//ॐ श्री परमात्मने नमः//
अथाष्टादशो अध्यायः
दोहा ;-
सार सर्व अध्याय का , जेहि से उपजे ज्ञान /
होय विरति ,योगी लहहिं ,तन से मुक्ति महान //
सो अर्जुन के प्रति कहहिं ,त्रिभुवन पति योगेश /
कर्म प्रवृत अरु श्रवण रत,जन के मिटहिं कलेश //
अर्जुन उवाच
श्लोक;-
सन्न्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छमि वेदतुम् /
सन्न्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छमि वेदतुम् /
त्यागस्य च ह्रषीकेश पृथक्केशिनिषूदन //१//
दोहा;--
तत्त्व ,त्याग -संन्यास का , जानन चाहूँ देव /
तत्त्व ,त्याग -संन्यास का , जानन चाहूँ देव /
कहिये प्रभु विस्तार से ,पृथक पृथक सब भेव //
चौपाई ;-
महाबाहु हे अन्तर्यामी / केशिनिषूदन त्रिभुवन स्वामी /
वासुदेव हे कृष्णमुरारी / त्याग तत्त्व कहिये गिरिधारी //
श्री भगवानुवाच
श्लोक;-
काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्न्यासं कवयो विदुः /
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः //
चौपाई;-
सुन जिज्ञासु वचन अर्जुन के / बोले परम पुरुष त्रिभुवन के //
दोहा;-
काम्यकर्म के त्याग को , कुछ कहते संन्यास /
किन्तु पार्थ जो विज्ञ जन , जिन्हे तत्त्व आभास //
सर्व कर्म फल त्याग को , वे कहते हैं त्याग /
रहित राग आसक्ति से , उपजे पूर्ण विराग //
श्लोक;-
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः /
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे //३//
चौपाई;-
बहुतेरे ज्ञानी यह कहते / सारे कर्म दोष युत रहते //
इससे सभी त्यागने लायक / किन्तु विज्ञजन जो निर्णयक //
वे नर कहहिं यज्ञ ,तप,दाना / नहीं त्याज्य ये कर्म विधाना //
श्लोक;-
निश्चयं श्रुणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम /
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः//४//
चौपाई;-
पुरुष श्रेष्ठ हे अर्जुन ज्ञानी / कहहुँ त्याग के भेद बखानी //
अब निश्चय सुन मम अनुसारा /कर्म त्याग के विविध प्रकार //
श्लोक;-
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् /
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् //५//
चौपाई;-
तीनों कर्म यज्ञ ,तप, दाना / नहीं त्याज्य कर्त्तव्य विधाना //
मुख्य कर्म ये पाप नशावन / मुनि मनीष को करते पावन //
श्लोक;-
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गम त्यक्त्वा फलानि च /
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् //६//
चौपाई;-
इससे इन तीनों के सँग में / हैं कर्त्तव्य और जो जग में //
सब आसक्ति कर्मफल त्यागी /करे अवश्य ब्रह्म अनुरागी //
यही उचित मम मत अनुसारा/ हुआ सुनिश्चित मेरे द्वारा //
श्लोक;-
नियतस्य तु सन्न्यासः कर्मणो नोपपद्यते /
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः//७//
चौपाई;-
जप, तप, दान, भजन, आराधन / ये ही नियतकर्म संसाधन //
जप, तप, दान, भजन, आराधन / ये ही नियतकर्म संसाधन //
काम्य, निषिद्धकर्म परित्यागे/ किन्तु न नियतकर्म को त्यागे//
दोहा;-
नियतकर्म परित्याग को , उचित न माना जाय /
जो त्यागहिं जन मोहवश ,तामस त्याग कहाय //
श्लोक;-
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् /
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत //८//
चौपाई;-
नियतकर्म दुख रूप समझ नर / देह क्लेश के भय में आकर //
जो कर्त्तव्य कर्म परित्यागे / कष्ट देख कर्मों से भागे //
तासु त्याग राजस हो जाये / त्याग किये भी फल नहिं पाये //
या जो परम शान्ति कहलाये / उस फल को साधक नहीं पाये //
श्लोक;-
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियते र्जुन /
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्विको मतः//९//
