Friday, March 13, 2015


                       अथ षष्ठोsध्यायः 

दोहा;-
सुनहिं  पार्थ   श्रीकृष्ण   से   आत्मसंयमी   योग /
किस विधि योगाभ्यास कर, लहहिं सिद्धि संयोग // 

                      श्री भगवानुवाच 
श्लोक;-
अनाश्रितः   कर्मफलं  कार्यं  कर्म  करोति  यः /
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः//१//

चौपाई;-
कर्मफलों का आश्रय तजकर / योग्यकर्म सब  करते  जो  नर //
महापुरुष   वह   है   संन्यासी  /  वही  तपस्वी  योगाभ्यासी //
जोनरकेवल अग्निहिं त्यागे / अथवा नियतक्रिया परित्यागे //
वह  नर  पार्थ  नहीं  संन्यासी  / ढोंगी  तपसी  भोगविलासी //
                                                                                                                                  श्लोक;-
यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं  विद्धि  पाण्डव /
न ह्यसन्न्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन //२// 

चौपाई;-
जेहि  सन्यास  नाम से जाने /  वही  योग  है  पार्थ  सयाने //
जबतक मन संकल्प न त्यागे / पुरुष नयोगी,योग न जागे //

श्लोक;-
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं    कर्म   कारणमुच्यते /
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते //३//

चौपाई;
जो समाधि के इच्छुक ज्ञानी / मननशील योगी अरु ध्यानी //  
उनके पार्थ ! कर्मनिष्कामा / कारण  कहे जाहिं तेहि यामा //    
जब समाधिस्थिति नर पाये / मन संकल्प रहित हो जाये //
ऐसा विरत भाव जब आये / साधक  हित  में  हेतु  कहाये //

श्लोक;-
यदा  हि  नेन्द्रियार्थेषु  न  कर्मस्वनुषज्जते /
सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी योगारूढस्तदोच्यते //४// 

चौपाई;-
उस क्षण इन्द्रिय के भोगों से /  भव कर्मों के  संयोगों से //
होय विरत आसक्ति न आये / तब वह स्थितप्रज्ञ कहाये //
वह संकल्प विहीन निगूढा /  कहा जाय  नर योगारूढा //

श्लोक;-
उद्धरेदात्मनात्मानं     नात्मानमवसादयेत् /
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः//५//

चौपाई;-
नर  निज  का  शुभ  कर्मों  द्वारा / स्वयं  करे  जग  से  उद्धारा //
निजआत्माकी करे न अवनति / करसत्कर्म दिलावे सदगति //
मनुज स्वयं  ही  है  निज मीता / वही शत्रु  भी जान विनीता // 
सतसंगी मन मीत  समाना / मनस  कुसंगति  दे दुख नाना //

श्लोक;-
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः/
अनात्मनस्तु    शत्रुत्वे   वर्तेतात्मैव   शत्रुवत् //६//

दोहा;-
मन   इन्द्रिय   के   संग  में ,  तन   जीते   जो  जीव /
उस   जीवात्मा   का    वही ,  साँचा    मीत   अतीव //
जीते  नहिं  मन  इन्द्रियाँ , जो   नर   तन   के   संग /
उसका   रिपु   सम   चित्त  यह , करे  योग  को  भंग //

विषय   मार्ग , रथ   पुरुष   तन ,  अश्वेंद्रिय  बलवान /
मन   लगाम  ,  बुधि   सारथी ,  रथी  आत्मा   जान //
मन  लगाम  के  वश  करहिं , जो  सारथि निज अश्व /
वही  रथी   अरु    सारथी ,  रहहिं   एक   मत   विश्व //
रहे   बुद्धि   सँग    आत्मा ,  तब    हो   जाये     योग /
बने    तभी    परमात्म    से ,  मिलने   का   संयोग //
भिन्न आत्मा, भिन्न बुधि ,अस्थिर भटकत खिन्न / 
बरतत रिपु  सम  आत्म  से , योगी  करत अभिन्न //    

श्लोक;-
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः /
शीतोष्णसुखदुःखेषु    तथा    मनापमानयोः //७//

चौपाई;-
आतप ,शीत ,दुःख,सुख भारी / मान और अपमान मझारी //  
अंतःकरण वृत्तियाँ जिनकी / शान्त और स्थिरगति मनकी //
उनको आत्म विजित नर मानो / ब्रह्म सुस्थित योगी जानो //
उन विजितात्मा योगी जन में / ब्रह्म प्रतिष्ठित अन्तर्मन में // 

