Friday, March 13, 2015

                 अथ सप्तमोsध्यायः 
          
दोहा; 
गूढ़ विषय यह योग  का , नाम  ज्ञान विज्ञान /
अक्षरशःश्रीकृष्ण के , शब्द धरहु  हिय ध्यान //


                   श्री भगवानुवाच 
श्लोक;-
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः /
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु //१//

दोहा;-
जब अनन्य दृढ़ प्रेम  से , मुझमें  हो  अनुरक्त /
मम आश्रित हो ,योग में ,जग से हुआ विरक्त //
बल , विभूति , ऐश्वर्य , गुणयुक्त   आत्मारूप /
मुझको जाने जाहि विधि,संशयरहित स्वरूप //  
चौपाई;-
सो सुन कहूँ सहित विस्तारा / सुने मिटे भ्रम,मोह तुम्हारा //   

श्लोक;-
ज्ञानं   तेsहं   सविज्ञानमिदं   वक्ष्याम्यशेषतः /
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोsन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते //२//

चौपाई;- 
तत्त्वज्ञान  विज्ञान  समेता / सब  कहिहौं   पारथ  तव  हेता //
जिसे जान फिर पूर्ण जगत में / ज्ञेय न शेष बचे जन मत में //

श्लोक;-
मनुष्याणां   सहस्त्रेषु   कश्चिद्यतति  सिद्धये / 
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः//३//

चौपाई;-
सहस पुरुष में ही इक कोई / मेरी प्राप्ति हेतु रत होई //
उन यतनी योगी में पारथ / कोई जाने रूप  यथारथ // 

श्लोक;-
भूमिरापोsनलो  वायुः   खं  मनो बुद्धिरेव च /
अहङ्कार  इतीयं  मे  भिन्ना   प्रकृतिरष्टधा //४//
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् /
ज़ीवभूतां  महाबाहो  ययेदं  धार्यते   जगत् //५ //

चौपाई;-
छिति,जल, पावक,गगन,समीरा / अहंकार, मन,बुधि गंभीरा //
अष्ट प्रकार भेदयुत  न्यारी / सुन  ये सब  जड़  प्रकृति  हमारी //
दूजी जग में  जीव स्वरूपा /  परा  प्रकृति  वह  जान  अनूपा //

श्लोक;-
एतद्योनीनि   भूतानि   सर्वाणीत्युपधारय /
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा //६//

चौपाई;- 
पार्थ समझ तू ऐसा मनमें / उभय प्रकृति  से  प्राणी  जन्में // 
उद्भव ,प्रलय जगत तारण हूँ / सब कारण का मैं कारण हूँ //   

श्लोक;-
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय /
मयि  सर्वमिदं  प्रोतं  सूत्रे   मणिगणा  इव //७//

चौपाई;-
मुझसे परम पार्थ कछु नाहीं / और न भिन्न वस्तु जगमाहीं //
गुँथा जगत सब  मुझमें  ऐसे / सूत्र  पिरोये  मणिगण  जैसे //

श्लोक;-
रसोsहमप्सु   कौन्तेय   प्रभास्मि   शशिसूर्ययोः /
प्रणवः   सर्ववेदेषु     शब्दः    खे    पौरुषं    नृषु //८//
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ /
जीवनं     सर्वभूतेषु     तपश्चास्मि     तपस्विषु //९//

सवैया;-
सुन भारत मैं जल में रस हूँ,रवि,चन्द्रविभा कर मैं ही प्रकाशा /
वेदन में ओंकार हूँ  मैं अरु, व्योम  में  शब्द,  अनंत  अकाशा //
पौरुष हूँ सब पुरुषन में अरु ,अग्नि में तेज , धरा  शुचिवासा /
तापस में सब का तप हूँ सब ,चेतन जीव  में  जीवन  आशा // 

श्लोक;-
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् /
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् //१०//

​​दोहा;-
मोहिं सनातन बीज तू ,सब जीवों का जान /
तेजस्वी का तेज हूँ , बुध  की  बुद्धि  महान //

श्लोक;-
बलं बलवतां  चाहं  कामरागविवर्जितम् /
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोsस्मि भरतर्षभ //११//

चौपाई;- 
सुन हे भरतश्रेष्ठ मतिधीरा / मैं  सामर्थ्य  शक्ति  गंभीरा //
बलवानों की शक्ति अपारा / रहित कामना राग विकारा // 
सब भूतों में चेतन मूला / मैं   ही  काम  धर्म  अनुकूला //    

