Sunday, May 3, 2015

                              ॐ श्रीपरमात्मनेनमः 

                                     द्वितीयोsध्यायः

दोहा;-
अविनाशी यह  जीव अरु , तन के विविध स्वरूप /
निज निज कर्म अनुसार नित , धरे सृष्टि में रूप //
सो   उपदेश  सुनाय  हरि ,  हरहिं  मोह   अज्ञान /
जो  जाने  इस  मर्म  को ,  सोई   ज्ञान   निधान // 

                        संजय उवाच   
श्लोक;-
तं  तथा  कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्  /
विषीदन्तमिदं   वाक्यमुवाच   मधुसूदनः //१//

 दोहा;-
करुणभाव अतिशोक से,व्याकुल और अधीर /
अश्रुपूर्णदृग  पार्थ  से  ,  बोले    यों   यदुवीर //

                  श्रीभगवानुवाच 
श्लोक;-
कुतस्त्वा कश्यमलमिदं विषमे समुपस्थितम् /
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन           //२//

चौपाई;-
तुमहिं न उचित उपज जो छोहा/असमय प्राप्त हुआ क्यों मोहा//
प्रथापुत्र   यह  कर्म  तुम्हारा / नहिं  आचरित  श्रेष्ठ  नर  द्वारा//
ना ही यश, कीरति फैलाये / नहिं  यह   कर्म  स्वर्ग  ले  जाये// 

दोहा;-
अर्जुन  को  अद्वैत   में ,   ले  जाने   योगेश /
पारलौकिक   लक्ष्य   का ,  देते  हैं  उपदेश //
ज्ञान योग के बीच में, जिसका नहिं स्थान /
प्रगट हुआ उस क्षेत्र में ,अर्जुन क्यों अज्ञान //

चौपाई ;-
कुलरक्षा यदि  धर्म  समझते / महापुरुष उस पथ पर चलते //
हुआ  न  इससे  जन  कल्याणा / सिद्ध  इसीसे  यह अज्ञाना //
  
श्लोक;-
क्लैब्यं मा स्म  गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते /
क्षुद्रं   ह्रदयदौर्बल्यं   त्यक्त्वोत्तिष्ठ   परन्तप //३//

चौपाई;-
पार्थ   नपुंसकता   क्यों  आई / कर्म हीनता  क्यों  मन भाई//
वीर  परंतप  परम  यशस्वी / मत  बन  भीरु  पुरुष तेजस्वी//
तज निजह्रदय तुच्छ दुर्बलता/ उठ कर युद्ध,त्याग निर्बलता//

श्लोक;-
नपुंसक पुमान ज्ञेयो यो न वेत्ति ह्रदि स्थितम् /
पुरुषं  स्वप्रकाशं  तस्मानन्दात्मानमव्ययम् //

दोहा;-
याज्ञवल्क्य ऋषि ने किया , गार्गी से अभिव्यक्त /
आत्मा पुरुष, प्रकाश अरु , आनँद  पूर्ण  अव्यक्त //
जो हिय  स्थित  आत्मा ,  को  नहिं   जाने  मूढ़ /
उसे  नपुंसक  जानिये , योग   भाष्य  अति  गूढ़ // 
चौपाई;-
सतपुरुषार्थ आतमा   दर्शन / जाने  योगी  साधक मुनिजन// 
तनपुरुषार्थ काम नहिं आये/पथिकजीव सब तजकर जाये//
इससे  आत्म मुक्ति के हेता / वृत्ति युद्ध   कर इन्द्रिविजेता//
                               अर्जुन उवाच 
श्लोक;- 
कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये  द्रोणं च मधुसूदन /    
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि  पूजार्हावरिसूदन //४//

चौपाई;- 
अस कह केशव मतिपट खोले/ व्यथित पार्थ तब हरि से बोले//
दोहा;-
पूज्य द्रोणगुरु ,भीष्म ये, खड़े युद्ध विपरीत /
युद्ध करूँ  रण भूमि में ,केशव यह अनरीत //

द्वैत भाव प्रभु  प्राप्ति का,प्रथम स्रोत है द्रोण /
गुरु गुरुत्व ही प्रेरणा , पाय होय मन मौन //
चौपाई;-   
भ्रम  ही  भीष्म  मोह  उपजाये  / रिश्ते  नाते  जगत  बसाये //
आत्मा पूज्य इन्हीं को माने /जबतक निजको नहिं पहचाने //
मोह मिटे फिर कोइ न प्यारा / मिथ्या लगता  है जग  सारा //

श्लोक;-   
 न   बन्धुर्न   मित्रं   गुरुर्नैव   शिष्यः/
चिदानंदरूपः शिवोsहम् शिवोsहम् //
चौपाई;- 
गुरु में  लींन  शिष्य हो जाये  / तब गुरुत्व की  स्थिति पाये //
फिर नहिं गुरू नहीं कोई चेला /केवल  व्यापक ब्रम्ह अकेला //
यही परमआनन्द  स्वरूपा / कहहिं  कृष्ण  सदगुरु  के रूपा //
फिर मुझ  में  ही  करे निवासा /त्यागहु संशय और निराशा //
अर्जुन  गुरुपद  ढाल  बनाये / वृत्तियुद्ध  से   वह   कतराये //

श्लोक;- 
गुरूनहत्वा हि  महानुभावान् 
               श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके /
हत्वार्थकामांस्तु  गुरूनिहैव 
          भुंजीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् //५//

चौपाई;- 
इससे  जो  श्रद्धेय   हमारे / गुरुजन   हैं  उनको  बिन  मारे //
भिक्षाअन्न माग कर खाना/ समझूँ इस जग में  कल्याना //
क्योंकि गुरूजन का वध भी / रक्त सने सुख भोगूँ तब भी //

