Tuesday, May 5, 2015

                            अनुक्रमणिका 
विषय                                                       पृष्ठ संख्या  
 १.गीता सुगीता कर्तव्या 
 २.प्रथम संस्करण में दिये पूज्य मनीषी सन्तों के आशीर्वचन
 ३.भाव भूमि 
 ४.श्री विष्णु स्तवन 
 ५.प्रेरणा 
 ६.गुरुवन्दना 
 ७.योगेश्वर वन्दना 
 ८.मंगलाचरण 
 ९ .विषय प्रणयन 
१०.यथा अर्थ विवेचन 
११.जीवन ही महाभारत 
१२.गीता माहत्म्य 
१३.प्रार्थना 
१४.श्रीकृष्ण स्तुति 
१५.आवाहन 
१६.प्रथम अध्याय ( संशय-विषादयोग )
१७.द्वितीय  अध्याय ( कर्म जिज्ञासा ) 
१८.तृतीय अध्याय ( शत्रु विनाश प्रेरणा )
१९.चतुर्थ अध्याय ( यज्ञ कर्म स्पष्टीकरण )
२०.पंचम  अध्याय ( यज्ञभोक्ता महापुरुषस्थ महेश्वर  ) 
२१.षष्ठम अध्याय ( अभ्यास योग )
२२.सप्तम अध्याय ( समग्र जानकारी )
२३.अष्टम अध्याय ( अक्षरब्रह्म योग )
२४.नवम अध्याय ( राजविद्या जागृति ) 
२५.दशम अध्याय ( विभूति वर्णन )
२६.एकादश अध्याय ( विश्वरूप दर्शन )
२७.द्वादस अध्याय ( भक्तियोग )
२८.त्रयोदश अध्याय ( क्षेत्र-क्षत्रज्ञविभाग योग ) 
२९.चतुर्दश अध्याय ( गुणत्रय विभाग योग ) 
३०.पञ्च दशअध्याय ( पुरुषोत्तम योग ) 
३१.षोडश अध्याय ( देवासुर सम्पद् विभाग योग )
३२.सप्तदश अध्याय ( ॐ तत्सत् तथा श्रद्धात्रय विभाग योग )
३३.अष्टदश अध्याय ( संन्यास योग )
३४.आरती गीता मानस 
३५.आरती सदगुरु 
३६. शब्द संकेत  
 गीता सुगीता कर्तव्या
          सहृदय सुधी गीता साधक श्री उदयभानु तिवारी से मेरा परिचय पूर्व परिचित साहित्य साधक से भिन्न रूप में , पहली बार हुआ. क्रमशः उनसे बढ़ते हुये संबंधों  ने  उनके  व्यक्तित्व की अनेक विशेषतायें उदघाटित कीं और आज  वे  मेरे  निकट और आत्मीय व्यक्ति बन गये हैं. उनमें  जो  मुख्य  बात  मैने अनुभव की वह है उनके व्यक्तित्व में एक लय / उसे सहज रूप से ऊपर से नहीं देखा जा सकता क्योंकि उसके ऊपर एक सुदृढ़ कवच है बाह्य -रूप से गतिशील ऊर्जा का / वे  एक  साथ त्वरा ओर सजकता से अनेक काम निपटा लेते हैं और ज्यों के  त्यों स्फूर्त बने रहते हैं / पर ध्यान से  देखें  तो  उसमें भी एक लय दृष्टिगोचर होती है / हाँ यह अवश्य है कि  भीतरी  लय  बाहरी गति की तुलना में अधिक गहरी और स्थाई है /
            दूसरी बात  जो मुझे दिखाई दी वह है ''आ नो भद्रः क्रतवो यन्तु विश्वतः '' विश्व के सभी सात्विक , शाश्वत एवं कल्याणकारी विचार मेरे पास पहुँचे / वे फिर  नई  बात को सुनने, समझने, स्वीकार करने और उसका उपयोग करने के लिये सर्वात्मना तत्पर हो जाते हैं /
               मुख्य-रूप से इन वैयक्तिक विशेषताओं का उल्लेख कर और ध्यान  में  रख  कर  मैं उनकी ''श्री गीता मानस ''को समझने का प्रयत्न  करना चाहता हूँ / यहाँ यह टिप्पणी करना भी आवश्यक  प्रतीत  होता  है  कि  भारतीय -परम्परा में दो प्रमुख धाराएँ प्रवाहित होती रही हैं /  उन धाराओं  से  हमारा वैचारिक और व्यवहारिक,दोनों प्रकार का व्यहार गहरे रूप में प्रभावित  होता रहा  है / वे  हैं  शास्त्र -धर्मी  और  लोक-धर्मी चिंतन और परम्पराएँ / कोई भी महत्वपूर्ण कृति समाज  में इन दोनों धाराओं में रच-बस कर ही स्वीकार्य हो पाती हैं/ यह बात श्रीमद् भगवद् गीता पर भी समान रूप से लागू होती है /जहाँ उस पर लिखे गये भाष्यों ,टीकाओं ,टिप्पणियों की एक वैविध्यपूर्ण ,  प्रतिभा -प्रकर्ष   सम्पन्न  और   सिद्धातों  की निर्णायक  भूमिकाओं  के आश्रय शास्त्र धर्मी   रूप  में  वृहद   श्रृंखला  प्राप्त होती है , वहीं  दूसरी ओर भारतीय और विदेशी भाषान्तरों,काव्यानुवादों के रूप में भी प्रचुर साहित्य मिलता है / इसके  अतिरिक्त  एक  और प्रकार का साहित्य भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है जिसमें प्रचलित  भाषान्तर  अनुवाद  के साथ व्याख्या और विशेष  विश्लेषण पूर्ण विचार बिन्दुओं को समाहित  किया  गया  है / तीसरे वर्ग में भी नये-नये विचारऔर  विचार करने के प्रयत्न भिन्न-भिन्न सन्दर्भों के आधार पर किये गये हैं / वे आधुनिकयुग की संवेदना एवं प्रतिपादन शैली के उत्तम उदाहरण के रूप में विद्वत्  समाज  में स्वीकर किये जा रहे हैं. इनमें विनोबा, धर्मानंद, कौसाम्बी, महर्षि बावरा, ओशो और स्वामी अड़गड़ानन्द जी प्रमुख हैं. 

  
               श्री उदयभानु तिवारी द्वितीय एवं तृतीय प्रकार के साहित्य से प्रभावित रहे हैं / बाल्यावस्था से ही उनके मन में श्री रामचरित  मानस  का  राग-बन्ध  सुदृढ़ हो गया था और स्वामी  अड़गड़ानन्द जी   की   यथार्थ  गीता  में  प्रतिपादित पात्रों ,घटनाओं  और  तत्व  संदर्भों के  मनोवैज्ञानिक  एवं प्रतीकात्मक  व्याख्यानों  ने  उन्हें  प्रभावित   किया  था परिणामतः उन्होंने श्री गीता मानस का पुनःप्रणयन करना, अपने  कवि  और  विचारशील व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति की दृष्टि से आवश्यक समझा / 
                ''श्री गीतामानस '' श्री रामचरित मानस की छन्द  
रचना से प्रभावित गीता -व्याख्या है ,जिसे वे सर्व ग्राह्य रूप में सहज मानते हैं / इसमें कोई संदेह नहीं है की श्री तिवारी जी ने अपनी इस कृति में ,यथा संभव  लयात्मकता की  रक्षा  करते हुये गीता के तत्त्व-चिंतन को नये संदर्भों में प्रस्तुत किया है / 
उन्होंने अपने प्रतिपादन के आधारभूत  सिद्धान्तों  को  स्पष्ट करते हुये लिखा है कि ;-
दोहा ;-
             मानुष तन कुरुक्षेत्र है , कौरव  असुर प्रवृत्ति /
             पाण्डव देवी सम्पदा , पाण्डु  पुण्य की वृत्ति // 
             कुन्ती है कर्तव्य अरु, भ्रम ही भीष्म महान /
             धर्म युधिष्ठिर जानिये , भाव भीम बलवान // 
चौपाई;-
  अर्जुन है मन  कर  अनुरागा / ब्रह्मज्ञान जेहि रुचिकर लागा //
  नियम   नकुल   सतसँग  सहदेवा ,  द्वैताचार  द्रोण गुरुदेवा //
  मनअनुरक्ति ही अश्वत्थामा/ सात्विकता का सात्यकिनामा //

इसी तरह अन्य पात्रों के संबंध में उन्होंने प्रतीकात्मकता  का उपयोग करते हुये और कुरुक्षेत्र को मनुज शरीर मानते हुये श्री अड़गड़नन्द जी के आधार पर यज्ञ की व्याख्या करते हुये कहा  गया  है कि ;-
दोहा ;-    ब्रह्म  प्राप्ति  की  साधना, जहाँ  चित्त  रमजाय /
             उस  विशेषविधि  को कहहिं, यज्ञ विज्ञ  समुदाय //
 कर्मफल पर यह टिप्पणी दृष्टव्य है ;-
चौपाई;-
फल का कारण बनने वाले / हैं अतिदीन कृपण मति वाले //
'' प्राणों का प्राणों का प्राणों में हवन ''गीता का महत्वपूर्ण वक्तव्य है -उसको श्री तिवारी जी ने समझाते हुये कहा है ;-
दोहा ;-
        प्राण वायु वह वायु है ,प्राणि करहिं जेहि पान /
        बाहर  निकली वायु  को , जानो  वायु अपान //
चौपाई ;-
प्राणवायु जब  अन्दर  जाये / ता  में  भाव , कुभाव  समाये //
जब साधक  मन  करे  निरोधा / हो  संकल्पों  में  अवरोधा //
योग-अग्नि   संकल्प  जलाये / प्राणवायु  ही  अन्दर  जाये //
विषय तरंग प्रवेश न  पायें / और  न  अन्दर  छोभ  बढ़ायें //
ब्रह्म समर्पित मन हो जाये / सिवा इष्ट कुछ ध्यान न आये //
यह क्षमता जब साधक पाये / प्राण -प्राण  में हवन कहाये // 
अपान में हवन पर कवि की अभिव्यक्ति है ;-
चौपाई ;-
अंदर से संकल्प  न  आयें / मन  में  नहिं  स्फुरण  जगायें //
हो  एकांत  योग  में  लागे / ब्रह्म  प्राप्ति  में  मन  अनुरागे //
यह स्थिति जब मन की आये / वह अपान में होम कहाये //
क्या हैं सात्विक ज्ञान ;-
चौपाई ;-
जिस सुबुद्धि से युक्त हुआ नर / भिन्न-भिन्न भूतों में ईश्वर //
एक भाव में स्थित  देखे / व्याप्त  ब्रह्म  सब  जग  में  लेखे // 
              इस तरह के अनेक प्रतीकात्मक एवं मनोवैज्ञानिक विचार श्री उदयभानु तिवारी '' मधुकर '' ने श्री गीता मानस में सरल और सुबोध बनाकर प्रस्तुत किये हैं / उनके इस ग्रन्थ के अनुशीलन  से  यह  भी  स्पष्ट होता है कि उन्होंने पूर्वाचार्यों से अतिरिक्त अपने मौलिक विचार भी इस कृति में विशेष रूप से दिये हैं , जिससे यह रचना उपयोगी ,आकर्षक एवं नवीन बन गई है /  
                    मेरी यह सुबद्ध धारणा है कि उनकी यह कृति सामान्य जन को आकर्षित तो करेगी ही,साथ ही विज्ञ जनों को भी प्रमुदित करेगी /
                     मेरी हार्दिक शुभकामना है कि यह कृति सुधी विद्वानों एवं गीता-रसिकों का कण्ठ हार बने /


                               आचार्य-कृष्णकान्त चतुर्वेदी 
                                  पूर्व  संस्कृत विभागाध्यक्ष 
                           रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय ,जबलपुर 
                         पूर्व निदेशक कालिदास अकादमी ,उज्जैन 
            प्रथमसंस्करण में मनीषियों के आशीर्वचन 
दोहा;- 
''श्रीकृष्ण   भाषित   यही , आत्मतत्व   का  ज्ञान /
 आभूषित  रस , छन्द   से ,  नव  रस  रत्न  महान //
परमब्रह्म   परमात्म   ने ,  कृपा   प्रकाश   दिखाय /
गीता   मानस   में   दिया  अदभुत   रस  बरसाय //
पढ़ यह अनुपम काव्य कृति,होकर अति अभिभूत / 
देते  आशिष  मुदित  मन , आत्मस्थित  अवधूत //''

