Sunday, February 1, 2015

                      अथ नवमोsध्यायः
दोहा;-
जगतोत्पत्ति, विनाश का, विषय सहित विज्ञान /
कहा पार्थ से कृष्ण ने , सो  सुनिये  धर  ध्यान // 

                    श्री भगवानुवाच 
श्लोक;-
इदं    तु     ते    गुह्यतमं      प्रवक्ष्याम्यनसूयवे /
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेsशुभात् //१//

दोहा;-
दोष दृष्टि  से रहित अरु,परम भक्त निज जान /
गोपनीय वह ज्ञान पुनि , कहूँ सहित विज्ञान // 
चौपाई;-
जिसे जान दुख-भव तरजाये / मुक्ति प्रकृति बंधन से पाये //

श्लोक;-
राजविद्या   राजगुह्यं    पवित्रमिदमुत्तमम् /
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् //२//

चौपाई;-
पार्थ ज्ञान, विज्ञान  समेता / विद्याराज, अध्यात्म  प्रणेता //
सबमें राजगुह्य अतिपावन / है प्रत्यक्ष फलित मन भावन //
धर्मयुक्त उत्तम सुखरासी / सुगमकर्म अरु ज्ञान अविनासी // 

श्लोक;-
अश्रद्दधानाः  पुरुषा  धर्मस्यास्य  परन्तप /
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि //३// 

चौपाई;-
इस उपरोक्त  धर्म में अर्जुन / जो  हैं  श्रद्धारहित  पुुरुषजन //
मुझ पमेश्वर को ना  पाकर / भटकत मृत्युलोक में आकर // 

श्लोक;-
मया     ततमिदं    सर्वं    जगदव्यक्तमूर्तिना //
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः //४//

चौपाई;-
निराकार नहिं देहुँ दिखाई / जलबिच हिमजिमि रहहुँ समाई //
मम अन्तर्गत प्राणि प्रतिष्ठित / किन्तु नहीं मैं उनमें स्थित // 

श्लोक;-
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य में योगमैश्वरम् /
भूतभृन्न  च  भूतस्थो  ममात्मा  भूतभावनः//५//

यही यथार्थ जान तू मनमें /   स्थित नहीं भूतगण मुझमें //
ये नश्वर मम  प्रकृति अधीना / मैं  अव्यक्तरूप  तनहीना // 
देख ईश्वरी  मेरी  माया / जो  धारक , पोषक  जग जाया //
वह मेराआत्मा भूतन में / स्थितनहीं समझ निज मनमें //

श्लोक;-
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान /
तथा सर्वाणि  भूतानि  मत्स्थानीत्युपधारय //६//

दोहा;-
ज्यों स्थित आकाश में ,महापवन अविछीन /
नित विचरे सर्वत्र  में , होवे  गगन  विलीन //
चौपाई;-
त्योंही अखिलसृष्टि के प्राणी / मुझमें स्थित जानहिं ज्ञानी //
मम इच्छा से प्राणी जन्में / ऐसा जान  पार्थ निज  मनमें //

श्लोक;-             
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् /
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ  विसृजाम्यहम् //७//

चौपाई;- 
सब कल्पान्त काल में अर्जुन / प्रकृति लीन  हों सभी भूतगन//
आदिकाल जब जग का आता / फिर विशेष सब सृष्टि रचाता// 

श्लोक;-
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनःपुनः /
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं  प्रकृतेर्वशात् //८// 

चौपाई;-
प्रकृति किये निज अंगीकारा / परवश हुये  स्वभावों  द्वारा //
उन भूतों को पुनि पुनि ताता /उनके कर्म अनुसार रचाता //

श्लोक;-
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय /
उदासीनवदासीनमसक्तं         तेषु       कर्मसु //९//

चौपाई;-
मैं अव्यक्त अलौकिक अक्षय / सर्व कर्म मम दिव्य धनंजय // 
सब  कर्त्तव्य  कर्म  मैं  करता / कर्मों  में  आसक्त  न रहता //
उदासीन सम जगमें स्थित / विश्व कर्म नहिं करते बंधित //  

श्लोक;-
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् /
हेतुनानेन    कौन्तेय   जगद्विपरिवर्तते //१०//

चौपाई;-
मैं  अध्यक्ष प्रकृति मम माया /जिसमें सारा जग  भरमाया //
लेकर अनुमति प्रकृति हमारी / रचे जगत  सचराचर झारी //
उन्नति उन्मुख परिवर्तन ही /''कल्प'''जानते ज्ञानीजन ही //    
छुद्र कल्प यह जिससे अर्जुन/ सृष्टिचक्र घूमे अविरल सुन //

