Wednesday, October 1, 2014

ॐ 
श्री गीता- मानस 
श्री भगदगीता काव्यामृत
अथ प्रथमो अध्यायः
दोहा 
       प्रथमहिं कर गुरु वंदना, हिय धरि  श्री योगेश /
       रचहुँ  काव्य  रस धार में  , गीतामृत  उपदेश //

धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 
       धर्मक्षेत्रे   कुरुक्षेत्रे    समवेता    युयुत्सवः /
           मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय //१//
चौपाई 
         उत्कंठित   हो  पूछते , कुरु   धृतराष्ट्र   नृपाल /
          कहु   संजय   विस्तार  से , कुरुक्षेत्र  का  हाल //
          धर्म भूमि  कुरुक्षेत्र में , मम  सुत  पाण्डव वीर /
          युद्ध भावना  से   जुडे  , सैन्य  सहित  रणधीर //
         अपना उस रणक्षेत्र  में , केंद्रित  करके  ध्यान /
           उभय पक्ष ने क्या किया ,वह सब करो बखान //
चौपाई
      यह तन क्षेत्र प्रकृति गुणखानी /पञ्चतत्व इसकेनिर्माणी//
      दैव   सम्पदा   की  जो  गेही  /  धर्मक्षेत्र  सोई   नर  देही //
    पार्थहिं केशव ने समझाया  / इस तन को ही क्षेत्र बताया //
     श्लोक     
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते /
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः//
चौपाई 
       दैव सम्पदा  पाण्डव  वीरा / कौरव  आसुर  वृत्ति प्रवीरा //
       देह पिंड  इन कर आधारा / वृत्ति  युद्ध  महाभारत  सारा //
      धर्मक्षेत्र आत्मा  का जानो / यह तन  कुरुक्षेत्र  पहचानो //
      मुक्ति  उपाय  क्षेत्र से  जाने / वे  क्षेत्रज्ञ   सुविज्ञ  सयाने //
      मन में सदगुणसंगति निखरे /युद्धक्षेत्र  में  साधक उतरे // 
 दोहा 
    युद्ध क्षेत्र क्षेत्रज्ञ का, सम्मुख लखे न कोय /
     दैव  आसुरी  वृत्ति   में, युद्ध  निरंतर होय //
   बहु जन्मों की साधना,विप्र वर्ण  में लाय /
   मुक्ति दिलाये क्षेत्र से,भव बंधन कट जाय //
 अज्ञानी धृतराष्ट्र मन,मोह विकार अधीन /
  देख न पाये सत्य को ,हुआ  दृष्टि से हीन //
 युद्ध क्षेत्र , क्षेत्रज्ञ  का , संयम  लेता जान /
   कहो हुआ  क्या युद्ध में , पूछ रहा अज्ञान // 

संजय उवाच
श्लोक 
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा /
      आचार्यमुपसङ्गम्य  राजा   वचनमब्रवीत् //२//
चौपाई 
      सुन संजय ने ध्यान लगाया/ जो देखा सब नृपहिं सुनाया//
      व्यूह बद्ध पाण्डव दल सारा/ देख तुरग,गज,रथ असवारा//
      द्रोण निकट दुर्योधन आये / गुरुवर  को  ये वचन सुनाये//
     
     द्वैताचार द्रोण द्विज शिक्षक /उभय वृत्तिबिचज्ञानप्रशिक्षक //
     मैं हूँ भिन्न, भिन्न जगदीश्वर / भाव जगे साधक के अंदर //
     यही द्वैत का भान कराये  / ब्रह्म  प्रप्ति हित  मन अकुलाये //
    तब मन करतफिरत गुरुशोधा/उभयवृत्तिबिच प्रथमपुरोधा //
   जो दे प्रथम  ज्ञान  की  दीक्षा /वही  द्रोण  गुरु की है शिक्षा //
   आगे जो  गुरु  योग  सिखाये  / योगेश्वर  सदगुरु कहलाये //
  ब्रह्म स्थित जब मन हो जाये /  तब अद्वैत भाव  वह पाये //
  हो जाये  मन  एकाकारा /  लखे  ब्रह्ममय  यह  जग सारा //
 आत्मिक धन स्थिर जिज्ञासी /दूषित करे मोह  अघराशी //
 सकल व्याधि कर मूलविमोहा / मत्सर,लोभ,कामअरुकोहा //
यही प्रकृति की ओर लुभायें /आत्मिक धन में दोष जगायें //
दोहा 
           पुण्य प्रवाहित संगठित ,सजातीय चैतन्य /
          व्यूह  बद्ध सेना निरखि , दैवसम्पदा जन्य //
          मोह रूप दुर्योधन ,निज गुरु सम्मुख जाय /
         द्वैतभाव  गुरु  द्रोण  से  ,  कहता  है हर्षाय //
श्लोक 
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् /
व्यूढां  द्रुपदपुत्रेण   तव  शिष्येण  धीमता //३//     
     