                                      प्रकाश वन अवधूत 
                       श्री शैलेश्वरधाम शैलवारा,सिहोरा,जबलपुर   

           ''ऐसे सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ का पद्यानुवाद मानस  की  शैली  में प्रणीत कर सर्व साधारण के लिये सुगम बनाया है , मानस  की तरह ज्ञेय है /आपके इस प्रयास के लिये मैं अपनीशुभकामनायें
 प्रेषित करता हूँ और पाठकों के बीच  अधिकाधिक  प्रसार  के  लिये भगवान से प्रार्थना करता हूँ / शेष ईश्वरेक्षा सर्वोपरि / ''

                   स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि जी महाराज
              ( निवृत्त जगद् गुरु शंकराचार्य ,ज्योतिर्मय शाखा )  
                                भारत माता मन्दिर 
                      समन्वय कुटीर ,सप्त सरोवर ,हरिद्वार 

      ''पं. उदयभानु तिवारी 'मधुकर ' ने  उपनिषदों  के  सारभूत गीतारूपी  नवनीत  का  आस्वादन लोकभाषा  के  माध्यम से सामान्य जन  को  भी  कराने  का  पुण्य कार्य किया है / दोहा चौपाई आदि छन्दों में निबद्ध  यह  गीता मानस श्रीरामचरितमानस  की  शैली  में  लिखी  गई  है , जो लोगों  की न केवल आध्यात्मपिपासा  को ही शान्त  करेगी बल्कि उनकी बल्कि उनकी दैनन्दिन समस्याओं के समाधान का मार्ग भी प्रशस्त करेगी / ''

        महामंडलेश्वर श्रीमहंत स्वामी रामचन्द्रदास जीमहाराज  
                                 नरसिंह पीठाधीस्वर
                  श्री नृसिंह मन्दिर ,शास्त्री ब्रिज ,जबलपुर   

           ''इसी  अनादि - अविच्छिन्न  तथा  स्वाभाविक  परम मांगलिक क्रम में सम्पूर्ण वैदिक वाङ्गमय की सारभूता श्रीमद् भगवद् गीता का प्राकट्य 'गीता मानस  के  रूप  में  हुआ  है / जिसका सम्पूर्ण कलेवर चौपाई ,दोहा एवं छन्दों से रामचरित मानस के  समान  ओत -प्रोत  है /  इस  अनुपम  प्राकट्य  से  अब  गीता मानस सर्वजन सुलभ -सुग्राह्य एवं व्यापक रूप में मुमुक्षु जनों के लिए वरदान सिद्ध होगी / यद्यपि भगवद् गीता के  अन्यान्य  भी  पद्यात्मक  एवं   गद्यात्मक  अनुवाद  तथा व्याख्यान हुए हैंजो  श्लाघनीय  तथा उपादेय हैं परन्तु यह तो मानस के समान चौपाई, दोहा  एवं  छन्दों में  संग्रथित होने के कारण बेजोड़ है / जैसे मानस  की सहजता, सरसता,अनुपम प्रेरकता अद्वितीय है,वैसा ही लाभ मानवता को''गीता मानस''के द्वारा प्राप्त होगा, ऐसा मेरा परम  विश्वास तथा सर्वावतारी भगवान श्रीराम जी के चरणों में प्रार्थना भी है /

                            डॉ.स्वामी श्रीरामनरेशाचार्य जी महाराज 
                                    श्रीमठ ,पंचगंगा ,वाराणसी 

                  ''गीता मानस की रचना कर पं.उदयभानु तिवारी '' मधुकर ''ने बड़ा पुनीत कार्य किया  है / गीता  के  गूढ़  तत्वों  को  उन्होंने बहुत ही सहज,सरल छन्दों में निबद्ध कर गेयरूप 
में प्रस्तुत किया है / ''

                                  डॉ. स्वामी श्यामदास जी महाराज 
                                           गीता धाम, जबलपुर  

        ''गीतामानस में कवि ने भगवान श्रीकृष्ण जी की सरस,सहज  और  प्रभावपूर्ण   अभिव्यक्ति  को   सरल   हिन्दी   में तुलसीकृत श्रीरामचरित मानस की  भाँति  जन-जन के हृदय तक  पहुँचाने का  जो  कार्य किया  है वह प्रशंसनीय है / रस, छन्द स्वर ,लय , ताल की  अधिष्ठात्री माँ  शारदा अपने  इस लाडले पुत्र पर अपनी अहैतुकी कृपा सदा सर्वदा बनाये रखें / ''             
                                  
                                  स्वामी मुकुन्ददास जी महाराज 
                                           स्वयं-भू सिद्धपीठ 
                              श्री गुप्तेश्वर महादेव मन्दिर ,जबलपुर 
                                भाव भूमि
श्रीमद्भगवद् गीता   परमात्मा की दिव्य वाणी है परमात्मा के पूर्ण अवतार भगवान श्री कृष्ण ने अपनी सम्पूर्ण करुणा ,सम्पूर्ण ज्ञान गीता के रूप में अपने विषाद ग्रस्त सखा अर्जुन के ह्रदयमें सम्प्रेषित कर दिया/ सरलता ,सहजता ,सरसता और प्रेम की तरलता से संयुक्त गीता ज्ञान लोगों के ह्रदय पर अपना अमिट प्रभाव छोड़ देता है / इस अमर काव्य में वैदिक ज्ञान  का सम्पूर्ण सार सन्निहित है / गीता सभी युगों में मनुष्य मात्र की प्रत्येक समस्या का समुचित समाधान देती है ,मानवता के लिये सार्वकालिक ,सार्वदेशिक ,सार्वजनीन ज्ञान,आचार तथा भक्ति का मार्ग प्रशस्त करतीहै / यह सर्व  धर्म-सद्  भाव  की प्रेरक है / देश काल , जातिवर्ग,सम्प्रदाय  में  निहित ईश्वरीय  ज्ञान  को  महत्ता देती है तथा भगवान के विविध रूपों का दिग्दर्शन कराती है / परमप्रभु की कृपा से गीता द्वारा मुझे जिस परमानन्द की अनुभूति हुई उसे जन-जन   के  ह्रदय  तक   पहुँचाने   की  आकुलता  ने  मुझे गीतामानस की रचना के लिये प्रवृत्त किया /       
               श्रीमद् भगवद् गीता का पद्यानुवाद करना मेरे लियेकोई सहज कार्य नहीं था,तथापि परमात्मा की महतीअनुकम्पा पूर्वजों  के  आशीर्वाद , पूर्व  संचित  पुण्यों  और  पूज्य सन्तों ,महात्माओं के चरणों की कृपा से ही यह संभव हो सका /
                मेरे  पूज्य  पितामह श्री  रघुवरप्रसाद  जी  तिवारी बचपन में मुझसे सस्वर रामचरित मानस का गायन कराते थे ,वे ही  संस्कार  और  स्वर ताल मेरे हृदय को झंकृत करते रहे /कविता और संगीत में रुचि के कारण विभिन्न रागों ,विभिन्न छन्दों में प्रकृति,सौंदर्य ,श्रंगार आदि से जुडी लोकशैली के गीत तथा कवितायें भी मैने लिखीं /तत्पश्चात शिवस्तोत्र,दुर्गास्तुति,चौंसठ  योगिनी स्तुति , महाकाली  स्तुति, महाकाली आरती ,शारदा  स्तुति , नर्मदा  स्तुति , लक्ष्मी  स्तुति , गणेश स्तुति ,श्री हनुमान स्तुति,भजन  आदि रचनायें विविध छन्दों में पूर्ण हुईं /
              इसके बाद अचानक अन्तःकरण में अलौकिक दिव्य शक्ति की  प्रेरणा जागृत हुई / विचार  और  शव्द  संयोजन  की अपूर्व सामर्थ्य का आभास हुआ / संकल्पना शक्ति जागी , लगा कि शब्दब्रह्म के माध्यम से  ज्ञान , कर्म और भक्ति का विवेचन विश्व के  सम्मुख रखा जाये / उस परमप्रकाश पुंज के दिग्दर्शन में गीता का अनुपम  पीयूष  असंख्य  लोगों  में बाँटा जाये ,जो संजीवनी बन कर जन-जन के शुष्क ,संतृप्त और नीरस मानस में नव जीवन का  संचार  कर लौकिक तथा पारलौकिक सुख शान्ति प्रदान  करे तथा समाज में आध्यत्मिक एवं दार्शनिक चेतना जागृत कर सके / अतः मैं अपनी छुट पुट रचनाओं को विराम  दे , मूल  संस्कृत  भाषा  में रचित जन कल्याणकारी ,मोक्षदायी ,श्रीमद् भगवद् गीता का अमृत प्रसाद लोक रंजक सहजभाषा में श्रीरामचरितमानस की शैली तथा छन्दविधान में दोहा ,चौपाई ,छन्द ,सोरठा , सवैया आदि रूप में लाने के लिये ,चिंतन मनन करने लगा / अंतःकरण में बंशी के दिव्य स्वर का संधान होते  ही रोम -रोम पुलकित हो गया और मैं भीतर  उठते मनोभावों  को  लिपिबद्ध  करने लगा / भाव की अभिव्यक्ति में अवधी , बुन्देली  तथा  ब्रजभाषा के शब्दों का भी स्वभाविक रूप से प्रयोग हुआ /
            अन्तर्मन में उठती अनेक जिज्ञासाओं के समाधान तथा विचारों को सात्विक प्रवाह प्रदान करने में  मैंने  पूज्य स्वामी अड़गड़ानन्द जी  महाराज  को  मानस गुरु मान कर उनकी यथार्थ गीता कृति के माध्यम से अपना मार्ग प्रशस्त किया /
          यथार्थ  गीता  पढ़  कर  मन  ने  स्वीकार  किया  यह महाभारत चित्रण योग साधक का वृत्ति युद्ध है जिसे गीता के तेरहवें  श्लोक  में  स्पष्ट किया है कि यह शरीर ही वह क्षेत्र है /
अतःअर्थ के साथ प्रतीकात्मक पात्र भी दर्शाये गये  हैं /
            श्रीमद् भगवद् गीता  के  प्रति  भारतीय परम्परा का आकर्षण प्राचीनकाल  से रहा है / यही कारण  है कि  इस  पर लिखी गई  टीकाएँ , भाष्य , व्याख्यान , संसार की सर्वाधिक लोकप्रिय भाषाओं में उपलब्ध हैं /  यह स्थिति भारत के और एशिया महाद्वीप के अन्य किसी ग्रंथों की नहीं है / परिणामतः आज उसका अनुवाद  करने  वाले या  उसके  भाव  को  प्रगट करने  वाले   व्यक्ति के  सामने  वही  कठिनाई   आती है जो जगदगुरुआदिशंकराचार्य के सामने आई थी जिसको उन्होंने गीता  की  एक  विशेषता  के  रूप में कहा कि गीता का अर्थ जानना अत्यंत कठिन है उन्होंने कहा  है कि ;-
                                     ''गीता तत्त्वं परम दुर्विज्ञेयार्थम्''
           अतः मुझे भी गीता मानस के इस नये संस्करण को प्रस्तुत करते हुये दो कठिनाइयों का अनुभव हुआ कि  इतने विपुल सहित्य के सामने मैं  क्या छोड़ूँ और क्या लिखूँ  / 
                   श्रीमद् भगवद् गीता पर जो भी नये विचार और विश् लेषण अभी तक आयें हैं उनमें से किसका आश्रय लूँ /
                   इसके अतिरिक्त एक और दबाव मन  में रहा कि नये भावों को देते समय ऐसा न हो कि यह पूरा ग्रंथ  लोगों  के लिये कठिन हो जाये / इन सभी बातों को ध्यान में रख कर मैने
वर्तमान  संस्करण  में सरलता के साथ एक नये  दृष्टिकोण  को रखा है /
            मैं रामचरित मानस की लयबद्धता के बाहर नहीं आ सकता  और  आना  भी  नहीं  चाहता  अतः परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्द जी के विचारों को यथा  सम्भव  लयबद्ध  करके प्रस्तुत किया है / इसका यह अर्थ नहीं है कि भगवद् गीता के पूर्व  प्रचलित  पारम्परिक  अर्थों  की मैनें उपेक्षा की है बल्कि उनको  भी  गीता  मानस  में  यथा  स्थान दिया गया है / हो सकता  है   कहीं-कहीं  शास्त्रीय  और  संस्कृतनिष्ठ  शब्दों  के यथावत  प्रयोग  की  विवशता  वश  लयबद्धता में कुछ बाधा उत्पन्न हुई हो किन्तु गीता के मूल स्वर या भाव  की  उपेक्षा कहीं भी नहीं  हुई है  ऐसा प्रयत्न किया गया है /
        यह मेरा विचार है कि  गीता मानस का पाठ लोगों को रुचिकर लगेगा और वे उसका सस्वर गायन कर आनन्द का अनुभव करेंगे /
          गीता मानस के अन्त में शब्द संकेत ,कठिन शब्दों के भावार्थ हेतु दिये गये  हैं , ताकि  पाठक  आसानी  से  भावार्थ  समझ सकें / अध्याय  का  सार  एवं  मीमांसा की अभिव्यक्ति तिरछेअक्षरों में की गई है /

