशुचिव्रताः//१०//

चौपाई;-
दम्भ,मान,मद से युत वे नर / अति दुसाध्य इच्छायें लेकर //   
निजअज्ञान वशीकृत होकर/ मिथ्या सब सिद्धांत ग्रहण कर //
भृष्ट आचरण धारण करते / कर्म अशुभ कर  जगत विचरते // 

श्लोक;-
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः/
कामोपभोगपरमा   एतावदति   निश्चिताः //११//

चौपाई;-
अन्तहीन उनकी इच्छायें / मृत्युकाल तक मुक्ति न पायें //
विषयभोग में वे लिपटाने / इतना  ही  सुख  है यह माने //

श्लोक;-
आशापाशशतैर्बद्धाः      कामक्रोधपरायणाः /
ईहन्ते  कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान् //१२//

चौपाई;-
आशरूप सत फाँसी बंधन / बँधे पुरुष वे ! कुन्ती  नन्दन //
दोहा;-
काम क्रोध में लिप्त नर ,विषय भोग के हेत /
नीति त्याग अन्याय से ,धन संग्रह कर लेत //

श्लोक;-
इदमद्य  मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् /
इदमस्तीदमपि   मे  भविष्यति  पुनर्धनम् //१३//

दोहा;-
नित मन में चिंतन करहिं ,यह पाया मैं आज /
आगे वह हो जायेगा , पूर्ण   मनोरथ     काज //
चौपाई;-
धन इतना है पास हमारे / यह हो और लालसा धारे //

श्लोक;-
असौ  मया  हतः  शत्रुर्हनिष्ये  चापरानपि /
ईश्वरोsहमहं  भोगी सिद्धोsहं बलवान्सुखी //१४//

चौपाई;- 
मारा गया शत्रु यह  मुझसे / हतूँ  अन्य  भी  इसी  तरह से //
सब  ऐश्वर्य  भोगने  वाला  /  मैं  ही   ईश्वर जगत निराला //
मैं सब सिद्धियुक्त बलवाना / सुखी जगत में ज्ञान निधाना //

श्लोक;-
आढ्योsभिजनवानस्मि कोsन्योsस्ति सदृशो  मया /
यक्ष्ये    दास्यामि    मोदिष्य    इत्यज्ञानविमोहिताः//१५//
अनेकचित्तविभ्रान्ता                  मोहजालसमावृताः /
प्रसक्ताः       कामभोगेषु      पतन्ति      नरकेsशुचौ //१६//

चौपाई;-
मैं बड़धनी वृहद परिवारा / मो  सम  को  अस  करे विचारा //
दूँगा दान करूँ मख भारी / मुदित होउँ  लख  खुशियाँ  सारी //
इसप्रकार अज्ञान विमोहित/बहुविधि भ्रमित लोभ से प्रेरित //
ऐसे मोहासक्त  असुर  नर  / गिरहिं अपावन नरकहिं जाकर// 

श्लोक;- 
आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः /
यजन्ते     नामयज्ञैस्ते     दम्भेनाविधिपूर्वकम् //१७//

चौपाई;-
रहें मदान्ध मान अरु धन से /समझें श्रेष्ठ स्वयं को  मन से//
नाममात्र को,शास्त्रविहीना / करहिं दम्भसे मख विधिहीना//

श्लोक;-
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः /
मामात्मपरदेहेषु   प्रद्विषन्तोsभ्यसूयकाः //१८//

चौपाई;- 
अहंकार , बल , दर्प , कामना / क्रोध आदि से युक्त भावना //
इनके वशीभूत हो कलुषित /निज में अरु पर तन में स्थित //
मुझ  ईश्वर   से  वे  अज्ञानी / करहिं  द्वेष  परनिंदक  प्राणी // 

श्लोक;-
तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् /
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु //१९//

दोहा;-
हैं  जितने  क्रूरात्मा , द्वेषी  इस  संसार /
उनको आसुर योनि में , डारूँ बारम्बार //

श्लोक;-
असुरीं योनिमापन्ना मूढ़ा जन्मनि जन्मनि /
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् //२०//

चौपाई;-
अर्जुन वे अतिमूढ़ असुरनर / बहुत जन्म तक मोहिं न पाकर //
जन्म अनेक नीचगति पाते / फिर अतिअधम योनि में जाते //

श्लोक;-
त्रिविधं     नरकस्येदं     द्वारं     नाशनमात्मनः /
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्  //२१//

चौपाई;
काम क्रोध अरु लोभ लुभायें  / तीनों नरक द्वार कहलायें // 
पार्थ आत्महिं यही नशायें / उसे अधोगति  में  ले  जायेँ //
इससे जब तीनों को त्यागे / तब ही मन मुझमें अनुरागे //

श्लोक;-
एतैर्विमुक्तः    कौन्तेय      तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः /
आचरत्यात्मनःश्रेयस्ततो याति परां गतिम् //२२//

चौपाई;- 
जो त्रय  नरकद्वार  बतलाये /  इनसे  मुक्ति  पुरुष  जो  पाये //
कौन्तेय  वह  निज  हित   लागी  / सद्आचरण करे वैरागी //
जिससे उस सदगति को पाये / जो मम  परमधाम कहलाये //

श्लोक;-
यह  शास्त्रविधिमुत्सृज्य  वर्तते  कामकारतः /
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् //२३//

चौपाई;-
जोनर तजकर शास्त्रविधाना/करहिं आचरण निज मनमाना//
उनके कर्म व्यर्थसब जायेँ / सिद्धि न सुख न परमगति पायेँ//

श्लोक;-
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ /
ज्ञात्वा  शास्त्रविधानोक्तं   कर्म   कर्तुमिहार्हसि //२४//

दोहा;-
इस कारण हे पार्थ तू , बस  इतना  ही  जान /
अकर्तव्य ,कर्तव्य क्या , इसके शास्त्र प्रमाण //
ऐसा मन में जान के ,शास्त्र विहित सब कर्म /
करना ही तुझको उचित इसे मन निज  धर्म //  
    
दैव, असुर दो सम्पदा ,लक्षण सहित सुनाय /
पूर्ण हुआ इस योग  का , सोलहवाँ  अध्याय // 

इस प्रकार श्रीमद् भगवद् गीता रूपी उपनिषद एवं ब्रह्मविद्या तथा  योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण  और   अर्जुन   के   संवाद  में  उदयभानु  तिवारी 'मधुकर' कृत  महाकाव्य ''गीतामानस''में देवासुर सम्पद् विभाग योग नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ /   
    
   
                                हरिॐ तत्सत् 
        
                  // अथ सप्तदशोsध्यायः // 
चौपाई;- 
सात्विक   राजस  तामसी , कौन  यज्ञ   तप  दान /
भेद कहहिं समझाय हरि ,विधिवत सहित विधान //

                           अर्जुन उवाच
श्लोक;-
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः /
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः //१// 