श्लोक;-
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो  विजितेँद्रियः/
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः//८//

चौपाई;-
निर्विकार जिसका  अन्तर्मन / ज्ञान  और  विज्ञान  तृप्त जन //
विजितेंद्रिय,जेहि स्वर्ण,पषाना / मृत्तिकादि सब एक समाना //
ब्रह्म  स्थिति  वह  नर  ही  पाये / ब्रह्म  प्राप्त  योगी  कहलाये // 

श्लोक;-
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु  /
साधुष्वपि च  पापेषु  समबुद्धिर्विशिष्यते //९//

चौपाई;- 
शत्रु,मित्र,मध्यस्थ,उदासी / साधु, असाधु, गृही, संन्यासी //
द्वेष्य,बन्धु में समबुधि ज्ञानी / परमश्रेष्ठ कहलावहिं प्रानी //    

श्लोक;-
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः /
एकाकी    यतचित्तात्मा   निराशीरपरिग्रहः//१०//

चौपाई;-
मन, इन्द्रिय,तन जासु अधीना / योगी आशा,संग्रहहीना //     
हो एकान्त अकेला ध्याये  / नित्य ब्रह्म में लगन  लगाये //

श्लोक;-
शुचौ  देशे  प्रतिष्ठाप्य  स्थिरमासनमात्मनः/
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् //११//

चौपाई;-
हो अति उच्च न नीची आसन / शुद्धभूमि पर डार कुशासन //  
मृगछाला , शुचिवस्त्र बिछाये / आसन स्थिर, रुचिर बनाये //  

श्लोक;-
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः /
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये //१२//

चौपाई;-
उस पर हो साधक आसीना / चित्त, इन्द्रियाँ कर स्वाधीना // 
अंतःकरण  शुद्धि  हित  योगी / योगाभ्यास  करे  संयोगी //

श्लोक;-
समं   कायशिरोग्रीवं   धारयन्नचलं   स्थिरः /
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् //१३//

दोहा;-
तन,शिर, ग्रीवा अचल कर,हो थिर एक समान /
दृष्टि नासिका अग्र  में चितवे नहिं दिशि आन //

श्लोक;-
प्रशान्तात्मा  विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते  स्थितः /
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः //१४//

चौपाई;-
ब्रह्मचर्य व्रत स्थित योगी /शान्त चित्त भय मुक्त सँयोगी //
स्थिर मन मुझ में ठहराये  / होकर तत्पर ध्यान लगाये //

श्लोक;-
युञ्जन्नेवं   सदात्मानं  योगी  नियतमानसः / 
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति //१५//

चौपाई;-
योगी निज मन वश में करके / ममस्वरूप में ही चित धरके //
मेरी  पराशान्ति   पा   जाये  /  ब्रह्मलीन    योगी   कहलाये //

श्लोक;-  
नात्यश्नतस्तु योगोsस्ति न चैकान्तमनश्नतः /
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव  चार्जुन //१६//

चौपाई;-
सधे  न योग भोग अति खाये / और न तो बिन भोजन पाये //
सिद्ध न होय सदा जो जागे / या  जेहिं  अतिशय निद्रा लागे //

श्लोक;-
युक्ताहारविहारस्य     युक्तचेष्टस्य    कर्मसु /
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा //१७//
       
चौपाई;-
यथायोग्य  जो   कर्म  प्रयासी / योगयुक्त  योगी, सन्यासी //
संयत जासु अहार विहारा / जागत सोवत विधि अनुसारा //
उनका योग सिद्ध हो  जाये / दुःखविघातक  योग  कहाये //

श्लोक;-
यदा    विनियतं    चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते /
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा //१८// 

चौपाई;-
अतिवश हुआ चित्त जिस क्षण में / रमे ब्रह्म ही के चिंतन में //
भोगों  से   निष्पृह  हो  जाये / वही  योग  से  युक्त  कहाये //
बोले  केशव  सुन  हे  अर्जुन / ऐसा  कहते  हैं  ज्ञानी   जन // 

श्लोक;-
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता /
योगिनो यतचित्तस्य  युञ्जतो  योगमात्मनः //१९// 

चौपाई;-
वायु रहित  स्थल  में  जैसे / दीपक  ज्योति  रहे  थिर  वैसे //
विजयी योगी साधक जन की / उपमा है ब्रह्मस्थित मन की //

श्लोक;-
यत्रोपरमते      चित्तं     निरुद्धं     योगसेवया /
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति //२०//