                      // श्रीकृष्णार्पणमस्तु //  
                 
                                                                                                                                                                                                               डॉ उदयभानुतिवारी ''मधुकर''

Monday, May 4, 2015

            श्री विष्णु स्तवन

शान्ताकारं      भुजगशयनं    पद्मनाभं    सुरेशं, 
विश्वाधारं      गगनसदृशं      मेघवर्णं     शुभाङ्गम्  / 
लक्ष्मीकान्तं      कमलनयनं    योगिभिर्ध्यानगम्यं, 
वन्दे      विष्णुं       भवभयहरं     सर्वलोकैकनाथम् //

यं   ब्रह्मा   वरुणेन्द्रमरुतः  स्तुन्वन्ति  दिव्यैः  स्तवै, 
र्वेदैः   साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति    यं   सामगाः //
ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो, 
यस्यान्तं  न  विदुः  सुरासुरगणा  देवाय  तस्मै नमः //
                                    प्रेरणा 
दोहा;-
रस   छन्दों    में   बाँधने ,  गीता   के   उपदेश /
कैसे   आई    प्रेंरणा ,  कवि   के   ह्रदय  प्रदेश //
पढ़ यथार्थ गीता विमल ,मनहिं मिला सन्देश /
हो जाओ सदगुरु  शरण ,  मेटहिं  दुख  योगेश //
चौपाई;-
जबसे  गुरु  अनुकम्पा   पाई / ॐ  नाद   स्वर   गूँज  समाई //
उदित ज्ञान रवि कीन्ह  प्रकाशा / संसृति मूल  अविद्या नाशा // 
जाबालीऋषि आश्रम पावन / गुप्त  गुफा  जहँ  परम सुहावन //
ज्योतिर्लिंगों  में  शिव  धामा / स्वयं  प्रकट  गुप्तेसवर नामा //
एकदिवस तेहि मन्दिर जाई / कीन्ह प्रणाम शिवहिं मनलाई //
शब्दब्रह्म में मन अनुरागा / विकसे कवि कृति कुसुम तड़ागा //
उठी  प्रथम   स्तोत्र   तरंगा /  बही   स्तवन   निर्मल   गंगा //
शिव प्रेरित शारद हिय आई / शब्द सलिल सरि दीन्ह बहाई //
उमा , रमा ,जननी   ब्रह्माणी / पवनतनय,  काली महारानी //
गणपति,सिद्ध ब्रह्ममयजानी / सबकी स्तुति कर निजवाणी //
पुनि रेवापद वन्दन कीन्हा / श्रेष्ठ काव्य में  गीतहिं  चीन्हा //
भृगुआश्रम  प्रभु  प्रेरि  पठावा / जहँ  योगेश्वर  दर्शन  पावा //
मन सदगुरु चिंतन में लागा / गीतामृत रस बरसन  लागा //
छन्द, सोरठा सुन्दर  दोहा / कवित  सवैयों  ने  मन  मोहा //
चौपाई  अति   सरस   सुहाई /  वह  तरंग  वाणी  में  आई //
जो छन्दों में रस बरसाये / चुन चुन मधुकर  शब्द  सजाये //
सरस भाव  मानस  से  आई / सो   गीता मानस  कहलाई //
दोहा;-  
यंत्ररूप  यह  देह है , अभियन्ता करतार /
निज को करता मानता ,मायावी संसार //
                                    ॐ 
                        श्री सदगुरुदेवाय नमः
        //अनंत श्री विभूषित परमहंस स्वामीअड़गदानन्दजीमहाराज//
                 गुरु वंदना 
गुरु बिन ज्ञान  न  कोई  पाये  / बिना  ज्ञान  वैराग्य  न आये //
सो  सदगुरु  श्री  पद्मपरागा / वन्दहुँ  प्रथम  सहित  अनुरागा //
गुणागार गुरु   ज्ञान  प्रकाशा / दे  सतसंगति  रखहु  सकासा //
कर यथार्थ गीतामृत पाना / जिय निज  मानसगुरु पहचाना //
ज्ञान  प्रकाश  किरण  गुरु  दीजै / चित्त ब्रह्म में  स्थित  कीजै //
ब्रह्म  ज्ञान में  चित  अनुरागे/ निर्गुण पंथ मोहिं  प्रिय  लागे //
जेहि गुरुकृपा दृष्टि मिल जाये/  मोह निशा से सो जग जाये //
स्वामी  अड़गड़   नाम  अनूपा /  हे गुरु  देवा  ब्रह्म  स्वरूपा //
ब्रह्म ध्यानमय सदगुरु स्वामी / कृपासिंधु    हे   अन्तर्यामी //
तुम बिन यह भव सिंधु  अगाधा / पार न पाऊँ उपजे बाधा //  
गुरुवर चरण शरण में लीजै / भव से मुक्ति मन्त्र मोहिं दीजै //
मंगल मूरति छवि हिय भाई / प्रभु दरशन अमोघ फल दाई //
तव यथार्थ गीता कृति पाई / काव्यसरित हियसे झिरआई //
गीता मानस जेहि कर नामा / सो भवतारिणि मातु प्रणाम //

दोहा;-     
पूरणकर गुरु वंदना , निज  मन मुकुर सुधारि /
हिय बन्दहुँ पुनि जगदगुरु , महादेव  त्रिपुरारि //
करहु कृपा ह्रद-सरिकमल, विकसै पाय प्रकाश /
''उदय भृंग'' मकरंद रस , पियै  कटैं भाव पाश //    
​                                     
             //श्री योगेस्वराय नमः//
 //अनन्त श्री विभूषित योगीराजश्री स्वामी जगमित्रानन्द जी महाराज //  
                      श्रीयोगेश्वर वन्दना 
दोहा;- 
रेवातट  तपस्थली , जिनका   पावन  धाम /
सो जगमित्रानन्द गुरु,स्वामी करहुँ प्रणाम//

चौपाई ;- 
चन कहे अस त्रिभुवन भूपा / योगी मम प्रत्यक्ष स्वरूपा //
सो हे प्रभु  योगेश्वर  देवा /  विनवहुँ  कर  पद पंकज सेवा //
मागहुँ योगिराज  कर  जोरे  /  कीजै  सिद्ध  मनोरथ मोरे //
सर्व शास्त्र रस भगवत  गीता / चाहौं ब्रह्मज्ञान नवनीता //      
मोपर कृपा  करहु  हे स्वामी / ध्यानगम्य  हे अन्तर्यामी //
गीताज्ञान विमलअति गूढ़ा/करत काव्यमय यहमनमूढ़ा //
मानसकृति की धुन मनभाई / सो तरंग हिय गई समाई //
ज्ञानप्रकाश ह्रदय में  कीजै / कृति में गीतामृत भर दीजै //
सुनत ह्रदय उपजैअनुरागा / जायमोह,तम होय विरागा //
जो अनुकंपा गुरु की  पाऊँ / तो हरिकृपा अवस पाजाऊँ //   
होयविमलमति हरिगुणगावे/ सुमिरतशारद हियमेंआवे //
उदयभानु मानसकवि जागे / हिय शाश्वतरसमें अनुरागे //

दोहा;- 
स्वर तरंग में गूँजती , रागिनि  रहीं  समाय /                       
गुरुवर आशिष दीजिये,ज्ञानकलश भर जाय //
                    गीता मानस मंगला चरण 
दोहा;- 
करहुँ  वंदना  ध्यान  धर , बुद्धि  निधान  गणेश /
थाम  रहा  हूँ  लेखनी  , हरहु  विघ्न भ्रम क्लेश //
 
सुमिर    बुलाऊँ    शारदे   ,  मति  मेरी  नादान /
काव्य  शास्त्र  के  ज्ञान  से ,  माँ  मैं हूँ अनजान //

अगम काव्य के सिंधु में ,  शव्द चयन का ज्ञान /
मुझ  को  आय  कराइये ,  रह  कर  अन्तर्ध्यान //

तत्त्व  ज्ञान  के  सरित  की ,  पावन निर्मल धार /
मेरे    ह्रदय    बहाइये   , भर   गीता   का   सार //

भगवत   गीता  ज्ञान  का  ,  कृष्णार्जुन   संवाद /
छन्द    बद्ध     करने   चला  ,  कीजै   अन्तर्नाद //

गुरु  पितु  मातु  सुमीत  तुम ,  वासुदेव  हे  नाथ /
पथ  दर्शक  बन   नित्य   हरि , रहिये  मेरे  साथ //

दिव्य  ज्ञान  की ज्योति प्रभु ,मुझ को करें प्रदान /
पुलकित तन मन कर रहा ,हर क्षण तव गुणगान //

सर्वदेव  सुमिरन  करहुँ  , सब  मिलि  होहु सहाय /
गीत  कलश  में सिंधु सा  , गीता  काव्य  समाय //

बन्दहुँ  सब  कर  जोरि  जुग , प्रेत पितर गन्धर्व / 
चलें   झूमती   रागनी  ,   रहहु    सहायक   सर्व //

चौपाई;-
बह  कर  चली  ज्ञान  की गंगा /  कर  स्नान  मोह  हो  भंगा //
उघरेंपटल भगतिपथमति के/ सुगम मार्गहों तब सदगति के //
जब हरि में यह मन अनुरागे / अन्तःकरण  शक्ति  तब जागे //
सुख दुःख दोनों  कर्म  धरोहर /  पुण्य कर्म  सत्कर्म  मनोहर //

कर्म  क्षेत्र  की  भूमि  यही  है / वेद , शास्त्र  ने  बात  कही  है //
जैसा  कर्म  करेगा  प्राणी  /  वैसी  होय  बुद्धि,  मन ,  वाणी //

दोहा;- 
जब  जब  पाप  पहाड़  से , बढ़े   भूमि का भार /
हर  युग  में   भगवान हरि ,  लेते  हैं   अवतार //

धर्म -युद्ध  रण-क्षेत्र  में  , कर  अधर्म  का  नाश /
ज्ञान ज्योति  से  विश्व  में , करते  धर्म  प्रकाश //

तासु प्रकाशित ज्योति से ,लेकर विमल प्रकाश /
निज कृति  में  भरने  चला , पूरण  कीजै  आश //
    
चौपाई;-
नहिं कवि प्रवर न चतुर कहाऊँ/ काव्यकलश धर तुम्हेंमनाऊँ //
हे  माँ  शारद  ह्रदय  समाजा /  वरद  हस्त  दे  भाव  जगाजा //
ऋद्धि  सिद्धि  सँग  हे  गणराजा / आजाओ  पूरण  हों  काजा //
काव्यकठिन प्रभु कलम चलाओ/ गीतामानस आ लिखवाओ //
बुद्धि   परे  यह  ज्ञान  पुनीता  /  मैं  अज्ञानी  भाव  विनीता //
प्रभुपदपंकज रज धरि शीशा/ सुमिरहुँ ज्ञान निधान कपीशा //
पंथ प्रदर्शक तुम  तुलसी  के / दिग्दर्शक तुम भक्ति वशी के //
अर्जुन रथ की ध्वजा समाये /  प्रभु उपदेश  श्रवण  में आये //
सो   गीता  अमृत उपदेशा /  ध्वनि  गूँजे मम ह्रदय प्रदेशा //
हे कपि हिय में आन समाओ /  गीता मानस  पूर्ण  कराओ //

दोहा;-
देव दनुज नर किन्नरहिं ,कहहुँ युगल कर जोरि /
क्षमहु दोष मम छंद के , समझ  मंद मति मोरि //

