Saturday, March 28, 2015

                         अथ पञ्चमोsध्यायः
दोहा;-
कर्म ओर संन्यास दोऊ ,योगमार्ग सुन पार्थ /
पूछ रहे हैं कृष्ण  से , कौन  हैं  श्रेष्ठ  यथार्थ //
                  अर्जुन उवाच
श्लोक;-
सन्न्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि /
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे  ब्रूहि  सुनिश्चितम् //१//

दोहा;-
कबहुँ प्रशंसत कर्म को ,कबहुँ कर्म सन्यास /
श्रेष्ठ योग में कौन सा ,मन जागी  जिज्ञास //
चौपाई;-
उभय योग में मम हितकारी /निश्चित साधन कहहु विचारी //

                           श्रीभगवानुवाच 
श्लोक;- 
सन्न्यासः    कर्मयोगश्च    निःश्रेयसकरावुभौ /
तयोस्तु  कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते //२//

चौपाई;-
सुन यों पार्थ वचन योगेश्वर / पुनि बोले  विस्तृत  वर्णन कर //
कर्मयोग , संन्यास   बखाना /  दोनों   योग   करें   कल्याना //
अगम कर्म संन्यास नियोगा / सुगम सु-उत्तम कर्मणा योगा //

श्लोक;-
ज्ञेयः स नित्यसन्न्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति /
निर्द्वन्द्वो   हि   महाबाहो  सुखं  बन्धात्प्रमुच्यते //३//

चौपाई;-
जिसके मन नहिं राग न  द्वेषा / पार्थ  कामना  रही  न  शेषा //
कर्म योगि वह रहित पिपासी /  समझे  उसे योग्य संन्यासी //    
राग,द्वेष,द्वन्द्वादिरहित जन / सुख से काटहिं भव के बन्धन //

श्लोक;-
साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः /
एकमप्यास्थितः   सम्यगुभयोर्विन्दते   फलम् //४//

चौपाई;-
जो जन मन्दबुद्धि अज्ञानी / उभय योग के वे नहिं ज्ञानी //
कर्मयोग,संन्यासहिं नर ते / पृथक पृथक फलदाई कहते //
किन्तु न ऐसा पण्डित माने / दोनों के  फल एकहिं जाने //
उभय एक में भी दृढ़ स्थित / है जो  योगी पूर्ण प्रतिष्ठित //
दोनों के फल ब्रह्म स्वरूपा / सो  पावे  वह  पुरुष  अनूपा //

श्लोक;-
यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते /
एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति //५//

चौपाई;-
परमधाम   जो   ज्ञानी   पाते  /  वहीं   कर्मयोगी   भी   जाते //
ज्ञान,कर्म दोउ योग समाना / समफल देखहिं जो निज ज्ञाना //
वही  सत्यदर्शी  अरु  ज्ञानी / सुनहिं   पार्थ   योगेश्वर   बानी // 

श्लोक;-
सन्न्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः /
योगयुक्तो  मुनिर्ब्रह्म  नचिरेणाधिगच्छति //६//

दोहा;-
बिना कर्म निष्काम के,पार्थ कठिन संन्यास /
योगयुक्त मुनि  शीघ्र ही , करे  ब्रह्म  में  वास //

श्लोक;-
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः /
सर्वभूतात्मभूतात्मा   कुर्वन्नपि   न   लिप्यते //७//        

चौपाई;-
योगयुक्त, मन परमपुनीता / सर्वेंद्रिय को जिसने जीता // 
प्राणिन में परमात्मा देखे / वही आत्मा निज  में  लेखे //
ऐसा कर्मयोग का करता /  कर्म  करे पर लिप्त न रहता //

श्लोक;-
नैव  किञ्चित्करोमीति  युक्तो   मन्येत   तत्त्ववित् /        
पश्यञ्श्रृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन् //८//
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि /
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु    वर्तन्त    इति     धारयन् //९//

सवैया;-
जो तत्व के ज्ञाता हैं सांख्ययोगी,देखत,परसत, भोजन पाते /
सुनते हुये अरु सोवत, सूँघत, स्वास ग्रहण करते, मग जाते //
पावत में अरु त्यागत,बोलत,आँखहिं खोलत, मूँदत ,ध्याते /
निजनिजकर्मकरें सबइन्द्रियाँ,मैं न करूँ कछु ध्यानमें लाते // 

श्लोक;-
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः /
लिप्यते   न    स    पापेन    पद्मपत्रमिवाम्भसा //१०//

दोहा;-
कर्म   ब्रह्म    को   अर्पि   के , जो   होते   निर्लिप्त /
कमलपात पर अम्बु जिमि,पाप करहिं नहिं लिप्त //

श्लोक;-
कायेन    मनसा    बुद्ध्या    केवलैरिन्द्रियैरपि /
योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये //११//

दोहा;-
मन ,इन्द्रिय ,तन ,बुद्धि से ,सर्वासक्तिहिं त्याग /
करहिं आत्मा शुद्धि हित , योगि कर्म बिनु राग //  

श्लोक;-
युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् /
अयुक्तः    कामकारेण    फले    सक्तो     निबध्यते //१२//

चौपाई;-
योगयुक्त नर फल सब त्यागें / ब्रह्मानन्द प्राप्ति में लागें //
पुरुष सकाम कामना प्रेरे / फलासक्ति  का  बन्धन घेरे //

श्लोक;-
सर्वकर्माणि मनसा सन्न्यस्यास्ते   सुखं वशी /
नवद्वारे    पुरे    देही    नैव   कुर्वन्न  कारयन् //१३//

चौपाई;-
आत्मविजित योगी व्रतधारी / जो  है  सांख्ययोग आचारी //
करे न कर्म , न कर्म कराये / मन से कर्म त्याग सुख पाये //
नौ  द्वारी  इस  दैहिक   गेहा /  बसे  ब्रह्म  में  लीन  विदेहा //   

श्लोक;-
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः /
न   कर्मफलसंयोगं   स्वभावस्तु    प्रवर्तते //१४//