दोहा;-
श्रद्धायुत जो नर करहिं ,त्याग शास्त्रविधि यज्ञ / 
उनकी  स्थिति   कौन  सी , हे  केशव   सर्वज्ञ //
सत,राजस या तामसिक,उन्हें सहित विस्तार /
कहिये  मुझसे  आप  ही ,  इसके   जाननहार //

                श्रीभगवानुवाच

श्लोक;  
 त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा /
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां श्रुणु //२//

दोहा;- 
श्रद्धा   देह  स्वभावजा , इसके   तीन   प्रकार /
सात्त्विक,राजस ,तामसी,सो सुन पाण्डुकुमार //  

श्लोक;-
सत्त्वानुरूपा  सर्वस्य  श्रद्धा   भवति  भारत /
श्रद्धामयोsयं  पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव  सः//३//

चौपाई;- 
निज स्वरुप अनुरूप सृजन में /श्रद्धा होती अन्तर्मन में //
जो जिस दैवी श्रद्धा से युत / है वह उसी  वृत्ति  से संयुत //
श्रद्धाभक्ति भक्त  की  जैसी / वैसा  स्वयं  वृत्ति  हो  वैसी //

श्लोक;- 
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः/
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः //४//

चौपाई;- 
सात्त्विक नर पूजहिं सुर देवा / राजस ,यक्ष दैत्य की सेवा //
शेष तामसी जो नर रहते / वे  सब  भूत  प्रेत  को  भजते //

श्लोक;-  
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते  ये तपो जनाः /
दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः //५//

चौपाई;-
जो मानव तज शास्त्रविधाना/ तपहिं घोरतप निज अज्ञाना //
दम्भ अहंकारों से संयुत / बल, अभिमान  कामना  से  युत // 
  
श्लोक;- 
कर्शयन्तः       शरीरस्थं       भूतग्राममचेतसः /
मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् //६//

चौपाई;-
पंचभूत तनधारी सबको / और ह्रदय में स्थित  मुझको //
दारुण दुख दाता अज्ञानी / असुर स्वभाव जान वे प्रानी //

श्लोक;- 
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः /
यज्ञस्तपस्तथा   दानं  तेषां  भेदमिमं  श्रुणु //७//

चौपाई;- 
सबहिं भोज्यप्रिय,त्रिविध प्रकार/ जैसाजो निजरुचि अनुसारा //
उसी प्रकार यज्ञ ,तप,दाना / त्रिविध  भाँति  के  करूँ बखाना //
पृथक पृथक सब भेद बताऊँ / मुझ  से सुन अब ज्ञान कराऊँ //

 श्लोक;- 
आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः/
रस्याःस्निग्धाःस्थिरा हृद्या आहाराःसात्त्विकप्रियाः//८//

दोहा;- 
आयु ,बुद्धि,आरोग्य,बल ,सुख अरु प्रीति अपार /
देते  चिकने   रसमयी , सात्विक  खाद्य  अहार //

चौपाई;-  ,   
अस स्वभाव से प्रियआहारा / सात्त्विकपुरुषहिं अधिक पियारा //

श्लोक;-  
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः/
आहारा   राजसस्येष्टा  दुःखशोकामयप्रदाः//९//

चौपाई;- 
उष्ण,अम्लयुत,कटु अरु खारा / रूक्ष,विदाही,तीक्ष्ण अहारा //
दुख, चिंता  अरु  रोग  बढ़ाते / राजस  पुरुषों  को  ये  भाते // 

 श्लोक;-     
यातयामं  गतरसं  पूति  पर्युषितं  च   यत् /
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् //१०//

चौपाई;- 
एक  प्रहर  पहिले  का  बासा / अपरिपक्व, रसहीन, कुवासा //
जूठनयुक्त,अपावन भोजन / अतिप्रिय उनको जो तामसजन //

श्लोक;-    
अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते /
यष्टव्यमेवेति  मनः समाधाय  स सात्त्विकः//११//

चौपाई;- 
यज्ञकर्म,कर्त्तव्य समझ नर / विधिवत कर्मों के फल तजकर //
जब एकाग्र चित्त  से  करते / सात्त्विक यज्ञ  उसी  को  कहते // 

श्लोक;-  
अभिसन्धाय तु  फलं दम्भार्थमपि चैव यत् / 
इज्यते   भरतश्रेष्ठ  तं  यज्ञं  विद्धि  राजसम् //१२//

चौपाई;- 
किन्तु पार्थ जो दम्भ समेता / करहिं यज्ञ नर फल के हेता //
उसको राजस मख तू जाने / दम्भ आचरण हित जब ठाने //

श्लोक;- 
विधिहीनमसृष्टान्नं  मन्त्रहीनमदक्षिणम् /
श्रद्धाविरहितं    यज्ञं   तामसं   परिचक्षते //१३//

दोहा;- 
बिना मंत्र बिन दक्षिणा ,अन्न किये बिन दान /
विधि विहीन ,श्रद्धारहित ,यज्ञहिं तामस जान //

श्लोक;- 
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं  शौचमार्जवम् /
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप  उच्यते //१४//

चौपाई;- 
गुरु ,आचार्य,देव,ब्राह्मणजन / और तत्त्वविद,ज्ञानी पूजन //
ब्रह्मचर्य,शुचिता,ऋजु रहना / सत्य अहिंसा पालन करना //    
ये शरीर के तप हैं अर्जुन / अब वाणी तप के  लक्षण  सुन //

श्लोक ;-
अनुद्वेगकरं वाक्यं  सत्यं  प्रियहितं  च  यत् /
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ् मयं तप उच्यते //१५//     

चौपाई;-
जो मन  में  उद्वेग न  लाये /  हितकारी , प्रिय, सबको  भाये //
सत्य सुभाषण,हरिजिज्ञासा/ आत्म सुचिंतन,जप,अभ्यासा //   
ये सब वाणी के तप अर्जुन / अब  मानस के तप आगे  सुन //

श्लोक;- 
मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः /
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो        मानसमुच्यते //१६//

चौपाई;- 
सौम्यभाव,हरिचिन्तन में रत / मन का निग्रह मौनशील व्रत //
इष्टदेव बिन कुछ नहिं ध्याये / मन  प्रसन्नता झलक दिखाये //
अन्तर्मन सब भाँति पुनीता / ये  मानस  तप  जान  विनीता //

श्लोक;- 
श्रद्धया  परया  तप्तं   तपस्तत्त्रिविधं   नरैः /
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते //१७//

चौपाई;- 
बिन फल आकाँक्षी नर द्वारा / उपर्युक्त तप त्रिविध प्रकारा //
किये पूर्ण श्रद्धा से जायें / वे  सब  सात्त्विक  तप कहलायें //

श्लोक;- 
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् /
क्रियते तदिह  प्रोक्तं  राजसं  चलमध्रुवम् //१८//

चौपाई;- 
बिनसम्मान,मान या पूजन/ अथवा स्वारथ हित साधकजन //

दोहा;- 
जो तप करते दम्भ से ,उसे अनिश्चित मान /
है फलदाई क्षणिक वह ,तप राजस तू जान //

श्लोक;-
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः / 
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम् // १९//