        चौपाई  
 धृष्टद्युम्न प्रिय पुत्र  द्रुपद के  / बुद्धिनिधान  शिष्य  गुरुवरके //
 पाण्डव   सेना   व्यूहाकारा  /  हुई   व्यवस्थित  उनके  द्वारा//
 उनकी  यह  सेना  अति भारी  /  देखहु  गुरुवर  दृष्टि पसारी//    
शाश्वत अचल सुस्थिति आये / द्रुपद महारथ  नृप  पद पाये //
तासुतनय शाश्वत पदसाधक /धृष्टद्युम्न सो  दृढ़मन  साधक //
दैवी  सम्पद  सैन्य  प्रधाना /युद्ध निपुण वह शिष्य सुजाना //
जिससे  सैन्य  व्यवस्थित  सारी / वृत्ति युद्ध की यह तैयारी //
    श्लोक 
              अत्र शूरामहेष्वासा    भीमार्जुनसमायुधि /
              युयुधानो    विराटश्च    द्रुपदश्च   महारथः//४//
              धृतकेतुश्चेकितानः  काशीराजश्च वीर्यवान /
              पुरुजित्कुन्तिभोजश्च   शैव्यश्च  नरपुंगवः//५//
              युधामन्युश्च विक्रांत उत्तमौजाश्च
              सौभद्रो   द्रौपदेयाश्च   सर्व   एव  महारथाः//६// 
चौपाई 
पाण्डव  यहाँ  सैन्य  जो लाये /  उसमें  महेष्वास   नृप आये //
अर्जुन  भीमसेन    से    योधा /  आये   कुरुक्षेत्र   कर  क्रोधा //
शूरवीर  सात्यकि   महिपाला / उनके  संग   विराट  भुआला //
राजाद्रुपद   महारथ    भारी  /  धृष्टकेतु ,  चेकितान  जुझारी //
पुरुजित काशिराज बलवाना/ कुन्तिभोज रणनिपुण सुजाना // 
मनुजश्रेष्ठ  नृप  शैब्य  धनुर्धर /  उत्तमौज   बलवान  गदाधर //
अति पराक्रमी  हैं  युद्धमन्यु  /  तथा   सुभद्रासुत  अभिमन्यु //
द्रौपदिसुत  पाँचों  भट  भारी /  सभी  महारथ   युधव्रत धारी //
     