दोहा;- 
कर सेवा गुरु साधु की ,मागे जग कल्याण /
वह भिक्षा का अन्न है ,जाने ज्ञान निधान //
चौपाई;-  
आत्मा  ब्रह्म अन्न कहलाये  / तृप्ति  अात्मा  जिसमें  पाये //
साधक , सिद्ध   और  गुरुदेवा  / है   भिक्षान्न  इन्हीं  की  सेवा //
याचन कर, कुछ बिना गवाँये /ब्रम्ह अमिय क्रमशः मिलजाये //
मोहित  मन  तत्त्वामृत  लूटे  /मुक्ति  मिले परिवार  न  छूटे //

नव साधक जिमि  रहहिं  रिझाने / ऐसे   ही  अर्जुन  उलझाने //
वासुदेव   केशव   अस   भाखे  / वृत्तियुद्ध   की  क्षमता  राखे //
है स्वभाव क्षत्रित्व प्रधाना /उस हित नहिं भिक्षान्न  विधाना //
स्वयं न कर याचन से पाते / वह भिक्षान्न शास्त्र  अस  गाते //

अर्जुन  सोच  रहे यह  मनमें /भौतिक सुख बढ़ जाहिं  भजन में //
हमें   मिले  क्या   गुरुजन   मारे  / रक्त  सने  सुख  भोगें  सारे //
अस मन जान तर्क पुनि दीन्हा /केशव स्वयं ब्रम्ह ,नहिं चीन्हा //

श्लोक;- 
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो-
             यद्वा  जयेम  यदि वा  नो जयेयुः /
यानेव हत्वा वा न जिजीविषाम -
            स्तेsवस्थिताःप्रमुखे  धार्तराष्ट्राः //६//

चौपाई;-  
युद्ध करूँ या नहीं श्रेष्ठ  क्या / जानूँ  नहिं  रण  भूमि  फलिद्या //
जिन्हें  मार  जीना  नहिं   चाहें /  वे  उत्सुक   रण   देखत   राहें //
कौरव सुत  सब  स्वजन  हमारे / खड़े  युद्ध  रण  सम्मुख  सारे //

कुरु   धृतराष्ट्र    रूप  अज्ञाना / जिनके   सुत   मोहादिक   नाना //
अगर स्वजन ये मिट भी जायें / तब हम  जीकर  क्या  कर  पायें //
प्रथा पुत्र   निज  मन   अनुमाना / शायद   यह  भी   हो  अज्ञाना //
अब  तक   तर्क    दिये   बहुतेरे  /  वे    निकले    अज्ञान    घनेरे //
तर्क  असत्य   सभी  जब  पाये  / पार्थ  शरण  में  हरि  की आये //
काय,वचन,मन सब कर अर्पण / केशव सम्मुख किया समर्पण //
किया   प्रार्थना    हे    गिरिधारी  / हे    मुरलीधर    हे   वनवारी //
    
श्लोक;- 
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः 
          पृच्छामि     त्वां   धर्मसम्मूढचेताः /
यच्छ्रेयः  स्यान्निश्चितं  ब्रूहि  तन्मे 
        शिष्यस्तेsहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् //७//

 चौपाई;-  
मम  स्वाभाव  योगेश्वर   राया / कायरता  के  दोष  नशाया //
धर्म  विषय में  मोहित  है  मन / पूछूँ   तुमसे  हे यदुनन्दन //
मैं हूँ भ्रमितबुद्धि अज्ञानी/ निश्चित साधन निज मुख वाणी //    
कहिये मोहिं सहित विस्तारा / जिसमें  हो कल्याण  हमारा //
मैं  तव  शिष्य कृपा प्रभु कीजै /शरण  आपकी  शिक्षा  दीजै //

विद्या,बुद्धि निपुण अरु ज्ञानी / श्रीकृष्ण सम निज को जानी // 
दिये  तर्क   बहु   सब  में  हारे /  तब  अर्जुन  केशव  पर  वारे //  
साधक जब अर्पित हो जाये / सदगुरु  साधे   गिर नहिं  पाये //
पूर्तिकाल तक बन कर मीता  / संग  चलें  दें   ज्ञान   पुनीता // 
अंतरात्मा    में    रम   जायें / प्रकृति  घाटियाँ   पार  करायें //
अब अर्जुन कर रहे निवेदन /और बात इक सुनिये  भगवन //

श्लोक;- 
न  हि   प्रपश्यामि    ममापनुद्याद् 
                 यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् /
अवाप्य           भूमावसपत्नमृद्धं -
                  राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् //८//

दोहा;- 
धन वैभव सम्पन्न महि, क्षिति निष्कंटक राज /
देवों  का  स्वामित्व  पद , पाकर  के  भी  आज //
दिखे  नहीं   मुझको   कहीं , ऐसा   एक  उपाय /
इन्द्रिय  शोषक  शोक  को,  जो  दे  दूर भागाय //

चौपाई;-   
केशव यदि नहिं शोक नशाये / तो  सब  व्यर्थ ऐश्वर्य कमाये //
मिलना  जब   इतना  ही  स्वामी / क्षमा  करें  हे  अन्तर्यामी //
अर्जुन के मन मतिभ्रम भारी /अब कहिहैं क्या कृष्ण मुरारी //

                              संजय उवाच  
श्लोक;- 
एवमुक्त्वा      हृषीकेशं     गुडाकेशः   परन्तप /
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह //९//

चौपाई;-   
राजन !निद्राजीत धनंजय / इतना कह, करके  मन  निश्चय //
अन्तर्यामी  मधुसूदन  से / बोले , व्यथित  हुये   जब  मनसे //
भीष्म,द्रोण लख उपजी बाधा / युद्ध करूँ नहिं कह चुप साधा //