चौपाई;-
नर  के  कर्म  और  कर्तापन /  कर्मों  के  फल  अरु  संयोजन //
इनका सृजन न करे विधाता / निज स्वभाववश हो नर पाता//

श्लोक;-
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव  सुकृतं विभुः/
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः //१५//

चौपाई;-
व्यापक ब्रह्म ध्याव मुनि जेहीं / पाप न पुण्य काहु  के लेहीं //    
निज  अज्ञानरूप  तम  द्वारा / ज्ञान  ढँका  रहता  है  सारा //
इससे  जो  नर  हैं  अज्ञानी  / मोह  रहे   हैं  वे  सब  प्रानी //

श्लोक;
ज्ञानेन तु  तदज्ञानं  येषां  नाशितमात्मनः /
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् //१६//

दोहा;-
ब्रह्मतत्व  के   ज्ञान  से, जिनका  मोह  नशाय /
उनको रविसम ब्रह्म की पावन ज्योति दिखाय //   
        
श्लोक;-
तद् बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः /
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं   ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः //१७//

चौपाई;-
जिनकी बुधि, मन हरि अनुरूपा / ब्रह्मलीन जो पुरुष अनूपा //  
पापविमुक्त ज्ञान से होकर / लहहिं  परमगति  वे  योगी नर //

श्लोक;-
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि /
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः  समदर्शिनः //१८//

चौपाई;-
ऐसे   समदर्शी   वे   ज्ञानी  /  ब्रह्मरूप    में    देखहिं    प्रानी //   
विद्याविनययुक्तद्विज,श्वाना/ स्वपच,धेनु,गज लखहिं समाना //

श्लोक;-
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितिं मनः /
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि  स्थिताः //१९//

चौपाई;-
जिनके मन समभाव सुस्थित/जीता जगको जिनने जीवित //
परमब्रह्म  सम  अरु  निर्दोषा /  इससे  स्थित  निर्गुण  वेषा //

श्लोक;-
न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् /
स्थिरबुद्धिरसम्मूढो  ब्रह्मविद्  ब्रह्मणि   स्थितः //२०//

चौपाई;-
हो न प्रसन्न वस्तु प्रिय पाये / अप्रिय पाय उद्वेग न आये //
वह  स्थिरमति  संशयहीना /  ब्रह्मसुविज्ञ  ब्रह्म  लवलीना //

श्लोक;-
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् /
स         ब्रह्मयोगयुक्तात्मा        सुखमक्षयमश्नुते //२१//

चौपाई;-
विषय बाहरी मन  से  त्यागे / आत्मा  में  ही  जो  अनुरागे //
ध्यानजनित  सात्विक सुख पाते / ब्रह्मलीन योगी कहलाते //   
ब्रह्मस्थिति जब लहहिं मुनिंदा / वे  पावहिं  अक्षय  आनंदा //

श्लोक;-
ये हि  संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते /
आद्यन्तवन्तः  कौन्तेय न तेषु रमते बुधः //२२//

चौपाई;-
इन्द्रियविषयभोग से जन्में / जितनेसुख अरु भोग भुवन में //
वे सब दुख के  हेतु  बनाये / यद्यपि  विषयी  मन  को  भाये //
पार्थ सदा ये थिर नहिं रहते / इनमें  विज्ञ  पुरुष नहिं रमते //
  
श्लोक;-
शक्नोतीहैव यः  सोढुं  प्राक्शरीरविमोक्षणात् /
कामक्रोधोद्भवं वेगं  स  युक्तः  स  सुखी  नरः //२३//

दोहा;-
तन के महाविनाश से , प्रथम काम अरु क्रोध /
इनसे  उपजे  वेग  को , सहन  करे  जो  बोध //
चौपाई;-
सोई नर योगी अरु ध्यानी / वही सुखी है पंडित,ज्ञानी //
             
श्लोक;-
योsन्तः सुखोsन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः /
स    योगी   ब्रह्मनिर्वाणं   ब्रह्मभूतोsधिगच्छति //२४//

चौपाई;-
अन्तर्मुखी आत्मसुख पाता / अन्तरात्मा में  रम जाता //
आत्मा से ही हैं जो ज्ञानी / परमब्रह्म छवि ह्रदय समानी //
एकभाव  स्थित  वह  योगी / पाये  शाश्वतब्रह्म  सँयोगी //

श्लोक;-
लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः /
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः //२५//

चौपाई;-
जिस नर के सब  पाप  नशाये / संशय  मुक्त  ज्ञान  जो  पाये //
प्राणिजगतके हितमें वे रत/ अविचल,विजयीमन हरिस्थित //
परमब्रह्म  ज्ञाता   कहलाते / शान्तिस्वरूप   ब्रह्म   को   पाते //

श्लोक;-
कामक्रोधवियुक्तानां  यतीनां  यतचेतसाम् /
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् //२६//

चौपाई;-
जासु काम अरु क्रोध नशाये / जीते चित  हरि  दर्शन पाये //
ऐसे   ज्ञानी   ध्यान   न   फेरें /  शान्तब्रह्म  परिपूरण  हेरें // 

श्लोक;-
स्पर्शान्कृत्वा  बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे  भ्रुवोः /
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ //२७//
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः          /
विगतेच्छाभयक्रोधो  यः सदा  मुक्त  एव सः//२८//    

सवैया;-
निजदृष्टि भृकुटीके मध्यधरे,औरबाह्यविषयचितचिंतनत्यागे// 
नासिकाचारी अपान औप्राण की वायु सामान किये अनुरागे//
वशमेंकिये मन,बुद्धि अौइन्द्रिय जोमुनि मोक्षकी युक्तिमेंलागे//
भय,क्रोध,इच्छाविहीन वेयोगी,रहेंमुक्त उनमें नआसक्ति जागे//

श्लोक;-
भोक्तारं       यज्ञतपसां     सर्वलोकमहेश्वरम् /
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति //२९//

दोहा;-
सबलोकों   के   लोक   का ,  मैं   ईश्वर  अव्यक्त /   
सर्वयज्ञ   तप   भोक्ता , जानहिं   मुझको   भक्त //
सब सचराचर जीव का ,सुह्रद न मुझ सम आन /
 जो जाने  यह  तत्व  वह , पाये  शान्ति महान //