पुण्यवृति युत सब  नृप  वीरा  / ये   हैं   वृत्ति  युद्ध  मतिधीरा //
मनसंस्थित  कर  दे  हिय  देशा / महेष्वास   वह  वीर नरेशा //
भावस्वरूप  भीम   गदधारी  /  अनुरागी   अर्जुन  सम  भारी //
ऐसे  शूरवीर   बहु   भूपा /  नृप  सात्यकि  सात्विकता  रूपा //
ब्रह्म व्याप्त  सब  जगत  निहारे / वह विराट नृप की धृतिधारे //
निश्चल ब्रह्म  सुस्थति   पाये  /  वही  परमपद  तक  ले  जाये //
वह  योद्धा  नृप  द्रुपद  महारथ  / युद्ध  करे लख कर परमारथ //
दृढ़  कर्त्तव्य क र्मरत  ध्यानी / धृष्टकेतु   नृप  रहित  अमानी //
चित्त इष्ट  में  खींच   रमाये  / चेकितान  नृप  वह   कहलाये //
परम  ईशवासी  अविनाशी  / सो   साधक  की  काया काशी // 
कारण, सूक्ष्म, स्थूल  शरीरा / जीते  सो  नृप  पुरुजित  वीरा // 
निज कर्तव्य कर्म  के  द्वारा / जीत  लिया  है  यह  जग  सारा // 
मनुजश्रेष्ठ  नृप शैब्य  धनुर्धर  / वृत्ति  युद्ध  का   योद्धा   दुर्धर //
युद्ध  नीति  पर करे  विचारा  / युधामन्यु वह  भट  बरिआरा //
वीर धुरन्धर  गुणनिधि  ध्यानी / उत्तमौजनृप  धीर  अमानी // 
ओजसशक्तियुक्त आराधक / मनमौजी कवि अरु स्वर साधक // 
संग     सुभद्रापुत्र     प्रवीरा   /  महाबाहु   विक्रम   मतिधीरा // 
शुभ में मस्त  न मानत हारी / वह अभिमन्यु अभय भटभारी //
दोहा 
         ध्यानरूप   है   द्रोपदी , पाँच    पुत्र   अतिवीर /
        सुहृद, सौम्य, लावण्यता, दृढ़ ,वात्सल्य प्रवीर //
        सब  के  सब  योद्धा प्रबल , धीर , वीर , गंभीर /
        ये  हैं  दैवी  सम्पदा ,   पाण्डव  दल   के  वीर //
श्लोक 
         अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध  द्विजोत्तम /
         नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते//७//
दोहा 
   गुरू  श्रेष्ठ   हे  विप्रवर ,  अपने  पक्ष प्रधान /
     जो हैं  उनको  जानिये , करवाऊँ   पहचान //
    कुरू सैन्य अध्यक्ष हैं,जो जो निपुण सुजान /
       बतलाता हूँ नाम  ले , सुनिये  देकर ध्यान // 
चौपाई 
उभय वृत्ति रण  चित्रण सारा / जहँ गुरु  द्रोण  द्वैत  आचारा //
जब तक विलग इष्ट से साधक /रहे प्रकृति में वह आराधक //
लेश  मात्र   जब  तक  है  दूरी /  द्वैत रहे अरु  तन  मगरूरी //
द्वि पर  विजय  हेतु  जो  प्रेरे /  पहले  गुरु  हैं  द्रोण   चितेरे //
अर्ध  ज्ञान  जब  करे  विकासा /  देत प्रेरणा  अरु जिज्ञासा //
दोहा 
   मोह द्वैत गुरु द्रोण से ,निज दल सैन्य प्रधान /
    वीरों का वर्णन  करे , मन  में कर  अभिमान //
श्लोक 

             भवान्भीमश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः /
             अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च //८//
                                    चौपाई 
  गुरुवर आप ,  भीष्म  हैं  जैसे /  विजयी  कृपाचार्य भी वैसे //
  वीर  कर्ण  अरु  अश्वत्थामा / महारथी  अतुलित  बलधामा //
  सोमदत्तसुत   भूरिश्रवा   से /  युद्ध  प्रवीण  विकर्ण  कला से //
       
 असुर  सम्पदा  वीर  गिनाये  / बहिर्मुखी  जो  भ्रम उपजाये //
द्वैताचारी  द्विज   मतिधीरा  / वही   प्रथम  गुरु  द्रोण प्रवीरा //
भ्रमित बुद्धि ही भीष्म पितामह / दुर्जयरिपुहै साधक का यह // 
भिन्न  कर्म   है  कर्ण  यशस्वी / रण में निपुण पुरुष तेजस्वी //
कृपाचार्य  आचार्य  अधीरा  / साधन  त्याग  फँसा  भव भीरा //
कृपा भाव  साधक  में  आये  / साधन  में   बाधक  बन जाये //
ऋद्धि सिद्धि बहु लोभ  दिखायें / योगी  पथ  से च्युत हो जायें //
कृपाचार्य   वह  सिद्ध  अधूरा  / जिसका योग  हुआ नहिं पूरा //
पूर्ण  सिद्धि  बिन  कृपा  दिखाये  / संचित सारी शक्ति गवाँये //
दुराधर्ष   है    अश्वत्थामा   /  यह  आसक्ति   मोह  की यामा //
वीर  विकर्ण  विकल्प  स्वरूपा  / युद्ध प्रवीण  पड़ा रण कूपा //
भूरिश्रवा  भ्रममय  निज  श्वासा / बहिर्प्रवाह प्रधान  सुपासा //
दोहा  
ध्यान योग में योगि जो,लखे चन्द्र सी ज्योति /
 सोमदत्ति सो स्थिति श्रवण ओम ध्वनि होति //
चौपाई 
   वह ध्वनि जो साधक सुन पाये /किन्तु अहं अज्ञान नजाये //
  भूरिश्रवा सो कुरुदल योधा /दम्भ युक्त निज चित्त न शोधा //
श्लोक 
           अन्ये च बहवः शूरा  मदर्थे त्यक्तजीविताः/
           नानाशस्त्रप्रहरणाः    सर्वे    युद्धविशारदाः//९//
चौपाई 
मम  हित जीवन  आशा  त्यागी / बहुतक शूरवीर  अनुरागी/
शस्त्र सुसज्जित अगणित वीरा / युद्ध चतुर सब ही रण धीरा//