                            उदयभानु तिवारी ''मधुकर"
                    विषय प्रणयन 
दोहा;-
कुरुक्षेत्र रण  भूमि में , निज  मुख  श्री भगवान / 
भक्त जानि अतिपरमप्रिय, दिया पार्थ को ज्ञान //
जेहि पुराणमुनि व्यास ने, अन्तः में कर ध्यान /
लिखा  लोक कल्याण हित, गीता शास्त्र महान //
सो   अद्वैत   विवेचनी  ,  सुधा  वर्षिणी  अम्ब /
अष्टादश  अध्याय   से  , युक्त  योग  अवलम्ब //
हे जग तारिणि भगवती , गीता मन अभिराम /
तव चिंतनकर ध्यानमें,पुनि पुनि करहुँ प्रणाम //

चौपाई;- 
सुरभित सरसिज नयन विशाला / श्रेष्ठबुद्धि  हे व्यास कृपाला // 
पुनि पुनि बन्दहुँ पद मुनि राया/नमन करत मन अतिहर्षाया //
तेलपूर्ण दीपक भारत में  / ज्ञान  प्रकाश  किया जन हित  में //
भक्त   कल्पतरु   अन्तर्यामी /  ज्ञान भाव  स्थित  हे  स्वामी //
गीता   अमृत   दोहन  कर्ता  / करहुँ  प्रणाम  कृष्ण जगभर्ता //
हे   वसुदेवपुत्र   यदुनंदन  /   कंस   और   चाणूर   निकन्दन //
मातु    देवकी   आनँद   दाता / जगदगुरु  हे   त्रिभुवन  त्राता //
जयजयजय तिरुपति योगेस्वर/ तुमहिं प्रणाम करहुँ विश्वेश्वर //
भीम,द्रोण तट रण सरिता के/ अति अगाधजल जयद्रथ जाके //
कुटिल मीन  गाँधार  नरेशा / शल्य  ग्राह  रण सरित  प्रदेशा //
कृपाचार्य तेहि  सरि की धारा /  कर्ण  उफान  महा  बरिआरा //
घोर मकर जिमि अतिबलधामा/ जहँ विकर्णअरु अश्वत्थामा //
दुर्योधन   है  भवँर  विशाला  /  डूबे  जिसमें  सकल  नृपाला //
सो  रण  सरिता  दुर्गम भारी  / नाविक जिसके कृष्ण मुरारी //

दोहा;-
निश्चय सो सरि  लाँघेउ , सहजहिं  पाण्डु  प्रवीर /
करहिं  सुरक्षा  भक्त  की , नित्य  कृष्ण  यदुवीर //
शब्द व्यास के अति विमल , पद्म समान सुगंध /
जिससे गीता तत्त्व  की, निकले अति शुचि गंध //
    
चौपाई;-
भिन्न भिन्न अति सरस प्रसंगा / जिसके केशर,हरिरसरंगा //
कथा ब्रह्म की ज्ञान विकाशा / श्रवण करत हिय करे प्रकाशा //
मुदमंगलमन सज्जनवृन्दा / पियहिं मधुपबन रसमकरन्दा //
सो   भारत-पंकज   अघहारी  /  है   कल्याणी   मंगलकारी // 
मूक कृपा से जिसकी बोले /  पंगु  चढें  गिरिवर बिन डोले //
ऐसे  परमानन्द  प्रदायक / श्रीकृष्ण प्रभु  त्रिभुवन  नायक //
  
दोहा;-
उन्हें करूँ पुनि पुनि नमन,चरण कमल धरि शीश /
कृपादृष्टि   प्रभु   कीजिये ,  विनय  करूँ  जगदीश //
                      यथा-अर्थ विवेचन 
दोहा;- 
पूज्य अड़गड़ानन्द गुरु, गीता ज्ञान निधान /
जिनके गीताभाष्य को,मिला विश्व सम्मान //
दे यथार्थ गीता किया ,गुरु ने जन कल्याण /
भगवत गीता ज्ञान का  , करूँ  छंद में गान // 
         श्री कृष्ण ,सत्य, सनातन
दोहा;-  
योगेश्वर  श्रीकृष्ण  हैं ,  आत्मा  ही  है सत्य /
परमात्मा अरु आत्मा,उभय सनातन नित्य //

                    सनातनधर्म
दोहा;-  
परमब्रह्म  से  जो  क्रिया ,  करवाये  संलग्न /
वही ''सनातनधर्म'' है,साधक रहहिं निमग्न //

                          युद्ध
दोहा;- 
दैव   आसुरी  वृतियाँ , जब   करतीं   संघर्ष /
''युद्ध''  उसे  ही  जानिये , रहिये रहितअमर्ष //
   
                     युद्धस्थल
दोहा;- 
सर्वेंद्रिय अरु मन सहित ,मनुज रूप यह देह /
कुरुक्षेत्र  की  भूमि  है , करहु  न  मन  संदेह //

                        ज्ञान 
चौपाई;-       
जासु काम,मद,मोह  नशाये / अन्तर्मन  हरि  में  रम  जाये //
प्रभु व्यापक देखे निज ध्याना/ तब जानो हिय उपजाज्ञाना //
  
                                   योग 
चौपाई ;-
भवसंयोग,वियोग विहीना / वह अव्यक्त  ब्रह्म  अविछीना //
वेद न थकें जासु गुणगाये / तासुमिलन ही योग कहाये //
    
                                ज्ञानयोग
चौपाई ;- 
ब्रह्म भजन जप तप आराधन/ ये भव मुक्ति कर्म संसाधन //  
जब निजपर ही निर्भर रहकर /कर्म प्रवृत्त होय जो भी नर //
''ज्ञानयोग''वह मार्ग कहाये /निजआश्रित जब सिद्धी पाये //

                           निष्काम कर्मयोग 
चौपाई;-   
अर्पण कर तन मन अरु वाणी/ प्रभु आश्रितहोकर जो प्राणी //
करे कर्म जब निस्पृह रह कर / कहें उसे ''निष्कामकर्म''नर//

                    श्रीकृष्ण द्वारा प्रदर्शित सत्य
चौपाई;-
तत्त्वदर्शियों   ने   जो   देखा  / आगे  देखेंगे    मुनि   भेखा //

दोहा;-
 वही सत्य श्रीकृष्ण ने , पार्थहिं कहा सुनाय /
ब्रह्म अनुरागी ध्यान में, तत्त्व ज्ञान पा जाय //

                                  यज्ञ
दोहा;- 
परमब्रह्म  साधन  विधि , जहाँ  चित्त  रमजाय /
उस विशेषविधि को कहें ''यज्ञ''विज्ञसमुदाय //

                                  कर्म
चौपाई;- 
जब यह यज्ञ क्रिया  में आये / तब वह क्रिया''कर्म''कहलाये //

                                  वर्ण
चौपाई;- 
''वर्ण'' कर्म श्रेणी चत्वारा / साधक  की  स्थिति अनुसारा //  
परमोत्तम, उत्तम, अरु मध्यम/साधक सेवा कर्म निम्नतम //

                               वर्णसंकर
चौपाई;-    
जब साधक मति में भ्रम आये/ साधन पथसे च्युत होजाये //
वही ''वर्णसंकर'' जिय जानो / शाश्वत  सत्य  इसे ही  मानो //

                          मनुष्य की श्रेणी
चौपाई;- 
अंतःकरण स्वाभाव  अनुसारा / दो मानव स्तर संसारा //
एक  मनुज  हैं  देव   समाना / दूजे आसुरवृत्ति  प्रधाना //
ये दो मनुज जातियाँ जानो/ इन्हें स्वभावों से पहचानो //

                                देवता
दोहा;- 
प्रभुता जो निज इष्ट की ,हिय में करे प्रदान /
गुण के उस समुदाय को,उदय ''देवता''जान //

                              अवतार
चौपाई;-     
जो ज्ञानी निज में जग पेखे / हरि ''अवतार''ह्रदय में देखे //
भौतिक दृष्टि  न  दर्शन पाये / देखें  योगी  ध्यान लगाये //

                          विराट दर्शन
चौपाई;-     
चौपाई;-    
दिव्यदृष्टि जिसको मिल जाये/ वह ''विराटदर्शन''पा जाये //
नेत्रज्योति जब प्रभु बनजायें/ हियअनुभूति भक्त करपायें //

                         पूज्यनीय देव
परमपूज्य    वह   ब्रह्म  अनूपा  /  वही  इष्ट  है देव स्वरूपा //
खोजहु तेहि कर ह्रदय  प्रवेशा / बसे नित्य सबके हियदेशा //  
जो अव्यक्त रूप  में  स्थित / उस योगी  में  ब्रह्म  प्रतिष्ठित //
श्रीहरिप्राप्तिस्रोत वह ध्यानी/ जेहि सदगुरु कहते सबज्ञानी //

दोहा;- 
इससे जितने योगिजन , करके  सबहिं  प्रणाम /
पुनि ''मधुकर''योगेश्वरहिं, भजहु भाव निष्काम //     
                         जीवन ही महाभारत 

महाभारत केसमयकुरुक्षेत्रमें  भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा  प्रिय सखा अर्जुन  को  दिए गए  गीता  उपदेश  का  जो  तात्विक विवेचन पूज्य स्वामी श्री अड़गड़ानन्द जी महाराज ने किया
है  उस व्याख्यानुसार यदि  चिंतन  किया  जाये तो  दैहिक जगत में सभी महाभारत के पात्रों की अनुभूति योग साधना
में रत योगी  पुरुष को दैव और आसुरीवृत्ति के अन्तर्द्वन्द्व से परिलक्षित होती है/

दोहा;- 
कुरुक्षेत्र  के  युद्ध  के  ,  महारथी  बलवान  / 
निजअन्तरपट खोलिये,लीजै सब पहचान //
मानुष तन कुरुक्षेत्र है , कौरव  असुरपृवृत्ति /
पाण्डव दैवी सम्पदा , पाण्डु पुण्य की वृत्ति //
कुन्ती है कर्तव्य अरु, भ्रमही भीष्म महान /
धर्म युधिष्ठिर जानिये ,भाव भीम बलवान //

चौपाई;-
अर्जुनहै   मनकर  अनुरागा /  ब्रह्मज्ञान  जेहि  रुचिकर लागा //
नियम   नकुल  सत्सँग  सहदेवा /  द्वैताचार   द्रोण  गुरुदेवा //
मनःशक्तिही अश्वत्थामा / सात्विकता  का  सात्यकि नामा //
नृप धृतराष्ट्र   ह्रदय   अज्ञाना /  दुर्योधन   है   मोह  प्रधाना // 
नरप्रवृत्ति   इन्द्रिय  आधारी  /  कुरुनृपसहचारिणि गाँधारी // 
जो   कर्तव्य  कर्म   के  द्वारा / जीते  यह   भवसिंधु अपारा //
कुन्तिभोज  सोई   नृपज्ञानी /  विदुरजीव  काया लिपटानी //
इतरकर्म  ही   कर्णस्वरूपा / अरु  कुबुद्धि   दुश्शासन  रूपा //
शाश्वतपद  का  जो  अनुरागी / सो  मन धृष्टद्युम्न बैरागी // 
पुण्यवृत्तियों का  वह  नायक / धर्मयुद्ध  सेना  अधिनायक // 
इन्द्रियविषयरागपरित्यागा/ सोईकपिध्वज प्रगटविरागा //

दोहा;- 
काशीनृप तन शक्ति अरु ,वीर विकर्णविकल्प /
कृपाचार्य  वह कृपाचरण,जासु साधना अल्प //
चौपाई;-
दिव्यदृष्टि जिससे मिल जाये/ वहसंयम संजय कहलाये // 
परमब्रह्म  में चित्त  रमाये  / महेश्वास  नृप स्थिति पाये //
व्याप्तब्रह्म जग में धृतिधारे / वहविराटनृप भाव निहारे //    
अचलसुस्थिति जब नर पाये/ महारथीनृपद्रुपद कहाये //
दृढ़कर्त्तव्य कर्मरतध्यानी / धृष्टकेतु नृप सम सो ज्ञानी //
मन को खींच इष्टमें लाये / चेकितान  नृप पदवी पाये //
कारण,सूक्ष्म,स्थूलशरीरा/ विजयकरे सो पुरुजितवीरा //
सत्यआचरणयुक्त अमानी / नर मेंश्रेष्ठ शैव्यनृप ज्ञानी //
भ्रममयभूरिश्रवा निजश्वासा/ बहिर्प्रवाह प्रधानसुपासा //
शिखासूत्रपरित्याग शिखण्डी/ लक्ष्यप्रतीक महाबरबंडी // 
युधअनुरूप विचार बनाये / युधामन्यु की स्थिति पाये //
शुभकीमस्ती कर्म कराये/ उत्तमौजनृप छवि दिखलाये // 
जबवहशुभ बनजाय अधारा/ होअभिमन्यु अभय बरिआरा //
वही सुभद्रासुत सम वीरा / ध्यानयोग स्थित मतिधीरा //