श्लोक;-
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् /
परं   भावमजानन्तो   मम  भूत  महेश्वरम् //११//

दोहा;-
परमभाव   भूतेश्वर , विचरत   नर    के    रूप /
पहचानहिं नहिं मूढ़ नर , माया रचित स्वरूप //
चौपाई;-
भ्रमित  बुद्धि नर मोहिं न जाने / साधारण मानुष ही माने //
  
श्लोक;-
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः /
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं  श्रिताः //१२//

चौपाई;-
व्यर्थ की आशा व्यर्थकर्मणा / व्यर्थ ज्ञान अरु व्यर्थ कल्पना //
उस मतिसे विक्षिप्त,अशोभित / राक्षस,असुरवृत्ति से मोहित //
अधम प्रकृति वे नर अभिमानी / धारण किये रहें , अज्ञानी //
  
श्लोक;-
महात्मानस्तु मां पार्थ  दैवीं  प्रकृतिमाश्रिताः /
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् //१३//

चौपाई;-
दैवी सम्पद आश्रित मुनिजन / सब भूतों का आदि सनातन //
कारण मुझको ही सब जाने  / पारथ  ! अव्यय, अक्षर माने //
नित अनन्यमनसे करचिंतन/भजहिंनिरंतर मोहिं भक्तजन //
  
श्लोक;-
सततं   कीर्तयन्तो   मां   यतन्तश्च   दृढ़वृताः /
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते //१४//

चौपाई;-
दृढ़ निश्चय से होकर तत्पर / करहिं कीर्तन  भजन  निरन्तर //
मुझको पाने जप ममनामा / पुनि पुनि करहिं सप्रेमप्रणामा //
मोहिं अनन्य प्रेम  से  भजते  /  ध्यानयुक्त  आराधन करते //

श्लोक;-
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते /
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् //१५//

चौपाई;-
दूजे ज्ञान योग के ज्ञानी / निर्गुण निराकार  मोहिं जानी //
ज्ञानयज्ञ द्वारा कर पूजन / करहिं अभिन्नभाव आराधन //
दोहा;-
बहुरूपों  से  युक्त  मम , दिव्य  विराट  स्वरुप /
करहिं उपासन अन्य नर ,पृथक भाव तद रूप //

श्लोक;-
अहं क्रतुरहं  यज्ञः  स्वधाहमहमौषधम् /
मन्त्रोsहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् //१६//

चौपाई;-
मैं क्रतु और यज्ञ भी मैं हूँ / मैं  ही  स्वधा  सु-औषध मैं  हूँ //
मैं  ही मन्त्र,अग्नि,घृत मैं हूँ / मैं ही हवन,क्रिया भी मैं  हूँ // 

श्लोक;-
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः / 
वेद्यं  पवित्रमोङ्कार  ऋक्साम  यजुरेव  च //१७//

चौपाई;-
मैं सम्पूर्ण जगत का धाता / सब  कर्मों  का मैं फल दाता //
मैं ज्ञातव्य,पितामह,माता / मैं ही पिता जगत विख्याता //    
परम   पवित्र   रूप   ओंकारा  /  सामवेद  , ऋग्वेदाधारा //
यजुर्वेद भी मुझ को जानो / वेदों में  नित  स्थित  मानो // 

श्लोक;-
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् /
प्रभवःप्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् //१८//

चौपाई;-
प्राप्य  परमगति , अन्तर्यामी / विश्वभरणकर्ता  अरु  स्वामी //
सर्व   वासस्थल , सब  दृष्टा / आश्रय   योग्य   भक्त  आकृष्टा // 
प्रतिउपकाररहित   हितकर्ता /  उत्पति, प्रलय, हेतु , संहर्ता //
स्थिति का आधार निधाना / विलयकाल का जीव ठिकाना //
अविनाशी कारण भी मैं  हूँ / मैं  ही  सब  सबही  में  मैं  हूँ //
अंत प्रवेश लेहिं जहँ मुनिजन /सब विभूति वे मैं ही अर्जुन //

श्लोक;-
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च /
अमृतं   चैव  मृत्युश्च   सदसच्चाहमर्जुन //१९//

सवैया;-
सूर्य के रूप में मैं ही तपूँ ,ऋतु  बारिश  आकर्षण  कर  लाता /
घोर  घटा  बन  अम्बर से, जल  पारथ  भू  पर  मैं  बरसाता //
मैं अमरत्व औ मृत्यु भी मैं ही , मैं ही चराचर विश्व सजाता /
मैं सत् और असत् भी धनंजय,परमप्रकाश का मैं ही प्रदाता //