दुष्टवृत्ति रण  को मुनि ग्यानी /शस्त्र शास्त्र रण निपुण बखानी //
श्लोक 
  अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् /
         पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीष्माभिरक्षितम् // १० //
चौपाई 
गंगासुत  से  रक्षित  सारी / सब  विधि  सेन अजेय हमारी //
भीम सुरक्षित पाण्डव दल है / उस  सेना  से  जीत सरल है //

जब तक मन में भ्रम है जीवित /अरु इच्छायें रहें असीमित // 
तब तक कौरव  सेना दुर्जय  / रहतीं असुर  वृत्तियाँ  निर्भय //
भ्रम से बुद्धि भ्रमित हो जाये  / पुण्यवृत्ति फिर जीत न पाये //
भाव भीम  के बस  भगवाना / सो ज्ञानी जिसने यह जाना //
श्रद्धाभाव  ह्रदय  में आये  / अविदित  ब्रह्म विदित हो जाये //
पुण्य  विकास   भाव  से  पाये / पुण्यवृत्ति  रक्षक कहलाये //  
लेशमात्र  त्रुटि हो साधन में  / भ्रम उपजे साधक के मन में //
भ्रमित भाव फिर सँभल न पाये /इससे जीत सुगम हो जाये //

श्लोक 
              अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः / 
              भीष्मेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि //११//
चौपाई 
इससे निज निज स्थिति गहिये/ दल सम्मुख मोर्चे पै रहिये //
भीष्मपितामह   की  ही रक्षा / करें  सजग  चहुँ  ओर सुरक्षा //  

मन  का  मोह -रूप  दुर्योधन  / जो  है  दुष्टवृत्ति  गठबन्धन //
कहे  करें  सब  भ्रम  की  रक्षा  / इनसे  अपनी  पूर्ण  सुरक्षा //
इसमें  किंचित  नहिं  संदेहा  /  इनसे  रक्षित  सबके  गेहा //
श्लोक 
        तस्य    सञ्जनयन्हर्षं    कुरुवृद्धः   पितामहः/
        सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् //१२//
चौपाई   
कौरव दल   के   महाप्रतापी / भीष्म  गर्जना  रण में व्यापी //
दुर्योधन  मन   हर्ष  जगायो  / सिँहनाद  कर  शंख  बजायो //

सेनापति  भ्रम    भीष्म   सयाने /  देववृत्ति  को  लगे डराने //
बल अनुमान प्रताप दिखाया  / मोहित  मन में हर्ष जगाया //
युद्ध  घोष  कर  शंख  बजायो / सिंहनाद कर भय उपजाओ //
ब्रह्म  अभय सत्ता अविकारी / हो भयभीत प्रकृति सविकारी //
 यदि भ्रम भीष्म विजय पा जाये /साधन पथ से भृष्टकराये //   
श्लोक 
          ततः  शङ्खाश्च  भेर्यश्च   पड़वानकगोमुखाः/
          सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोsभवत्//१३//
चौपाई 
फिर सब  एक संग मिल साजे / ढोल  मृदंग  शंख बहु बाजे// 
नरसिंघे   अरु    जंग   नगारे  /  महाभयंकर   नाद   उचारे// 