दोहा;-  
पार्थ दृष्टि  पौराणिकी , अब तक उसका  ज्ञान /
कर्मकाण्ड सँग जाहि में,भोगोपलब्धि विधान //
चौपाई ;-
जिसमें स्वर्ग  श्रेष्ठतम  माने / उससे आगे  पार्थ  न  जाने //
आगे ज्ञान प्रकाश दिखाया / यह मत मिथ्या कह यदुराया //
  
श्लोक;-
तमुवाच ह्रषीकेशः  प्रहसन्निव  भारत / 
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः//१०//

चौपाई;- 
सुनिये  भरतवंश महिपाला / पार्थहिं  व्यथित देख तेहि काला // 
उभय सैन्यबिच थिर नहिं डोले/ केशव बिहँसि वचन तब बोले //

                             श्रीभगवानुवाच
श्लोक;- 
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे /
गतासूनगतासूंश्च  नानुशोचन्ति   पण्डिताः//११//

चौपाई;- 
तुम  पंडित  सी  बातें  करते / हो  नहिं ज्ञानी  केशव  कहते// 
दोहा;-  
नहीं शोक  के योग्य  जो , उनका शोक मनाय /
वचन  सुनावत  ज्ञान  के ,  नैनन  नीर बहाय //
प्राण त्याग जिनने किये,नहीं तजे जिन प्राण /
उनका ज्ञानी नहिं करहिं, शोक  मोह  में आन //

श्लोक;- 
न त्वेवाहं  जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः/ 
न चैव न  भविष्यामः  सर्वे   वयमतः परम् //१२//

सोरठा;-
हुआ न ऐसा काल, जहँ मैं  तू ये नृप नहिं /
नहिं आगे भी काल, होंगे हम सबसे रहित //

चौपाई;-
हुआ न ऐसा युग जग  माहीं / जहँ  सदगुरु  अनुरागी  नाहीं //
अथवा  राजस वृत्ति  नरेशा  / अहं  रहा  नहिं  कह योगेशा //   
अरु आगे हम सब बिन अर्जुन / होगा ऐसा काल नहीं सुन //

श्लोक;- 
देहिनोsस्मिन्यथा  देहे  कौमारं  यौवनं  जरा / 
तथा   देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र   न  मुह्यति //१३//

चौपाई;- 
जैसे दैहिक विविध स्वरूपा / बालक  युवा  वृद्ध  त्रय रूपा //
वैसे  जीव  अन्य   तनु  धारे /  देह   पुरातन   वस्त्र  उतारे //
जीव  नित्य  जो  देह  समाया /  धीर  पुरुष  नहिं  मोहहिं //

श्लोक;-
मात्रास्पर्शास्तु   कौन्तेय    शीतोष्णसुखदुःखदाः /
आगमापायिनोsनित्यास्तांस्तितिक्षस्व  भारत //१४/

चौपाई;- 
आतप,शीत,दुःख,सुख भोगा / इन्द्रिय जनित विषय संयोगा // 
ये क्षणभंगुर  और  अनित्यम् / भारत ह्रदय सहनकर सत्यम् //

श्लोक;- 
 यं  हि  न  व्यथयन्त्येते  पुरुषं  पुरुषर्षभ /
 समदुःखसुखं धीरं सोsमृतत्वाय कल्पते //१५//

 चौपाई;- 
हे नरश्रेष्ठपार्थ !सुन बानी/ सुखदुख सम समझहिं जो ज्ञानी //   
इन्द्रिय जनित विषय की पीरा/ करे न व्याकुल वह नर धीरा // 
अमृत  तत्व   सोइ  नर  पावे / वही  मोक्ष  के  योग्य  कहावे //

श्लोक;- 
नासतो  विद्यते  भावो नाभावो  विद्यते  सतः /
उभयोरपि दृष्टोsन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः//१६//

चौपाई;-
असतवस्तु की सत्ता नाहीं / सत का नहिं अभाव जग माहीं //   
उभय  तत्व  तत्वज्ञों  द्वारा /  देखा  गया  भेद  युत  न्यारा //

श्लोक;-
 अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं   ततम् /
 विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति //१७//

 चौपाई;- 
अविनाशी  उसको   ही  जानो / दृश्यवर्ग  व्यापा  पहचानो //
दोहा;-  
देव ,असुर,नरलोक की ,महाशक्ति  भी होय /
अविनाशी यह आत्मा , मार सके नहिं कोय //

श्लोक;- 
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः /
अनाशिनोsप्रमेयस्य  तस्माद्युध्यस्व भारत //१८//

चौपाई;- 
नित्य स्वरूप जीव अविनाशी / यह  अप्रमेय  देह का वासी //
जीव अमर  तन  के  बहु रूपा /  नाशवान सब  देह स्वरूपा //
ऐसा   जान  भरतनृपवंशी  /  उठ, कर  युद्ध , वीर अवतंसी //
  
श्लोक;- 
य  एनं  वेत्ति  हन्तारं  यश्चैनं  मन्यते हतम् /
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते // १९//
  
चौपाई;-
आत्मा को समझे हन्तारी / या  जो  मृत  माने  सविकारी //
दोनों नहिं रहस्य के ज्ञाता / वह  नहिं हतै  न मारा  जाता // 
                                     
श्लोक;-
न जायते  म्रियते वा  कदाचि-
              न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः /
अजो नित्यः शाश्वतोsयं पुराणो-
              न   हन्यते    हन्यमाने   शरीरे //२०// 
                                    