दोहा;-
योगाभ्यासी  रुद्ध  चित  , जहँ   पर   जा   ठहराय /
ब्रह्मस्थित  जिस  ध्यान  में , बुद्धि विमलता पाय //
सूक्ष्म हुई मति ,ब्रह्म छवि ,निरखे अति अभिराम /
रहे   तुष्ट   परमात्म   में , वह   योगी   अविराम //

श्लोक;-
सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् /
वेत्ति यात्रा न  चैवायं  स्थितश्चलति  तत्त्वतः //२१//

चौपाई;-
केवलसूक्ष्म  विमलमति द्वारा / इन्द्रिय परे  जगत से  न्यारा //
ग्रहण योग्य  आनंद अनंता / अनुभव   करे  जहाँ  वह  संता // 
जिस स्थिति में स्थित योगी / विचलित होय न ब्रह्मसँयोगी //

श्लोक;-
यं लब्ध्वा चापरं  लाभं  मन्यते  नाधिकं  ततः /
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते //२२//

चौपाई;-
ब्रह्म प्राप्ति से बढ़कर जगमें / लाभ न दूजा मानहिं मन में //
ब्रह्मप्राप्ति की स्थिति न्यारी / डिगहिं न योगी दुखमें भारी//

श्लोक;-
तं  विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम् /
स निश्चयेन योक्तव्यो  योगोsनिर्विण्णचेतसा //23//

चौपाई;- 
जो दुख-भवसंयोग  विहीना / वही ''योग'' है  पार्थ   प्रवीना //
वह विद्या योगी  नर  जाने / चित  उमंग  धीरज  उर  आने //
बिन उकताये दृढ़ निश्चय कर / करे योग कर्त्तव्य समझ नर // 

श्लोक;-
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः /
मनसैवेन्द्रियग्रामं    विनियम्य   समन्ततः //२४//

चौपाई;-
सब संकल्पज  इच्छा त्यागे / होय  विरत  आसक्ति  न  जागे //
इसप्रकार वह पुरुषजितेन्द्रिय / भलीभाँति वशकर सबइन्द्रिय // 

श्लोक;-
शनैः        शनैरुपरमेद् बुद्धया        धृतिगृहीतया /  
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत//२५//

चौपाई;- 
क्रमशः नित्य  करे  अभ्यासा / पाये उपरति   ब्रह्म  प्रकाशा //
धीरजयुक्तबुद्धिसे निजमन / ब्रह्मस्थितकर,तजसब चिन्तन //
परम ब्रह्म में ही रम जाये / सिवा ब्रह्म के  कुछ  नहिं  ध्याये //

श्लोक;-
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् / 
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् //२६//

दोहा;-
यह अस्थिर अरु चपल मन , जिन विषयों में जाय /
कर  निरुद्ध   पुनि   ब्रह्म   में  ,  उसको  रखे  रमाय //             

श्लोक;-
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुख मुत्तमम् /
उपैति   शान्तरजसं  ब्रह्मभूतमकल्मषम् //२७//

दोहा;-
सब विधि से है  शान्त  मन ,जो है पाप विहीन /
समन   हुआ  है  रजो  गुण , रहे  ब्रह्म  में  लीन //
चौपाई;-
ब्रह्म स्थित योगी कहलाये  / अक्षय सर्वोत्तम सुख पाये //

श्लोक;-
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः /
सुखेन     ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं    सुखमश्नुते //२८//

चौपाई;-
पाप रहित वह योगि  निरन्तर / आत्मा में ईश्वर चिंतन कर //
ब्रह्म  प्राप्ति  सुख  नेति  अनंदा / अनुभव पाये  पार्थ  मुनिंदा // 
ब्रह्म  स्पर्श , प्रवेश  अनुभूती /  परमानन्द    संग   में  होती //

श्लोक;-
सर्वभूतस्थमात्मानं  भूतानि चात्मनि /
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः //२९//

चौपाई;-
योगारूढ़   ब्रह्म   संयोगी / समभावी ,  समदर्शी   योगी //
सब प्राणी में आत्मा देखे / आत्मा में ही सब जग  पेखे //
आत्मरूप में मैं ही व्यापक / वासुदेव हूँ त्रिभुवन नायक // 

श्लोक;-
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च  मयि  पश्यति /
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति //३०//

चौपाई;-
प्राणि  जगत में  जो  आराधक / सब में देखे मुझको व्यापक //
और   सर्व   भूतों   को   स्थित  /  देखे   मेरे   ही   अन्तर्गत //
उससे मैं नहिं होता ओझल/ मुझसे नहिं अदृश्य वह इक पल //