श्लोक;-
त्रैविद्या   मां   सोमपाः   पूतपापा -
            यज्ञैरिष्ट्वा   स्वर्गतिं   प्रार्थयन्ते /
ते      पुण्यमासाद्य     सुरेन्द्रलोक-
            मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् //२०//

दोहा;-
अर्चन विद्या  अंग हैं , ऋक्  , यजु , साम , महान /
क्  में  ईश्वर   प्रार्थना , साम  समत्वं  विधान //
यजु  में   अर्चन  आचरण , यज्ञ  क्रिया  है  जान /
अनुष्ठान   की   वेद  में , विधियाँ   कहीं   बखान //
तीनिहुँ वेद विधान कृत ,विधि  से कर्म सकाम /
करते  ज्ञाता  पुरुष  जब , प्राप्ति  हेतु  सुरधाम //  
चौपाई;-
क्षीण   प्रकाश  चन्द्र  का   पाते  /  सोमपानकर्ता  कहलाते //  
पापमुक्त  होकर   ऐसे   जन /  यज्ञों  द्वारा  कर  मम  पूजन //
स्वर्ग कामना करते ध्यानी / यही असत,नहिं जान अज्ञानी //
वे नर पुण्यफलों के रूपा / पावहिं   सुरपुर   कर्म   अनुरूपा //
वहाँ   दिव्य  देवों  के  सारे /  सुख  भोगें  पृथवी  से  न्यारे //
मैं ही स्वर्गलोक फलदाता /सगुणउपासक जो जन ध्याता //

श्लोक;-
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं- 
            क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति /
एवं           त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना-
            गतागतं   कामकामा  लभन्ते //२१//

चौपाई;-
 वे नर  उस  विशाल  सुरपुर  के / भोगकाल  को  पूरण करके //
जब सब पुण्य क्षीण  हो जायें / मृत्युलोक  में  नर  तन  पायें //
एहिविधि त्रय वेदोंविधि द्वारा / वर्णित  यज्ञविधान  अनुसारा //
कर्मकरहिं मम आश्रित ज्ञानी / भोग कामना निज उर आनी //
बारम्बार  स्वर्ग   वे   जाते /  पुनर्जन्म   लेकर   फिर   आते //
जो सकाम  नर  मुझको  ध्यावें / पुनर्जन्म   मुक्ति  न  पावें //

श्लोक;-
अनन्याश्चिन्तयन्तो  मां   जनाः  पर्युपासते /
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् //२२//

दोहा-
जो अनन्य   चित   भक्तजन ,  प्रतिपल   आठोयाम /
चिन्तन रत मुझ  ब्रह्म  का, भजन  करहिं  निष्काम //
योगक्षेम   उन   भक्त   का ,  स्वयं     कराऊँ    प्राप्त /  
फिर उनको  नहिं प्रकृति के ,त्रिविध ताप हों व्याप्त //

श्लोक;-
येsप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते  श्रद्धयान्विताः /
तेsपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् //२३//

चौपाई;-
यद्यपि   श्रद्धायुत  दूजे  जन  / करहिं  अन्य  देवों का   पूजन //
वे   मेरी   ही  करते   पूजा  /  वह   मैं   ही  हूँ  और  न  दूजा //
किन्तुपार्थ उनका यह पूजन / विधि अनुसार नहीं है सचसुन //

श्लोक;-
अहं  हि   सर्वयज्ञानां  भोक्ता  च  प्रभुरेव  च /
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते //२४//

चौपाई;-
सर्वयज्ञभोक्ता   अरु   स्वामी / निराकार   मैं   अन्तर्यामी //
मोहिं तत्त्व से वे नहिं जाने / भ्रमित बुद्धि माया लिपटाने //
पाकर स्वर्ग पुनः गिर जाते /  पुनर्जन्म से मुक्ति न पाते // 

श्लोक;-
यान्ति    देवव्रता     देवान्पितृन्यान्ति     पितृव्रताः /
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोsपि माम् //25//

चौपाई;-
सुर के पूजक सुर को पावें / पावहिं पितर, पितर जो ध्यावें //
भूतों का जो  करते  पूजन / पावैं  भूतों  की  गति  वे  जन //
मम आराधक  हैं  जो ज्ञानी / वे मुझको ही पावहिं ध्यानी //
इससे  मुझे भक्त  जो  भजता / मुक्त  पुनर्जन्मों  से  रहता //

श्लोक;-
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति /
तदहं     भक्त्युपहृतमश्नामि     प्रयतात्मनः//२६//

चौपाई;-
जो मुझको हैं  भक्त  समर्पित / पत्र ,पुष्प , फल करते अर्पित //
शुद्ध बुद्धि निष्काम भक्त का / अर्पित पत्र, पुष्प,फल,जल का //
प्रीति सहित मैं भोजन पाऊँ / सगुणरूप निज प्रगट दिखाऊँ//  
   