चौपाई;-
शास्त्रयुक्त विधि से सब करना / है कर्तव्य, कर्मरत रहना //
यही भाव जिसके मन जागे / संगदोष अरु फल परित्याग //
तब वह सात्त्विक त्याग कहाये / पार्थ!जहाँ आसक्ति न आये //
श्लोन
द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते /
द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते /
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः//१०//
चौपाई;-
अकुशल कर्म न द्वेष बढ़ावे / कुशल कर्म कर्तत्व न लावे //
वही सत्त्वगुण युक्त विरागी / संशय रहित ,बुद्ध अरु त्यागी //
श्लोक;-
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः /
यस्तु कर्मफल त्यागी स त्यागीत्यभिधीयते //११//
चौपाई;-
पूर्ण त्याग इस सृष्टि भुवन में / संभव नहिं मानव जीवन में //
इसकारण जो फल के त्यागी / वही मनुज सच्चे परित्यागी //
श्लोक;-
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् /
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु सन्न्यासिनां क्वचित् //१२//
चौपाई;-
जन,सकामजब तनतज जावें/शुभ या अशुभ,मिश्र फल पावें//
पर जो त्यागी पुरुष कहाते / वे ये त्रय फल कबहुँ न पाते//
श्लोक;-
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे /
साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् //१३//
दोहा;-
सर्वकर्म की सिद्धि के , हेतु पाँच ही जान /
सांख्यशास्त्र में जो कहे ,तुमसे करूँ बखान //
चौपाई;-
महाबाहु हे पाण्डुकुमारा / कारण सुन ये पंच प्रकारा //
श्लोक;-
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् /
विविधाश्च पृथक्वेष्टा दैवं चैवात्र पंचमम् //१४//
चौपाई;-
'अधिष्ठान' आधार कहाये / या आश्रय जो कर्म कराये //
'कर्ता' ही इस मन को जानो /करण भिन्न माध्यम को मानो //
शम,दम,त्याग,विराग,विवेका / नितहरिचिंतन यत्नअनेका //
यदि नर को शुभ पार लगाये / यही करण कारण बन जाये //
होय अशुभ से पार अगर नर /काम,क्रोध, लिप्सा या मत्सर //
राग, द्वेष ही कारण बनते / यही करण बन प्रेरित करते //
चौथा कारण हैं इच्छायें / ये अनंत नर पार न पायें //
पंचम कारण दैव कहाये / कर्म सिद्धि जिससे मिल जाये //
श्लोक;-
शरीरवाङ् मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः /
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः //१५//
चौपाई;-
जब मानव मन,वाणी,तन से / करे कर्म शुभ और अशुभ से //
उनसे सुफल कुफल जो पाये / उनके हेतु पांच कहलाये //
श्लोक;-
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः /
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः /
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः //१६//
चौपाई;-
ऐसे में भी जो मन मूढ़ा / जानहिं नहिं रहस्य यह गूढ़ा //
दोहा;-
कर्ता समझे आत्महिं ,सो जड़मति अज्ञान /
देखे नहीं यथार्थ वह ,हुआ न बुद्धि विहान //
श्लोक;-
यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते /
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते //१७//
चौपाई;-
कर्ता भाव न जिसमें रहते / और न कर्म लिप्त जेहिं करते //
वह सब लोकों का वध कर भी / मारे नहिं यथार्थ में तब भी //
और न पापों के ही बन्धन / उसको बाँधें कुन्तीनन्दन //
श्लोक;-
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना /
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः //१८//
चौपाई;-
ज्ञाता,ज्ञान ,ज्ञेय संधारण / ये त्रय कर्म प्रेरणा कारण //
कर्ता,करण,क्रिया तीनों यह / हैं अर्जुन कर्मों के संग्रह //
श्लोक;-
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः /
प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि //१९//
चौपाई;-
