Sunday, February 1, 2015

                  अथाष्टमोsध्यायः
दोहा;-
ब्रह्म,कर्म,अध्यात्म के, पूछहिं अर्जुन प्रश्न /
देकर उत्तर  पार्थ  के , संशय  हरते  कृष्ण // 

                 अर्जुन उवाच  
श्लोक;-
किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम //
अधिभूतं च किं   प्रोक्तमधिदैवं  किमुच्यते //१//

दोहा;-
दयानिधे पुरुषोत्तम ,ब्रह्म , कर्म , अध्यात्म /
क्या हैं कह समझाइये ,कैसा वह परमात्म // 
चौपाई;-
को अधिभूत कौन अधिदेवा / मोहिं बतायें त्रिभुवन देवा // 

श्लोक;-
अधियज्ञः कथं  कोSत्र   देहेSस्मिन्मधुसूदन /
प्रयाणकाले  च कथं ज्ञोयोSसि नियतात्मभिः//२//

चौपाई ;-
कौन यहाँ अधियज्ञ कहावे / वह कैसे इस  तन  में  आवे //
हे मधुसूदन युक्तचित्त नर / जो हैं उनके अन्त  समय पर //
किस विधि आप ज्ञान में आते / भक्तों द्वारा  जाने  जाते //

                    श्री भगवानुवाच 
श्लोक;-
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोSध्यात्ममुच्यते /
भूतभावोद्भवकरो    विसर्गः कर्मसञ्ज्ञितः//३//

चौपाई;-
सुन अर्जुन के  प्रश् न  अमोले / अमिय वचन योगेश्वर बोले //
दोहा;-
परमाक्षर ही ब्रह्म  है , अक्षय  वह  परमात्म /
जीवात्मा थिर भाव को, कहते हैं अध्यात्म //
चौपाई;-
भूतों में जो भाव निरन्तर / जिनसे मोहित जग यह नश्वर //
उनका त्याग कर्म कहलाये / परम सिद्धि जिससे नर पाये //
जब वे भाव शान्त  हो  जायें / वहीं  कर्म  सम्पूर्ण  कहायें //  

श्लोक;-
अधिभूतं क्षरो  भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् /
अधियज्ञोSहमेवात्र   देहे   देहभृतां  वर //४//

चौपाई;-
नश्वर भावयुक्त सब भूता /  इनहिं  पार्थ  जानहु  अधिभूता // 
जो हिरण्यमय पुरुष स्वरूपा / उसे कहहिं अधिदैव  अनूपा //
हे नर श्रेष्ठ जान अस मनमें / मैं अधियज्ञरूप थित तन में //
मैं ही वह  त्रिभुवन  का  स्वामी / वासुदेव  हूँ  अन्तर्यामी //

श्लोक;-
अन्तकाले  च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् /
यः प्रयाति स मद्भावं याति  नास्त्यत्र  संशयः//५//

चौपाई;-
अन्तकाल में जो भी मुझको / सुमिरन करते त्यागे तन को //  
मम  प्रत्यक्षरूप  सो  पाये / नहिं   संशय   कोई  मन  लाये //

श्लोक;-
यं यं वापि  स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् /
तं   तमेवैति   कौन्तेय   सदा  तद्भावभावितः//६//

चौपाई;-
जो जो भाव हृदय धारणकर / अन्त समय तनत्यागे जो नर //
उनको प्राप्त करे  वह ध्यानी / भावित  रहता  जिनसे  प्राणी //

श्लोक;-
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च /
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् //७//

चौपाई;-
इससे तू मेरा  ही  चिंतन / हर  क्षण  कर  हे  कुन्तीनन्दन //
और युद्धरत भी हो तत्क्षण / सबकुछ मुझको करके अर्पण //
दोहा;-
अर्पितकर निज बुद्धि मन , जब हो जाय विदेह /
तो  मुझको  ही  पायेगा ,  इसमें   नहिं   संदेह //
  
श्लोक;-
आभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना /
परमं पुरुषं दिव्यं याति  पार्थानुचिन्तयन् //८// 

चौपाई;-
जो अनन्य चित  से कर चिंतन / योगाभ्यास करे हे अर्जुन // 
वह नर परमप्रकाश स्वरूपा / दिव्य पुरुष जो  ब्रह्म  अनूपा //
उसको प्राप्त करे वह ध्यानी / यही नियम है जानहिं ज्ञानी //

श्लोक;-
कविं        पुराणमनुशासितार-
                  मनोरणीयांसमनुस्मरेद्यः /
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप-    
           मादित्यवर्णं तमसः परस्तात् //९//

चौपाई;-
जो अनादि सब जगत नियंता / महासूक्ष्म  वह ब्रह्म अनंता //
सब जग धारण, पोषणकर्ता / रूप अचिंत्य सकल तमहर्ता // 
नित्य प्रकाशित रूप दिनेशा /  प्रकृतिपरे  निर्गुण ह्रदयेशा //
शुद्ध सच्चिदानन्द स्वरूपा / ध्यान  करे  जो  नर तदरूपा //