चौपाई;-  
जन्मत  मरत न यह किहुँ काला / अर्जुन से बोले नँदलाला //
न उतपन्न ही फिर से होकर / ना  आगे  जन्मे फिर आकर //
यह है  नित्य अजन्मा जग में /सदा सनातन व्यापे तन में //
वही   पुरातन  तन  में  आता / देह  हते  नहिं  मारा  जाता // 
                                     
श्लोक;- 
वेदाविनाशिनं   नित्यं   य   एनमजमव्यम् /
कथं स पुरुषः पार्थ  कं घातयति हन्ति कम् //२१//
                                    
दोहा;-  
जो नर समझे आत्मा , अविनाशी अरु नित्य /
तथा  अजन्मा   अव्यम् , पृथापुत्र  यह  सत्य //
कैसे  किसको  मारता , मरवाता    वह   विज्ञ /
कहा   पार्थ   से   कृष्ण ने ,ज्ञान  योग  सर्वज्ञ //
//
श्लोक;- 
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय 
               नवानि   गृह्णाति   नरोsपराणि /
तथा  शरीराणि  विहाय  जीर्णा- 
             न्यन्यानि संयाति  नवानि देही //२२//
                                   
चौपाई;-  
त्यागे ज्यों नर वस्त्र पुराने / नवल वस्त्र धारे  सुख माने //
तैसइ  जीव  धरे  नव  देहा / तजे   जीर्ण  तनरूपी   गेहा //
         
श्लोक;- 
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः /
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः //२३//
     
चौपाई;- 
आत्महिं शस्त्र न काटे कोऊ  / जला सके नहिं पावक सोऊ //
नहीं भिंगो सकता इसको जल / वायु सुखाने में भी निर्बल //
                   
श्लोक;- 
अच्छेद्योsमदाह्योsयमक्लेद्योsशोषय इव च /
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोsयं सनातनः //२४//
                                     
चौपाई;- 
आत्मा सदा अदाह्य अक्लेदयं / निःसन्देह अशोष्य अच्छेद्यं //
अचल  सर्वव्यापी  अरु  नित्यं / सदा  सनातन   स्थिर   दिव्यं //  
                                      
श्लोक;- 
अव्यक्तोsयमचिन्त्योsयमविकार्योsयमुच्यते /
तस्मादेवं       विदित्वैनं      नानुशोचितुमर्हसि //२५// 
                             
चौपाई;-
यह अप्रमेय आत्मा सत्यं/ रहित विकार अव्यक्त अचिन्त्यं //    
ऐसा मन से जान यथारथ / शोक उचित नहिं तुझ को पारथ //
                                      
श्लोक;- 
अथ  चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् /   
तथापि   त्वं   महाबाहो   नैवं   शोचितुमर्हसि //२६//
                              
चौपाई;- 
जो साकार आत्मा  मानो / जन्मत मरत सदा यदि  जानो //
तब भी सुन महाबाहो दुर्धर / नहीं  शोक  के योग्य धनुर्धर //
                                       
श्लोक;-  
जातस्य ही ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च /
तस्मादपरिहार्येsर्थे   न  त्वं  शोचितुमर्हसि //२७//
                                       
दोहा;- 
इस मत के अनुसार  तो, यही  सत्य  तू  जान /
जन्म हुये की मृत्यु फिर , जन्में निष्चय मान //
इस उपाय बिन सृष्टि की,गति में सभी अयोग्य /
इस कारण भी तू  नहीं , शोक  करन  के योग्य// 
     
श्लोक;- 
अव्यक्तादीनि  भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत /   
अव्यक्तनिधनान्येव   तत्र    का   परिदेवना //२८//

चौपाई;- 
प्रथम जन्म से, जग के प्राणी /प्रकट  नहीं थे  सच  यह वाणी //
मृत्य बाद  ये पुनः  सृष्टि  में /  होंगे  फिर  अप्रकट  दृष्टि में //
मात्र बीच में प्रगटे जग में / मत कर शोक समझ यह मन में// 
                                    
श्लोक;-  
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन -
           माश्चर्यवद्वदति तथैव  चान्यः /
आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोति 
         श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् //२९//
                                     
चौपाई;- 
आत्मा   को   विस्मय   से   कोई  /  देखे   महापुरुष  जो  होई //
दूजा  इसका  तत्व  समझ नर / विस्मय से कहता वर्णन कर // 
तीजा इसका अधिकारी नर/सुने ध्यान से अति विस्मय  कर //
कोई कोई तो सुनकर भी/ नहिं समझहिं नहिं जानहिं तब भी //
                                       
श्लोक;- 
देही   नित्यमवध्योsयं   देहे  सर्वस्य  भारत /
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि //३०//
                                      
चौपाई;-  
हे  अर्जुन इस सृष्टि सृजन में / सदा  अबध्य आत्मा तन में //
इस कारण सब प्राणी जनके / योग्य  नहीं  तू शोक करन के //
                                        
श्लोक;- 
स्वधर्ममपि    चावेक्ष्य     न    विकम्पितुमर्हसि /
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोsन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते //३१//
                                       
चौपाई;-     
देख स्वधर्म उचित नहिं डरना / है  कर्त्तव्य  धर्मयुध  करना //
इससे  श्रेष्ठ  धर्म  नहिं  दूजा / क्षत्रिय  वंश  कर्म   अरु  पूजा //
                                         
श्लोक;- 
यदृच्छया    चोपपन्नं   स्वर्गद्वारमपावृतम्/ 
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ  लभन्ते  युद्धमीदृशम्//३२// 
                                          