कर्ता ,कर्म ,ज्ञान गुण भेदा / तीनों के त्रय कहते वेदा //
उन्हें यथावत तुझे सुनाऊँ / उनके भिन्न भेद समझाऊँ //
श्लोक;-
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते /
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् //२०//
चौपाई;-
जिस सुबुद्धि से युक्त हुआ नर / भिन्न भिन्न भूतों में ईश्वर //
एक भाव में स्थित देखे / व्याप्त ब्रह्म सब जग में लेखे //
उस प्रत्यक्षज्ञान को अर्जुन / सात्त्विक जान भाव वह निर्गुण //
श्लोक;-
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् //
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् //२१//
चौपाई;-
जिस सुबुद्धि से जन सविवेका / भिन्न जीव के भाव अनेका //
पृथक पृथक रूपों में जाने / शुभ अरु अशुभ भेद पहचाने //
दोहा;-
उस मानव की बुद्धि को ,अर्जुन ! राजस जान /
अब आगे विस्तार से , तामस करूँ बखान //
श्लोक;-
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् /
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् /
अतत्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् //२२//
दोहा;-
वह सम्पूरण ज्ञान जो , तन से है आसक्त /
बिना युक्ति,तत्वार्थ से , रहित तुच्छ अनुरक्त //
चौपाई;-
ज्ञान तामसी वह कहलाये / भव सागर नहिं पार लगाये //
श्लोक;-
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम् /
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्विकमुच्यते //२३//
चौपाई;-
राग द्वेष कर्तत्त्व विहीना / संगदोष, फल इच्छा हीना //
शास्त्र सुसम्मत विधि अनुसारा / नियत कर्म हों करता द्वारा //
कर्म वही सात्त्विक कहलाये / जग बंधन से मुक्ति दिलाये //
श्लोक;-
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः/
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् //२४//
चौपाई;-
कर्म करें अतिश्रम से जो नर / भोगेक्षा से प्रेरित होकर //
अहम् भावना से जब करते / राजसकर्म शास्त्र तेहि कहते //
श्लोक;-
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम् /
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते //२५//
चौपाई;-
हिंसा,हानि,फलहिं बिन जाने / निज पौरुष के बिन अनुमाने //
कर्मारम्भ मोहवश करते / तामसकर्म विज्ञ तेहि कहते //
श्लोक;-
मुक्तसङ्गोsनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः /
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते//२६//
चौपाई;-
अहंवचन तज रहहिं असंगा / मन धीरज उत्साह उमंगा //
सिद्धि असिद्धि हर्ष अरु शोका/ नहिंव्यापें जिसको एहिंलोका //
ऐसा कर्ता सात्त्विक जानो / वह योगी में उत्तम मानो //
श्लोक;-
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोsशुचिः /
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः //२७//
चौपाई;-
लोभ वृत्ति जिस नर में जागे / कर्मों के फल में अनुरागे //
दोहा;-
परपीड़क,शुचि रहित जो, हर्ष शोक में लीन /
ऐसा करता राजसी , कहते ज्ञान प्रवीण //
श्लोक;-
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठोsनैष्कृतिकोsलसः/
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते //२८ //
दोहा;-
जो अयुक्त शिक्षा रहित, धूर्त अहं से युक्त /
पर अपकारी आलसी , अरु विषाद संयुक्त //
दीर्घसूत्री पुरुष नित ,कल पर छोड़हिं कर्म /
ऐसे कर्ता तामसी , जानहिं ज्ञाता मर्म //
श्लोक;-
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं श्रृणु /
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय //२९//
चौपाई;-
अब सुन पार्थ बुद्धि धृति भेदा / गुण अनुरूप तीन कह वेदा //
सो अब पृथक पृथक समझाऊँ/ इनका विस्तृत ज्ञानकराऊँ //
श्लोक;-