श्लोक;-
प्रयाणकाले         मनसाचलेन 
            भक्त्या युक्तो  योगबलेन  चैव /
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्-
             स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् //१०//

चौपाई;-
भक्तियोग  बल पाकर वह नर / अंतकाल में मन निश्चल  कर //
धरके भृकुटि मध्य निज प्राणा / सुमिर ब्रह्म जब करे प्रयाणा //
दिव्य पुरुष परमात्महिं पावे / जहाँ   पहुँच वापस नहिं आवे // 
  
श्लोक;-
यदक्षरं    वेदविदो   वदन्ति 
            विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः /
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति 
           तत्ते   पदं  सङ्ग्रहेण  प्रवक्ष्ये //११//

सवैया;-
भारत ! जासु परमपद को सब वेद के कोविद अक्षुण बताते /
या में प्रवेश के हेतु विरक्त महामुनि यत्न  से  ध्यान लगाते //
जो पद के अभिलाषी सदा ब्रह्मचर्य में ही सारी उम्र  विताते /
क्या है परमपद प्राप्त हो कैसे कहूँ सार योगी उसे कौन पाते //

श्लोक;-
सर्वद्वाराणि   संयम्य   मनो   हृदि   निरुध्य   च /
मूर्ध्न्याधायात्मनःप्राणमास्थितो योगधारणाम् //१२//
ओमित्येकाक्षरं     ब्रह्म     व्याहरन्मामनुस्मरन् /
यः प्रयाति  त्यजन्देहं  स  याति  परमां  गतिम् //१३//

दोहा;-
इन्द्रिद्वार सब रोक के , कर मन को हिय देश /
विजयी मन से प्राण को , मस्तक  करे प्रवेश //
योगधारणा युक्त  नर ,  जपत  शव्द  ओंकार /
चिंतन रत मुझ  ब्रह्म  में , देह  तजे  हो  पार //
चौपाई;-
ओम जपत जो भव तज जाये / वह नर पार्थ परमगति पाये //

श्लोक;-
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः /
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः //१४//

चौपाई;-
मोहिं अनन्यचित्त से अर्जुन / भजहिं निरन्तर जो योगीजन //
उन्हें सहज ही में मिल  जाता / योगयुक्त  हो   जन  ध्याता //

श्लोक;-
मामुपेत्य   पुनर्जन्म    दुःखालयमशाश्वतम् /
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः//१५//

चौपाई;- 
कर चित शुद्धि ब्रह्म संयोगी / परम सिद्धि पाये वह योगी //
दुःखगेह इस नश्वर तन से / होकर  मुक्त न जन्में फिरसे //

श्लोक;-
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोsर्जुन /
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते //१६//

चौपाई;-
सकल  लोक  ब्रह्मा   तक  जितने / वे  सब  पुनरावर्ती  उतने //
किन्तु  सुनो  हे  कुन्तीनन्दन / मुझे प्राप्त जो  होते मुनिजन // 
पुनर्जन्म   वे  पुरुष  न  पाते  /  काल अतीत  पार्थ  मैं  याते //
सबअनित्य ब्रह्माकेलोका /मुझबिन अन्य न सकहिं विलोका //

श्लोक;-
सहस्त्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो       विदुः/
रात्रिं युगसहस्त्रान्तां तेsहोरात्रविदो जनाः//१७//

चौपाई;-
सतयुग,त्रेता,द्वापर,सतयुग / सहस बार जब बीतें ये  युग //
एक दिवस  ब्रह्मा  का  आये / ब्रह्मदिवस वह  जाना  जाये //
उतनी उसमें  निशा समानी / जाने  इसे  तत्त्व  के  ज्ञानी //
तत्त्वदर्शि जो मुनि  हो जाते / कालतत्त्व  ज्ञाता  कहलाते //

श्लोक;-
अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे /
रात्र्यागमे  प्रलीयन्ते   तत्रैवाव्यक्तसञ्ज्ञके //१८//

दोहा;- 
दिन के  आगम  काल में, उस  अव्यक्त  स्वररूप /
ब्रह्मा   से   प्रगटें    सभी ,  सचराचर    के    रूप //
पुनि निशि आगम काल में,सभी प्रकृति आधीन /
उस   ब्रह्मा   में   तत्त्व   ये , हो   जाते   हैं   लीन // 
  
श्लोक;-
भूतग्रामः स  एवायं  भूत्वा  प्रलीयन्ते /
रात्र्यागमेsवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे//१९//

चौपाई;-
वही भूतगण पुनि पुनि जन्में / होकर पार्थ प्रकृति  के वश में //
निशि के आगम काल विलाते / दिन में  सभी प्रगट हो जाते //

 श्लोक;-
परस्तस्मात्तु भावोsन्योsव्यक्तोsव्यक्तात्सनातनः/
यः  स   सर्वेषु   भूतेषु   नश्यत्सु   न  विनश्यति //२०//