दोहा;-
ध्यानरूप   है  द्रोपदी  ,   पांच  पुत्र  ये  जान /
सुह्रद ,सौम्य,लावण्यता,दृढ़,वात्सल्य महान //

Sunday, May 3, 2015

                         ॐ श्रीपरमात्मने नमः

                 श्रीमद् भगवद् गीता माहात्म्य

चौपाई;- 
अति सुपुनीत शास्त्र यह गीता /नित्य पढ़हिं जो भक्त सप्रीता //
विष्णु अमरपद हरि का पावें/भवभय,दुख तेहिनिकट न आवें//
जो  निशिदिन  यह गीता  गाये/ प्राणायाम सविधि अपनाये//
वर्तमान अरु पूर्व जन्म के  / विनशहिं  पाप  दोष  सब उनके//
जिमि निर्मलजल से कर मज्जन/तनकी शुद्धि करहिं साधकजन//   
वैसे ही गीता  जल  पावन / जगत अशुद्धि  विकार नशावन//
गीता मानस पढ़े विचारे / भाव  सहित  फिर  मन  में  धारे//
यह कर्तव्य कर्म निज जानी / करे  अवश्य  पुरुष जो ज्ञानी//
पद्मनाभ हरिमुख से निःसृत/ जिससे है यह विश्व प्रकाशित//    
उसमें जो ज्ञानी  रम जाये /  उसे  न  अन्य शास्त्र मन भाये//
कुन्तीसुतहिं भक्त निज जानी / गूढ़ तत्त्व हरि कहा बखानी//
अमियरूप गीता गंगाजल  / पान करे सो मति  हो निर्मल//
दिव्य  पुरुष  में  जाय  समाये / मुक्ति  पुनर्जन्मों  से  पाये//
सर्वोपनिषद धेनु यह गीता / तासु अमियपय परम पुनीता//
अर्जुन वत्स कीन्ह पय पाना/ दोहक स्वयं कृष्णभगवाना//      
गीतामृत पयपियहिं सुधीरा/होय विमलमति विरुजशरीरा//

दोहा;-
देवकी नन्दन कृष्ण ने ,निज मुख किया बखान //
एकमेव  सब   शास्त्र   में ,  गीता  शास्त्र  महान //
योगेश्वर    श्रीकृष्ण   ही ,  सब   देवों   के   देव /
महामंत्र   यह   नाम   है ,  देव   न   जाने  भेव //
कर्म  एक  ही  श्रेष्ठ  है  ,  ॐ   कृष्ण  का   जाप /
''उदयभानु''  उस  ब्रह्म  को, भजे  मिटें भव ताप //    
                                प्रार्थना
दोहा;-
जय जय जय हे जगदगुरु,शक्ति विभूति निधान /
ज्योतिपुञ्ज     आनंदमय  , वासुदेव   भगवान //

चौपाई;- 
तुमही  आदि पुरुष भगवंता  / अगुन अनीह अनूप अनन्ता //
तत्त्वरूप व्यापक अवनाशी/अजम्  अनादि सकल सुखराशी //
एकाक्षर  ओंकार   स्वरूपा  /  निर्विकार    अव्यक्त   अरूपा //
सब  ब्रह्माण्ड   लोक  के  स्वामी  /  विश्वरूप  हे  अन्तर्यामी //
तुमही  परमब्रह्म  परमेश्वर / तुमही  ब्रह्मा ,  विष्णु , महेश्वर //
तुमही  जग  के  उद्भव  कर्ता / धारक , पालक अरु संहर्ता//
सब हिय स्थित हे अखिलेश्वर/ करहुँ प्रणाम तुमहिं योगेश्वर//
दिव्य   प्रकाश  ह्रदय  में  कीजै  / ब्रह्मज्ञान  रस से भर दीजै//
पत्र,पुष्प,फल करके अर्पण /कर यह जीवन तुमहिं समर्पण//
ॐ ॐ जप ध्यान लगाऊँ / सगुन स्वरुप  ह्रदय  में  ध्याऊँ//

दोहा;-
नाम   पुष्प   बहु   आपके ,  उनमें   ॐ  महान /
पी पी मधुकर अमिय रस,करे नित्य गुण  गान //
हिय दर्शन की आश प्रभु,पुनि पुनि करहुँ निहोर /
भक्त  जानि  सदगुरु  करहु , पूर्ण  मनोरथ  मोर /
जग  जन्मूँ जब लगि  तुमहिं , पाऊँ  गुरु के रूप /
पाजाऊँ  प्रभु अन्त   में ,  तव  अव्यक्त  स्वरुप //           
    
                                       उदयभानुतिवारी ''मधुकर''
                               श्रीकृष्ण स्तुति
सवैया;- 
मात पिता अरु ,बन्धु  तुम्हीं,तुमही गुरुदेव  सुमीत  हमारे /
श्रेष्ठ तुम्हीँ सब देवन  में, सर्वज्ञ  हे  देवकी  नन्दन   प्यारे //
तारनहार   तुम्हीं   सबके ,  श्रीकृष्ण  सुदर्शनचक्र   सम्हारे /
आन बसो हिय में विकसैं  ,सब पंकज भाव प्रकाश तुम्हारे //

दोहा;-
अटल नीति दृढ़ प्रीति  की ,  मूर्ति  द्धारकाधीश /
करहुँ तुम्हें शत शत नमन, विश्वदीप्ति  सुर ईश //
विद्या, बुद्धि, विवेक तुम , तुम्हीं  द्रविण करतार /
जय  जय  जय हे  जगतपति , कीजै  भव  से पार //

                        पं० उदयभानु तिवारी "मधुकर"
                        ॐ परमात्मने नमः
                                   आवाहन
सोरठा;- 
सिद्धि   सुमिरतहिं   होय,  सर्व  रूप निर्गुण सगुण /
बुद्धि  विनायक  सोइ ,  भक्त  हेतु  प्रगटहिं  भुवन //
   
शक्ति विभूति निधान,विमल बुद्धि शुभ गुण सदन /
करहिं  जासु  गुण  गान ,  वेद ,  शारदा ,  देवगण //

सो    योगेश्वर     रूप   ,  ब्रह्म   सच्चिदानंदघन /
ह्रदय  बसहु  सुरभूप, शंख , चक्र , गद ,पद्म धर //

अदभुत  रूप   निहार  ,  करूँ  वन्दना  ध्यान  धर /
द्रवहु  विश्व   करतार , विनवहुँ  प्रभु  कर जोरिकर //

मोपर  कीजै   छोहु  ,  नर   नारायण   पार्थ   हरि /
कबहुँ  घटै  जनि  नेहु , मागहुँ  गहि  पद  पंकरुह //

बन्दहुँ मुनिपदकंज , सिद्ध शिरोमणि व्यास मुनि /
भगवत गीता दीन्ह , भव तारणि कलिमल हरनि //

बन्दहुँ  सदगुरुदेव ,  पदपंकज   रज   शीश   धरि /
रचवायहु   गुरुदेव  ,  गीता  मानस  जगत   हित //

प्रणवहुँ पवन कुमार , भक्त  शिरोमणि ज्ञान निधि /
विमल  बुद्धि  आधार , काव्यरूप  कलिमल  दहन //
दोहा;- 
विश्वरूप भूदेव सब,निज निज  अासन  लेहु /
वरणहुँ,गीता ज्ञान अब,विमल बुद्धि वर देहु //                
                
                  श्री मद् भगवद् गीता

           श्री भगदगीता काव्यामृत अथ

                     प्रथमो अध्याय
दोहा;-
प्रथमहिं कर गुरु वंदना, हिय धरि  श्री  योगेश /
रचहुँ  काव्य  रस धार में  , गीतामृत  उपदेश //

                       धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक;-
धर्मक्षेत्रे   कुरुक्षेत्रे    समवेता    युयुत्सवः / 
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय //१//

चौपाई;
उत्कंठित   हो  पूछते , कुरु   धृतराष्ट्र   नृपाल /
कहु   संजय   विस्तार  से , कुरुक्षेत्र  का  हाल //
धर्म भूमि  कुरुक्षेत्र में , मम  सुत  पाण्डव वीर /
युद्ध भावना  से   जुडे  , सैन्य  सहित  रणधीर //
अपना उस रणक्षेत्र  में , केंद्रित  करके  ध्यान /
उभय पक्ष ने क्या किया ,वह सब करो बखान //
चौपाई;-
यह तन क्षेत्र प्रकृति गुणखानी /पञ्चतत्व इसकेनिर्माणी //
दैव   सम्पदा   की  जो  गेही  /  धर्मक्षेत्र  सोई   नर  देही // 
पार्थहिं केशव ने  समझाया / इस तन  को ही क्षेत्र बताया //
     
श्लोक;-
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते /
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः//

चौपाई;-
दैव सम्पदा  पाण्डव  वीरा / कौरव  आसुर  वृत्ति  प्रवीरा //
देह पिंड  इन कर आधारा / वृत्ति  युद्ध  महाभारत  सारा // 
धर्मक्षेत्र आत्मा  का जानो / यह तन  कुरुक्षेत्र  पहचानो //
मुक्ति  उपाय  क्षेत्र से  जाने / वे  क्षेत्रज्ञ   सुविज्ञ  सयाने //
मन में सदगुणसंगति निखरे /युद्धक्षेत्र  में  साधक उतरे // 
दोहा;- 
युद्ध क्षेत्र क्षेत्रज्ञ का, सम्मुख लखे न कोय /
दैव  आसुरी  वृत्ति   में, युद्ध  निरंतर होय //
बहु जन्मों की साधना,विप्र वर्ण  में लाय /
मुक्ति दिलाये क्षेत्र से,भव बंधन कट जाय //
अज्ञानी धृतराष्ट्र मन,मोह विकार अधीन /
देख न पाये सत्य को ,हुआ  दृष्टि से हीन //
युद्ध क्षेत्र , क्षेत्रज्ञ  का , संयम  लेता जान /
कहो हुआ  क्या युद्ध में , पूछ रहा अज्ञान //
  
                    संजय उवाच 
श्लोक;- 
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा /
आचार्यमुपसङ्गम्य  राजा   वचनमब्रवीत् //२// 

चौपाई;- 
सुन संजय ने ध्यान लगाया / जो  देखा सब  नृपहिं  सुनाया //
व्यूह बद्ध पाण्डव दल सारा / देख  तुरग,गज,   रथ असवारा //
द्रोण  निकट  दुर्योधन  आये / गुरुवर   को  ये  वचन सुनाये //

द्वैताचार  द्रोण द्विज शिक्षक /उभय वृत्ति बिच ज्ञान प्रशिक्षक //
मैं हूँ भिन्न , भिन्न जगदीश्वर /भाव  जगे  साधक  के अंदर //
यही द्वैत का भान  कराये  / ब्रम्ह  प्राप्ति  हित मन  अकुलाये //
तब मन करत फिरत गुरु शोधा /उभयवृत्ति बिच प्रथम पुरोधा //

जो  दे प्रथम  ज्ञान  की  दीक्षा /वही  द्रोण गुरु की  है शिक्षा //
आगे  जो  गुरु  योग  सिखाये  / योगेश्वर  सदगुरु  कहलाये //
ब्रम्ह स्थित जब  मन हो  जाये /  तब  अद्वैत  भाव  वह पाये //
हो   जाये  मन  एकाकारा /  लखे  ब्रम्हमय   यह  जग सारा //

आत्मिक  धन  स्थिर  जिज्ञासी /दूषित करे मोह  अघराशी //
सकल व्याधि कर मूल विमोहा / मत्सर,लोभ,काम अरु कोहा / 
यही प्रकृति की ओर लुभायें /आत्मिक धन में दोष जगायें //