चौपाई;-   
जो तप करहिं मूढ़मति हठ  से / मन,वाणी या  देह  कष्ट  से //
अथवा पर अनिष्ट हित  करते / उस तप को तामस तप कहते //

श्लोक;-
दातव्यमिति     यद्दानं    दीयतेsनुपकारिणे /  
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् //२०//

चौपाई;- 
प्रत्युपकार भावना तज नर / देशकाल अरु पात्र परख कर //
दान करे विधिवत सम्मानी /निज कर्त्तव्य कर्म मन जानी //
सुन वह सात्त्विक दान कहाये /जो सुपात्र के हित  में जाये //

श्लोक;- 
यत्तु  प्रत्युपकारार्थं  फलमुद्दिश्य  वा  पुनः /
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् //२१// 

चौपाई;- 
दान करे पर दिया  न  जाये  /  या  जो  दान  क्लेश  पहुंचाये //
अथवा प्रत्युपकार भाव धर/ करहिं दान फलके हित जब नर //
स्वार्थ  भाव   दाता   मन  आये / वही  दान  राजस  कहलाये //

 श्लोक;- 
अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते /
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् //२२//

चौपाई;- 
देशकाल स्थिति बिन जाने / तिरस्कार युत, बिन सम्माने //
दानकुपात्रहिं जोजन  करते / तामसदान शास्त्र सब  कहते //   

श्लोक;-  
ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः /
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च    विहिताः पुरा //२३//

दोहा ;-
ॐ तत् सत्  उस ब्रह्म के ,तीनों नाम प्रधान /
विप्र ,वेद ,यज्ञादि की  , रचना  इनसे  जान // 

श्लोक;-   
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपः क्रियाः /
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् //२४//

दोहा;- 
इसकारण सब वेदविद् ,क्रिया ,यज्ञ ,तप ,दान /
प्रथम ॐ उच्चार नित , करते  सहित विधान //

श्लोक;- 
तदित्यनभिसन्धाय     फलं     यज्ञतपःक्रियाः /
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः//२५//

चौपाई;- 
त् का अर्थ वही परमेश्वर / जगत व्याप्त ,अक्षर,अखिलेश्वर // 
उसी ब्रह्म का ही यह सब है / उसको  ही  यह  सब  अर्पण है //
यही भावना मन धारण कर / दान,यज्ञ,तप के फल तजकर //
सारे  कर्म  शास्त्र  अनुसारा  /  होहिं  मुमुक्षु  पुरुष  के  द्वारा //

 श्लोक;-
सद्भावे  साधुभावे   च   सदित्येतत्प्रयुज्यते /
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते //२६//

चौपाई;- 
त् ही सत्य ब्रह्म कहलाये  / सत्यश्रेष्ठतम भाव दिखाये //
वही सनातन अमृतरूपा / हिय स्थित त्रिभुवन कर भूपा //
जहँ हों मंगलकाज पुनीता / त् सम्पुट दें विज्ञ विनीता //

श्लोक;- 
यज्ञे तपसि  दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते /
कर्म     चैव    तदर्थोयं    सदित्येवाभिधीयते //२७//

चौपाई;- 
यज्ञ,दान,तपमें जो स्थित / वह ही त् सब कहहिंतत्त्ववित् //
उस हित कर्म किया जो जाये / निश्चय वह त् ही कहलाये //
  
श्लोक;-  
अश्रद्धया हुतं दत्तं  तपस्तप्तं  कृतं  च  यत् /
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह //२८// 

दोहा;- 
हे  भारत  श्रद्धा रहित , हवन  तपस-तप दान / 
और अन्य शुभ कर्म जो ,उन्हें असत ही जान //
बिन श्रद्धा विश्वास के / करहिं  जो कर्म अनंत /
नहिं फलदाई  लोक  में ,  नहीं  मृत्यु  पर्यन्त // 

ॐ तत् सत् त्रय ब्रह्म की / व्याख्या कर गुण  गाय /
पूर्ण   हुआ    उपदेश   का  ,   सप्तदशो    अध्याय //

इसप्रकार श्रीमद् भगवद् गीता रूपी उपनिषद एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन  के  संवाद  में  उदयभानु  तिवारी  ''मधुकर''  कृत  महाकाव्य 'गीतामानस'में ॐ तत् सत् श्रद्धात्रय विभाग योग नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ /


                                हरिः ॐ  तत् सत्

Sunday, October 5, 2014

               //ॐ श्री परमात्मने नमः//

                   अथाष्टादशो  अध्यायः
दोहा ;-

सार  सर्व अध्याय का , जेहि   से  उपजे  ज्ञान /
होय विरति ,योगी लहहिं ,तन से मुक्ति महान //   
सो अर्जुन के प्रति कहहिं ,त्रिभुवन पति योगेश /
कर्म प्रवृत अरु श्रवण रत,जन के मिटहिं कलेश // 
                     अर्जुन उवाच

श्लोक;-  
सन्न्यासस्य  महाबाहो तत्त्वमिच्छमि वेदतुम् /
त्यागस्य   च    ह्रषीकेश    पृथक्केशिनिषूदन //१//       

दोहा;--
तत्त्व ,त्याग -संन्यास का , जानन  चाहूँ  देव /
कहिये प्रभु विस्तार से ,पृथक पृथक सब भेव //

चौपाई ;- 
महाबाहु हे अन्तर्यामी / केशिनिषूदन त्रिभुवन स्वामी /
वासुदेव हे कृष्णमुरारी / त्याग तत्त्व कहिये गिरिधारी //
                    श्री भगवानुवाच

श्लोक;-
काम्यानां कर्मणां न्यासं   सन्न्यासं कवयो विदुः /
सर्वकर्मफलत्यागं    प्राहुस्त्यागं       विचक्षणाः //
       
चौपाई;-
सुन जिज्ञासु वचन अर्जुन के / बोले परम पुरुष त्रिभुवन के /
दोहा;-
काम्यकर्म के त्याग  को , कुछ  कहते  संन्यास / 
किन्तु पार्थ जो विज्ञ जन , जिन्हे तत्त्व आभास //
सर्व  कर्म  फल  त्याग को , वे  कहते  हैं  त्याग /
रहित   राग   आसक्ति  से , उपजे  पूर्ण   विराग //

श्लोक;- 
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः /
यज्ञदानतपःकर्म न  त्याज्यमिति  चापरे //३//

चौपाई;- 
बहुतेरे   ज्ञानी    यह  कहते /  सारे   कर्म  दोष  युत   रहते //
इससे सभी त्यागने लायक / किन्तु विज्ञजन जो निर्णयक //
वे नर कहहिं यज्ञ ,तप,दाना / नहीं त्याज्य ये कर्म विधाना //

श्लोक;-
निश्चयं   श्रुणु   मे  तत्र   त्यागे   भरतसत्तम /
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः//४//

चौपाई;- 
पुरुष श्रेष्ठ  हे  अर्जुन  ज्ञानी /  कहहुँ  त्याग  के  भेद  बखानी //
अब निश्चय सुन मम अनुसारा /कर्म त्याग के विविध प्रकार //