श्लोक;-
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः/
सर्वथा वर्तमानोsपि स  योगी  मयि  वर्तते //३१//

चौपाई;-
एक  भाव  में  स्थित  होकर / देखे  मुझको  जो  योगी  नर //
सब जीवों में व्यापक जानी / भजे  मोहिं नित वह नरज्ञानी //
 वह   योगी  जो  कर्म  बरतता / मेरी  इच्छा से  ही  करता //

श्लोक;-
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योsर्जुन /
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः//३२//

चौपाई;-
निज की भाँति जगत सब लेखे /सब जीवों को सम कर देखे //
दोहा;-
जिसके मन सुख, दुःख में , समता  भाव  दिखाय /
पार्थ   परन्तप   योगि  वह ,   उत्तम  माना  जाय // 

                        अर्जुन उवाच 

श्लोक;-
 योsयं   योगस्त्वया   प्रोक्तः   साम्येन   मधुसूदन /
एतस्याहं न पश्यामि चंचलत्वात्स्थितिं  स्थिराम् //३३//

चौपाई;-
मधुसूदन जो  योग  सुनाया /  उसमें जो  समभाव  बताया //
यह यथार्थ स्थिति यदुराई / मन चंचल  नहिं  पड़े  दिखाई //

श्लोक;-
चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम् /
तस्याहं निग्रहं मन्ये  वायोरिव  सुदुष्करम् //३४//

चौपाई;-
हे   मधुसूदन   कृष्ण   मुरारी  /  पंथ   प्रदर्शक    हे  बनवारी //
अश्वस्वभावी मन अति चंचल / दृढ़,बलवान न स्थिर इकपल //
गति इसकी है सबसे  न्यारी / सुनत सहज लागे  अति  भारी //
बहुत कठिन मन वश में रहना / ज्योंदुष्कर मारुतथिर करना //

                         श्रीभगवानुवाच 

 श्लोक;-
असंशयं  महाबाहो  मनो  दुर्निग्रहं चलम् /
अभ्यासेन तू कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते //३५//

चौपाई;-
महाबाहु   मन  बहुत  विशाला / सहज न वश में आने वाला // 
अतिचंचल  यह  बात  सही  है / इसमें   कुछ   संदेह  नहीं  है//
किन्तु भजन,जप,तप,अभ्यासा/ हरिचिन्तन जब करे प्रकाशा//
हो  विरक्ति  मन  मोह  नशाये / अर्जुन तब मन वश  में  आये//

श्लोक;-
असंयतात्मना   योगो  दुष्प्राप  इति  मतिः /
वश्यात्मना तु यतता  शक्योsवाप्तुमुपायतः //३६//

चौपाई;-
 जो नर  मन नहिं वश  कर पाये /योग प्राप्ति दुष्कर हो जाये // 
यत्नशील  जो परम पुनीता / उसे सहज  मन   जिसने जीता //
ऐसा मेरा  मत  है  अर्जुन / यही  सत्य  जानहिं  योगी जन //
                              
                           अर्जुन उवाच

श्लोक;-
अयतिः    श्रद्धयोपेतो    योगाच्चलितमानसः /
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति //३७//

चौपाई;-
पुनि अर्जुन बोले हे स्वामी / हे केशव हे अन्तर्यामी //
दोहा;-
जिसकी श्रद्धा योग में ,किन्तु संयमी नाहिं /
तेहि कारण से अन्त में योग भ्रष्ट हो जाहिं //
चौपाई;-
योग सिद्धि जो नहिं कर पाते / ब्रह्म दरश बिन ही रह जाते //
हे  केशव मुझको समझायें / ऐसे  योगी  क्या  गति  पायें // 

श्लोक;-
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति /
अप्रतिष्ठो  महाबाहो  विमूढो   ब्रह्मणः   पथि //३८//

चौपाई;-
महाबाहु   हे   कृष्ण   मुरारी  /   हे  लीलाधर    हे   गिरिधारी //
ईशप्राप्ति से विमुख विमोहित/ आश्रयरहित योगि हो क्षोभित //
योगमार्ग से विचलित होकर / उभयलोक के सब फल  खोकर //
जैसे   नभ   लघु  बदरी  छाये /  पवन  झकोरों  से  उड़  जाये //
क्या उन लघु मेघों की भाँती / उस योगी  की  गति हो  जाती //

श्लोक ;-
एतन्मे  संशयं   कृष्ण   छेत्तुमर्हस्यशेषतः /
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते //३९//