दोहा;- 
पुण्य प्रवाहित संगठित ,सजातीय चैतन्य /
व्यूह  बद्ध सेना निरखि , दैवसम्पदा जन्य //
मोह रूप दुर्योधन ,निज गुरु सम्मुख जाय /
द्वैतभाव  गुरु  द्रोण  से  ,  कहता  है हर्षाय //

श्लोक;- 
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् 
व्यूढां  द्रुपदपुत्रेण   तव  शिष्येण  धीमता //३//     
     
 चौपाई;-  
 धृष्टद्युम्न प्रिय पुत्र  द्रुपद के  / बुद्धिनिधान  शिष्य  गुरुवर के //
 पाण्डव   सेना   व्यूहाकारा  /  हुई   व्यवस्थित  उनके  द्वारा //
 उनकी  यह  सेना  अति भारी  /  देखहु  गुरुवर  दृष्टि पसारी // 
   
शाश्वत अचल सुस्थिति आये / द्रुपद महारथ  नृप  पद पाये //
तासुतनय शाश्वत पदसाधक /धृष्टद्युम्न सो  दृढ़मन  साधक //
दैवी  सम्पद  सैन्य  प्रधाना /युद्ध निपुण वह शिष्य सुजाना //
जिससे  सैन्य  व्यवस्थित  सारी / वृत्ति युद्ध की यह तैयारी //

श्लोक;- 
अत्र शूरामहेष्वासा    भीमार्जुनसमायुधि /
युयुधानो    विराटश्च    द्रुपदश्च   महारथः//४//
धृतकेतुश्चेकितानः  काशीराजश्च वीर्यवान /
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च   शैव्यश्च  नरपुंगवः//५//
युधामन्युश्च विक्रांत उत्तमौजाश्च वीर्यवान्/
सौभद्रो   द्रौपदेयाश्च   सर्व   एव  महारथाः//६//

चौपाई;- 
पाण्डव  यहाँ  सैन्य  जो लाये /  उसमें  महेष्वास   नृप आये //
अर्जुन  भीमसेन    से    योधा /  आये   कुरुक्षेत्र   कर  क्रोधा //
शूरवीर  सात्यकि   महिपाला / उनके  संग   विराट  भुआला //
राजाद्रुपद   महारथ    भारी  /  धृष्टकेतु ,  चेकितान  जुझारी //

पुरुजित काशिराज बलवाना/ कुन्तिभोज रणनिपुण सुजाना // 
मनुजश्रेष्ठ  नृप  शैब्य  धनुर्धर /  उत्तमौज   बलवान  गदाधर //
अति पराक्रमी  हैं  युद्धमन्यु  /  तथा   सुभद्रासुत  अभिमन्यु //
द्रौपदिसुत  पाँचों  भट  भारी /  सभी  महारथ   युधव्रत धारी //
     
पुण्यवृति युत सब  नृप  वीरा  / ये   हैं   वृत्ति  युद्ध  मतिधीरा //
मनसंस्थित  कर  दे  हिय  देशा / महेष्वास   वह  वीर नरेशा //
भावस्वरूप  भीम   गदधारी  /  अनुरागी   अर्जुन  सम  भारी //
ऐसे  शूरवीर   बहु   भूपा /  नृप  सात्यकि  सात्विकता  रूपा /

ब्रम्ह  व्याप्त  सब  जगत  निहारे / वह विराट नृप की धृतिधारे //
निश्चल ब्रम्ह   सुस्थति   पाये  /  वही  परमपद  तक  ले  जाये //
वह  योद्धा  नृप  द्रुपद  महारथ  / युद्ध  करे लख कर परमारथ //
दृढ़  कर्त्तव्य कर्मरत  ध्यानी / धृष्टकेतु   नृप  रहित  अमानी //

चित्त इष्ट  में  खींच   रमाये  / चेकितान  नृप  वह   कहलाये //
परम  ईशवासी  अविनाशी  / सो   साधक  की  काया काशी // 
कारण, सूक्ष्म,स्थूल  शरीरा / जीते  सो  नृप  पुरुजित  वीरा // 
निज कर्तव्य कर्म के द्वारा / जीत लिया  है  यह  जग  सारा /
/ 
मनुजश्रेष्ठ  नृप शैब्य  धनुर्धर  / वृत्ति  युद्ध  का  योद्धा दुर्धर //
युद्ध  नीति  पर करे विचारा  / युधामन्यु वह भट बरिआरा //
वीरधुरन्धर गुणनिधि  ध्यानी / उत्तमौजनृप  धीर अमानी // 
ओजसशक्तियुक्त आराधक /मनमौजी कवि अरु स्वर साधक // 
संग     सुभद्रापुत्र    प्रवीरा  /  महाबाहु  विक्रम  मतिधीरा //
शुभमें मस्त  न मानत हारी /वह अभिमन्यु अभयभटभारी //
दोहा ;-
ध्यानरूप   है   द्रोपदी , पाँच    पुत्र   अतिवीर //
सुहृद, सौम्य, लावण्यता, दृढ़ ,वात्सल्य प्रवीर //
सब  के  सब  योद्धा  प्रबल , धीर , वीर ,गंभीर //
ये   हैं   दैवी  सम्पदा ,  पाण्डव  दल   के  वीर //

श्लोक;- 


अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध  द्विजोत्तम /

नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते//७//



दोहा;- 

गुरू  श्रेष्ठ   हे  विप्रवर ,  अपने  पक्ष प्रधान /
जो हैं  उनको  जानिये , करवाऊँ   पहचान //
कुरू सैन्य अध्यक्ष हैं,जो जो निपुण सुजान /
बतलाता हूँ नाम  ले , सुनिये  देकर ध्यान // 

चौपाई;- 
उभय वृत्ति रण  चित्रण सारा / जहँ गुरु  द्रोण  द्वैत  आचारा //
जब तक विलग इष्ट से साधक /रहे प्रकृति में वह आराधक //
लेश  मात्र   जब  तक  है  दूरी /  द्वैत रहे अरु  तन  मगरूरी //

द्वि पर  विजय  हेतु  जो  प्रेरे /  पहले  गुरु  हैं  द्रोण   चितेरे //
अर्धज्ञान  जब  करे  विकासा  /  देत  प्रेरणा  अरु  जिज्ञासा //

दोहा;- 
मोह द्वैत गुरु द्रोण से ,निज दल सैन्य प्रधान /
वीरों का वर्णन  करे , मन  में कर  अभिमान //

श्लोक;-
भवान्भीमश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः /
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च //८//

चौपाई;- 
गुरुवर आप ,  भीष्म  हैं  जैसे /  विजयी  कृपाचार्य भी वैसे //
वीर  कर्ण  अरु  अश्वत्थामा / महारथी  अतुलित  बलधामा //
सोमदत्तसुत   भूरिश्रवा   से /  युद्ध  प्रवीण  विकर्ण  कला से //

असुर  सम्पदा  वीर  गिनाये  / बहिर्मुखी  जो  भ्रम उपजाये //
द्वैताचारी  द्विज   मतिधीरा  / वही   प्रथम  गुरु  द्रोण प्रवीरा //
भ्रमित बुद्धि ही भीष्म पितामह / दुर्जय रिपु है साधक का यह //
भिन्न  कर्म  है  कर्ण  यशस्वी / रण में निपुण पुरुष तेजस्वी //
कृपाचार्य  आचार्य  अधीरा  / साधन त्याग फँसा  भव भीरा //

कृपा भाव  साधक  में  आये  / साधन  में   बाधक  बन जाये //
ऋद्धि सिद्धि बहु लोभ  दिखायें / योगी  पथ  से च्युत हो जायें //
कृपाचार्य   वह  सिद्ध  अधूरा  / जिसका योग  हुआ नहिं पूरा //
पूर्ण  सिद्धि  बिन  कृपा  दिखाये  / संचित सारी शक्ति गवाँये //

दुराधर्ष   है    अश्वत्थामा   /  यह  आसक्ति   मोह परिणामा  //

वीर  विकर्ण  विकल्प  स्वरूपा  / युद्ध प्रवीण  पड़ा रण कूपा //

भूरिश्रवा  भ्रममय  निज  श्वासा / बहिर्प्रवाह प्रधान  सुपासा //
दोहा  
ध्यान योग में योगि जो,लखे चन्द्र सी ज्योति /
सोमदत्ति सो स्थिति ,श्रवण ओम ध्वनि होति // 

चौपाई ;-
वह ध्वनि जो साधक सुन पाये /किन्तु अहं अज्ञान न जाये // 
भूरिश्रवा सो कुरुदल योधा /दम्भ युक्त निज चित्त न शोधा //

श्लोक;- 
अन्ये च बहवः शूरा  मदर्थे त्यक्तजीविताः/
नानाशस्त्रप्रहरणाः    सर्वे    युद्धविशारदाः//९//


चौपाई;- 
मम  हित जीवन  आशा  त्यागी / बहुतक शूरवीर  अनुरागी //
शस्त्र सुसज्जित अगणित वीरा / युद्ध चतुर सब ही रण धीरा //

दुष्टवृत्ति रण को मुनि ग्यानी /शस्त्र शास्त्र रण निपुण बखानी //


श्लोक;-
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् /
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीष्माभिरक्षितम् // १० //

चौपाई;- 
गंगासुत  से  रक्षित  सारी / सब  विधि  सेन अजेय हमारी //
भीम सुरक्षित पाण्डव दल है / उस  सेना  से  जीत सरल है //

जब तक मन में भ्रम है जीवित /अरु इच्छायें रहें असीमित // 
तब तक कौरव  सेना दुर्जय  / रहतीं असुर  वृत्तियाँ  निर्भय //
भ्रम से बुद्धि भ्रमित हो जाये  / पुण्यवृत्ति फिर जीत न पाये //
भाव भीम  के बस  भगवाना / सो ज्ञानी जिसने यह जाना //

श्रद्धाभाव  ह्रदय  में आये  / अविदित  ब्रम्ह  विदित हो जाये //
पुण्य  विकास   भाव  से  पाये / पुण्यवृत्ति  रक्षक कहलाये //  
लेशमात्र त्रुटि हो साधन में  / भ्रम उपजे साधक के मन में //

भ्रमितभाव फिर सँभल न पाये /इससे जीत सुगम हो जाये //

श्लोक;-
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः / 
भीष्मेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि //११//

चौपाई;- 
इससे निज निज स्थिति गहिये/ दल सम्मुख मोर्चे पै रहिये //
भीष्मपितामह   की  ही रक्षा / करें  सजग  चहुँ  ओर सुरक्षा //  

मन  का  मोह -रूप  दुर्योधन  / जो  है  दुष्टवृत्ति  गठबन्धन //
कहे  करें  सब  भ्रम  की  रक्षा  / इनसे  अपनी  पूर्ण  सुरक्षा //
इसमें  किंचित  नहिं  संदेहा  /  इनसे  रक्षित  सबके  गेहा //


श्लोक;- 
तस्य    सञ्जनयन्हर्षं    कुरुवृद्धः   पितामहः/
सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् //१२//

चौपाई   
कौरव दल  की   महाप्रतापी / भीष्म  गर्जना  रण में व्यापी //
दुर्योधन  मन   हर्ष  जगायो  / सिंहनाद  कर  शंख  बजायो //

सेनापति  भ्रम    भीष्म   सयाने /  देववृत्ति  को  लगे डराने //
बल अनुमान प्रताप दिखाया  / मोहित  मन में हर्ष जगाया //
युद्ध  घोष  कर  शंख  बजायो / सिंहनाद कर भय उपजाओ //
ब्रम्ह   अभय सत्ता अविकारी / हो भयभीत प्रकृति सविकारी // 
यदि भ्रम भीष्म विजय पा जाये /साधन पथ से भृष्टकराये // 
  
श्लोक;- 
ततः  शङ्खाश्च  भेर्यश्च   पड़वानकगोमुखाः/
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोsभवत्//१३//

चौपाई;- 
फिर सब  एक संग मिल साजे / ढोल  मृदंग  शंख बहु बाजे // 
नरसिंघे   अरु    जंग   नगारे  /  महाभयंकर   नाद   उचारे // 

छल,बल,कपट  अस्त्र  बहु धारे  / असुर  वृत्ति  के  बजे नगारे // 
सब  मिल  अपनी शक्ति दिखायें /कर कोलाहल भयउपजायें //
साधक यदि  इनसे  भय खाये / मन का  मोह घना हो जाये //
पुनि पाण्डव दल  ने  कर रोषा / शंख बजाय कीन्ह उदघोषा //