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये /
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी //३०//
चौपाई;-
प्रवृति, निवृति को जो पहिचाने / अकर्तव्य, कर्त्तव्यहिं जाने//
प्रवृति, निवृति को जो पहिचाने / अकर्तव्य, कर्त्तव्यहिं जाने//
भयअरु अभय मोक्षअरु बन्धन/ ज्ञान जिसे यह कुन्तीनन्दन//
यह प्रत्यक्ष भेद जो पाये / वही बुद्धि सात्त्विक कहलाये//
श्लोक;-
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च /
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी //३१//
चौपाई;-
धर्म,अधर्म न जो पहचाने / उचित, अनुचित कर्त्तव्य न जाने //
या यथार्थ जो भेद न पाये / बुद्धि राजसी वह कहलाये //
श्लोक;-
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता /
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी //३२//
चौपाई;-
जब तम गुण जन बुद्धिहिं घेरे / कुमति होय दुष्कर्महिं प्रेरे //
तब मति धर्म अधर्म न जाने / पापहिं पुण्यकर्म ही माने //
सब में अर्थ लखे विपरीता / बुद्धि तामसी, कहहिं विनीता //
श्लोक;-
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः /
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी //३३//
चौपाई;-
अब सुन धारण शक्ति प्रभेदा / जिसको धृति कहते हैं वेदा //
इष्ट ध्यान तज कुछ भी ध्याये /वह व्यभिचारी दोष कहाये //
दोहा;-
ऐसी अब्यभिचारिणी , धृति से मन अरु प्राण /
तथा इन्द्रियों की क्रिया , धारहिं जो मतिमान //
वह धृति सात्त्विक कहहिं सब,सुन अर्जुन मतिधीर /
होहिं समर्पित ब्रह्म को , मन अरु प्राण शरीर //
श्लोक'-
यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेsर्जुन /
प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी //३४ //
दोहा;-
फल अनुरागी पुरुष जिस, धृति से अति आसक्त /
अर्थ धर्म अरु काम ये , धारण करहिं समस्त //
चौपाई;-
है वह धारण शक्ति राजसी / अब आगे धृति कहूँ तामसी //
श्लोक;-
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च /
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी //३५//
चौपाई;-
जिस धृतिशक्ति भावसे ! भारत / निद्रा,भय,चिंता,मद आरत //
जिस धृतिशक्ति भावसे ! भारत / निद्रा,भय,चिंता,मद आरत //
दुष्ट बुद्धि नर धारण करते / उसे तामसी धृति सब कहते //
श्लोक;-
सुखं त्विदानीं त्रिविधं श्रृणु मे भरतर्षभ /
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति //३६//
यत्तदग्रे विषमिव परिणामsमृतोपमम् /
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् //३७//
चौपाई;-
अब सुख के भी तीन प्रकारा / तुझ से कहूँ सहित विस्तार //
भारत !जिससुख में साधकजन / जप, ध्यान,भजन,आराधन //
सेवा से, करके अभ्यासा / रमे, न दुःख आवें तेहि पासा //
प्रथमहिं वहसुख विषसम लागे/ किन्तु अमियसम फलहैंआगे //
इससे ब्रह्म विषय का चिंतन / करती जो बुधि कुन्तीनन्दन //
वह जो आत्म ज्ञान से पाये / सो सुख ही सात्त्विक कहलाये //
श्लोक;-
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेsमृतोपमम् /
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् //३८//
चौपाई;-
विषय इन्द्रियों के संयोगा / उपजे फल पाये दुर्योगा //
प्रथमहिं लागे अमियसमाना/ फलविषतुल्य न जान अज्ञाना//
दोहा;-
धन,उमंग,बल,वीर्य,बुधि, अरु नाशे परलोक /
इससे विष के तुल्य यह ,राजस सुख इहलोक //
श्लोक;-
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः/
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् //३९//
दोहा;-
भोगकाल से अंत तक ,आत्महिं रखे रमाय /
आलस नींद प्रमादजा ,सुख तामस कहलाय //
श्लोक;-
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः /
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः//४०//
चौपाई;-
पृथ्वी,देवलोक, आकाशा / अथवा जहँलगि सृष्टि विकाशा //
ऐसा सत्य न कहुँ जग माहीं/ प्रकृतिज तिरगुण युत जो नाहीं //
ब्रह्मादिक सुर ,अरु संसारा / प्रकृति जन्य तिर्गुणहिं विकारा //
इनका आदि ब्रह्म से जानो / इससे इन्हें अनादि न मानो //
श्लोक;-
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप /
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः//४१//
चौपाई;-
सुनहु परन्तप ! ब्राह्मण,क्षत्रिय / वैश्य,शूद्र श्रेणी कर सक्रिय //
कर्म स्वभावज गुण के द्वारा / किये विभक्त कर्म अनुसारा //
श्लोक;-
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिराजर्वमेव च /
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् //४२//
चौपाई;-
सम,दम,क्षमा,तपस्या,करुणा/मन, इन्द्रिय,तन का ऋजु रहना //
भीतर अरु बाहर की शुचिता / नियत कर्म में दृढ़ स्थिरता //
वेद शास्त्र ईश्वर में श्रद्धा / शास्त्र पठनरत जाग्रित मेधा //
ब्रह्मतत्त्व का पावे अनुभव / विप्र स्वभाव कर्म ! कह केशव //
श्लोक;-
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् /
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् //४३//
चौपाई;-
शौर्य,तेज,धीरज,निपुणाई / कबहुँ न रण त्यागहिं भयखाई //
दानशील , स्वामी सदभाऊ / ये सब क्षत्रिय कर्म स्वभाऊ //
श्लोक;-
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् /
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् //४४//
चौपाई;-
कृषि व्यापार और गोपालन / सद्व्यवहार सहित अनुपालन //
दोहा;-
वैश्य स्वाभाविक कर्म ये,और यही सद् धर्म /
सेवा तीनों वर्ण की , शूद्र स्वभावज कर्म //
चौपाई;-
भारत !काम,क्रोध,मद, लोभा /सर्वेन्द्रिय उपजावहिं क्षोभा //
भारत !काम,क्रोध,मद, लोभा /सर्वेन्द्रिय उपजावहिं क्षोभा //
सम,दम,त्याग करहिं गोरक्षा / या विषयों से इन्द्रि सुरक्षा //
आत्म विषय का क्रमशःअर्जन / वही आत्मा का स्थिरधन //
उस हित नित्य यत्नरत रहते / वे व्यापार ज्ञान का करते //
वह हरिनाम कृषी कहलाये/ प्रकृति द्वन्द्व बिच नित लहराये //
दोहा;-
ब्र्ह्मज्ञानियों की करहिं , सेवा जो अल्पज्ञ /
शूद्रवर्ण वह जानिये , सेवत होहिं गुणज्ञ //
निम्न अरु मध्यम, उत्तम ,परमोत्तम ये चार /
कर्म श्रेणियाँ जानिये, योगी मत अनुसार //
श्लोक;-
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः /
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु //४५//
चौपाई;-
निज निज स्वाभाविक कर्मों में / तत्पर जन अपने धर्मों में //
भगवत प्राप्ति सिद्धि को पावें / पाय परमपद बहुरि न आवें //
जिन निज सुकृत कर्ममें तत्पर/रहकर सिद्धिलहहिं साधक नर //
वह विधिभी अब तू मुझसेसुन/ तव हितकारण कहिहहुँ अर्जुन //
श्लोक;-
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् /
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः//४६//
चौपाई;-
जिससे सब सचराचर जन्में / अलख व्याप्त जो सृष्टि भुवन में //
उस परमेश्वर का चिंतन कर / निज स्वाभाविक कर्मों से नर //
सिद्धि अर्चना करके पाते / दुख स्वरूप भव से तर जाते //
श्लोक;-
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् /
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् //४७//
चौपाई ;-
सब गुण युक्त धर्म से, पर के / निगुण धर्म ही उत्तम निज के //
क्योंकि स्वभावज नियत कर्ममें / पाप न लागे रत स्वधर्म में //
श्लोक;-
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् /
सर्वारम्भा हिदोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः //४८//
चौपाई;-
सहज कर्म हो यदपि सदोषा / तदपि न त्यागे लख कर दोषा //