श्लोक;-
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् /
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् //५//

चौपाई;- 
तीनों कर्म यज्ञ ,तप, दाना / नहीं त्याज्य कर्त्तव्य विधाना //
मुख्य कर्म ये पाप नशावन / मुनि मनीष को करते पावन //

श्लोक;- 
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गम त्यक्त्वा फलानि च /
कर्तव्यानीति     मे   पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् //६//

चौपाई;- 
इससे इन तीनों के सँग में / हैं कर्त्तव्य और  जो  जग में //
सब आसक्ति कर्मफल त्यागी /करे अवश्य ब्रह्म अनुरागी //
यही उचित मम मत अनुसारा/ हुआ सुनिश्चित  मेरे द्वारा //

श्लोक;- 
नियतस्य तु  सन्न्यासः कर्मणो नोपपद्यते /
मोहात्तस्य  परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः//७//

चौपाई;-
जप, तप, दान, भजन, आराधन / ये ही नियतकर्म  संसाधन //
काम्य, निषिद्धकर्म परित्यागे/ किन्तु न नियतकर्म को त्यागे//
दोहा;-
नियतकर्म परित्याग को , उचित न माना जाय /
जो त्यागहिं जन मोहवश ,तामस त्याग कहाय //

श्लोक;-    
दुःखमित्येव यत्कर्म  कायक्लेशभयात्त्यजेत् /
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत //८// 

चौपाई;-
नियतकर्म दुख रूप समझ नर / देह क्लेश के भय में आकर // 
जो   कर्त्तव्य   कर्म   परित्यागे / कष्ट   देख  कर्मों   से  भागे //
तासु त्याग राजस हो जाये / त्याग किये भी फल नहिं  पाये //
या जो परम शान्ति कहलाये / उस फल को साधक नहीं पाये //

श्लोक;-
कार्यमित्येव     यत्कर्म     नियतं     क्रियते र्जुन /
सङ्गं  त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्विको मतः//९//

चौपाई;- 
शास्त्रयुक्त विधि से सब  करना / है  कर्तव्य,  कर्मरत  रहना //
यही भाव जिसके मन जागे / संगदोष  अरु  फल परित्याग //
तब वह सात्त्विक त्याग कहाये / पार्थ!जहाँ आसक्ति न आये //

श्लो
द्वेष्ट्यकुशलं    कर्म     कुशले   नानुषज्जते /
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः//१०// 

चौपाई;- 
अकुशल कर्म न द्वेष बढ़ावे / कुशल  कर्म  कर्तत्व   न लावे //
वही सत्त्वगुण युक्त विरागी / संशय रहित ,बुद्ध अरु त्यागी //

श्लोक;- 
न  हि  देहभृता  शक्यं  त्यक्तुं  कर्माण्यशेषतः /
यस्तु कर्मफल त्यागी स त्यागीत्यभिधीयते //११//

चौपाई;-  
पूर्ण त्याग इस सृष्टि भुवन  में / संभव नहिं मानव जीवन में //
इसकारण जो फल के त्यागी  / वही मनुज सच्चे परित्यागी //

श्लोक;-
अनिष्टमिष्टं    मिश्रं    च  त्रिविधं   कर्मणः  फलम् /
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु सन्न्यासिनां क्वचित् //१२//

चौपाई;-  
जन,सकामजब तनतज जावें/शुभ या अशुभ,मिश्र फल पावें//
पर जो त्यागी पुरुष कहाते / वे  ये  त्रय   फल कबहुँ  न पाते// 

श्लोक;-  
पञ्चैतानि   महाबाहो   कारणानि  निबोध  मे /
साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् //१३//

दोहा;- 
सर्वकर्म की सिद्धि  के , हेतु  पाँच ही जान /
सांख्यशास्त्र में जो कहे ,तुमसे करूँ बखान //

चौपाई;-   
महाबाहु  हे  पाण्डुकुमारा / कारण  सुन  ये पंच प्रकारा // 

श्लोक;-
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् /
विविधाश्च पृथक्वेष्टा दैवं  चैवात्र  पंचमम् //१४//

चौपाई;- 
'अधिष्ठान'   आधार   कहाये  /  या  आश्रय  जो  कर्म  कराये //
'कर्ता' ही इस मन को जानो /करण  भिन्न माध्यम को मानो //

शम,दम,त्याग,विराग,विवेका / नितहरिचिंतन यत्नअनेका // 
यदि नर को शुभ पार लगाये / यही करण कारण  बन जाये //
होय अशुभ से पार अगर नर /काम,क्रोध, लिप्सा या मत्सर // 
राग, द्वेष ही कारण बनते /  यही  करण  बन  प्रेरित  करते // 

चौथा  कारण  हैं  इच्छायें  / ये  अनंत  नर  पार  न  पायें //
पंचम कारण दैव कहाये / कर्म  सिद्धि जिससे मिल जाये // 

श्लोक;-
शरीरवाङ् मनोभिर्यत्कर्म     प्रारभते   नरः /
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः //१५//
    
चौपाई;- 
जब मानव मन,वाणी,तन से / करे कर्म शुभ और अशुभ से //  
 उनसे  सुफल कुफल जो  पाये / उनके  हेतु  पांच  कहलाये //

श्लोक;-
तत्रैवं सति   कर्तारमात्मानं  केवलं  तु  यः /
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः //१६//

चौपाई;- 
ऐसे में भी जो मन मूढ़ा / जानहिं नहिं रहस्य यह गूढ़ा //
दोहा;- 
कर्ता समझे आत्महिं ,सो जड़मति अज्ञान /
देखे नहीं यथार्थ वह ,हुआ न बुद्धि  विहान //

श्लोक;-  
यस्य नाहङ्कृतो  भावो  बुद्धिर्यस्य न लिप्यते /
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते //१७//

चौपाई;-  
कर्ता भाव न जिसमें रहते / और न कर्म  लिप्त  जेहिं  करते //
वह सब लोकों का वध कर भी / मारे नहिं यथार्थ में तब भी //
और न  पापों  के  ही  बन्धन /  उसको  बाँधें  कुन्तीनन्दन //

श्लोक;-
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना /
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः  कर्मसङ्ग्रहः //१८//

चौपाई;-  
ज्ञाता,ज्ञान ,ज्ञेय संधारण / ये त्रय कर्म  प्रेरणा कारण //
कर्ता,करण,क्रिया तीनों यह / हैं अर्जुन कर्मों के संग्रह //

श्लोक;-
ज्ञानं  कर्म  च  कर्ता  च  त्रिधैव  गुणभेदतः /
प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि //१९//

चौपाई;- 
कर्ता  ,कर्म ,ज्ञान गुण भेदा / तीनों  के त्रय कहते वेदा //
उन्हें यथावत तुझे सुनाऊँ / उनके भिन्न भेद समझाऊँ //

श्लोक;-
सर्वभूतेषु        येनैकं       भावमव्ययमीक्षते /
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् //२०//