दोहा;-
स्वयं  आप ही मिल गया ,अर्जुन यह उपहार /
धर्म  युद्ध  व्यापार  से , खुले  स्वर्ग   के  द्वार //
चौपाई;-   
इस  विधि  धर्मयुद्ध  जो पाते / भाग्यवान  क्षत्रिय  कहलाते //
                                       
श्लोक;-   
अथ  चेत्त्वमिमं धर्म्यं   सङ्ग्रामं न करिष्यसि /
ततः स्वधर्मं कीर्ति च  हित्वा  पापमवाप्स्यसि //३३//

चौपाई;- 
यदि  इस  धर्म  युद्ध  को पारथ / नहीं करे तो जाय अकारथ //
अपना धर्म  सुयस फिर खोकर / पावे  पाप धर्मच्युत होकर // 
                                       
श्लोक;- 
अकीर्ति   चापि    भूतानि 
                    कथयिष्यन्ति तेsव्ययाम् /
सम्भावितस्य    चाकीर्ति-
                             र्मरणादतिरिच्यते //३४//
                                      
चौपाई;- 
बहुत काल तक अयस तुम्हारा / वर्णन  करे  जगत  यह  सारा //
अपयश से अति उत्तम जग में /मरना,मान्य पुरुष के हित में //  
                                       
श्लोक;-
भयाद्रणादुपरतं     मंस्यन्ते    त्वां  महारथाः /
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् //३५//
                                      
चौपाई;- 
जिनमें अब तक था सम्मानित /होगा लघुता से अपमानित //
कहहिं महारथ दम्भी रागा / रण  से  डर कर   अर्जुन  भागा // 
                                     
श्लोक;-    
अवाच्यवादांश्च   बहून्वदिष्यन्ति   तवाहिताः /
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्//३६//
                                    
चौपाई;- 
अकथनीय शब्दों से निंदा /  करिहैं  तव  दुश्मन  नृप  वृन्दा //
तब क्या यह सब तू सुन पावे / इससे बढ़ दुख क्या कहलावे //
                                     
श्लोक;- 
हतो वा प्राप्यस्यसि  स्वर्गं  जित्वा  वा  भोक्ष्यसे महीम् / 
तस्मादुत्तिष्ठ       कौन्तेय       युद्धाय      कृतनिश्चयः//३७//
                                    
चौपाई;- 
मारा  गया अगर तू रण में / स्वर्ग सिधार मिले सुरगण में //
जो संग्राम विजय कर जाओ / तो  तुम राज धरा का पाओ //
इससे युध का करके निश्चय / पार्थ खड़ा  होजा  तू  निर्भय //
                                     
श्लोक;-    
सुखदुःखे    समे   कृत्वा  लाभालाभौ   जयाजयौ /
ततो    युद्धाय  युज्यस्व   नैवं    पापमवाप्स्यसि //३८//
                                     
दोहा;- 
विजय  पराजय  दुःख सुख ,और लाभ या हानि /
सब समान ये  जान  कर , युद्ध  हेतु  मन  ठान //
इस   प्रकार   के   युद्ध  से  , लगे  न  कोई  पाप /
पार्थ वचन यह सत्य  है ,  त्याग  ह्रदय  संताप //
                                    
श्लोक;-  
एषा  तेsभिहिता साङ्ख्ये
                     बुद्धिर्योगे    त्विमां   श्रृणु /
बुद्ध्या  युक्तो  यया  पार्थ 
                    कर्मबन्धं        प्रहास्यसि//३९// 
                                  
चौपाई;-  
पार्थ तुझे कह  बोध कराया / ज्ञानयोग का विषय  सुनाया //
कर्म योग अब कहौं बखानी / सुनहु पार्थ यह अमृत  वाणी //
जिससे युक्त बुद्धि होवे  जब / कर्मबन्ध  तू  त्यागेगा सब //
                                    
श्लोक;- 
नेहाभिक्रमनाशोsस्ति   प्रत्यवासो  न  विद्यते /
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य  त्रायते  महतो  भयात् //४०//
                                    
दोहा;- 
कर्मयोग  में  बीज का ,नाश कबहुँ नहिं होय /
ना आरम्भ ,विरुद्ध फल ,दोष आदि हैं  कोय //
कर्मयोग के रूप का  , धर्मी  स्वल्प  विधान /
जन्म मृत्यु के महाभय , का रक्षक ही जान //
                                    
श्लोक;-    
व्यवसायत्मिका       बुद्धिरेकेह      कुरुनन्दन /
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोsव्यवसायिनाम् //४१//
                                    
दोहा;- 
सुन   अर्जुन   विस्तार   से , भेद  सुनाऊँ   तोय /
कर्मयोग  निश्चयात्मिका , बुद्धि   एक  ही होय //
अस्थिर चित्त सकाम जन, अविवेकी जो कोइ /
निश्चय   उनकी   बुद्धियाँ ,  बहुभेदी   बहु  होइ //
                                   
श्लोक;-  
यामिमां पुष्पितां  वाचं  प्रवदन्त्यविपश्चितः /
वेदवादरताः  पार्थ   नान्यदस्तीति   वादिनः //४२//
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् /
क्रियाविशेषबहुलां     भोगैश्वर्यगतिं    प्रति //४३//
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां      तयापहृतचेतसाम् / 
व्यवसायात्मिका बुद्धिःसमाधौ न विधीयते //४४//
                                    
छन्द;-      
वेद  के  वे  वाक्य  जो  सब  कर्मफल  से  युक्त  हैं /
रखहिं   उनमें   प्रीति  नर जो  कामना  संयुक्त हैं //
और जिनकी बुद्धि में  है स्वर्ग ही  अति  श्रेष्ठतम /
स्वर्ग से बढ़कर  न  कोई  प्राप्य  वस्तु यथेष्ठटम //