श्लोक;-  
ततः  श्वेतैर्हयैर्युक्ते  महति  स्यन्दने  स्थितौ / 
माधवःपाण्डवाश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः //१४//

चौपाई;-
 श्वेत  अश्व रथ  रुचिर  सुहाये / कृष्णार्जुन   दिब  संख बजाये // 

श्वेतअश्व रथ तनिक न श्यामा /दिव्य अलौकिक मनअभिरामा //
सुर  ब्रम्हादिक   अरु  भू  लोका  / इनसे  परे  जहाँ  नहिं  शोका //
सो  परब्रम्ह    निगुण  निर्दोषा  / ताहि  मिलाने   कर  उदघोषा // 
श्रीकृष्ण ने  शंख  बजाया / लक्ष्य  विजय   विश्वाश   जगाया //


श्लोक ;-
पांचजन्यं   हृषीकेशो   देवदत्तं   धनञ्जयः /
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः //१५//

छन्द ;- 
पांचजन्यं   शंख  फूँका  कृष्ण  ने  रण घोष में /
देवदत्तं  नाद  कीन्हा   पार्थ  ने   भर   रोष   में //    
विकट भट भारी गदाधर  पाण्डुसुत बलसीम ने /
पौण्ड्रनामक शंख  भयप्रद  नाद कीन्हा भीम ने //

चौपाई ;-
दैवी  सम्पद  जासु   अधीना  / वीर   धनंजय  युद्ध  प्रवीणा //
देवदत्त  दिब  शंख   बजाया  / निजदल  में  देवत्त्व  जगाया //
कर्म  भयानक  जिसके  सारे  / भावभीम  जिससे  हरि हारे //
पौंड्र नाम जब शंख बजाया / भक्ति  भाव से हिय भर आया //
पौंड्र जानिये हरिपद प्रीता /जिस हिय उपजे वह जग जीता //

श्लोक;- 
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः /
नकुलः   सहदेवश्च    सुघोषमणिपुष्पकौ //१६//

छन्द;-
अनंतविजयी शंख ध्वनि ,गूँजी युध्ष्ठिरराज की /
श्रेष्ठ  कुन्तीपुत्र  पाण्डव  धर्मयुत  महाराज  की //
नकुल शंख सुघोष का भी  रव  सुना  गुरुदेव ने /
बाद मणिपुष्पक बजाया , पाण्डुसुत सहदेव  ने //



चौपाई ;-
वृत्तियुद्ध  में जो  है स्थिर  /  उस   योद्धा   का  नाम  युधिष्ठिर //
धर्म  युधिष्ठिर  शंख  अनूपा   /  गूँजा   शब्द   नाद  के  रूपा //
जो अनंत में विजय  दिलाये  / वह  अनंत  विजयी  कहलाये //
ॐ  अनंत  नाद  जब  आये  / चित  में   स्थिर  भाव  जगाये //

नियम नकुल का  शंख  सुघोषा  / वृत्तियुद्ध  में  कर  उदघोषा //
अशुभ शमन कर उन्नति लाये /क्रमशःचित शुभ में रम जाये //
है  प्रत्यक्ष श्वास  मणि रूपा   / यह मणिपुष्पक  शंख  अनूपा //
यहअमूल्यनिधि कहहिं मुनीशा / नर तन पाय जाप कर ईशा //

सतसंगति   ही   है   सहदेवा  /  हिय   प्रेरक  श्री  सदगुरुदेवा // 
सत्य संग  जब  शंख बजाये  / आत्मतत्त्व   दर्शन मन पाये //
चिंतन ध्यान  समाधि  लगाये  / वह सतसंग साधु तब पाये //
सत सानिध्य मिलेगा जिसक्षण /श्वास श्वास पर मिले नियंत्रण //

मन के सँग हो इन्द्रि निरोधा / सब पाया  जिसने चित सोधा //
ताल संग स्वर ज्यों  मिल जाये  / चित्त आत्मा  में  रस पाये // 
फिर मिल उभय करहिं सतसंगा /झर झर झरे भाव रस गंगा //

श्लोक;- 
काश्यश्च  परमेष्वासः  शिखण्डी  च   महारथः/
धृष्टद्युम्नो    विराटश्च    सात्यकिश्चापराजितः//१७//
द्रुपदो       द्रौपदेयाश्च      सर्वशः     पृथ्वीपते /
सौभद्रश्च महाबाहुःशङ्खान्दध्मुः पृथक् पृथक् //१८// 
   
दोहा;- 
श्रेष्ठ  धनुर्धर  काशि नृप , और   शिखण्डी वीर /
धृष्टद्युम्न विराट नृप , अजय सात्यिकी धीर //
गूँजे   द्रोपदिपुत्र  औ ,  द्रुपद   शंख  के  शोर  //
महाबाहु  अभिमन्यु का , शंख नाद घन घोर //  

चौपाई ;-
जो मन इन्द्रिय बस कर पाये  / अन्तः में   केंद्रित  हो  जाये //
परमईशवासी  अविनाशी  /  उसी  पुरुष  की   काया   काशी //
शिखा -सूत्र परित्याग शिखण्डी /लक्ष्य प्रतीक महा बरबंण्डी //
ब्रम्ह प्राप्ति जब तक है शेषा / तब तक  पुरुष पथिक  के  भेषा // 

प्राप्य  लक्ष्य  जब  मन  पा जाये / उससे  श्रेष्ठ नहीं जो पाये //
लक्ष्य प्राप्ति  मन का भ्रम  मेटे / साधक इच्छा सकल समेटे //
लक्ष्य सिखंडी सम्मुख आये /तब भ्रमभीष्म समन हो जाये //

दोहा;-   
ब्रम्ह   अचल  पद  दायक  , द्रुपद  महारथ  धीर / 
ध्यान  द्रोपदी   के  तनय  , पाँचों  महा  प्रवीर //
सुह्रद, सौम्य ,लावण्यता , वात्सल्य  ,दृढ़  वीर /
दीर्घ  भुजी  अभिमन्यु  का  , शंखनाद  गंभीर //
अलग अलग सबने किया ,शंख बजा कर घोष /
वृत्ति  युद्ध  रणक्षेत्र  में  ,जागा  सात्विक  रोष //
                                     
श्लोक;- 
स घोषो  धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्  /
नभश्च पृथिवीं चैव  तुमुलो  व्यनुनादयन् //१९//
                                     
चौपाई;- 
गूँजे सब स्वर धरणि, अकाशा / कौरव दल  में उपजी त्रासा//
दोहा ;-
पाञ्चजन्य उदघोष अरु,दैव शक्ति अधिपत्य /
स्वर अनंत जयघोष का,ह्रदय गूँजता नित्य //
अशुभ समन हो शुभ बढे / आसुर बहिर्प्रवृत्ति /
सबके ह्रदय विदीर्ण हों , जीते सात्विक वृत्ति //
चौपाई;- 
धारावाही  स्वर  जब  आयें   / मोह प्रवृत्ति समन हो जायें //
  
श्लोक;- 
अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः /
प्रवृत्ते      शस्त्रसम्पाते     धनुरुद्यम्य     पाण्डवः //२०//
हृषीकेशं      तदा      वाक्यमिदमाह     महीपते /
                          अर्जुन उवाच 
सेनयोरुभयोर्मध्ये   रथं   स्थापय  मे   sच्युत //२१//

चौपाई;- 
इन्द्रिय विषय राग परित्यागा /सोई कपिध्वज प्रगट विरागा //

कपिध्वज अर्जुन कौरव लेखे / शस्त्र युक्त  रण आतुर  देखे //
कर में धनु गांडीव उठाया  /  ह्रषीकेश  को  वचन  सुनाया //
प्रभु सर्वज्ञ  ह्रदय के ज्ञाता  / ह्रषीकेश  सुर नर  मुनि त्राता //
हे अच्युत रथ आगे लीजै  /  दोनों दल  बिच  स्थिर कीजै //

श्लोक;
यावदेतान्निरीक्षेsहं योद्धुकामानवस्थितान् /
कैर्मया   सह   योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे //२२//

चौपाई;-     
 बोले   सुहृद   पार्थ   मृदुभाषी / योधा  कौन   युद्ध  अभिलाषी //
युध व्यापारी कितने  नृप जन / जब तक देखूँ  नहिं मधुसूदन // 
युद्धउचित किन किन से करना / समझूँ जब तक थिर ही रहना //

 श्लोक 
योत्स्यमानानवेक्षेsहं य एतेsत्र समागताः/ 
धार्तराष्ट्रस्य    दुर्बुद्धेर्बुधे     प्रियचिकीर्षवः//२३// 

चौपाई 
दुर्मति दुर्योधन शुभ चिंतक / आये नृप लै सेन , विनिंदक //
सम्मुख दुश्मन को रिपु मोरा / एक झलक देखूँ उन ओरा //
                           संजय उवाच 
श्लोक;-
एवमुक्तो   हृषीकेशो    गुडाकेशन    भारत /
सेनयोरुभयोर्मध्ये  स्थापित्वा   रथोत्तमम्//२४//
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् /
उवाच पार्थ पश्यैतान् समवेतान् कुरूनिति //२५ //

चौपाई;-                                   
बोले संजय  सुनहु  महीशा / पार्थ  विनय  सुनकर  वृजधीशा //
श्वेत अश्व  रथ  हाँक  बढ़ाये / गुडाकेश  कुरु  दल  बिच  आये //

विजय  नींद  पर  पाई जबसे  / गुडाकेश  भये  अर्जुन  तबसे /

दोहा;-
उभय  सेन  के  मध्य  में  ,  तनमहि   स्थित  भूप /
तथा भीष्म  गुरु  द्रोण  के , सम्मुख  दिव्य  अनूप //
रथ  रोका  श्रीकृष्ण  ने  , सब  नृप  झलक दिखाय /
थकित हुये  अर्जुन निरखि ,निज परिजन समुदाय //
बोले    केशव    पार्थ    से  ,  सम्मुख    रहे   परेख /
जुड़े   हुये   रण  भूमि   में  ,  कौरव   दल  को  देख//
चौपाई ;-
जब  मन आतम में रम जाये / यह तन उत्तम रथ कह लाये //

श्लोक;-
तत्रापश्यत्स्थितान्   पार्थः पितृनथ  पितामहान् /
आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा// २६ //
श्वशुरान्सुहृदश्चैव                    सेनयोरुभयोरपि/
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् //२७//
कृपया        पर्याविष्टो        विषीदन्निदमब्रवीत् / 
                         अर्जुन उवाच 
दृष्ट्वेमं  स्वजनं  कृष्ण  युयुत्सुं समुपस्थितम् //२८//

चौपाई;- 
उभय पक्ष जब दृष्टि फिराई/ सब निज परिजन दिये दिखाई //
पृथापुत्र   अर्जुन   ने    देखे   /  चाचा ,  ताऊ ,  दादा   लेखे //
मामा, बाँधव, सुत ,पौत्रों  को/ गुरुवर, ससुर,सुहृद,मित्रों को //
रण में स्वजन बन्धु लख डोले / करुण भाव शोकातुर  बोले //
हे  केशव आनँदघनरासी / देख  स्वजन  सब  युद्ध पिपासी //

पार्थिव  तन-रथ जासु सवारी / लक्ष्य  अचूक  धनुर्धर भारी //
अर्जुन ने जब कुरुदल  देखा  / उपजा  मन  में  मोह विशेखा //
पितृ,भ्रात गुरु और पितामह  / ससुर, प्रपुत्र , पौत्र सेना  मह //
ह्रदय  देश  का  चित्रण सारा  / यह जग  मोहमयी  परिवारा // 
  
श्लोक;-  
सीदन्ति  मम  गात्राणि   मुखं   च  परिशुष्यति /
वेपथुश्च     शरीरे     मे      रोमहर्षश्च     जायते //२९ //

चौपाई;- 
युद्ध कल्पना छवि  उर  आनी / मुख  सूखे  आवे  नहिं बानी /
शिथिल हुआ तन होय कुरंगा /तन कम्पित रोमांचित अंगा // 

श्लोक;- 
गाण्डीवं  स्त्रंसते  हस्तात्त्वक्चैव  परिदह्यते /
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः//३०//

चौपाई;- 
भ्रमित हुआ मन त्वचा जलानी / धनु गांडीव गिराअब जानी //
 अब इक पल रह सकहुँ न ठाढ़े / बिन परिणाम नेत्र जल बाढे //