चौपाई;-
जिस सुबुद्धि से युक्त हुआ नर / भिन्न भिन्न  भूतों  में  ईश्वर // 
एक  भाव  में  स्थित  देखे / व्याप्त  ब्रह्म  सब   जग  में  लेखे //
उस प्रत्यक्षज्ञान को अर्जुन / सात्त्विक जान भाव वह निर्गुण // 

श्लोक;-
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् //
वेत्ति   सर्वेषु   भूतेषु  तज्ज्ञानं  विद्धि  राजसम् //२१//

चौपाई;-
जिस सुबुद्धि से जन सविवेका / भिन्न जीव के भाव अनेका //
पृथक पृथक रूपों में जाने / शुभ  अरु  अशुभ  भेद  पहचाने //
दोहा;-
उस मानव की बुद्धि को ,अर्जुन ! राजस जान /
अब  आगे  विस्तार  से , तामस  करूँ बखान //

श्लोक;- 
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् /
अतत्वार्थवदल्पं    च   तत्तामसमुदाहृतम् //२२//

दोहा;- 
वह सम्पूरण  ज्ञान जो , तन  से  है  आसक्त /
बिना युक्ति,तत्वार्थ से , रहित तुच्छ अनुरक्त //
चौपाई;-   
ज्ञान तामसी वह कहलाये / भव सागर नहिं पार लगाये //

श्लोक;- 
नियतं    सङ्गरहितमरागद्वेषतः   कृतम् / 
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्विकमुच्यते //२३//

चौपाई;-  
राग   द्वेष   कर्तत्त्व   विहीना / संगदोष,  फल  इच्छा  हीना //
शास्त्र सुसम्मत विधि अनुसारा / नियत कर्म हों करता द्वारा //
कर्म वही सात्त्विक कहलाये / जग  बंधन  से  मुक्ति  दिलाये //

श्लोक;- 
यत्तु कामेप्सुना कर्म  साहङ्कारेण  वा पुनः/
क्रियते    बहुलायासं     तद्राजसमुदाहृतम् //२४//

चौपाई;- 
कर्म करें अतिश्रम से जो नर / भोगेक्षा  से  प्रेरित   होकर //
अहम् भावना से जब करते / राजसकर्म शास्त्र तेहि कहते //

श्लोक;- 
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य  च  पौरुषम्  /
मोहादारभ्यते    कर्म     यत्तत्तामसमुच्यते //२५//

चौपाई;-  
हिंसा,हानि,फलहिं बिन जाने / निज पौरुष के बिन अनुमाने // 
कर्मारम्भ   मोहवश   करते /  तामसकर्म  विज्ञ  तेहि  कहते //

श्लोक;- 
मुक्तसङ्गोsनहंवादी         धृत्युत्साहसमन्वितः  /
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते//२६//

चौपाई;- 
अहंवचन  तज  रहहिं  असंगा / मन  धीरज  उत्साह  उमंगा //
सिद्धि असिद्धि हर्ष अरु शोका/ नहिंव्यापें जिसको एहिंलोका // 
ऐसा   कर्ता   सात्त्विक   जानो / वह  योगी  में  उत्तम  मानो //

श्लोक;- 
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोsशुचिः /
हर्षशोकान्वितः कर्ता  राजसः  परिकीर्तितः //२७//

चौपाई;- 
लोभ वृत्ति जिस नर में जागे / कर्मों के फल में अनुरागे //
दोहा;- 
परपीड़क,शुचि रहित जो, हर्ष शोक में लीन /
ऐसा  करता  राजसी , कहते  ज्ञान   प्रवीण //

श्लोक;- 
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठोsनैष्कृतिकोsलसः/
विषादी   दीर्घसूत्री   च   कर्ता   तामस  उच्यते //२८ //

दोहा;-
जो अयुक्त शिक्षा रहित, धूर्त  अहं  से युक्त /
पर अपकारी आलसी , अरु विषाद संयुक्त //
दीर्घसूत्री पुरुष नित ,कल पर छोड़हिं कर्म /
ऐसे  कर्ता  तामसी , जानहिं  ज्ञाता  मर्म // 

श्लोक;-  
बुद्धेर्भेदं   धृतेश्चैव   गुणतस्त्रिविधं  श्रृणु  /
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय //२९// 

चौपाई;- 
अब सुन पार्थ बुद्धि धृति भेदा / गुण अनुरूप तीन कह वेदा //
सो अब पृथक पृथक समझाऊँ/ इनका विस्तृत ज्ञानकराऊँ //

श्लोक;- 
प्रवृत्तिं   च   निवृत्तिं   च   कार्याकार्ये  भयाभये  /
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी //३०// 

चौपाई;-    
प्रवृति, निवृति  को  जो पहिचाने / अकर्तव्य, कर्त्तव्यहिं जाने//
भयअरु अभय मोक्षअरु बन्धन/ ज्ञान जिसे यह कुन्तीनन्दन//
यह  प्रत्यक्ष  भेद  जो  पाये /   वही  बुद्धि  सात्त्विक  कहलाये//

श्लोक;-   
यया  धर्ममधर्मं  च  कार्यं  चाकार्यमेव  च /
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी //३१//

चौपाई;-
धर्म,अधर्म न जो पहचाने / उचित, अनुचित कर्त्तव्य न जाने //
या   यथार्थ  जो  भेद  न  पाये / बुद्धि  राजसी  वह  कहलाये //

श्लोक;-  
अधर्मं  धर्ममिति  या  मन्यते  तमसावृता  /
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी //३२//

चौपाई;- 
जब तम गुण जन बुद्धिहिं घेरे / कुमति होय दुष्कर्महिं प्रेरे //
तब मति  धर्म अधर्म न जाने / पापहिं पुण्यकर्म ही माने //
सब में अर्थ लखे विपरीता / बुद्धि तामसी, कहहिं विनीता // 

श्लोक;- 
धृत्या   यया    धारयते    मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः /
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी //३३//

चौपाई;- 
अब सुन धारण शक्ति प्रभेदा / जिसको धृति कहते हैं वेदा //
इष्ट ध्यान तज कुछ भी ध्याये /वह व्यभिचारी दोष कहाये //
दोहा;-
ऐसी  अब्यभिचारिणी , धृति   से  मन  अरु   प्राण /
तथा   इन्द्रियों  की  क्रिया , धारहिं  जो  मतिमान //
वह धृति सात्त्विक कहहिं सब,सुन अर्जुन मतिधीर /
होहिं  समर्पित  ब्रह्म  को ,  मन   अरु  प्राण  शरीर // 

श्लोक'-   
यया  तु   धर्मकामार्थान्धृत्या   धारयतेsर्जुन /
प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी //३४ //

दोहा;- 
फल अनुरागी पुरुष जिस, धृति  से अति  आसक्त /
अर्थ  धर्म  अरु  काम  ये , धारण  करहिं  समस्त //

चौपाई;-
है वह धारण शक्ति राजसी / अब आगे धृति कहूँ तामसी //

श्लोक;-  
यया  स्वप्नं  भयं  शोकं  विषादं  मदमेव च /
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी //३५//

