गीता सुगीता कर्तव्या
सहृदय सुधी गीता साधक श्री उदयभानु तिवारी से मेरा परिचय पूर्व
परिचित साहित्य साधक से भिन्न रूप में , पहली बार हुआ. क्रमशः उनसे बढ़ते
हुये संबंधों ने उनके व्यक्तित्व की अनेक विशेषतायें उदघाटित कीं और आज
वे मेरे निकट और आत्मीय व्यक्ति बन गये हैं. उनमें जो मुख्य बात
मैने अनुभव की वह है उनके व्यक्तित्व में एक लय / उसे सहज रूप से ऊपर से
नहीं देखा जा सकता क्योंकि उसके ऊपर एक सुदृढ़ कवच है बाह्य -रूप से गतिशील
ऊर्जा का / वे एक साथ त्वरा ओर सजकता से अनेक काम निपटा लेते हैं और
ज्यों के त्यों स्फूर्त बने रहते हैं / पर ध्यान से देखें तो उसमें भी
एक लय दृष्टिगोचर होती है / हाँ यह अवश्य है कि भीतरी लय बाहरी गति की
तुलना में अधिक गहरी और स्थाई है /
दूसरी बात जो मुझे दिखाई दी वह है ''आ नो भद्रः क्रतवो यन्तु
विश्वतः '' विश्व के सभी सात्विक , शाश्वत एवं कल्याणकारी विचार मेरे पास
पहुँचे / वे फिर नई बात को सुनने, समझने, स्वीकार करने और उसका उपयोग करने
के लिये सर्वात्मना तत्पर हो जाते हैं /
मुख्य-रूप से इन वैयक्तिक विशेषताओं का उल्लेख कर और ध्यान
में रख कर मैं उनकी ''श्री गीता मानस ''को समझने का प्रयत्न करना
चाहता हूँ / यहाँ यह टिप्पणी करना भी आवश्यक प्रतीत होता है कि
भारतीय -परम्परा में दो प्रमुख धाराएँ प्रवाहित होती रही हैं / उन
धाराओं से हमारा वैचारिक और व्यवहारिक,दोनों प्रकार का व्यहार गहरे रूप
में प्रभावित होता रहा है / वे हैं शास्त्र -धर्मी और लोक-धर्मी
चिंतन और परम्पराएँ / कोई भी महत्वपूर्ण कृति समाज में इन दोनों धाराओं
में रच-बस कर ही स्वीकार्य हो पाती हैं/ यह बात श्रीमद् भगवद् गीता पर भी
समान रूप से लागू होती है /जहाँ उस पर लिखे गये भाष्यों ,टीकाओं
,टिप्पणियों की एक वैविध्यपूर्ण , प्रतिभा -प्रकर्ष सम्पन्न और
सिद्धातों की निर्णायक भूमिकाओं के आश्रय शास्त्र धर्मी रूप में वृहद श्रृंखला प्राप्त होती है , वहीं दूसरी ओर भारतीय और विदेशी भाषान्तरों,काव्यानुवादों के रूप में भी प्रचुर साहित्य मिलता है
/ इसके अतिरिक्त एक और प्रकार का साहित्य भी पर्याप्त मात्रा में
उपलब्ध है जिसमें प्रचलित भाषान्तर अनुवाद के साथ व्याख्या और विशेष
विश्लेषण पूर्ण विचार बिन्दुओं को समाहित किया गया है / तीसरे वर्ग में
भी नये-नये विचारऔर विचार करने के प्रयत्न भिन्न-भिन्न सन्दर्भों के आधार पर
किये गये हैं / वे आधुनिकयुग की संवेदना एवं प्रतिपादन शैली के उत्तम
उदाहरण के रूप में विद्वत् समाज में स्वीकर किये जा रहे हैं. इनमें
विनोबा, धर्मानंद, कौसाम्बी, महर्षि बावरा, ओशो और स्वामी अड़गड़ानन्द जी
प्रमुख हैं.