योग ,कर्म ,संन्यास  का , हुआ  पूर्ण  अध्याय /
यज्ञभोक्ता    ब्रह्म    ही  , सबमें   रहा   समाय //

इस प्रकार श्रीमद् भगवद् गीता रूपी उपनिषद एवं ब्रह्म विद्या तथा   योगशास्त्र विषयक  श्रीकृष्ण  और  अर्जुन  के   संवाद   में  उदयभानु  तिवारी''मधुकर''  कृत  महाकाव्य ''गीतमानस'' में यज्ञभोक्ता महापुरुषस्थ महेश्वर   नामक योग का पाचवाँ
  अध्याय पूर्ण हुआ /

                                       हरि ॐ तत्सत्  

Friday, March 13, 2015


                       अथ षष्ठोsध्यायः 

दोहा;-
सुनहिं  पार्थ   श्रीकृष्ण   से   आत्मसंयमी   योग /
किस विधि योगाभ्यास कर, लहहिं सिद्धि संयोग // 

                      श्री भगवानुवाच 
श्लोक;-
अनाश्रितः   कर्मफलं  कार्यं  कर्म  करोति  यः /
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः//१//

चौपाई;-
कर्मफलों का आश्रय तजकर / योग्यकर्म सब  करते  जो  नर //
महापुरुष   वह   है   संन्यासी  /  वही  तपस्वी  योगाभ्यासी //
जोनरकेवल अग्निहिं त्यागे / अथवा नियतक्रिया परित्यागे //
वह  नर  पार्थ  नहीं  संन्यासी  / ढोंगी  तपसी  भोगविलासी //
                                                                                                                                  श्लोक;-
यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं  विद्धि  पाण्डव /
न ह्यसन्न्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन //२// 

चौपाई;-
जेहि  सन्यास  नाम से जाने /  वही  योग  है  पार्थ  सयाने //
जबतक मन संकल्प न त्यागे / पुरुष नयोगी,योग न जागे //

श्लोक;-
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं    कर्म   कारणमुच्यते /
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते //३//

चौपाई;
जो समाधि के इच्छुक ज्ञानी / मननशील योगी अरु ध्यानी //  
उनके पार्थ ! कर्मनिष्कामा / कारण  कहे जाहिं तेहि यामा //    
जब समाधिस्थिति नर पाये / मन संकल्प रहित हो जाये //
ऐसा विरत भाव जब आये / साधक  हित  में  हेतु  कहाये //

श्लोक;-
यदा  हि  नेन्द्रियार्थेषु  न  कर्मस्वनुषज्जते /
सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी योगारूढस्तदोच्यते //४// 

चौपाई;-
उस क्षण इन्द्रिय के भोगों से /  भव कर्मों के  संयोगों से //
होय विरत आसक्ति न आये / तब वह स्थितप्रज्ञ कहाये //
वह संकल्प विहीन निगूढा /  कहा जाय  नर योगारूढा //

श्लोक;-
उद्धरेदात्मनात्मानं     नात्मानमवसादयेत् /
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः//५//

चौपाई;-
नर  निज  का  शुभ  कर्मों  द्वारा / स्वयं  करे  जग  से  उद्धारा //
निजआत्माकी करे न अवनति / करसत्कर्म दिलावे सदगति //
मनुज स्वयं  ही  है  निज मीता / वही शत्रु  भी जान विनीता // 
सतसंगी मन मीत  समाना / मनस  कुसंगति  दे दुख नाना //

श्लोक;-
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः/
अनात्मनस्तु    शत्रुत्वे   वर्तेतात्मैव   शत्रुवत् //६//

दोहा;-
मन   इन्द्रिय   के   संग  में ,  तन   जीते   जो  जीव /
उस   जीवात्मा   का    वही ,  साँचा    मीत   अतीव //
जीते  नहिं  मन  इन्द्रियाँ , जो   नर   तन   के   संग /
उसका   रिपु   सम   चित्त  यह , करे  योग  को  भंग //

विषय   मार्ग , रथ   पुरुष   तन ,  अश्वेंद्रिय  बलवान /
मन   लगाम  ,  बुधि   सारथी ,  रथी  आत्मा   जान //
मन  लगाम  के  वश  करहिं , जो  सारथि निज अश्व /
वही  रथी   अरु    सारथी ,  रहहिं   एक   मत   विश्व //
रहे   बुद्धि   सँग    आत्मा ,  तब    हो   जाये     योग /
बने    तभी    परमात्म    से ,  मिलने   का   संयोग //
भिन्न आत्मा, भिन्न बुधि ,अस्थिर भटकत खिन्न / 
बरतत रिपु  सम  आत्म  से , योगी  करत अभिन्न //    

श्लोक;-
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः /
शीतोष्णसुखदुःखेषु    तथा    मनापमानयोः //७//

चौपाई;-
आतप ,शीत ,दुःख,सुख भारी / मान और अपमान मझारी //  
अंतःकरण वृत्तियाँ जिनकी / शान्त और स्थिरगति मनकी //
उनको आत्म विजित नर मानो / ब्रह्म सुस्थित योगी जानो //
उन विजितात्मा योगी जन में / ब्रह्म प्रतिष्ठित अन्तर्मन में // 

श्लोक;-
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो  विजितेँद्रियः/
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः//८//

चौपाई;-
निर्विकार जिसका  अन्तर्मन / ज्ञान  और  विज्ञान  तृप्त जन //
विजितेंद्रिय,जेहि स्वर्ण,पषाना / मृत्तिकादि सब एक समाना //
ब्रह्म  स्थिति  वह  नर  ही  पाये / ब्रह्म  प्राप्त  योगी  कहलाये // 

श्लोक;-
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु  /
साधुष्वपि च  पापेषु  समबुद्धिर्विशिष्यते //९//

चौपाई;- 
शत्रु,मित्र,मध्यस्थ,उदासी / साधु, असाधु, गृही, संन्यासी //
द्वेष्य,बन्धु में समबुधि ज्ञानी / परमश्रेष्ठ कहलावहिं प्रानी //    