श्लोक;-
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि  यत् /
यत्तपस्यसि  कौन्तेय  तत्कुरुष्व  मदर्पणम् //२७//

दोहा;-
कर्म करे जो खाय अरु , करे  दान, तप, यज्ञ /
मुझको वह सब पार्थ तू , अर्पण कर हे विज्ञ // 

श्लोक;- 
शुभाशुभफलैरेवं      मोक्ष्यसे      कर्मबन्धनैः /
सन्न्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि //२८//

चौपाई;-
इस संन्यास योग में अर्जुन / कर्म होहिं सब  मुझको अर्पण //
इससेयुक्त चित्तहो जिसक्षण / शुभ या अशुभ कर्मफल बंधन //
उनसे मुक्ति सुनिश्चित पाये / फिर  तू  मुझे  प्राप्त  हो  जाये //

श्लोक;-
समोsहं  सर्वभूतेषु   न  मे  द्वेष्योsस्ति  न  प्रियः/
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् //२९//

चौपाई;-
मैं   समभावयुक्त   धरणी  में  / रमा  हुआ  हूँ  सब  प्राणी  में //
नहींअप्रिय नहिंप्रिय मोहिंकोई / पर जो भजहिं भक्तियुत होई //
 वे  मुझमें  अरु  मैं  उनमें  हूँ / पार्थ  प्रगट  योगी  तन  में  हूँ //

श्लोक;-
अपि  चेत्सुदुराचारो   भजते  मामनन्यभाक् /
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः//३०//

चौपाई;-
पापाचारी   भी   यदि   कोई /  भजे   अनन्यभावयुत  होई //
तब  भी  उसको  साधू  माने / दृढ़  निश्चयी  भक्त वह जाने //
भलीभाँति उसने यह जाना / ईश भजन सम और न आना // 
  
श्लोक;-
क्षिप्रं भवति  धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति /
कौन्तेय   प्रतिजानीहि  न  मे  भक्तः  प्रणश्यति //३१//

चौपाई;-
भक्तिभाव   से   पापाचारी  /  बने    शीघ्र   सदगुण  आचारी // 
भगवतभजन लगनलगजाये/ निशिदिनपरमशान्तिवहपाये //
सत्यजान निश्चय यह पारथ / विनशेनहिं ममभक्त  यथारथ //
यदि इस जन्म पार  नहिं पाये / पुनर्जन्म लेकर  फिर आये // 
शीघ्र साधना में लग जाये / परमशान्ति  की  स्थिति  पाये //

श्लोक;-
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य  येsपि  स्युः  पाप  योनयः /
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेsपि यान्ति परां गतिम् //32//

चौपाई;-
अर्जुन ! वैश्य, शूद्र अरु नारी / या जो पापयोनि तनुधारी //;
जो भी शरणागत हो जाते / वे सब पुरुष परमगति  पाते //

श्लोक;-
किं  पुनर्ब्राह्यणाः  पुण्या  भक्ता  राजर्षयस्तथा /
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् //३३//

चौपाई;-
फिर राजर्षि ,विप्र ,क्षत्रिन की / श्रेणी का क्या कहना उनकी //
वे भी मम शरणागत होकर /  पाते नित्य परमगति सो नर //
सुख विहीन क्षयभंगुर देहा / पाकर  कर  मम भजन सनेहा //   
   
श्लोक;-
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी  मां  नमस्कुरु /
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः //३४// 

चौपाई;-
मेरे ही मनवाला होजा / मम  चिंतन  कर  मुझ  में  खोजा // 
बन अनन्य मम  भक्त , निरन्तर / श्रद्धा  से मेरा  पूजनकर //
नमस्कारकर करके वन्दन / मुझको नित हे कुन्ती नन्दन //
दोहा;-
एक  भाव  से  आत्मा , कर  मुझ  स्थित  पार्थ /
शरण हुआ मम ध्यान कर,मुझको मिले यथार्थ //

राजविद्या ,  राजगुह्य ,  योग   नाम   अध्याय /
पूर्णहुआ,जो पढ़हिं नित ,राग सहित रमजाय // 

इस प्रकार श्रीमद् भगवद् गीता रूपी उपनिषद एवं ब्रह्म विद्या तथा   योगशास्त्र विषयक  श्रीकृष्ण  और  अर्जुन  के   संवाद   में  उदयभानु  तिवारी''मधुकर''  कृत  महाकाव्य ''गीतमानस'' में  राजविद्या जागृति योग नामक
​नववाँ अध्याय पूर्ण हुआ /


                                         हरि ॐ तत्सत्    

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