छल,बल,कपट  अस्त्र  बहु धारे  / असुर  वृत्ति  के  बजे नगारे // 
सब  मिल  अपनी शक्ति दिखायें /कर कोलाहल भयउपजायें //
साधक यदि  इनसे  भय खाये / मन का  मोह घना हो जाये //
पुनि पाण्डव दल  ने  कर रोषा / शंख बजाय कीन्ह उदघोषा //
श्लोक  
ततः  श्वेतैर्हयैर्युक्ते  महति  स्यन्दने  स्थितौ/
माधवःपाण्डवाश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः//१४//
चौपाई 
श्वेत  अश्व रथ रुचिर  सुहाये / कृष्णार्जुन  दिब  शंख बजाये //  

श्वेतअश्वरथ तनिक न श्यामा /दिव्यअलौकिक मनअभिरामा //
सुर ब्रह्मादिक  अरु  भू  लोका  / इनसे  परे  जहाँ  नहिं शोका //
सो  परब्रह्म  निगुण  निर्दोषा  / ताहि  मिलाने  कर  उदघोषा // 
श्रीकृष्ण ने  शंख  बजाया / लक्ष्य  विजय  विश्वाश  जगाया //
                                     श्लोक
पांचजन्यं   हृषीकेशो   देवदत्तं   धनञ्जयः /
       पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः //१५//
छंद
          पांचजन्यं   शंख  फूँका  कृष्ण  ने  रण घोष में /
          देवदत्तं  नाद  कीन्हा   पार्थ  ने   भर   रोष   में //
          विकट भट भारी गदाधर  पाण्डुसुत बलसीम ने /
          पौण्ड्रनामक शंख  भयप्रद  नाद कीन्हा भीम ने //
चौपाई
दैवी  सम्पद  जासु   अधीना  / वीर   धनंजय  युद्ध  प्रवीणा //
देवदत्त  दिब  शंख   बजाया  / निजदल  में  देवत्त्व  जगाया //
कर्म  भयानक  जिसके  सारे  / भावभीम  जिससे  हरि हारे //
पौंड्र नाम जब शंख बजाया / भक्ति  भाव से हिय भर आया //
पौंड्र जानिये हरिपद प्रीता /जिस हिय उपजे वह जग जीता //
श्लोक
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः /
नकुलः   सहदेवश्च    सुघोषमणिपुष्पकौ //१६//
छंद
          अनंतविजयी शंख ध्वनि ,गूँजी युध्ष्ठिरराज की /
          श्रेष्ठ  कुन्तीपुत्र  पाण्डव  धर्मयुत  महाराज  की //
          नकुल शंख सुघोष का भी  रव  सुना  गुरुदेव ने /
          बाद मणिपुष्पक बजाया ,पाण्डुसुत सहदेव ने //
चौपाई 
वृत्तियुद्ध  में जो  है स्थिर  /  उस   योद्धा   का  नाम  युधिष्ठिर //
धर्म  युधिष्ठिर  शंख  अनूपा   /  गूँजा   शब्द   नाद  के  रूपा //
जो अनंत में विजय  दिलाये  / वह  अनंत  विजयी  कहलाये //
ॐ  अनंत  नाद  जब  आये  / चित  में   स्थिर  भाव  जगाये //
नियम नकुल का  शंख  सुघोषा  / वृत्तियुद्ध  में  कर  उदघोषा //
अशुभ शमन कर उन्नति लाये /क्रमशःचित शुभ में रम जाये //
है  प्रत्यक्ष श्वास  मणि रूपा   / वह मणिपुष्पक  शंख  अनूपा //
यह मूल्य निधि कहहिं मुनीशा / नर तन पाय जाप कर ईशा //
सतसंगति   ही   है   सहदेवा  /  हिय   प्रेरक  श्री  सदगुरुदेवा // 
सत्य संग  ने  शंख बजाया  / आत्मतत्त्व   संगत मन पाया //
चिंतन ध्यान  समाधि  लगाये  / वह सतसंग साधु तब पाये //
सत सानिध्य मिलेगा जिसक्षण /श्वास श्वास परमिलेनियंत्रण //
मन के सँग हो इन्द्रि निरोधा / सब पाया  जिसने चित सोधा //
ताल संग स्वर ज्यों  मिल जाये  / चित्त आत्मा  में  रस पाये // 
फिर मिलउभय करहिं सतसंगा /झर झर झरे भाव रस गंगा //