चौपाई;- 
जिस धृतिशक्ति भावसे ! भारत / निद्रा,भय,चिंता,मद आरत //
दुष्ट बुद्धि नर धारण  करते  /  उसे  तामसी  धृति  सब  कहते //

श्लोक;- 
सुखं  त्विदानीं  त्रिविधं  श्रृणु  मे  भरतर्षभ /
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति //३६//
यत्तदग्रे     विषमिव   परिणामsमृतोपमम् /
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् //३७//

चौपाई;-  
अब सुख के भी  तीन  प्रकारा  / तुझ से  कहूँ  सहित विस्तार //
भारत !जिससुख में साधकजन / जप, ध्यान,भजन,आराधन //  
सेवा  से,  करके   अभ्यासा / रमे, न  दुःख   आवें  तेहि पासा //
प्रथमहिं वहसुख विषसम लागे/ किन्तु अमियसम फलहैंआगे //
इससे ब्रह्म विषय  का चिंतन / करती  जो  बुधि  कुन्तीनन्दन //
वह जो आत्म ज्ञान से पाये /  सो सुख  ही सात्त्विक  कहलाये //

श्लोक;- 
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेsमृतोपमम्       /
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् //३८//

चौपाई;- 
विषय   इन्द्रियों   के   संयोगा  /  उपजे   फल  पाये  दुर्योगा //
प्रथमहिं लागे अमियसमाना/ फलविषतुल्य न जान अज्ञाना//
दोहा;- 
धन,उमंग,बल,वीर्य,बुधि, अरु  नाशे परलोक /
इससे विष के तुल्य यह ,राजस सुख इहलोक //

श्लोक;-   
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः/ 
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् //३९//

दोहा;- 
भोगकाल से अंत तक ,आत्महिं रखे रमाय /
आलस नींद प्रमादजा ,सुख तामस कहलाय //

श्लोक;-
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः /
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः//४०//

चौपाई;-   
पृथ्वी,देवलोक, आकाशा / अथवा  जहँलगि   सृष्टि  विकाशा //
ऐसा सत्य न कहुँ जग माहीं/ प्रकृतिज तिरगुण युत जो नाहीं //

ब्रह्मादिक सुर ,अरु संसारा / प्रकृति जन्य तिर्गुणहिं विकारा //
इनका आदि ब्रह्म से जानो / इससे  इन्हें  अनादि  न  मानो //

श्लोक;- 
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप /
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः//४१//

चौपाई;- 
सुनहु परन्तप ! ब्राह्मण,क्षत्रिय / वैश्य,शूद्र श्रेणी कर सक्रिय //
कर्म स्वभावज गुण के द्वारा / किये  विभक्त कर्म  अनुसारा // 

श्लोक;-   
शमो   दमस्तपः  शौचं  क्षान्तिराजर्वमेव  च /
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् //४२//

चौपाई;- 
सम,दम,क्षमा,तपस्या,करुणा/मन,इन्द्रिय,तन का ऋजु रहना // 
भीतर अरु बाहर की शुचिता / नियत  कर्म   में  दृढ़  स्थिरता //
वेद   शास्त्र   ईश्वर  में  श्रद्धा / शास्त्र   पठनरत  जाग्रित  मेधा //  
ब्रह्मतत्त्व का  पावे  अनुभव / विप्र  स्वभाव  कर्म ! कह केशव //

श्लोक;-
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् /
दानमीश्वरभावश्च   क्षात्रं  कर्म  स्वभावजम् //४३//

चौपाई;-  
शौर्य,तेज,धीरज,निपुणाई / कबहुँ न रण त्यागहिं भयखाई //
दानशील , स्वामी  सदभाऊ / ये  सब  क्षत्रिय कर्म स्वभाऊ //

श्लोक;-      
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् /
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि  स्वभावजम् //४४//

चौपाई;- 
कृषि व्यापार और गोपालन / सद्व्यवहार सहित अनुपालन //

दोहा;-
वैश्य स्वाभाविक कर्म ये,और यही सद् धर्म /
सेवा तीनों  वर्ण  की , शूद्र  स्वभावज  कर्म //   

चौपाई;- 
भारत !काम,क्रोध,मद, लोभा /सर्वेन्द्रिय  उपजावहिं  क्षोभा //   
सम,दम,त्याग करहिं गोरक्षा / या विषयों  से  इन्द्रि सुरक्षा //
आत्म विषय का क्रमशःअर्जन / वही आत्मा का स्थिरधन //
उस हित  नित्य यत्नरत रहते / वे  व्यापार  ज्ञान  का करते //
वह हरिनाम कृषी कहलाये/ प्रकृति द्वन्द्व बिच नित लहराये //  

दोहा;-
ब्र्ह्मज्ञानियों  की  करहिं , सेवा  जो  अल्पज्ञ /
शूद्रवर्ण  वह  जानिये ,  सेवत  होहिं  गुणज्ञ // 
निम्न अरु मध्यम, उत्तम ,परमोत्तम ये चार /
कर्म श्रेणियाँ जानिये, योगी  मत  अनुसार // 

श्लोक;- 
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं  लभते  नरः /
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु //४५// 

चौपाई;- 
निज निज स्वाभाविक कर्मों में / तत्पर  जन  अपने  धर्मों  में //
भगवत  प्राप्ति  सिद्धि को  पावें / पाय परमपद  बहुरि न  आवें //
जिन निज सुकृत कर्ममें तत्पर/रहकर सिद्धिलहहिं साधक नर //
वह विधिभी अब तू मुझसेसुन/ तव हितकारण कहिहहुँ अर्जुन // 

श्लोक;- 
यतः   प्रवृत्तिर्भूतानां    येन   सर्वमिदं   ततम् /
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य  सिद्धिं विन्दति मानवः//४६//

चौपाई;-   
जिससे सब सचराचर जन्में / अलख व्याप्त जो सृष्टि भुवन में //
उस परमेश्वर का चिंतन कर / निज  स्वाभाविक  कर्मों से नर //
सिद्धि  अर्चना  करके  पाते / दुख  स्वरूप  भव  से  तर  जाते //

श्लोक;- 
श्रेयान्स्वधर्मो  विगुणः  परधर्मात्स्वनुष्ठितात् /
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् //४७//

चौपाई ;-
सब गुण युक्त धर्म से, पर के /  निगुण धर्म ही उत्तम निज के //
क्योंकि स्वभावज नियत कर्ममें / पाप न लागे रत स्वधर्म में //

श्लोक;- 
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् /
सर्वारम्भा हिदोषेण  धूमेनाग्निरिवावृताः //४८//

चौपाई;- 
सहज कर्म हो यदपि सदोषा / तदपि न त्यागे लख कर दोषा //
धुआँ   अग्नि   में   स्थित  जैसे / सारे  कर्म  दोष  युत  वैसे //

जितनेगुण अरु दोष बखाने / प्रकृति जन्य गुण से लिपटाने //
व्यक्ति  विशेषक   कर्म   सदोषा / केवल  एक  ब्रह्म  निर्दोषा // 

