Monday, May 4, 2015

                         जीवन ही महाभारत 

महाभारत केसमयकुरुक्षेत्रमें  भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा  प्रिय सखा अर्जुन  को  दिए गए  गीता  उपदेश  का  जो  तात्विक विवेचन पूज्य स्वामी श्री अड़गड़ानन्द जी महाराज ने किया
है  उस व्याख्यानुसार यदि  चिंतन  किया  जाये तो  दैहिक जगत में सभी महाभारत के पात्रों की अनुभूति योग साधना
में रत योगी  पुरुष को दैव और आसुरीवृत्ति के अन्तर्द्वन्द्व से परिलक्षित होती है/

दोहा;- 
कुरुक्षेत्र  के  युद्ध  के  ,  महारथी  बलवान  / 
निजअन्तरपट खोलिये,लीजै सब पहचान //
मानुष तन कुरुक्षेत्र है , कौरव  असुरपृवृत्ति /
पाण्डव दैवी सम्पदा , पाण्डु पुण्य की वृत्ति //
कुन्ती है कर्तव्य अरु, भ्रमही भीष्म महान /
धर्म युधिष्ठिर जानिये ,भाव भीम बलवान //

चौपाई;-
अर्जुनहै   मनकर  अनुरागा /  ब्रह्मज्ञान  जेहि  रुचिकर लागा //
नियम   नकुल  सत्सँग  सहदेवा /  द्वैताचार   द्रोण  गुरुदेवा //
मनःशक्तिही अश्वत्थामा / सात्विकता  का  सात्यकि नामा //
नृप धृतराष्ट्र   ह्रदय   अज्ञाना /  दुर्योधन   है   मोह  प्रधाना // 
नरप्रवृत्ति   इन्द्रिय  आधारी  /  कुरुनृपसहचारिणि गाँधारी // 
जो   कर्तव्य  कर्म   के  द्वारा / जीते  यह   भवसिंधु अपारा //
कुन्तिभोज  सोई   नृपज्ञानी /  विदुरजीव  काया लिपटानी //
इतरकर्म  ही   कर्णस्वरूपा / अरु  कुबुद्धि   दुश्शासन  रूपा //
शाश्वतपद  का  जो  अनुरागी / सो  मन धृष्टद्युम्न बैरागी // 
पुण्यवृत्तियों का  वह  नायक / धर्मयुद्ध  सेना  अधिनायक // 
इन्द्रियविषयरागपरित्यागा/ सोईकपिध्वज प्रगटविरागा //

दोहा;- 
काशीनृप तन शक्ति अरु ,वीर विकर्णविकल्प /
कृपाचार्य  वह कृपाचरण,जासु साधना अल्प //
चौपाई;-
दिव्यदृष्टि जिससे मिल जाये/ वहसंयम संजय कहलाये // 
परमब्रह्म  में चित्त  रमाये  / महेश्वास  नृप स्थिति पाये //
व्याप्तब्रह्म जग में धृतिधारे / वहविराटनृप भाव निहारे //    
अचलसुस्थिति जब नर पाये/ महारथीनृपद्रुपद कहाये //
दृढ़कर्त्तव्य कर्मरतध्यानी / धृष्टकेतु नृप सम सो ज्ञानी //
मन को खींच इष्टमें लाये / चेकितान  नृप पदवी पाये //
कारण,सूक्ष्म,स्थूलशरीरा/ विजयकरे सो पुरुजितवीरा //
सत्यआचरणयुक्त अमानी / नर मेंश्रेष्ठ शैव्यनृप ज्ञानी //
भ्रममयभूरिश्रवा निजश्वासा/ बहिर्प्रवाह प्रधानसुपासा //
शिखासूत्रपरित्याग शिखण्डी/ लक्ष्यप्रतीक महाबरबंडी // 
युधअनुरूप विचार बनाये / युधामन्यु की स्थिति पाये //
शुभकीमस्ती कर्म कराये/ उत्तमौजनृप छवि दिखलाये // 
जबवहशुभ बनजाय अधारा/ होअभिमन्यु अभय बरिआरा //
वही सुभद्रासुत सम वीरा / ध्यानयोग स्थित मतिधीरा //

दोहा;-
ध्यानरूप   है  द्रोपदी  ,   पांच  पुत्र  ये  जान /
सुह्रद ,सौम्य,लावण्यता,दृढ़,वात्सल्य महान //

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