श्लोक;-
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः /
एकाकी    यतचित्तात्मा   निराशीरपरिग्रहः//१०//

चौपाई;-
मन, इन्द्रिय,तन जासु अधीना / योगी आशा,संग्रहहीना //     
हो एकान्त अकेला ध्याये  / नित्य ब्रह्म में लगन  लगाये //

श्लोक;-
शुचौ  देशे  प्रतिष्ठाप्य  स्थिरमासनमात्मनः/
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् //११//

चौपाई;-
हो अति उच्च न नीची आसन / शुद्धभूमि पर डार कुशासन //  
मृगछाला , शुचिवस्त्र बिछाये / आसन स्थिर, रुचिर बनाये //  

श्लोक;-
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः /
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये //१२//

चौपाई;-
उस पर हो साधक आसीना / चित्त, इन्द्रियाँ कर स्वाधीना // 
अंतःकरण  शुद्धि  हित  योगी / योगाभ्यास  करे  संयोगी //

श्लोक;-
समं   कायशिरोग्रीवं   धारयन्नचलं   स्थिरः /
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् //१३//

दोहा;-
तन,शिर, ग्रीवा अचल कर,हो थिर एक समान /
दृष्टि नासिका अग्र  में चितवे नहिं दिशि आन //

श्लोक;-
प्रशान्तात्मा  विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते  स्थितः /
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः //१४//

चौपाई;-
ब्रह्मचर्य व्रत स्थित योगी /शान्त चित्त भय मुक्त सँयोगी //
स्थिर मन मुझ में ठहराये  / होकर तत्पर ध्यान लगाये //

श्लोक;-
युञ्जन्नेवं   सदात्मानं  योगी  नियतमानसः / 
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति //१५//

चौपाई;-
योगी निज मन वश में करके / ममस्वरूप में ही चित धरके //
मेरी  पराशान्ति   पा   जाये  /  ब्रह्मलीन    योगी   कहलाये //

श्लोक;-  
नात्यश्नतस्तु योगोsस्ति न चैकान्तमनश्नतः /
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव  चार्जुन //१६//

चौपाई;-
सधे  न योग भोग अति खाये / और न तो बिन भोजन पाये //
सिद्ध न होय सदा जो जागे / या  जेहिं  अतिशय निद्रा लागे //

श्लोक;-
युक्ताहारविहारस्य     युक्तचेष्टस्य    कर्मसु /
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा //१७//
       
चौपाई;-
यथायोग्य  जो   कर्म  प्रयासी / योगयुक्त  योगी, सन्यासी //
संयत जासु अहार विहारा / जागत सोवत विधि अनुसारा //
उनका योग सिद्ध हो  जाये / दुःखविघातक  योग  कहाये //

श्लोक;-
यदा    विनियतं    चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते /
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा //१८// 

चौपाई;-
अतिवश हुआ चित्त जिस क्षण में / रमे ब्रह्म ही के चिंतन में //
भोगों  से   निष्पृह  हो  जाये / वही  योग  से  युक्त  कहाये //
बोले  केशव  सुन  हे  अर्जुन / ऐसा  कहते  हैं  ज्ञानी   जन // 

श्लोक;-
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता /
योगिनो यतचित्तस्य  युञ्जतो  योगमात्मनः //१९// 

चौपाई;-
वायु रहित  स्थल  में  जैसे / दीपक  ज्योति  रहे  थिर  वैसे //
विजयी योगी साधक जन की / उपमा है ब्रह्मस्थित मन की //

श्लोक;-
यत्रोपरमते      चित्तं     निरुद्धं     योगसेवया /
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति //२०//

दोहा;-
योगाभ्यासी  रुद्ध  चित  , जहँ   पर   जा   ठहराय /
ब्रह्मस्थित  जिस  ध्यान  में , बुद्धि विमलता पाय //
सूक्ष्म हुई मति ,ब्रह्म छवि ,निरखे अति अभिराम /
रहे   तुष्ट   परमात्म   में , वह   योगी   अविराम //

श्लोक;-
सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् /
वेत्ति यात्रा न  चैवायं  स्थितश्चलति  तत्त्वतः //२१//

चौपाई;-
केवलसूक्ष्म  विमलमति द्वारा / इन्द्रिय परे  जगत से  न्यारा //
ग्रहण योग्य  आनंद अनंता / अनुभव   करे  जहाँ  वह  संता // 
जिस स्थिति में स्थित योगी / विचलित होय न ब्रह्मसँयोगी //

श्लोक;-
यं लब्ध्वा चापरं  लाभं  मन्यते  नाधिकं  ततः /
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते //२२//

चौपाई;-
ब्रह्म प्राप्ति से बढ़कर जगमें / लाभ न दूजा मानहिं मन में //
ब्रह्मप्राप्ति की स्थिति न्यारी / डिगहिं न योगी दुखमें भारी//

श्लोक;-
तं  विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम् /
स निश्चयेन योक्तव्यो  योगोsनिर्विण्णचेतसा //23//

चौपाई;- 
जो दुख-भवसंयोग  विहीना / वही ''योग'' है  पार्थ   प्रवीना //
वह विद्या योगी  नर  जाने / चित  उमंग  धीरज  उर  आने //
बिन उकताये दृढ़ निश्चय कर / करे योग कर्त्तव्य समझ नर // 

श्लोक;-
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः /
मनसैवेन्द्रियग्रामं    विनियम्य   समन्ततः //२४//

चौपाई;-
सब संकल्पज  इच्छा त्यागे / होय  विरत  आसक्ति  न  जागे //
इसप्रकार वह पुरुषजितेन्द्रिय / भलीभाँति वशकर सबइन्द्रिय // 

श्लोक;-
शनैः        शनैरुपरमेद् बुद्धया        धृतिगृहीतया /  
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत//२५//

चौपाई;- 
क्रमशः नित्य  करे  अभ्यासा / पाये उपरति   ब्रह्म  प्रकाशा //
धीरजयुक्तबुद्धिसे निजमन / ब्रह्मस्थितकर,तजसब चिन्तन //
परम ब्रह्म में ही रम जाये / सिवा ब्रह्म के  कुछ  नहिं  ध्याये //