श्लोक;-
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये /
मत्त  एवेति तान्विद्धि न त्वहं  तेषु  ते  मयि //१२//

चौपाई;-
सतगुण ,रजगुण ,तामस सारे / भाव  उपजते मुझसे न्यारे // 
सत्य यही है मैं नहिं उनमें / और न  वे  बसते  हैं  मुझ  में //
ये   मेरी   माया   में  आते / सो  मुझमें  प्रवेश  नहिं  पाते //

श्लोक;- 
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः     सर्वमिदं     जगत /
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् //१३//

चौपाई;-
इन तिर्गुण भावों से प्रेरित / चेतन  जग  हो  रहा  विमोहित // 
गुण से पर प्रकृति मम न्यारी / इससे नहिं जानहिं तनुधारी //

श्लोक;-
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया  दुरत्यया /
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते //१४//

चौपाई;-
तिर्गुणयुत अदभुत मम माया / जिसमें  पार्थ  विश्व भरमाया//
किन्तु मोहिं जो भजहिं निरन्तर / वे लाँघहिं यह मायादुष्कर//

श्लोक;-
न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नरधमाः /
माययापहृतज्ञाना  आसुरं  भावमाश्रिताः//१५//

चौपाई;-
माया जेहिकर ज्ञान नशाये / असुरस्वभावी  नर हो जाये /
वे नर अधम पाप नित करते / ऐसे मूढ़ मुझे नहिं भजते // 

श्लोक;-
चतुर्विधा भजन्ते मां  जनाः सुकृतिनोsर्जुन /  
आर्तो  जिज्ञासुरर्थार्थी  ज्ञानी   च  भरतर्षभ //१६//

चौपाई;-
श्रेष्ठ भरतवंशी हे अर्जुन / मोहिं भजहिं जे  जन उनको सुन //
दोहा;-
उत्तम कर्मी भक्त जन,भजहिं मोहिं संसार /
अर्थाथी जिज्ञासु अरु, आरत  ज्ञानी  चार //
चौपाई;-
प्राप्यवस्तु हित जो जन भजते / तिनहिं विज्ञ अर्थार्थी कहते //   
सत्य   जानने   ध्यान   लगाते / वे  योगी  जिज्ञासु  कहाते //
संकट समय भजें जो  प्रानी / उनको  आर्त   कहें  सब  ज्ञानी //
ब्रह्मतत्त्व  का  जो  जन  ज्ञाता /  वही  पुरुष  ज्ञानी कहलाता //

श्लोक;-
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त   एकभक्तिर्विशिष्यते /
प्रियो हि ज्ञानिनोsत्यर्थमहं स च मम प्रियः//१७//

चौपाई;- 
उन सब  में जो  भजहिं  निरन्तर / एकभाव  में स्थित रहकर //
वह अनन्यमम भक्तसिरोमणि/ मैं उनकोप्रिय जैसेफणि णि //
वह ज्ञानी  मोहिं सब में प्यारा / भक्त  गणों  में सबसे  न्यारा //

श्लोक;-
उदाराः  सर्व   एवैते  ज्ञानी  त्वात्मैव  मे  मतम् /
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् //१८//

चौपाई;- 
सब उदार समरथ  अनुरूपा  / ज्ञानी  मम  प्रत्यक्ष  स्वरूपा //
सुन अर्जुन ऐसा मेरा मत / क्योंकि  वही  मुझमें  है  स्थित //
थिर मन,बुद्धि और मृदुवाणी / उत्तम गतिस्वरूप वह ज्ञानी //
भलीभाँति  मुझमें  है  स्थित / मैं  भी  उसमें  रहूँ प्रतिष्ठित // 

श्लोक;-
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते /
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा  सदुर्लभः//१९//

दोहा;-
बहुजनमों के अंत में , तत्त्वज्ञान  नर  पाय /
वासुदेव सबमें लखे , भजे  मोहिं  चितलाय //   
चौपाई;-
सब कुछ वासुदेव जो माने / अस मुनि दुर्लभ बिरले जाने //

श्लोक;-
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः   प्रपद्यन्तेsन्यदेवताः /  
तं तं नियमास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया //२०//

चौपाई;-
जिन भोगों की इच्छा द्वारा /  ज्ञान  हरण  हो  जिनका  सारा //   
निज स्वभाव से प्रेरित वे नर / उन नियमों को ही धारण कर //
करें  अन्य   देवों   की  पूजा / श्रद्धा  सहित  भाव  नहिं  दूजा //

श्लोक;-
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति /
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव  विदधाम्यहम् //२१//