जो    कहें   अविवेक   से   ऐसे   पुरुष  अज्ञान  हैं /
मंजुल दिखाऊवाणि से सबका लुभावत ध्यान हैं //
जन्मरूपी  कर्मफल  की   भावना   मन   में  धरे /
भोग अरु  ऐश्वर्य  की   नाना  क्रिया  वर्णन  करे //

और बहु  विधि  मन्जुवाणी  के  प्रलोभित ज्ञान  से /
हरलिया है चित्त उनका भी सुना  जिन  ध्यान  से //
भोग अरु ऎश्वर्य की आसक्तिजिनकी  स्वात्म  में /
निश्चयात्मिक बुद्धि उन जन की नहीं परमात्म में //   
                                    
श्लोक;- 
त्रैगुण्यविषया       वेदा       निस्त्रैगुण्यो      भवार्जुन /
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् //४५// 
                                     
दोहा;- 
इसप्रकार   से   वेद   सब ,  तीनों    गुण   अनुरूप /
भोग प्राप्ति  की  सकल विधि,वर्णन करहिं अनूप //
तू  हो  तिर्गुण   से   परे  ,  अरु  आसक्ति  विहीन /
द्वन्द्व, हर्ष , शोकादि  से , रहित  ब्रम्ह में  लीन //
अरु अप्राप्ति   की  प्राप्ति से, हो जा भाव विहीन / 
नहीं क्षेम की  चाह  हो , कर   मन  को  स्वाधीन // 
                                    
श्लोक;- 
 यावानर्थ  उदपाने  सर्वतः  सम्प्लुतोदके  /
 तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः //४६//
                                   
चौपाई;- 
जो सब विधि सम्पूर्ण  कहाये / ऐसा  सरवर जब मिल जाये //
जन  को जितना उसके आगे / उपयोगी  नहिं लघु सर लागे //
ब्रम्हविज्ञ  हैं जो ब्राम्हण  जन / रखें  वेद  से  वही  प्रयोजन //
आत्मतत्त्व रस ब्राम्हण  चाखे / वेदों  से नहिं मतलब राखे //
                                    
श्लोक;-
कर्मण्येवाधिकारस्ते   मा  फलेषु   कदाचन /   
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोsस्त्वकर्मणि //४७//
                                  
चौपाई;-
कर्मों  का  ही  तू  अधिकारी / फल  में  रुचि  नहिं  रहे  तुम्हारी //
अकर्मणयता   में   भी    तेरी / हो  आसक्ति   न   पार्थ   घनेरी // 
फलहित कर्म न कर हे अर्जुन/ और न कर्मत्याग निष्क्रिय बन //
                                   
श्लोक;- 
योगस्थः कुरु  कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय /             
सिद्धयसिद्धयोः समो  भूत्वा समत्वं योग उच्यते //४८//
                                  
चौपाई;- 
त्याग सर्वआसक्ति विरत हो/ सिद्धि असिद्धि सभी में सम हो//
योग  सुस्थित  होकर   पारथ / कर  कर्तव्यकर्म   निःस्वारथ//

जहँ मन में फल भाव न आये / वही समत्व योग  कहलाये //
जब कुछ कर्म किया यदि  जाये  / चाहे  पूर्ण अपूर्ण कहाये //
उस फल में समता दिखलाये / वही समत्व योग  कहलाये // 
                                   
श्लोक;-   
दूरेण   ह्यवरं   कर्म  बुद्धियोगाद्धनञ्जय /
बुद्धौ शरणमन्विच्छ  कृपणाः  फलहेतवः //४९//
                                  
चौपाई;- 
श्रेष्ठ समत्त्वरूप बुधि योगा / तुच्छ  सकाम  कर्म संयोगा //
इससे  हे  कौन्तेय  धनंजय /  ले  तू  समता का ही आश्रय //
फल का कारण बनने वाले / हैं  अतिदींन, कृपण मतिवाले // 
                                   
श्लोक;- 
बुद्धियुक्तो     जहातीह     उभे       सुकृतदुष्कृते /
तस्माद्द्योगाय युज्जस्व योगः कर्मसु कौसलम् //५०//
                                  
चौपाई;-  
समता बुद्धियुक्त विज्ञाता /  पाप  पुण्य  तज   जग   से  जाता //
तू समत्त्व बुधि योगी हो जा /  बन्धन मुक्ति  उपाय में खोजा // 
                                    
श्लोक;- 
कर्मजं   बुद्धियुक्ता   हि   त्यक्त्वा   मनीषिणः /
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् //५१//
                                     
दोहा;- 
सब समत्त्व बुधि  युक्तमुनि ,करहिं कर्मफल त्याग /
उनके      शुचि     अन्तःकरण  ,  में    उपजे   वैराग //
जन्मरूप    भवबन्ध   से  , मुक्त   मोक्ष   को   पाय /
निर्विकार    पद   वे    लहहिं ,  परमधाम   में   जाय //
                                     
श्लोक;- 
यदा   ते  मोहकलिलं   बुद्धिर्व्यतितरिष्यति /
तदा गन्तासि  निर्वेदंश्रोतव्यस्य श्रुतस्य च //५२//
                                    
चौपाई;- 
मोहरूप  दल  दल अतिभारी / पार  करे  जब  बुद्धि तुम्हारी //
तब अब तक जो  सुने  निराले  / अरु  सुनने  में  आनेवाले //
सब इह लोक और परलोकी / भोगत्याग हो विरत विशोकी //
                                     
श्लोक;- 
श्रुतिविप्रतिपन्ना  ते यदा स्थास्यति निश्चला /
समाधावचला   बुद्धिस्तदा   योगमवाप्स्यसि //५३//
                                    