श्लोक;-
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् / 
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् //२६//

दोहा;-
यह अस्थिर अरु चपल मन , जिन विषयों में जाय /
कर  निरुद्ध   पुनि   ब्रह्म   में  ,  उसको  रखे  रमाय //             

श्लोक;-
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुख मुत्तमम् /
उपैति   शान्तरजसं  ब्रह्मभूतमकल्मषम् //२७//

दोहा;-
सब विधि से है  शान्त  मन ,जो है पाप विहीन /
समन   हुआ  है  रजो  गुण , रहे  ब्रह्म  में  लीन //
चौपाई;-
ब्रह्म स्थित योगी कहलाये  / अक्षय सर्वोत्तम सुख पाये //

श्लोक;-
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः /
सुखेन     ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं    सुखमश्नुते //२८//

चौपाई;-
पाप रहित वह योगि  निरन्तर / आत्मा में ईश्वर चिंतन कर //
ब्रह्म  प्राप्ति  सुख  नेति  अनंदा / अनुभव पाये  पार्थ  मुनिंदा // 
ब्रह्म  स्पर्श , प्रवेश  अनुभूती /  परमानन्द    संग   में  होती //

श्लोक;-
सर्वभूतस्थमात्मानं  भूतानि चात्मनि /
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः //२९//

चौपाई;-
योगारूढ़   ब्रह्म   संयोगी / समभावी ,  समदर्शी   योगी //
सब प्राणी में आत्मा देखे / आत्मा में ही सब जग  पेखे //
आत्मरूप में मैं ही व्यापक / वासुदेव हूँ त्रिभुवन नायक // 

श्लोक;-
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च  मयि  पश्यति /
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति //३०//

चौपाई;-
प्राणि  जगत में  जो  आराधक / सब में देखे मुझको व्यापक //
और   सर्व   भूतों   को   स्थित  /  देखे   मेरे   ही   अन्तर्गत //
उससे मैं नहिं होता ओझल/ मुझसे नहिं अदृश्य वह इक पल //

श्लोक;-
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः/
सर्वथा वर्तमानोsपि स  योगी  मयि  वर्तते //३१//

चौपाई;-
एक  भाव  में  स्थित  होकर / देखे  मुझको  जो  योगी  नर //
सब जीवों में व्यापक जानी / भजे  मोहिं नित वह नरज्ञानी //
 वह   योगी  जो  कर्म  बरतता / मेरी  इच्छा से  ही  करता //

श्लोक;-
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योsर्जुन /
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः//३२//

चौपाई;-
निज की भाँति जगत सब लेखे /सब जीवों को सम कर देखे //
दोहा;-
जिसके मन सुख, दुःख में , समता  भाव  दिखाय /
पार्थ   परन्तप   योगि  वह ,   उत्तम  माना  जाय // 

                        अर्जुन उवाच 

श्लोक;-
 योsयं   योगस्त्वया   प्रोक्तः   साम्येन   मधुसूदन /
एतस्याहं न पश्यामि चंचलत्वात्स्थितिं  स्थिराम् //३३//

चौपाई;-
मधुसूदन जो  योग  सुनाया /  उसमें जो  समभाव  बताया //
यह यथार्थ स्थिति यदुराई / मन चंचल  नहिं  पड़े  दिखाई //

श्लोक;-
चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम् /
तस्याहं निग्रहं मन्ये  वायोरिव  सुदुष्करम् //३४//

चौपाई;-
हे   मधुसूदन   कृष्ण   मुरारी  /  पंथ   प्रदर्शक    हे  बनवारी //
अश्वस्वभावी मन अति चंचल / दृढ़,बलवान न स्थिर इकपल //
गति इसकी है सबसे  न्यारी / सुनत सहज लागे  अति  भारी //
बहुत कठिन मन वश में रहना / ज्योंदुष्कर मारुतथिर करना //

                         श्रीभगवानुवाच 

 श्लोक;-
असंशयं  महाबाहो  मनो  दुर्निग्रहं चलम् /
अभ्यासेन तू कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते //३५//

चौपाई;-
महाबाहु   मन  बहुत  विशाला / सहज न वश में आने वाला // 
अतिचंचल  यह  बात  सही  है / इसमें   कुछ   संदेह  नहीं  है//
किन्तु भजन,जप,तप,अभ्यासा/ हरिचिन्तन जब करे प्रकाशा//
हो  विरक्ति  मन  मोह  नशाये / अर्जुन तब मन वश  में  आये//

श्लोक;-
असंयतात्मना   योगो  दुष्प्राप  इति  मतिः /
वश्यात्मना तु यतता  शक्योsवाप्तुमुपायतः //३६//

चौपाई;-
 जो नर  मन नहिं वश  कर पाये /योग प्राप्ति दुष्कर हो जाये // 
यत्नशील  जो परम पुनीता / उसे सहज  मन   जिसने जीता //
ऐसा मेरा  मत  है  अर्जुन / यही  सत्य  जानहिं  योगी जन //
                              
                           अर्जुन उवाच

श्लोक;-
अयतिः    श्रद्धयोपेतो    योगाच्चलितमानसः /
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति //३७//

चौपाई;-
पुनि अर्जुन बोले हे स्वामी / हे केशव हे अन्तर्यामी //
दोहा;-
जिसकी श्रद्धा योग में ,किन्तु संयमी नाहिं /
तेहि कारण से अन्त में योग भ्रष्ट हो जाहिं //
चौपाई;-
योग सिद्धि जो नहिं कर पाते / ब्रह्म दरश बिन ही रह जाते //
हे  केशव मुझको समझायें / ऐसे  योगी  क्या  गति  पायें // 

श्लोक;-
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति /
अप्रतिष्ठो  महाबाहो  विमूढो   ब्रह्मणः   पथि //३८//