धुआँ अग्नि में स्थित जैसे / सारे कर्म दोष युत वैसे //
जितनेगुण अरु दोष बखाने / प्रकृति जन्य गुण से लिपटाने //
व्यक्ति विशेषक कर्म सदोषा / केवल एक ब्रह्म निर्दोषा //
व्यक्ति विशेषक कर्म सदोषा / केवल एक ब्रह्म निर्दोषा //
श्लोक;-
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः /
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति //४९//
दोहा;-
विजितात्मा निष्पृह चित ,सब आसक्ति विहीन /
वे पावहिं निष्कर्म सिधि , साधक पुरुष प्रबीन //
श्लोक;-
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध में /
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा //५०//
चौपाई;-
परा ज्ञान की जो है निष्ठा / परम सिद्धि की पराकाष्ठा //
पुरुष सिद्धि वह जेहिं विधि पाये / परम ब्रह्म में जाय समाये //
उस विधिको अब तू मुझसे सुन / सारसमझ संक्षेपहिं अर्जुन //
श्लोक;-
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च /
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च //५१//
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः /
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः //५२//
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् /
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते //५३//
चौपाई;-
शुद्ध बुद्धि से युक्ताचारी / नियमित सात्त्विक , अल्पाहारी //
शब्दादिक विषयों को त्यागे / नित एकांत जिनहिं प्रिय लागे //
शुद्ध देश का करते सेवन / सात्त्विक धृति से आत्म संयमन //
काय,वचन,मन,निजवश करते / राग द्वेष नहिं कबहुँ उपजते //
दृढ़ विराग का लेहिं सहारा / काम , क्रोध जारहिं तप द्वारा //
अहं, दर्प, बल सब परित्यागे / ध्यानयोग में नित अनुरागे //
ममता रहित ,शान्ति मन पावे /ब्रह्म सिद्धि का पात्र कहावे //
श्लोक;-
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति /
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् //५४//
दोहा;-
ब्रह्म स्थित इक भाव से , रहते नित्य प्रसन्न /
करहिं न शोक न कामना,कबहुँ न होवें खिन्न //
सृष्टि रचित जीव को , देखे समता भाव /
पराभक्ति मम पावहिं , योगी सरल स्वभाव //
श्लोक;-
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः /
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् //५५//
चौपाई;-
मेरी परा भक्ति से वह नर / मैं जो ,जैसा,जितना, अक्षर //
तत्त्व सहित वैसा ही जाने / शाश्वत सत्य , शक्ति पहचाने //
इसविधि मोहिं तत्त्वसेजानी/ तत्क्षण मुझमें प्रविशहिं ज्ञानी//
श्लोक;-
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः /
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् //५६//
चौपाई;-
मुझ आश्रित यों सहित विवेका / सर्व कर्म रत कर चित एका //
मम प्रसाद से परम सनातन / अव्यय पद पा जाते वे जन //
श्लोक;-
चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्नयस्य मत्परः /
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव //५७//
चौपाई;-
सर्व कर्म मन से कर अर्पण / ले समत्त्व बुधि का अवलंबन //
तू भी मेरे आश्रित हो जा / नित चिंतन कर मुझ में खो जा //
श्लोक;-
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि /
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि //५८//
चौपाई;-
इस प्रकार जब मुझको ध्याये / मेरी अनुकम्पा तू पाये //
मन,इन्द्रिय के सब दुर्गम गढ़ / पार करे होकर वृत में दृढ़ //
यदि निज अहंकारवश पारथ / सुने न मेरे वचन कृतारथ //
होकर भ्रष्ट नष्ट हो जाये / फिर वह मोक्ष सिद्धि नहिं पाये //
श्लोक;-
यदहङ्कारमाश्रित्य योत्स्य इति मन्यसे /
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति //५९//