चौपाई;-
सुन बहुवचन अनेक प्रकारा/ हुआ भ्रमित चित पार्थ तुम्हारा //     
जब इश्वर  चिंतन में  गहरे बुद्धि  अचल  थिर  होकर  ठहरे //
तब  ही  सिद्ध होय  तव  योगा / नित्य  ब्रम्ह  से  हो  संयोगा //

                            अर्जुन उवाच
श्लोक;
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा  समाधिस्थस्य केशव /
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् //५४//
                                
चौपाई;- 
जिज्ञासा ने मति पट खोले / तब  अर्जुन  केशव  से बोले //
जो समाधि  स्थिति में आये / स्थिर बुद्धि पुरुष कहलाये //
उसके  लक्षण  कहहु   बखानी / वह नर बोले कैसी  वाणी //
बैठे  कैसे  थिरमति  साधक / चलता  कैसे  वह  आराधक //

                         श्री भगवानुवाच 
श्लोक;- 
प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ  मनोगतान् /
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते//५५//
                                
चौपाई;-  
तब भगवन बोले हे अर्जुन / स्थितप्रज्ञ  पुरुष लक्षण  सुन //
मनस्थित सब इच्छा  त्यागे /आत्मा से  आत्मा  अनुरागे //
नित संतुष्टि स्वयं में पावे / उस  क्षण  स्थितप्रज्ञ  कहावे //
                                  
श्लोक;- 
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः /
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते //५६//
                                 
चौपाई;- 
बिन उद्विग्न हुये दुःख सहता / प्राप्त सुखों से निस्पृह रहता //
क्रोध, राग, भय  जिसका  जाये / स्थिर  बुद्धि  पुरुष  कहलाये //
                                   
श्लोक;- 
यः   सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य   शुभाशुभाम् /
नाभिनन्दति न द्वेष्टि  तस्य  प्रज्ञा  प्रतिष्ठता //५७//
                                   
दोहा;- 
नेह  रहित   सर्वत्र   में ,   रहकर   भाव   समान /
अशुभ और शुभवस्तु जो,पावहिं  नर  मतिमान //
नहिं  प्रसन्न  होवे  कबहुँ , नहीं  द्वेष  का भान /
ऐसे   नर   की   पार्थ  तू ,  बुद्धि  सुस्थिर   जान // 
                                   
श्लोक;- 
यदा    संहरते    चायं    कूर्मोsङ्गानीव    सर्वशः /                     
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता //५८// 
                                 
चौपाई;-  
अंग  समेटे  कछुआ  जैसे / विषय  विरत हो नर भी वैसे //
सभी इन्द्रियों विषयों से जब /मानव मनको दूर रखे तब //
उसकी बुद्धि सुस्थिर जानो / स्थिरबुद्धि  पुरुष  वह मानो // 
                                  
श्लोक;-  
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः /
रसवर्जं रसोsप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते //५९//
                                
चौपाई;-  
निज इन्द्रियद्वारा विषयों को / ग्रहण करे नहिं उन पुरुषों  को //
केवल विषयमुक्ति मिल जाती/ उनकी नहिं आसक्ति नशाती //
स्थितप्रज्ञ   जबहिं    हो   जाये / आत्मतत्त्व  दर्शन  में   आये //
फिर मन की सब चाह  नशाये / पार्थ ! निवृत्ति  सदा  को पाये //
                                  
श्लोक;- 
यततो ह्यपि कौन्तेय  पुरुषस्य विपश्चितः /
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः //६०//
                                  
दोहा;- 
बिन आसक्ति विनाश के,प्रमथन प्रकृति प्रधान /
सर्व   इन्द्रियाँ   यत्नरत ,  योगी   जो  विद्वान //
उनके भी मन का   हरण , वे  कर  लेहिं  बलात् /
जिनके मन आसक्ति की, शेष किरण रह जात // 
                                  
श्लोक;- 
तानि  सर्वाणि  संयम्य युक्त  आसीत  मत्परः /
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तास्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता //६१//
                                 
चौपाई;- 
इससे साधक सबसे पहिले / सभी इन्द्रियाँ वश में  करले //
फिर एकाग्रचित्त युत होकर /  ध्यान भाव में होवे तत्पर //
करें इन्द्रियाँ  वश में जो नर / होय बुद्धि उनकी ही  स्थिर //
                                  
श्लोक;-  
ध्यायतो     विषयान्पुंसः      सङ्गस्तेषूपजायते /
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोsभिजायते //६२ //
                                  
छन्द;- 
विषय का चिंतन निरन्तर करहिं जो मन में सदा /
विषय की आसक्ति  होती  है  उन्हीं  जन में  तदा //
फिर विषय की कामना आसक्ति  से मन  में जगे /
कामना में  विघ्न  से  मन   क्रोध  का  अंकुर  उगे //
                                 
श्लोक;- 
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः /
स्मृतिभ्रंशाद्  बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति //६३// 
                                 
छन्द;- 
क्रोध से  उतपन्न हो  अति  मूढ़ता  की  भावना  /
मूढ़ता के  भाव से  हो  स्मृति  भ्रम  की  धारणा //
स्मृति भ्रम से बुद्धि यानी ज्ञानशक्ति विनाश है /
बुद्धि के फिर नाश से नर  पतन अथवा नाश  है //
                                              
श्लोक;- 
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् /
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा  प्रसादमधिगच्छति//६४/
                                
दोहा;- 
पर जो  भी  स्वाधीन  मन, नर सिधि साधक होय /
राग , द्वेष  तज  इन्द्रियाँ , वश  करते  जो  कोय //
इन्द्रिय  द्वारा  विषय में , विचरण करत सज्ञान /
प्राप्त   करे   अन्तःकरण ,  में   प्रसन्नता   भान //
                               
