प्रेरणा
दोहा;-
रस छन्दों में बाँधने , गीता के उपदेश /
कैसे आई प्रेंरणा , कवि के ह्रदय प्रदेश //
पढ़ यथार्थ गीता विमल ,मनहिं मिला सन्देश /
हो जाओ सदगुरु शरण , मेटहिं दुख योगेश //
चौपाई;-
जबसे गुरु अनुकम्पा पाई / ॐ नाद स्वर गूँज समाई //
उदित ज्ञान रवि कीन्ह प्रकाशा / संसृति मूल अविद्या नाशा //
जाबालीऋषि आश्रम पावन / गुप्त गुफा जहँ परम सुहावन //
ज्योतिर्लिंगों में शिव धामा / स्वयं प्रकट गुप्तेसवर नामा //
एकदिवस तेहि मन्दिर जाई / कीन्ह प्रणाम शिवहिं मनलाई //
शब्दब्रह्म में मन अनुरागा / विकसे कवि कृति कुसुम तड़ागा //
उठी प्रथम स्तोत्र तरंगा / बही स्तवन निर्मल गंगा //
शिव प्रेरित शारद हिय आई / शब्द सलिल सरि दीन्ह बहाई //
उमा , रमा ,जननी ब्रह्माणी / पवनतनय, काली महारानी //
गणपति,सिद्ध ब्रह्ममयजानी / सबकी स्तुति कर निजवाणी //
पुनि रेवापद वन्दन कीन्हा / श्रेष्ठ काव्य में गीतहिं चीन्हा //
भृगुआश्रम प्रभु प्रेरि पठावा / जहँ योगेश्वर दर्शन पावा //
मन सदगुरु चिंतन में लागा / गीतामृत रस बरसन लागा //
छन्द, सोरठा सुन्दर दोहा / कवित सवैयों ने मन मोहा //
चौपाई अति सरस सुहाई / वह तरंग वाणी में आई //
जो छन्दों में रस बरसाये / चुन चुन मधुकर शब्द सजाये //
सरस भाव मानस से आई / सो गीता मानस कहलाई //
दोहा;-
यंत्ररूप यह देह है , अभियन्ता करतार /
निज को करता मानता ,मायावी संसार //
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