श्लोक;- 
असक्तबुद्धिः  सर्वत्र   जितात्मा   विगतस्पृहः /
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति //४९//

दोहा;- 

विजितात्मा निष्पृह चित ,सब आसक्ति विहीन /
वे पावहिं निष्कर्म सिधि , साधक  पुरुष  प्रबीन //

श्लोक;- 
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध में /
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा  ज्ञानस्य  या  परा //५०//

चौपाई;- 
परा   ज्ञान   की  जो  है  निष्ठा /  परम  सिद्धि  की  पराकाष्ठा //
पुरुष सिद्धि वह जेहिं विधि पाये / परम  ब्रह्म में जाय समाये //
उस विधिको अब तू मुझसे सुन / सारसमझ संक्षेपहिं अर्जुन //


श्लोक;- 
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं  नियम्य च /
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ  व्युदस्य च //५१//
विविक्तसेवी    लघ्वाशी     यतवाक्कायमानसः /
ध्यानयोगपरो   नित्यं    वैराग्यं    समुपाश्रितः //५२//
अहङ्कारं   बलं   दर्पं   कामं   क्रोधं   परिग्रहम् /
विमुच्य  निर्ममः  शान्तो  ब्रह्मभूयाय   कल्पते //५३//

चौपाई;- 
शुद्ध  बुद्धि  से  युक्ताचारी  /  नियमित  सात्त्विक  , अल्पाहारी //
शब्दादिक विषयों को त्यागे / नित एकांत जिनहिं  प्रिय लागे //
शुद्ध  देश  का करते सेवन / सात्त्विक  धृति से आत्म संयमन //
काय,वचन,मन,निजवश करते / राग द्वेष नहिं  कबहुँ उपजते //
दृढ़ विराग का लेहिं सहारा /  काम , क्रोध  जारहिं   तप  द्वारा //
अहं, दर्प, बल  सब  परित्यागे / ध्यानयोग  में  नित अनुरागे //    
ममता रहित ,शान्ति मन पावे /ब्रह्म सिद्धि का पात्र कहावे //

श्लोक;- 
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति /
समः  सर्वेषु  भूतेषु   मद्भक्तिं   लभते   पराम् //५४//

दोहा;-
ब्रह्म स्थित इक भाव से , रहते  नित्य  प्रसन्न /
करहिं न शोक न कामना,कबहुँ न होवें खिन्न // 
सृष्टि   रचित   जीव  को ,  देखे   समता  भाव /
पराभक्ति  मम  पावहिं , योगी  सरल  स्वभाव //

श्लोक;- 
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः /
ततो   मां   तत्त्वतो  ज्ञात्वा  विशते  तदनन्तरम् //५५//

चौपाई;-     
मेरी  परा  भक्ति  से  वह  नर / मैं  जो ,जैसा,जितना, अक्षर //
तत्त्व सहित वैसा ही  जाने /  शाश्वत  सत्य , शक्ति  पहचाने //
इसविधि मोहिं तत्त्वसेजानी/ तत्क्षण मुझमें प्रविशहिं ज्ञानी// 

श्लोक;- 
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः /
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् //५६//

चौपाई;- 
मुझ आश्रित यों सहित विवेका / सर्व कर्म रत कर चित एका //
मम प्रसाद से परम सनातन / अव्यय  पद  पा जाते  वे  जन //

श्लोक;- 
चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्नयस्य मत्परः /
बुद्धियोगमुपाश्रित्य  मच्चित्तः  सततं   भव //५७//

चौपाई;- 
सर्व कर्म मन से कर अर्पण / ले  समत्त्व बुधि का अवलंबन // 
तू भी मेरे आश्रित हो जा / नित चिंतन कर  मुझ में खो जा //

श्लोक;- 
मच्चित्तः    सर्वदुर्गाणि    मत्प्रसादात्तरिष्यसि /
अथ  चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि //५८//

चौपाई;-  
इस प्रकार जब मुझको  ध्याये / मेरी  अनुकम्पा  तू  पाये //
मन,इन्द्रिय के सब दुर्गम गढ़ / पार करे होकर वृत में दृढ़ // 
यदि निज अहंकारवश पारथ / सुने न मेरे वचन  कृतारथ //
होकर भ्रष्ट नष्ट  हो  जाये / फिर वह मोक्ष सिद्धि नहिं पाये //

श्लोक;-   
यदहङ्कारमाश्रित्य    योत्स्य    इति   मन्यसे /
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति //५९//

चौपाई;- 
पार्थ अहं वश यति तू जाने / युद्ध करूँगा  नहिं, व्रत ठाने //
दोहा;- 
तो निज वृत मिथ्या समझ  ,जबरन प्रकृति प्रभाव /
युद्ध  प्रवृत  तुझको  करे , क्षत्रिय   सहज   स्वभाव //

श्लोक;-   
स्वभावजेन   कौन्तेय   निबद्धः   स्वेन  कर्मणा /
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोsपि तत् //६०// 

दोहा;-  
जिन कर्मों को मोहवश, करन न चाहे पार्थ /
करे विवश हो पूर्व कृत ,कर्मन बँधा यथार्थ //

श्लोक;- 
ईश्वरः  सर्वभूतानां   हृद्देशेsर्जुन   तिष्ठति /
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया //६१//

चौपाई;- 
देह स्वरुप यंत्र  आरूढ़ा /  सब  जीवहिं  वह  ईश्वर  गूढ़ा //
हिय स्थित हो कर्म कराये / निज माया में जग भरमाये //

श्लोक;- 
तमेव   शरणं     गच्छ     सर्व     भावेन     भारत /
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् //६२//

चौपाई;- 
वह अखिलेश्वर जग का स्वामी / अज,अविनाशी,अन्तर्यामी //
अर्जुन तासु शरण गहु जाई  /  जहँ  मायातम  जाय  सिराई //
सर्व भाव उसको कर अर्पित / हो जा उस हित स्वयं समर्पित //
जासु कृपा ,मन शान्ति समाये  /  शाश्वत  परमधाम तू पाये //

श्लोक;- 
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद् गुह्यतरं मया /
विमृश्यैतदशेषेण   यथेच्छसि  तथा   कुरु //६३//

चौपाई;-  
यह अति गूढ़ ,गूढ़तम ज्ञाना / तुमहिं पार्थ जो कहा बखाना //
गुप्त रहस्य ज्ञान यह न्यारा /  निज हिय कर संपूर्ण  विचारा //
फिर जैसा तव जिय में आये / वैसा  कर  जो  तुझ को भाये //

श्लोक;- 
सर्वगुह्यतमं    भूयः    श्रृणु   मे   परमं   वचः /
इष्टोsसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् //६४//

चौपाई;-   
अब अतिगुप्त वचन मम अर्जुन / परमरहस्ययुक्त तू फिर सुन //
तू अतिशय प्रिय सबमें इससे / हितकर  वचन  कहूँगा तुझसे //