चौपाई;-
महाबाहु   हे   कृष्ण   मुरारी  /   हे  लीलाधर    हे   गिरिधारी //
ईशप्राप्ति से विमुख विमोहित/ आश्रयरहित योगि हो क्षोभित //
योगमार्ग से विचलित होकर / उभयलोक के सब फल  खोकर //
जैसे   नभ   लघु  बदरी  छाये /  पवन  झकोरों  से  उड़  जाये //
क्या उन लघु मेघों की भाँती / उस योगी  की  गति हो  जाती //

श्लोक ;-
एतन्मे  संशयं   कृष्ण   छेत्तुमर्हस्यशेषतः /
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते //३९//

चौपाई;-
हे मधुसूदन  कृष्ण  मुरारी / तुम  समर्थ  सब  संशयहारी //
तुम सा संशय हर्ता जन में / मिलना संभव नहीं भुवन में // 

                     श्रीभगवानुवाच
श्लोक;-
पार्थ   नैवेह   नामुत्र   विनाशस्तस्य    विद्यते /
न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति //४०//

चौपाई;-
अर्जुन से बोले तब भगवन / सखा सुनो जो  योगयुक्त  जन // 
वह  इस जग में  नहीं नशाये / नहिं परलोक  नाश को पाये //
भगवत प्राप्ति हेतु रत ध्यानी / कबहुँ  न दुर्गति पावे  ज्ञानी //                   

श्लोक;-
प्राप्य पुण्यकृतांलोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः /
शुचीनां   श्रीमतां   गेहे   योगभृष्टोsभिजायते //४१//

दोहा;-
योग भृष्ट  नर  अन्त  में , स्वर्ग  लोक में  जाय  /
सुख भोगे  बहु काल वह,पुनि जन्में  जग आय //
चौपाई;-
शुचि आचरित पुरुष के  गेहा / धरे योगच्युत पुनि नर देहा //

 श्लोक;-
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् /
एतद्धि  दुर्लभतरं  लोके  जन्म  यदीदृशम् //४२//

चौपाई;-
अथवा वह नर  स्वर्ग न जाकर / योगी के ही कुल  में आकर //
जन्में ,संस्कार शुचि पाये / सदगुरु  की  संगति   मिलजाये  //
ऐसा जन्म  विशिष्ट  कहावे / अति  दुर्लभ  विरला  नर  पावे //
इसमें कुछ संदेह न मानो / भगवत  प्राप्ति  योग  ही  जानो //

श्लोक;-
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते  पौर्वदेहिकम् /
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन //४३//

चौपाई;-
पिछले जन्म कर्म से संग्रह / समबुधिरूप योग को फिर वह // 
प्रबल   सुसंस्कार  से   पाये / वह  संयोग   उसे  मिल  जाये //
कुरुनन्दन  पहले  से  बढ़ कर / यत्न  करे  वह  योगी  होकर // 

श्लोक;-
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोsपि सः /
जिज्ञासुरपि योगस्य  शब्दब्रह्मातिवर्तते //४४//

चौपाई;-
परवश हुआ योगि च्युत होकर / जन्में जो श्रीमन् गृह आकर //
प्रथम  किये  अभ्यासों  से  ही /  ब्रह्माकर्षित  हो  निश्चय  ही // 
सम बुधि  रूप योग वह जाने / त्यागे फल जेहि वेद  बखाने //

श्लोक;-
प्रयत्नाद्यतमानस्तु   योगी  संशुद्धकिल्बिषः /
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् //४५//

चौपाई;-
बहु जनमों से कर्म प्रयासी / वह यत्नी योगी जिज्ञासी // 
दोहा;-
इसी जन्म में योग से , होकर  पाप विहीन //
पाय परमगति ब्रह्म में ,होय  सदा को लीन //

श्लोक;-
तपस्विभ्योsधिको योगी ज्ञानिभ्योsपि मतोsधिकः /
कर्मिभ्यश्चाधिको    योगी    तस्माद्योगी    भवार्जुन //४६//     

चौपाई;-
जो शास्त्रज्ञ तपस्वी ज्ञानी /और सकाम कर्म रत ध्यानी //
उन सब में योगी है ऊपर / इससे  योग  हेतु  हो  तत्पर // 

श्लोक;-
योगिनामपि सर्वेषां  मद् गतेनान्तरात्मा /
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः //४७// 

दोहा;-
अन्तरात्मा   से   भजे , नित  जो  योगी  निष्ठ /
मोहिं परमप्रिय मान्य अरु ,सबमें वही विशिष्ठ //

कृष्णार्जुन  संवाद  का , आत्मसंयमी   योग /
पूर्ण हुआ प्रभु से मिला ,जब अद् भुत संयोग //
  
इस प्रकार श्रीमद् भगवद् गीता रूपी उपनिषद एवं ब्रह्म विद्या तथा   योगशास्त्र विषयक  श्रीकृष्ण  और 
अर्जुन  के   संवाद   में  उदयभानु  तिवारी''मधुकर कृत महाकाव्य 'गीतामानस'में अभ्यास नामक योग
का छठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ /


                                       हरि ॐ तत्सत 
                 अथ सप्तमोsध्यायः 
          
दोहा; 
गूढ़ विषय यह योग  का , नाम  ज्ञान विज्ञान /
अक्षरशःश्रीकृष्ण के , शब्द धरहु  हिय ध्यान //


                   श्री भगवानुवाच 
श्लोक;-
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः /
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु //१//

दोहा;-
जब अनन्य दृढ़ प्रेम  से , मुझमें  हो  अनुरक्त /
मम आश्रित हो ,योग में ,जग से हुआ विरक्त //
बल , विभूति , ऐश्वर्य , गुणयुक्त   आत्मारूप /
मुझको जाने जाहि विधि,संशयरहित स्वरूप //  
चौपाई;-
सो सुन कहूँ सहित विस्तारा / सुने मिटे भ्रम,मोह तुम्हारा //   

श्लोक;-
ज्ञानं   तेsहं   सविज्ञानमिदं   वक्ष्याम्यशेषतः /
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोsन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते //२//

चौपाई;- 
तत्त्वज्ञान  विज्ञान  समेता / सब  कहिहौं   पारथ  तव  हेता //
जिसे जान फिर पूर्ण जगत में / ज्ञेय न शेष बचे जन मत में //