चौपाई;-
जिन देवों  को जो सकाम  नर / पूजन चाहें मन स्थिर कर //
उनके प्रति  ऐसे  भक्तन  में / श्रद्धा  स्थिर  करता  मन  में //  
   
श्लोक;-
स    तया    श्रद्धया   युक्तस्तस्याराधनमीहते /
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् //२२//

चौपाई;-
वह नर सोइ  श्रद्धायुत  होकर / पूजे  उसी  देव  ही  को  नर //
अरु मम कृत विधान अनुसारा / इच्छित भोग इष्ट के द्वारा //   
 बिन  संदेह   भक्त  वह  पाये / उन  देवों  में  ही  रम  जाये //  

श्लोक;-
अन्तवत्तु   फलं   तेषां  तद्भवत्यल्पमेधसाम् /
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि //२३//

चौपाई;-
पर उन अल्पबुद्धि भक्तों के / नाशवान  सब   फल  कर्मों के //
सुर के पूजक सुर को पायें  / मम ध्यानी मुझ में मिल जायें//  

श्लोक;-
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः /
परं   भावमजानन्तो    ममाव्ययमनुत्तमम् //२४//

दोहा;-
परम  भाव  सर्वोत्तम,  अरु व्यय , अव्यक्त /  
मोहिं न जाने जगत यह ,माया से आसक्त //
चौपाई;-
भ्रमित बुद्धि माया लिपटाने  / व्यक्ति स्वरूप भाव से जाने //

श्लोक;-
नाहं   प्रकाशः   सर्वस्य    योगमायासमावृतः / 
मूढोsयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् //२५//

चौपाई;-
छिपा  योगमाया से निज की / इससे देखे  दृष्टि  न  सबकी //
मैं   अविनाशी   अरु   अविकारी / ये  अज्ञानी  नर  संसारी //
मोहिं अजन्मा को नहिं जाने / जन्म ,मृत्यु धारक ही माने // 

श्लोक;-
वेदाहं   समतीतानि  वर्तमानानि   चार्जुन /
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन //२६//

चौपाई;-
पूर्व ,आज जो प्राणी जन्में / जो होंगे भविष्य के  क्षण में //
उन सबको मैं जानूँ अर्जुन / मोहिं न जाने कोई सच सुन // 

श्लोक;-
इच्छाद्वेषसमुत्थेन    द्वन्द्वमोहेन    भारत /
सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप //२७//

चौपाई;-
इच्छा द्वेष द्वन्द्व सम्मोहा / प्राणिजगत उपजावहिं क्षोहा //
इससे  मोह  रहे  सब  प्राणी / मोहिं  न जाने वे अज्ञानी // 

श्लोक;-
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् /
ते   द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता  भजन्ते  मां  दृढ़वृताः//२८//

चौपाई;-
पर निष्काम कर्म  आचारी / पापविमुक्त  योग  व्रतधारी //
 रागद्वेष द्वन्द्वादि विमोहा / इनको  त्याग  भये  निर्मोहा //
ऐसे योगी दृढ व्रतधारी / मोहिं भजहिं सब काम बिसारी //

श्लोक;-
जरामरणमोक्षाय    मामाश्रित्य    यतन्ति   ये /
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् //२९//

चौपाई;-
जरा,मरण मोक्षार्थ सयाने / जो मम शरणागत व्रत ठाने //
वे नर परमब्रह्म विज्ञाता / सब आध्यत्म , कर्म के ज्ञाता //

श्लोक;-
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः /
प्रयाणकालेsपि  च मां ते विदुर्युक्त चेतसः //३०//        

दोहा;-
साधिभूत ,अधिदैव अरु , साधियज्ञ मोहिं जान /
अन्तहुँ   में  सर्वात्मा , जानि  करे  मम  ध्यान //
ब्रह्म   समाहित    चित्त   से , मुझको  ही सर्वज्ञ /
इस सृष्टी का जानते , मोहिं  मिलहिं  वे   विज्ञ //

ज्ञान  और  विज्ञान  का , हुआ  पूर्ण  अध्याय /
मिली भाव  मन्दाकिनी , प्रभु अनुकम्पा पाय //      

 इस प्रकार श्रीमद् भगवद् गीता रूपी उपनिषद एवं ब्रह्म विद्या तथा   योगशास्त्र विषयक  श्रीकृष्ण  और
अर्जुन  के   संवाद   में  उदयभानु  तिवारी''मधुकर''  कृत  महाकाव्य ''गीतमानस'' में समग्र जानकारी
नामक ​सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ /


                              हरि ॐ तत्सत्   

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