चौपाई;-
पार्थ अहं वश यति तू जाने / युद्ध करूँगा नहिं, व्रत ठाने //
दोहा;-
तो निज वृत मिथ्या समझ ,जबरन प्रकृति प्रभाव /
युद्ध प्रवृत तुझको करे , क्षत्रिय सहज स्वभाव //
श्लोक;-
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा /
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोsपि तत् //६०//
दोहा;-
जिन कर्मों को मोहवश, करन न चाहे पार्थ /
करे विवश हो पूर्व कृत ,कर्मन बँधा यथार्थ //
श्लोक;-
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेsर्जुन तिष्ठति /
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया //६१//
चौपाई;-
देह स्वरुप यंत्र आरूढ़ा / सब जीवहिं वह ईश्वर गूढ़ा //
हिय स्थित हो कर्म कराये / निज माया में जग भरमाये //
श्लोक;-
तमेव शरणं गच्छ सर्व भावेन भारत /
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् //६२//
चौपाई;-
वह अखिलेश्वर जग का स्वामी / अज,अविनाशी,अन्तर्यामी //
अर्जुन तासु शरण गहु जाई / जहँ मायातम जाय सिराई //
सर्व भाव उसको कर अर्पित / हो जा उस हित स्वयं समर्पित //
जासु कृपा ,मन शान्ति समाये / शाश्वत परमधाम तू पाये //
श्लोक;-
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद् गुह्यतरं मया /
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु //६३//
चौपाई;-
यह अति गूढ़ ,गूढ़तम ज्ञाना / तुमहिं पार्थ जो कहा बखाना //
गुप्त रहस्य ज्ञान यह न्यारा / निज हिय कर संपूर्ण विचारा //
फिर जैसा तव जिय में आये / वैसा कर जो तुझ को भाये //
श्लोक;-
सर्वगुह्यतमं भूयः श्रृणु मे परमं वचः /
इष्टोsसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् //६४//
चौपाई;-
अब अतिगुप्त वचन मम अर्जुन / परमरहस्ययुक्त तू फिर सुन //
तू अतिशय प्रिय सबमें इससे / हितकर वचन कहूँगा तुझसे //
श्लोक;-
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु /
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोsसि मे //६५//
चौपाई;-
मुझ में बसे चित्त नित तेरा / हो मम भक्त यजन कर मेरा //
नित प्रणाम कर ध्यान लगावे / तो निश्य मुझको ही पावे //
दोहा;-
सत्य प्रतिज्ञा कर कहूँ, तू अतिप्रिय मम भक्त /
मुझको पाये अंत में / जग से हुआ विरक्त //
श्लोक;-
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज /
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः//६६//
दोहा;-
सब धर्मों को त्याग के , एक विश्व आधार /
मुझ परमेश्वर की शरण, आजा कुन्तीकुमार //
कर दूँगा मैं विश्व के , सब पापों से मुक्त /
शोक न कर दृढ़ भक्ति से ,हो मुझ में अनुरक्त //
श्लोक;-
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन /
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योsभ्यसूयति //६७//
चौपाई;-
जो तप रहित भक्ति से हीना / ईश्वर श्रद्धाभाव विहीना//
जिनश्रवणनको प्रियनहिंलागे/श्रवणकरत मन नहिं अनुरागे//
उनको गीता ज्ञानोपदेशा / कबहुँ न कहिये कह योगशा//
दोष दृष्टि जो मुझ में राखे / ताके सम्मुख कबहुँ न भाखे//
श्लोक;-
य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति /
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः//६८//
चौपाई;--
जो नर मुझ में कर अति प्रीता / परमरहस्य युक्त यह गीता //
मम भक्तों के बीच सुनावे / बिनु संदेह मुझे ही पावे //
श्लोक;-
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः /
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि //६९//
चौपाई;-
उससे उत्तम नहीं पुरुष में / मम प्रिय कार्य करे जो जगमें //
और न उससे बढ़ कर प्यारा / दूजा होगा भक्त हमारा //
जोभक्तहिं उपदेशहिं ज्ञाना /उस सम श्रेष्ठकर्म नहिं आना //