श्री उदयभानु तिवारी द्वितीय एवं तृतीय प्रकार के साहित्य से
प्रभावित रहे हैं / बाल्यावस्था से ही उनके मन में श्री रामचरित मानस का
राग-बन्ध सुदृढ़ हो गया था और स्वामी अड़गड़ानन्द जी की यथार्थ गीता
में प्रतिपादित पात्रों ,घटनाओं और तत्व संदर्भों के मनोवैज्ञानिक एवं प्रतीकात्मक व्याख्यानों ने उन्हें प्रभावित किया था परिणामतः उन्होंने श्री गीता मानस का पुनःप्रणयन करना, अपने कवि और विचारशील व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति की दृष्टि से आवश्यक समझा /
''श्री गीतामानस '' श्री रामचरित मानस की छन्द
रचना
से प्रभावित गीता -व्याख्या है ,जिसे वे सर्व ग्राह्य रूप में सहज मानते
हैं / इसमें कोई संदेह नहीं है की श्री तिवारी जी ने अपनी इस कृति में ,यथा
संभव लयात्मकता की रक्षा करते हुये गीता के तत्त्व-चिंतन को नये
संदर्भों में प्रस्तुत किया है /
उन्होंने अपने प्रतिपादन के आधारभूत सिद्धान्तों को स्पष्ट करते हुये लिखा है कि ;-
दोहा ;-
मानुष तन कुरुक्षेत्र है , कौरव असुर प्रवृत्ति /
पाण्डव देवी सम्पदा , पाण्डु पुण्य की वृत्ति //
कुन्ती है कर्तव्य अरु, भ्रम ही भीष्म महान /
धर्म युधिष्ठिर जानिये , भाव भीम बलवान //
चौपाई;-
अर्जुन है मन कर अनुरागा / ब्रह्मज्ञान जेहि रुचिकर लागा //
नियम नकुल सतसँग सहदेवा , द्वैताचार द्रोण गुरुदेवा //
मनअनुरक्ति ही अश्वत्थामा/ सात्विकता का सात्यकिनामा //
इसी
तरह अन्य पात्रों के संबंध में उन्होंने प्रतीकात्मकता का उपयोग करते
हुये और कुरुक्षेत्र को मनुज शरीर मानते हुये श्री अड़गड़नन्द जी के आधार पर
यज्ञ की व्याख्या करते हुये कहा गया है कि ;-
दोहा ;- ब्रह्म प्राप्ति की साधना, जहाँ चित्त रमजाय /
उस विशेषविधि को कहहिं, यज्ञ विज्ञ समुदाय //
कर्मफल पर यह टिप्पणी दृष्टव्य है ;-
चौपाई;-
फल का कारण बनने वाले / हैं अतिदीन कृपण मति वाले //
'' प्राणों का प्राणों का प्राणों में हवन ''गीता का महत्वपूर्ण वक्तव्य है -उसको श्री तिवारी जी ने समझाते हुये कहा है ;-
दोहा ;-
प्राण वायु वह वायु है ,प्राणि करहिं जेहि पान /
बाहर निकली वायु को , जानो वायु अपान //
चौपाई ;-
प्राणवायु जब अन्दर जाये / ता में भाव , कुभाव समाये //
जब साधक मन करे निरोधा / हो संकल्पों में अवरोधा //
योग-अग्नि संकल्प जलाये / प्राणवायु ही अन्दर जाये //
विषय तरंग प्रवेश न पायें / और न अन्दर छोभ बढ़ायें //
ब्रह्म समर्पित मन हो जाये / सिवा इष्ट कुछ ध्यान न आये //
यह क्षमता जब साधक पाये / प्राण -प्राण में हवन कहाये //
अपान में हवन पर कवि की अभिव्यक्ति है ;-
चौपाई ;-
अंदर से संकल्प न आयें / मन में नहिं स्फुरण जगायें //
हो एकांत योग में लागे / ब्रह्म प्राप्ति में मन अनुरागे //
यह स्थिति जब मन की आये / वह अपान में होम कहाये //
क्या हैं सात्विक ज्ञान ;-
चौपाई ;-
जिस सुबुद्धि से युक्त हुआ नर / भिन्न-भिन्न भूतों में ईश्वर //
एक भाव में स्थित देखे / व्याप्त ब्रह्म सब जग में लेखे //
इस तरह के अनेक प्रतीकात्मक एवं मनोवैज्ञानिक विचार श्री
उदयभानु तिवारी '' मधुकर '' ने श्री गीता मानस में सरल और सुबोध
बनाकर प्रस्तुत किये हैं / उनके इस ग्रन्थ के अनुशीलन से यह भी स्पष्ट
होता है कि उन्होंने पूर्वाचार्यों से अतिरिक्त अपने मौलिक विचार भी इस
कृति में विशेष रूप से दिये हैं , जिससे यह रचना उपयोगी ,आकर्षक एवं नवीन
बन गई है /
मेरी यह सुबद्ध धारणा है कि उनकी यह कृति सामान्य जन को
आकर्षित तो करेगी ही,साथ ही विज्ञ जनों को भी प्रमुदित करेगी /
मेरी हार्दिक शुभकामना है कि यह कृति सुधी विद्वानों एवं गीता-रसिकों का कण्ठ हार बने /
आचार्य-कृष्णकान्त चतुर्वेदी
पूर्व संस्कृत विभागाध्यक्ष
रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय ,जबलपुर
पूर्व निदेशक कालिदास अकादमी ,उज्जैन
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