श्लोक;-
मनुष्याणां   सहस्त्रेषु   कश्चिद्यतति  सिद्धये / 
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः//३//

चौपाई;-
सहस पुरुष में ही इक कोई / मेरी प्राप्ति हेतु रत होई //
उन यतनी योगी में पारथ / कोई जाने रूप  यथारथ // 

श्लोक;-
भूमिरापोsनलो  वायुः   खं  मनो बुद्धिरेव च /
अहङ्कार  इतीयं  मे  भिन्ना   प्रकृतिरष्टधा //४//
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् /
ज़ीवभूतां  महाबाहो  ययेदं  धार्यते   जगत् //५ //

चौपाई;-
छिति,जल, पावक,गगन,समीरा / अहंकार, मन,बुधि गंभीरा //
अष्ट प्रकार भेदयुत  न्यारी / सुन  ये सब  जड़  प्रकृति  हमारी //
दूजी जग में  जीव स्वरूपा /  परा  प्रकृति  वह  जान  अनूपा //

श्लोक;-
एतद्योनीनि   भूतानि   सर्वाणीत्युपधारय /
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा //६//

चौपाई;- 
पार्थ समझ तू ऐसा मनमें / उभय प्रकृति  से  प्राणी  जन्में // 
उद्भव ,प्रलय जगत तारण हूँ / सब कारण का मैं कारण हूँ //   

श्लोक;-
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय /
मयि  सर्वमिदं  प्रोतं  सूत्रे   मणिगणा  इव //७//

चौपाई;-
मुझसे परम पार्थ कछु नाहीं / और न भिन्न वस्तु जगमाहीं //
गुँथा जगत सब  मुझमें  ऐसे / सूत्र  पिरोये  मणिगण  जैसे //

श्लोक;-
रसोsहमप्सु   कौन्तेय   प्रभास्मि   शशिसूर्ययोः /
प्रणवः   सर्ववेदेषु     शब्दः    खे    पौरुषं    नृषु //८//
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ /
जीवनं     सर्वभूतेषु     तपश्चास्मि     तपस्विषु //९//

सवैया;-
सुन भारत मैं जल में रस हूँ,रवि,चन्द्रविभा कर मैं ही प्रकाशा /
वेदन में ओंकार हूँ  मैं अरु, व्योम  में  शब्द,  अनंत  अकाशा //
पौरुष हूँ सब पुरुषन में अरु ,अग्नि में तेज , धरा  शुचिवासा /
तापस में सब का तप हूँ सब ,चेतन जीव  में  जीवन  आशा // 

श्लोक;-
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् /
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् //१०//

​​दोहा;-
मोहिं सनातन बीज तू ,सब जीवों का जान /
तेजस्वी का तेज हूँ , बुध  की  बुद्धि  महान //

श्लोक;-
बलं बलवतां  चाहं  कामरागविवर्जितम् /
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोsस्मि भरतर्षभ //११//

चौपाई;- 
सुन हे भरतश्रेष्ठ मतिधीरा / मैं  सामर्थ्य  शक्ति  गंभीरा //
बलवानों की शक्ति अपारा / रहित कामना राग विकारा // 
सब भूतों में चेतन मूला / मैं   ही  काम  धर्म  अनुकूला //    

श्लोक;-
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये /
मत्त  एवेति तान्विद्धि न त्वहं  तेषु  ते  मयि //१२//

चौपाई;-
सतगुण ,रजगुण ,तामस सारे / भाव  उपजते मुझसे न्यारे // 
सत्य यही है मैं नहिं उनमें / और न  वे  बसते  हैं  मुझ  में //
ये   मेरी   माया   में  आते / सो  मुझमें  प्रवेश  नहिं  पाते //

श्लोक;- 
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः     सर्वमिदं     जगत /
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् //१३//

चौपाई;-
इन तिर्गुण भावों से प्रेरित / चेतन  जग  हो  रहा  विमोहित // 
गुण से पर प्रकृति मम न्यारी / इससे नहिं जानहिं तनुधारी //

श्लोक;-
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया  दुरत्यया /
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते //१४//

चौपाई;-
तिर्गुणयुत अदभुत मम माया / जिसमें  पार्थ  विश्व भरमाया//
किन्तु मोहिं जो भजहिं निरन्तर / वे लाँघहिं यह मायादुष्कर//

श्लोक;-
न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नरधमाः /
माययापहृतज्ञाना  आसुरं  भावमाश्रिताः//१५//

चौपाई;-
माया जेहिकर ज्ञान नशाये / असुरस्वभावी  नर हो जाये /
वे नर अधम पाप नित करते / ऐसे मूढ़ मुझे नहिं भजते // 

श्लोक;-
चतुर्विधा भजन्ते मां  जनाः सुकृतिनोsर्जुन /  
आर्तो  जिज्ञासुरर्थार्थी  ज्ञानी   च  भरतर्षभ //१६//

चौपाई;-
श्रेष्ठ भरतवंशी हे अर्जुन / मोहिं भजहिं जे  जन उनको सुन //
दोहा;-
उत्तम कर्मी भक्त जन,भजहिं मोहिं संसार /
अर्थाथी जिज्ञासु अरु, आरत  ज्ञानी  चार //
चौपाई;-
प्राप्यवस्तु हित जो जन भजते / तिनहिं विज्ञ अर्थार्थी कहते //   
सत्य   जानने   ध्यान   लगाते / वे  योगी  जिज्ञासु  कहाते //
संकट समय भजें जो  प्रानी / उनको  आर्त   कहें  सब  ज्ञानी //
ब्रह्मतत्त्व  का  जो  जन  ज्ञाता /  वही  पुरुष  ज्ञानी कहलाता //

श्लोक;-
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त   एकभक्तिर्विशिष्यते /
प्रियो हि ज्ञानिनोsत्यर्थमहं स च मम प्रियः//१७//

चौपाई;- 
उन सब  में जो  भजहिं  निरन्तर / एकभाव  में स्थित रहकर //
वह अनन्यमम भक्तसिरोमणि/ मैं उनकोप्रिय जैसेफणि णि //
वह ज्ञानी  मोहिं सब में प्यारा / भक्त  गणों  में सबसे  न्यारा //