चौपाई;-
वह  ब्रह्मा  जो  सृष्टि  रचाये / जिनके  दिन  अरु रात बताये //
दूजा  उससे  परे  पुरातन / व्यक्त  नहीं  वह  भाव  सनातन //
परम दिव्य वह  पुरुष कहाये / जग विनशे वह नहीं नशाये //

श्लोक;-
अव्यक्तोsक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् /
यं  प्राप्य  न  निवर्तन्ते  तद्धाम  परमं  मम //२१//

चौपाई;-
जो अव्यक्त नाम  है अक्षर / वही  परमगति  कहते  मुनिवर //   
जहाँ जाय नर फिर नहिं आये / वह मम परमधाम कहलाये //

श्लोक;-
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या  लभ्यस्त्वनन्यया /
यस्यान्तः स्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् //२२//

चौपाई;-
जिसके अन्तर्गत सब प्राणी / जगतव्याप्त वह ब्रह्म अजानी //    
सुदृढ़ अनन्य भक्ति के द्वारा / प्राप्य  पुरुष  वह परम उदारा // 

श्लोक;-
यत्र  काले  त्वनावृत्तिमावृत्तिं  चैव  योगिनः/
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ //23//

सोरठा;-
सुन अर्जुन जिस काल,तन तज पुनि  मुनि नहिं फिरहिं /
गत  योगी   जिस   काल , पुनर्जन्म  गति  को  लहहिं //  
चौपाई;-
दोनों काल कहहुँ समझाई / भेद जान थिर ध्यान लगाई //

श्लोक;-
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् /
तत्र  प्रयाता  गच्छन्ति  ब्रह्म  ब्रह्मविदो   जनाः//२४//

चौपाई;-
तनके त्यागकालमें जिसके/सम्मुखज्योति अग्निकी चमके // 
फैल रहा हो  दिवस प्रकाशा / चमके रवि हो विमल अकाशा //
शुक्लपक्ष ,शशि बढ़ते क्रम में / उत्तरायण, छैमासी  क्षण में //
ब्रह्मविज्ञ  जो  तन  तज  जाये / परमब्रह्म  में  जाय  समाये //
ज्योतिर्मयपथ गत तन त्यागी / पुनर्जन्म नहिंलेहिं विरागी // 

श्लोक;-
धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् /
तत्र   चान्द्रमसं   ज्योतिर्योगी  प्राप्य  निवर्तते //२५//

चौपाई;-
जिसके  अन्तकाल  में  अर्जुन / मोहरात्रि  के  छाये  हों  घन //
फैले धुआँ , निशा अँधियारी / कृष्णपक्ष  का  तम  हो  भारी //
षडविकारयुत,मद अरु मोहा / मत्सर,लोभ,काम अरु कोहा //
दक्षिणायन षडमास सिधाये / चन्द्रज्योति  मारग सो पाये //
स्वर्गलोकफल भोगहिं जाकर / पुनिजन्महिं पृथ्वीमें आकर // 

श्लोक;-
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतःशाश्वते  मते /
एकया   यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते   पुनः//२६//

चौपाई;-
इस जग के दो शाश्वत साधन / शुक्ल,कृष्ण ये मार्गसनातन //
दोहा;-
अनावर्ति गति पाय इक ,फिर वापस नहिं होय /
जो पावें  गति  दूसरी , पुनि  जन्में  जग  सोय // 

श्लोक;-
नैते सृती पार्थ जानन्योगी  मुह्यति कश्चन /
तस्मात्सर्वेषु कालेषु  योगयुक्तो  भवार्जुन //२७//

चौपाई;-
दोनों  पंथ  तत्त्व  से  जानी / कोई  न  मोहित  होवे  ज्ञानी //
इससे तू समबुधियुत होजा / नित्य योग से मुझ में खोजा //

श्लोक;-
वेदेषु    यज्ञेषु    तपःसु   चैव 
              दानेषु  यत्पुण्यफलं  प्रदिष्टम् /
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा 
             योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् //२८//

चौपाई;-
वेद पाठ  अरु यज्ञ विधाना / जाप, दान,तप आदिक नाना //
 इनसे प्राप्त पुण्यफल अर्जुन / उल्लंघन कर जाते मुनिजन //
वह तत्त्वज्ञ भेद यह  पाये / मम पद पाय मोहिं मिल जाये //

दोहा;-
शब्दमेघ उमड़त घिरत , बरसे छन्द बनाय /
ब्रह्माक्षर के योग  का, पूर्ण  किया  अध्याय //       

इस प्रकार श्रीमद् भगवद् गीता रूपी उपनिषद एवं ब्रह्म विद्या तथा   योगशास्त्र विषयक  श्रीकृष्ण  और  अर्जुन  के   संवाद   में  उदयभानु  तिवारी''मधुकर''  कृत महाकाव्य ''गीतमानस'' में अक्षर ब्रह्मयोग नामक आठवाँ
अध्याय पूर्ण हुआ /


                                         हरि ॐ तत्सत्   

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