श्लोक;-
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः /
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः //७०//
चौपाई;-
यह हमार संवाद पुनीता /जो नित अध्ययन करे सप्रीता //
उनके ज्ञान यज्ञ के प्रेरे / मोहिं भक्त पूजेंगे मेरे //
ऐसा मममत कुन्तीनन्दन / बोले केशव भव दुख भंजन //
श्लोक;-
श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः /
सोsपि मुक्तःशुभाँल्लोकान्प्राप्नुया त्पुण्यकर्मणाम् //७१//
दोहा;-
दोष दृष्टि से हैं रहित , नर जो श्रद्धा युक्त /
वे भी सुन सुन शास्त्र यह , होहिं पाप से मुक्त //
चौपाई;-
पुण्यकर्म करता जहँ जाते / उसी लोक को श्रोता पाते //
श्लोक;-
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा /
कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय //७२//
चौपाई;-
कर चित स्थिर ह्रदय प्रदेशा / सुना पार्थ क्या ! यह उपदेशा //
क्या ! अज्ञान जनित तव मोहा / नष्टहुआ,जेहि ते भा छोहा //
अर्जुन उवाच
श्लोक;-
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत /
स्थितोsस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव //७३//
चौपाई;-
तब अर्जुन बोले हे स्वामी / हे अच्युत , हे अन्तर्यामी //
तव प्रसाद महिमा सुरराया / अब मेरा सब मोह नशाया //
संशय रहित हुआ अब जाई / निज स्मृति मैंने पुनि पाई //
अब जो मोहिं रजायसु होई / करहुँ शीश धर आयसु सोई //
संजय उवाच
श्लोक;-
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः /
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् //७४//
चौपाई;-
एहिविधि वासुदेव मधुसूदन / और महान आत्मा अर्जुन //
दोनों के संवाद विलक्षण / सुने आज कीन्हें प्रभु दर्शन //
गूढ़ रहस्य रोम पुलकावे / वाणी से सो बरणि न जावे //
श्लोक ;-
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद् गुह्यमहं परम् /
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात् कथयतः स्वयम् //७५//
चौपाई;-
अतिशयकृपा व्यासमुनिकीन्हा/जोयह दिव्यदृष्टि मोहिं दीन्हा //
जासु कृपा से प्रभु योगेश्वर / श्रीकृष्ण जो हैं अखिलेश्वर //
दोहा;-
उनसे मैं प्रत्यक्ष सब , योगशास्त्र का ज्ञान /
जो अति गुप्त रहस्यमय ,श्रवण किया धर ध्यान //
श्लोक;-
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् /
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृस्यामि च मुहुर्मुहुः //७६//
चौपाई;-
अति प्रिय वासुदेव अर्जुन के /अदभुत संवादहिंहिय गुन के //
मैं आश्चर्य चकित रह जाऊं / राजन बार बार हरषाऊँ //
श्लोक;-
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः /
विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः //७७//
चौपाई;-
श्रीहरि अदभुत विश्वस्वरूपा / सुमिर सुमिर हियमें कुरुभूपा //
चितअतिविस्मित तन हर्षाये / पुलकगात लोचनजल छाये //
श्लोक;-
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः /
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम//७८//
दोहा;-
जहँ योगेश्वर कृष्ण हैं , वहीं अचल दृढ़ नीति /
वहीं धनुर्धर पार्थ भी ,वहीं विजय श्री ,कीर्ति //
ईश्वर सर्व विभूतियाँ , वे हैं अर्जुन संग /
मेरा मत यह जानिये , इति सम्पूर्ण प्रसंग //
मोक्ष और संन्यास का , अष्टदशोअध्याय /
पूर्ण हुआ श्रीकृष्णहरि, की अनुकम्पा पाय //
इस
प्रकार श्रीमद् भगवद् गीता रूपी उपनिषद एवं ब्रह्म विद्या तथा
योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन संवाद में उदयभानु
तिवारी''मधुकर'' कृत महाकाव्य ''गीतमानस'' में संन्यास योग नामक अठारहवाँ
अध्याय पूर्ण हुआ /
हरि ॐ तत्सत्
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