श्लोक;-
उदाराः  सर्व   एवैते  ज्ञानी  त्वात्मैव  मे  मतम् /
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् //१८//

चौपाई;- 
सब उदार समरथ  अनुरूपा  / ज्ञानी  मम  प्रत्यक्ष  स्वरूपा //
सुन अर्जुन ऐसा मेरा मत / क्योंकि  वही  मुझमें  है  स्थित //
थिर मन,बुद्धि और मृदुवाणी / उत्तम गतिस्वरूप वह ज्ञानी //
भलीभाँति  मुझमें  है  स्थित / मैं  भी  उसमें  रहूँ प्रतिष्ठित // 

श्लोक;-
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते /
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा  सदुर्लभः//१९//

दोहा;-
बहुजनमों के अंत में , तत्त्वज्ञान  नर  पाय /
वासुदेव सबमें लखे , भजे  मोहिं  चितलाय //   
चौपाई;-
सब कुछ वासुदेव जो माने / अस मुनि दुर्लभ बिरले जाने //

श्लोक;-
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः   प्रपद्यन्तेsन्यदेवताः /  
तं तं नियमास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया //२०//

चौपाई;-
जिन भोगों की इच्छा द्वारा /  ज्ञान  हरण  हो  जिनका  सारा //   
निज स्वभाव से प्रेरित वे नर / उन नियमों को ही धारण कर //
करें  अन्य   देवों   की  पूजा / श्रद्धा  सहित  भाव  नहिं  दूजा //

श्लोक;-
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति /
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव  विदधाम्यहम् //२१//

चौपाई;-
जिन देवों  को जो सकाम  नर / पूजन चाहें मन स्थिर कर //
उनके प्रति  ऐसे  भक्तन  में / श्रद्धा  स्थिर  करता  मन  में //  
   
श्लोक;-
स    तया    श्रद्धया   युक्तस्तस्याराधनमीहते /
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् //२२//

चौपाई;-
वह नर सोइ  श्रद्धायुत  होकर / पूजे  उसी  देव  ही  को  नर //
अरु मम कृत विधान अनुसारा / इच्छित भोग इष्ट के द्वारा //   
 बिन  संदेह   भक्त  वह  पाये / उन  देवों  में  ही  रम  जाये //  

श्लोक;-
अन्तवत्तु   फलं   तेषां  तद्भवत्यल्पमेधसाम् /
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि //२३//

चौपाई;-
पर उन अल्पबुद्धि भक्तों के / नाशवान  सब   फल  कर्मों के //
सुर के पूजक सुर को पायें  / मम ध्यानी मुझ में मिल जायें//  

श्लोक;-
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः /
परं   भावमजानन्तो    ममाव्ययमनुत्तमम् //२४//

दोहा;-
परम  भाव  सर्वोत्तम,  अरु व्यय , अव्यक्त /  
मोहिं न जाने जगत यह ,माया से आसक्त //
चौपाई;-
भ्रमित बुद्धि माया लिपटाने  / व्यक्ति स्वरूप भाव से जाने //

श्लोक;-
नाहं   प्रकाशः   सर्वस्य    योगमायासमावृतः / 
मूढोsयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् //२५//

चौपाई;-
छिपा  योगमाया से निज की / इससे देखे  दृष्टि  न  सबकी //
मैं   अविनाशी   अरु   अविकारी / ये  अज्ञानी  नर  संसारी //
मोहिं अजन्मा को नहिं जाने / जन्म ,मृत्यु धारक ही माने // 

श्लोक;-
वेदाहं   समतीतानि  वर्तमानानि   चार्जुन /
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन //२६//

चौपाई;-
पूर्व ,आज जो प्राणी जन्में / जो होंगे भविष्य के  क्षण में //
उन सबको मैं जानूँ अर्जुन / मोहिं न जाने कोई सच सुन // 

श्लोक;-
इच्छाद्वेषसमुत्थेन    द्वन्द्वमोहेन    भारत /
सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप //२७//

चौपाई;-
इच्छा द्वेष द्वन्द्व सम्मोहा / प्राणिजगत उपजावहिं क्षोहा //
इससे  मोह  रहे  सब  प्राणी / मोहिं  न जाने वे अज्ञानी // 

श्लोक;-
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् /
ते   द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता  भजन्ते  मां  दृढ़वृताः//२८//

चौपाई;-
पर निष्काम कर्म  आचारी / पापविमुक्त  योग  व्रतधारी //
 रागद्वेष द्वन्द्वादि विमोहा / इनको  त्याग  भये  निर्मोहा //
ऐसे योगी दृढ व्रतधारी / मोहिं भजहिं सब काम बिसारी //

श्लोक;-
जरामरणमोक्षाय    मामाश्रित्य    यतन्ति   ये /
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् //२९//

चौपाई;-
जरा,मरण मोक्षार्थ सयाने / जो मम शरणागत व्रत ठाने //
वे नर परमब्रह्म विज्ञाता / सब आध्यत्म , कर्म के ज्ञाता //

श्लोक;-
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः /
प्रयाणकालेsपि  च मां ते विदुर्युक्त चेतसः //३०//        

दोहा;-
साधिभूत ,अधिदैव अरु , साधियज्ञ मोहिं जान /
अन्तहुँ   में  सर्वात्मा , जानि  करे  मम  ध्यान //
ब्रह्म   समाहित    चित्त   से , मुझको  ही सर्वज्ञ /
इस सृष्टी का जानते , मोहिं  मिलहिं  वे   विज्ञ //

ज्ञान  और  विज्ञान  का , हुआ  पूर्ण  अध्याय /
मिली भाव  मन्दाकिनी , प्रभु अनुकम्पा पाय //      

 इस प्रकार श्रीमद् भगवद् गीता रूपी उपनिषद एवं ब्रह्म विद्या तथा   योगशास्त्र विषयक  श्रीकृष्ण  और
अर्जुन  के   संवाद   में  उदयभानु  तिवारी''मधुकर''  कृत  महाकाव्य ''गीतमानस'' में समग्र जानकारी
नामक ​सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ /


                              हरि ॐ तत्सत्