श्लोक;- 
मन्मना  भव मद्भक्तो मद्याजी मां  नमस्कुरु  /
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोsसि मे //६५//

चौपाई;-
मुझ में बसे  चित्त नित तेरा / हो मम भक्त यजन कर मेरा //
नित प्रणाम कर ध्यान लगावे / तो निश्य मुझको ही पावे //
दोहा;- 
सत्य प्रतिज्ञा कर कहूँ, तू अतिप्रिय मम भक्त /
मुझको पाये अंत  में  / जग  से  हुआ  विरक्त //     

श्लोक;- 
सर्वधर्मान्परित्यज्य    मामेकं   शरणं   व्रज /
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः//६६//

दोहा;- 
सब धर्मों को त्याग के , एक  विश्व  आधार /
मुझ परमेश्वर की शरण, आजा कुन्तीकुमार //
कर  दूँगा मैं  विश्व  के , सब  पापों  से  मुक्त /
शोक न कर दृढ़ भक्ति से ,हो मुझ में अनुरक्त //

श्लोक;-
इदं  ते  नातपस्काय   नाभक्ताय   कदाचन /
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां  योsभ्यसूयति //६७//

चौपाई;- 
जो  तप  रहित   भक्ति  से  हीना /  ईश्वर  श्रद्धाभाव  विहीना//
जिनश्रवणनको प्रियनहिंलागे/श्रवणकरत मन नहिं अनुरागे//
उनको गीता   ज्ञानोपदेशा /  कबहुँ  न  कहिये  कह  योगशा//
दोष दृष्टि  जो मुझ  में राखे / ताके  सम्मुख  कबहुँ  न  भाखे//

श्लोक;- 
य  इमं  परमं  गुह्यं   मद्भक्तेष्वभिधास्यति /
भक्तिं मयि  परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः//६८//

चौपाई;--  
जो नर मुझ में कर अति प्रीता / परमरहस्य युक्त यह गीता //
मम   भक्तों   के   बीच  सुनावे / बिनु  संदेह  मुझे  ही  पावे //

श्लोक;- 
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः /
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि //६९//

चौपाई;-

उससे उत्तम नहीं पुरुष में / मम प्रिय कार्य करे जो जगमें // 
और न उससे  बढ़  कर  प्यारा  / दूजा होगा  भक्त हमारा //

जोभक्तहिं उपदेशहिं ज्ञाना /उस सम श्रेष्ठकर्म नहिं आना //

श्लोक;-
अध्येष्यते च य इमं  धर्म्यं  संवादमावयोः /
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः //७०//

चौपाई;- 
यह हमार संवाद पुनीता /जो नित अध्ययन करे सप्रीता //
उनके   ज्ञान   यज्ञ   के   प्रेरे /  मोहिं   भक्त  पूजेंगे  मेरे //
ऐसा मममत कुन्तीनन्दन / बोले केशव भव दुख भंजन //

श्लोक;- 
श्रद्धावाननसूयश्च          शृणुयादपि     यो     नरः /
सोsपि मुक्तःशुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् //७१//

दोहा;-   
दोष दृष्टि  से  हैं  रहित , नर  जो  श्रद्धा  युक्त /
वे भी सुन सुन शास्त्र यह , होहिं पाप से मुक्त //

चौपाई;- 
पुण्यकर्म करता जहँ जाते / उसी लोक को श्रोता पाते //

श्लोक;-
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा /
कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय //७२//

चौपाई;- 
कर चित स्थिर ह्रदय प्रदेशा / सुना पार्थ क्या ! यह उपदेशा //
क्या ! अज्ञान जनित तव मोहा / नष्टहुआ,जेहि ते भा छोहा //

                             अर्जुन उवाच 

श्लोक;-  
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत /
स्थितोsस्मि  गतसन्देहः  करिष्ये  वचनं  तव //७३//

चौपाई;-     
तब अर्जुन बोले  हे  स्वामी / हे  अच्युत , हे  अन्तर्यामी //
तव प्रसाद महिमा सुरराया / अब मेरा सब मोह  नशाया //
संशय रहित हुआ अब जाई / निज स्मृति मैंने पुनि पाई //
अब जो मोहिं रजायसु होई / करहुँ शीश धर आयसु सोई //

                         संजय उवाच  

श्लोक;- 
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः /
संवादमिममश्रौषमद्भुतं        रोमहर्षणम् //७४// 

चौपाई;- 
एहिविधि वासुदेव मधुसूदन / और महान आत्मा अर्जुन //
दोनों के संवाद विलक्षण / सुने  आज  कीन्हें  प्रभु  दर्शन //

गूढ़ रहस्य रोम पुलकावे / वाणी  से  सो  बरणि  न  जावे //

श्लोक ;-  
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद् गुह्यमहं           परम् /
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः  स्वयम् //७५//

चौपाई;- 
अतिशयकृपा व्यासमुनिकीन्हा/जोयह दिव्यदृष्टि मोहिं दीन्हा //
जासु   कृपा   से  प्रभु  योगेश्वर /  श्रीकृष्ण  जो  हैं  अखिलेश्वर //

दोहा;-
उनसे   मैं    प्रत्यक्ष   सब , योगशास्त्र  का  ज्ञान /
जो अति गुप्त रहस्यमय ,श्रवण किया धर ध्यान //

श्लोक;-
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् /
केशवार्जुनयोः  पुण्यं  हृस्यामि  च  मुहुर्मुहुः //७६//

चौपाई;- 
अति प्रिय वासुदेव अर्जुन के /अदभुत संवादहिंहिय गुन के //
मैं   आश्चर्य  चकित  रह  जाऊं /  राजन  बार  बार  हरषाऊँ //

श्लोक;-  
तच्च   संस्मृत्य  संस्मृत्य  रूपमत्यद्भुतं  हरेः /
विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः //७७//

चौपाई;-
श्रीहरि अदभुत विश्वस्वरूपा / सुमिर सुमिर हियमें कुरुभूपा //
चितअतिविस्मित तन हर्षाये / पुलकगात लोचनजल छाये //

श्लोक;-    
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः /
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम//७८//

दोहा;- 
जहँ योगेश्वर कृष्ण हैं , वहीं अचल दृढ़ नीति /
वहीं धनुर्धर पार्थ भी ,वहीं विजय श्री ,कीर्ति //
ईश्वर   सर्व   विभूतियाँ , वे  हैं  अर्जुन   संग /
मेरा मत यह  जानिये , इति  सम्पूर्ण  प्रसंग //

मोक्ष और  संन्यास  का , अष्टदशोअध्याय /
पूर्ण हुआ श्रीकृष्णहरि, की अनुकम्पा पाय //

इस प्रकार श्रीमद् भगवद् गीता रूपी उपनिषद एवं ब्रह्म विद्या तथा   योगशास्त्र  विषयक  श्रीकृष्ण  और  अर्जुन  संवाद  में उदयभानु तिवारी''मधुकर''  कृत  महाकाव्य ''गीतमानस'' में संन्यास योग नामक अठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ /
  
                           हरि ॐ तत्सत्