चौपाई;-
हे मधुसूदन  कृष्ण  मुरारी / तुम  समर्थ  सब  संशयहारी //
तुम सा संशय हर्ता जन में / मिलना संभव नहीं भुवन में // 

                     श्रीभगवानुवाच
श्लोक;-
पार्थ   नैवेह   नामुत्र   विनाशस्तस्य    विद्यते /
न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति //४०//

चौपाई;-
अर्जुन से बोले तब भगवन / सखा सुनो जो  योगयुक्त  जन // 
वह  इस जग में  नहीं नशाये / नहिं परलोक  नाश को पाये //
भगवत प्राप्ति हेतु रत ध्यानी / कबहुँ  न दुर्गति पावे  ज्ञानी //                   

श्लोक;-
प्राप्य पुण्यकृतांलोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः /
शुचीनां   श्रीमतां   गेहे   योगभृष्टोsभिजायते //४१//

दोहा;-
योग भृष्ट  नर  अन्त  में , स्वर्ग  लोक में  जाय  /
सुख भोगे  बहु काल वह,पुनि जन्में  जग आय //
चौपाई;-
शुचि आचरित पुरुष के  गेहा / धरे योगच्युत पुनि नर देहा //

 श्लोक;-
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् /
एतद्धि  दुर्लभतरं  लोके  जन्म  यदीदृशम् //४२//

चौपाई;-
अथवा वह नर  स्वर्ग न जाकर / योगी के ही कुल  में आकर //
जन्में ,संस्कार शुचि पाये / सदगुरु  की  संगति   मिलजाये  //
ऐसा जन्म  विशिष्ट  कहावे / अति  दुर्लभ  विरला  नर  पावे //
इसमें कुछ संदेह न मानो / भगवत  प्राप्ति  योग  ही  जानो //

श्लोक;-
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते  पौर्वदेहिकम् /
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन //४३//

चौपाई;-
पिछले जन्म कर्म से संग्रह / समबुधिरूप योग को फिर वह // 
प्रबल   सुसंस्कार  से   पाये / वह  संयोग   उसे  मिल  जाये //
कुरुनन्दन  पहले  से  बढ़ कर / यत्न  करे  वह  योगी  होकर // 

श्लोक;-
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोsपि सः /
जिज्ञासुरपि योगस्य  शब्दब्रह्मातिवर्तते //४४//

चौपाई;-
परवश हुआ योगि च्युत होकर / जन्में जो श्रीमन् गृह आकर //
प्रथम  किये  अभ्यासों  से  ही /  ब्रह्माकर्षित  हो  निश्चय  ही // 
सम बुधि  रूप योग वह जाने / त्यागे फल जेहि वेद  बखाने //

श्लोक;-
प्रयत्नाद्यतमानस्तु   योगी  संशुद्धकिल्बिषः /
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् //४५//

चौपाई;-
बहु जनमों से कर्म प्रयासी / वह यत्नी योगी जिज्ञासी // 
दोहा;-
इसी जन्म में योग से , होकर  पाप विहीन //
पाय परमगति ब्रह्म में ,होय  सदा को लीन //

श्लोक;-
तपस्विभ्योsधिको योगी ज्ञानिभ्योsपि मतोsधिकः /
कर्मिभ्यश्चाधिको    योगी    तस्माद्योगी    भवार्जुन //४६//     

चौपाई;-
जो शास्त्रज्ञ तपस्वी ज्ञानी /और सकाम कर्म रत ध्यानी //
उन सब में योगी है ऊपर / इससे  योग  हेतु  हो  तत्पर // 

श्लोक;-
योगिनामपि सर्वेषां  मद् गतेनान्तरात्मा /
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः //४७// 

दोहा;-
अन्तरात्मा   से   भजे , नित  जो  योगी  निष्ठ /
मोहिं परमप्रिय मान्य अरु ,सबमें वही विशिष्ठ //

कृष्णार्जुन  संवाद  का , आत्मसंयमी   योग /
पूर्ण हुआ प्रभु से मिला ,जब अद् भुत संयोग //
  
इस प्रकार श्रीमद् भगवद् गीता रूपी उपनिषद एवं ब्रह्म विद्या तथा   योगशास्त्र विषयक  श्रीकृष्ण  और 
अर्जुन  के   संवाद   में  उदयभानु  तिवारी''मधुकर कृत महाकाव्य 'गीतामानस'में अभ्यास नामक योग
का छठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ /


                                       हरि ॐ तत्सत 

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