श्लोक;-   
प्रसादे  सर्वदुःखानां    हानिरस्योपजायते /
प्रसन्नचेतसो ह्याशु  बुद्धिः पर्यवतिष्ठते //६५//
                              
चौपाई;- 
जब  नर  अन्तर्मन  हर्षाये / मिटें  दुःख  सब  तन  पुलकाये //
शीघ्र मुदित उस आराधक की/ होकर बुद्धिविमल साधक की //
सर्व दिशा से हट  सब  भाँती / परमब्रह्म  में  थिर हो  जाती //   
                              
श्लोक;- 
नास्तिबुद्धिरयुक्तस्य    न    चायुक्तस्यभावना /
न चा  भावयतःशान्तिरशान्तस्य  कुतः  सुखम् //६६//
                             
चौपाई;- 
जिनके नहीं विजित मन,इन्द्रिय/या कहिये जो नहीं जितेन्द्रिय //
वे   जन'योग'   साधना   हीना / निश्चयात्मिक   बुद्धि   विहीना //

जो निष्काम कर्म  में  रत हैं / वे  निश्चयात्मकबुद्धि   पुरुष   हैं // 
                               
छन्द;-  
अयुक्त वह अन्तःकरण जो भावना से  हीन  है /
भावना से हीन नर सुख और शान्ति  विहीन  है //
शान्ति से है रहित उस नर को  भला  कैसे कहीं /
होयगा सुख प्राप्त जिसके इन्द्रियाँ वश में नहीं // 
                                 
श्लोक;- 
इन्द्रियाणां हि चरतां  यन्मनोsनुविधीयते /
तदस्य  हरति  प्रज्ञां   वायुर्नावमिवाम्भसि //६७//
                                
सोरठा;- 
ज्यों जल विचरत नाव ,हरे झकोरों से पवन /
वैसइ विषयी भाव,जहँ इन्द्रिय करतीं रमण //
                                
चौपाई;- 
तब अयुक्त जन मन अनुरागे / जिस  इन्द्रिय  के  पीछे भागे //
वह इन्द्रिय उस योगी जन  की / बुद्धि हरे  अविवेकी  मन  की //
                                    
श्लोक;- 
तस्माद्यस्य   महाबाहो   निगृहीतानि   सर्वशः /                     
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता //६८//
                                  
चौपाई;- 
इन्द्रिय जब इन्द्रिय विषयों से / होवें निग्रह जिन पुरुषों से //
महाबाहु  वह  योगी  नर  है / बुद्धि  उसी  की   ही  स्थिर  है //
                                    
श्लोक;- 
या  निशा सर्वभूतानां  तस्यां  जागर्ति संयमी /
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः//६९//
                                   
चौपाई;- 
जो   हैं   नित्य   ज्ञान    के    रूपा /  चिदानन्दसन्दोह   अनूपा //
उसकी   प्राप्ति   हेतु  मुनियोगी  /  स्थितप्रज्ञ   ब्रह्म   संयोगी //
जागहिं करहिं योग अरु ध्याना/ जगजीवन्ह वह निशा समाना//
नाशवान   जो  संसारिक  सुख / उसे  प्राप्त करने  को  उन्मुख //
जागहिं प्राणी जानि  विहाना / ब्रम्ह   विज्ञ  को  निशा समाना //
                                    
श्लोक;-  
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं-
                 समुद्रमापः   प्रविशन्ति    यद्वत् /
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे 
             स शान्तिमाप्नोति न काम कामी //७०//
                                   
चौपाई;- 
अचल प्रतिष्ठित जलधि गँभीरा / उसमें ज्यों नाना सरि नीरा // 
होय समाहित उदधि न डोले / सब विधि पूर्ण तबहुँ , हरि बोले //
ऐसइ स्थित प्रज्ञ   कहाये /  बिन   विकार  सब   भोग  समाये //
शांति   प्राप्त  वे    ही   जग  माहीं /  भोग  चाहने  वाले  नाहीं //
                                     
श्लोक;-   
विहाय कामान्यःसर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः /
निर्ममो निरहंकारः  स शान्तिमधिगच्छति //७१//
                                      
दोहा;- 
जो नर तज सब कामना, ममता  सकल विकार /
गर्वरहित   निष्पृह   हुआ , विचरे    इस   संसार //
वही शान्ति को प्राप्त है,कहहिं कृष्ण सुन  पार्थ /
योगयुक्त जन की यही , स्थिति समझ यथार्थ // 
                                    
श्लोक;- 
एषा ब्राह्मी  स्थितिः पार्थ  नैनां  प्राप्य  विमुह्यति /
स्थित्वात्स्यामन्तकालेsपि   ब्रम्हनिर्वाणमृच्छति//७२//
                                     
दोहा;-     
इस स्थिति को प्राप्त कर ,मोह न जाग्रित  होय /
ब्रम्ह लीन   हो   अंत   में  ,ब्रम्ह   कहावे    सोय //

पाय कृपा निज इष्ट की ,सांख्ययोग अद्ध्याय /
हुआ पूर्ण पढ़ विमलमति,पुरुष मोह भ्रम जाय //

इसप्रकार श्रीमद्भगवद् गीता रूपी  उपनिषद् एवं  ब्रह्म विद्या तथा योगशास्त्र  विषयक श्रीकृष्ण और  अर्जुन के  संवाद  में पं० उदयभानु तिवारी 'मधुकर 'कृत महाकाव्य ''गीता मानस ''में 'कर्म जिज्ञासा 'नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ /

                              हरी ॐ तत्त्सत् 
           

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