श्लोक;- 
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव /
न च  श्रेयोsनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे//३१ //

चौपाई;- 
हे  केशव मन  भयो सभीता / मैं   लक्षण   देखौं  विपरीता //
निज जन  युद्ध  करूँ  संहारा / होय  नहीं  कल्याण  हमारा //

श्लोक;- 
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च /
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा //३२//

दोहा;- 
नहीं चाहिये  विजय श्री,नहीं राज्य सुख भोग /  
क्या  गोविन्द  बताइये, लाभ बिना सब लोग //

श्लोक;-  
येषामर्थे काङ्क्षितं  नो  राज्यं भोगाः सुखानि च /
त इमेsवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च //३३//  

दोहा;- 
हैं वांछित जिनके लिये ,राज्यादिक उपभोग /
धन जीवन की आश  तज ,खड़े युद्ध में लोग //

ऐसा सुख नहिं चाहिये ,नहीं परमपद शान्ति /
जहँ सँग में परिजन नहीं ,सारे सुख हैं भ्रान्ति // 
चौपाई;- 
जब तक है परिवार  बसेरा / रहता  इच्छाओं का डेरा //

श्लोक ;-
आचार्याः   पितरः    पुत्रास्तथैव    च    पितामहाः /
मातुलाःश्वसुराःपौत्राःश्यालाःसम सम्बन्धिनस्तथा // ३४//
                                  
चौपाई;- 
गुरुजन पुत्र पिता अरु ताऊ / दादा मामा श्यालक दाऊ //
पौत्र ससुर सब ही संबंधी/ मति सब की स्वारथ में अंधी//
                                   
श्लोक;-  
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोsपि मधुसूदन /
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते //३५//
                                   
चौपाई;- 
मारहिं स्वजन मोहिं मिल सोऊ/ तिहुँपुर राजतिलक कर कोऊ //
तबहूँ वध नहिं चाहूँ करना / फिर पृथ्वी तल की क्या  गणना //

भजन पूर्व में सब अनुरागी  / जिनकी  प्रीति  ब्रम्ह   में  जागी //
मोह त्याग बिन कर सतसंगा / चाहहिं  ब्रम्ह तत्त्व  रस  गंगा //
जब  यह  ज्ञान  उसे  हो जाये /  संग   दोष  से सत्य न पाये //
तब  साधक हो जाय अधीरा / भये  द्रवित  ज्यों पारथ  धीरा //  
स्वजन मोह वह त्याग न  पाये  / वृत्तियुद्ध  से फिर हट जाये //
भू  , पाताळ  और  सुरलोका  / इनसे  परे  और  इक  लोका //
 ताहि न अब तक अर्जुन जाने / देव लोक  तक  सीमा माने //

श्लोक;- 
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन /
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः          //३६//

चौपाई;- 
कुरु राजन धृतराष्ट्र सुतन्ह को / मारे क्या प्रसन्नता हमको // 
यदि मैं इन  दुष्टों को  मारूँ / पाप गठरिया निज सिर धारूँ //

राज्य  धृष्टता का जब  आये  / दुर्मति  दुर्योधन   उपजाये //
काम,क्रोध,मद,लोभ,अनीती / मोह  बढे त्यागे सब नीती //
अधम  कर्म  लेता  अपनाई  /   हो जाये  वह   आताताई //
मत्सर काम क्रोध मद लोभा /मन में ये उपजावहिं छोभा //
आतम  दर्शन  के ये बाधक / जाने  ज्ञानी  योगी  साधक //

श्लोक;- 
तस्मान्नार्हा वयं  हन्तुं धार्तराष्ट्रान् स्वबान्धवान् /
स्वजनं  हि  कथं  हत्वा  सुखिनः  श्याम  माधवः//३७//

चौपाई;- 
हे  यशुदानन्दन   हे  माधव / ये  सब हैं  अपने  ही   बांधव //
गान्धारी माँ के  चित  चन्दन / कौरवनृप के सब हैं नन्दन //
ये नहिं वधके योग्य हमारे / सुख किमि  पावें स्वजन सँहारे //

जब  तक  मन  अज्ञान   हमारे / तन  से  जुड़ते  रिश्ते सारे //
तन नश्वर तो जग के  नाते / वे   भी  नहीं  अमर रह  पाते  //  
मोह रहे तो सब जग प्यारा / स्वजन  बन्धु परिवार  हमारा //    
जब अज्ञान मोह मन घेरे / दुश्मन लगहिं  स्वजन सब  मेरे //

ऐसे  ही  अर्जुन  ने  सारा / रिपुदल  परिजन  मित्र   निहारा //
मोह भंग  जिस  दिन  हो  जाये  / सब संबंधी लगहिं पराये //  
मन   अज्ञान   प्रेरणा  पाई /  ज्ञान   पंथ   में  प्रविसे  जाई // 

श्लोक;-
यद्यप्येते   न    पश्यन्ति    लोभोपहतचेतसः /
कुलक्षयकृतं   दोषं   मित्रद्रोहे   च   पातकम् //३८//
कथं न ज्ञेयमस्माभिःपापादस्मान्निवर्तितुम् /
कुलक्षयकृतं        दोषं       प्रपश्यद्भिर्जनार्दन //३९//

चौपाई;-
यद्यपि भृष्ट चित्त ,निज रोषा / कुल विनाश नहिं देखहिं दोषा// 
मीत विरोध, पाप  नहिं  पेखें / तदपि दोष  हम  ज्ञानी  देखें//
कुल विनशे उपजे जो  दोषा / हम जानहिं  तव ज्ञान विशेषा// 
अघ से बचने केशव कहिये / क्यों विचार नहिं करना चहिये//   

जिमि नव साधक गुरु पहिं आये / तर्क करे अज्ञान न जाये  //
वैसइ अर्जुन मति भरमानी /माने नहिं निज को कम ज्ञानी //
कुल विनाश के दोष  विचारी  / गिरिधर से बोले  धनुधारी // 

श्लोक;- 
कुल क्षये  प्रणश्यन्ति कुलधर्माःसनातनः /
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोsभिभवत्युत //४०// 

दोहा;- 
कुल के महाविनाश से ,नाशे सब कुल धर्म /
धर्म  गये  सब वंश  में , फैले  पाप  अधर्म //

चौपाई ;-
कुलाचार अरु निज कुल कर्मा /इनहिं पार्थ जानहिं कुल धर्मा //
इन्हें  सनातन   अर्जुन   माने / केशव  का   संकेत  न  जाने //

श्लोक;- 
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः /
स्त्रीषु  दुष्टासु   वार्ष्णेय  जायते  वर्णसङ्करः//४१//

दोहा;- 
दूषित  हों  कुल  नारियाँ , वर्णसंकरी पुत्र /
जन्म लेहिं उस वंश में,केशव  महा कुपुत्र//
चौपाई ;- 
बाढ़हिं पाप जाहिं नहिं हेरी / दूषित नारि  होहिं  कुल  केरी //
होहिं   वर्णसंकर  संतानें  / ऐसा  अर्जुन  अब   तक   जानें //
आगे केशव ने समझाया / इससे  निज मत भिन्न बताया //
मैं  अथवा  स्वरूप   में  वासी  / महापुरुष या गुरु सन्यासी // 
आराधन  में   भ्रम   उपजाये  / वहीँ   वर्णसंकर   आजाये // 

श्लोक;-
सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च /
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः//४२//

चौपाई;- 
वर्णसंकरी   सुत   जो   होवे  / कुलघाती  कुल नरक  डुबोवे // 
तर्पण श्राद्ध बिना सब पुरखे/ पाय अधोगति भटकत निरखे //

दोष वर्णसंकर  कुल आये / भूत  भविष्य  आज  मिट जाये //
लोक रीति  कुलधर्म  बिहाई  /  श्राद्धकर्म सब  देहिं  भुलाई // 
पिंडक्रिया बिन पुरखे सारे /पुनि महिगिरहिं पार्थ मन धारे //  

श्लोक;-
दोषैरेतैः     कुलघ्नानां    वर्णसङ्करकारकैः/
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः//४३// 

चौपाई;- 
वर्णसंकरी   वंशज  दोषा  /  विनशे   जातिधर्म   कुल  कोषा //

जातिधर्म  कुलधर्म  सनातन / जान  रहे अर्जुन  अपने  मन //
रूढ़ि भवँर  में  फिरत भुलाने  / शाश्वत  सत्य  उसी को माने //
आगे   यह   मत   करके  खंडन  /  बोले   वासुदेव  यदुनंदन //
आतम सत्य सनातन अव्यय /ऐसा निज मन जान धनंजय //  

श्लोक;- 
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन /
नरकेsनियतं   वासो    भवतीत्यनुशुश्रुम //४४//

चौपाई;- 
जो  कुलधर्म  नशाये  केशव / रहे  अनंत  काल  तक  रौरव //
ऐसा अब तक सुनते आये / यही सोच मन अति दुःख  पाये // 

श्लोक;- 
अहो बात महत्पापं कर्तुम व्यवसिता वयम् /
यद्राज्यसुखलोभेन     हन्तुं   स्वजनमुद्यताः//४५//

चौपाई;
हाय शोक  कितना   दुखदाई / हम सब विज्ञ बुद्धि निपुनाई //
तदपिराज,सुख,लोभ निकेता / इन वश उद्यत कुल वध हेता //

 तर्क  बुद्धि तक  ज्ञान अधूरा  / दिखता मूरख  जब हो पूरा //
अर्ध ज्ञान घट छलकत  जाये  / शान्ति  पूर्ण होने  पर पाये //
अर्जुन केशव को समझाता /माने नहिं निज को कम ज्ञाता // 
गूढ़ तत्त्व  का  भेद न  जाने / तर्क करहिं जनु  परम सयाने //

हम तो बुद्धिमान अरु ज्ञाता  / तबहुँ करन चाहहिं कुलघाता //
राज्य भोग  सुख  में ललचाने / आपहुँ  केशव नीति भुलाने //
ऐसा  कह फिर करके  निर्णय / अपना  मत दे  रहे धनंजय //

श्लोक;-
यदि    मामप्रतीकारमशस्त्रं   शस्त्रपाणयः /
धार्तराष्ट्रा  रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् //४६//

चौपाई;- 
मुझ निशस्त्र अरु बिन  प्रतिकारी/ अर्जुन को  सर्वायुधधारी //
कौरव सुत यदि मारहिं रण में/ वह भी हितकर मानहुँ मनमें//

कहिहै जगत  पार्थ  थे  ज्ञानी / युद्ध  बचाय  दीन्ह  कुर्वानी // 
निजकुल अरु परिवार सनेही / सुख हित जन प्राणाहुति देहीं //
जब गृह तज कोई जाय विदेशा / वैभव पाय रहे बिन क्लेशा // 
चार दिवस  भी  बिता  न  पाये  /याद  उसी कुटिया की आये // 
ऐसा  प्रबल  मोह  का  फन्दा  /मुक्ति  लहै सो हो  स्वच्छन्दा //

                           संजय उवाच 
श्लोक;-
एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये  रथोपस्थ  उपाविशत् / 
विसृज्य    सशरं     चापं   शोकसंविग्नमानसः//४७ //

दोहा;-
कह संजय  धृतराष्ट्र से ,सुनिये  कुरु  महिपाल /
केशव  के  सम्मुख   हुये , अब  अर्जुन  बेहाल //
शोकमयी उद्विग्न मन ,  अपनी  व्यथा  सुनाय / 
धनु  गाण्डीवहिं  त्याग के ,  रथ  में  बैठे जाय //

क्षेत्र   और   क्षेत्रज्ञ   का  ,  युद्ध  क्षेत्र  तज  पार्थ /
हटे  ज्ञान   के  मार्ग  से , निज  कुल  के  रक्षार्थ //
कृष्णार्जुन   संवाद   का ,  पूर्ण   प्रथम   अध्याय /
पढ़हिं सुनहिं जो नित्य जन,शोक मोह भ्रम जाय /

इस प्रकार श्रीमद् भगवद्गीता रूपी उपनिषद एवं ब्रह्मविद्या तथा  योगशास्त्र  विषयक   श्री कृष्णऔर अर्जुन के संवाद में पं उदयभानु तिवारी "मधुकर "कृत महाकाव्य श्री   गीता मानस में शंसय ''विषादयोग'' नामक प्रथम अध्याय पूर्ण हुआ /   

हरि ॐ तत्सत्