                                    श्लोक 
          काश्यश्च  परमेष्वासः  शिखण्डी  च   महारथः/
          धृष्टद्युम्नो    विराटश्च    सात्यकिश्चापराजितः//१७//
          द्रुपदो       द्रौपदेयाश्च      सर्वशः     पृथ्वीपते /
          सौभद्रश्च महाबाहुःशङ्खान्दध्मुः पृथक् पृथक् //१८//    
दोहा 
           श्रेष्ठ  धनुर्धर  काशि नृप , और  शिखंडी वीर /
           धृष्टद्युम्न विराट नृप , अजय सात्यिकी धीर //
           द्रोपदिसुत , नृप  द्रुपद के शंख बजे सब ओर /
           महाबाहु  अभिमन्यु का , शंख नाद घन घोर //  
चौपाई 
जो मन इन्द्रिय बस कर पाये  / अन्तः में   केंद्रित  हो  जाये //
परमईशवासी  अविनाशी  /  उसी  पुरुष  की   काया   काशी //
शिखा -सूत्र परित्याग  शिखंडी  / लक्ष्य  प्रतीक महा बरबंडी //
ब्रह्मप्राप्ति जब तक है शेषा / तब तक  पुरुष पथिक  के  भेषा // 
प्राप्य  लक्ष्य  जब  मन  पा जाये / उससे  श्रेष्ठ नहीं जो पाये //
लक्ष्य प्राप्ति  मन का भ्रम  मेटे / साधक इच्छा सकल समेटे //
लक्ष्य सिखंडी सम्मुख आये /तब भ्रमभीष्म समन हो जाये //
दोहा   
          ब्रह्म  अचल  पद  दायक  , द्रुपद  महारथ  धीर / 
          ध्यान  द्रोपदी   के  तनय  , पाँचों  महा  प्रवीर //
         सुह्रद, सौम्य ,लावण्यता , वात्सल्य  ,दृढ़  वीर /
         दीर्घ  भुजी  अभिमन्यु  का  , शंखनाद  गंभीर //
        अलग अलग सबने किया ,शंख बजा कर घोष //
        वृत्ति  युद्ध  रणक्षेत्र  में  ,जागा  सात्विक  रोष //
                                     श्लोक 
            स घोषो  धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्  /
            नभश्च पृथिवीं चैव  तुमुलो  व्यनुनादयन् //१९//
                                     चौपाई 
गूँजे सब स्वर धरणि, अकाशा / कौरव दल  में उपजी त्रासा//
दोहा 
          पाञ्चजन्य उदघोष अरु,दैव शक्ति अधिपत्य /
          स्वर अनंत जयघोष का,ह्रदय गूँजता नित्य //
          अशुभ समन हो शुभ बढे / आसुर बहिर्प्रवृत्ति /
          सबके ह्रदय विदीर्ण हों , जीते सात्विक वृत्ति //
                                   चौपाई 
  धारावाही  स्वर  जब  आयें   / मोह प्रवृत्ति सामान हो जायें //                                       श्लोक 
      अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः /
      प्रवृत्ते      शस्त्रसम्पाते     धनुरुद्यम्य     पाण्डवः //२०//
      हृषीकेशं      तदा      वाक्यमिदमाह     महीपते /
                               अर्जुन उवाच 
      सेनयोरुभयोर्मध्ये   रथं   स्थापय  मे   sच्युत //२१//
                                    चौपाई 
इन्द्रिय विषय राग परित्यागा /सोई कपिध्वज प्रगट विरागा //

कपिध्वज अर्जुन कौरव लेखे / शस्त्र युक्त  रण आतुर  देखे //
कर में धनु गांडीव उठाया  /  ह्रषीकेश  को  वचन  सुनाया //
प्रभु सर्वज्ञ  ह्रदय के ज्ञाता  / ह्रषीकेश  सुर नर  मुनि त्राता //
हे अच्युत रथ आगे लीजै  /  दोनों दल  बिच  स्थिर कीजै //
                                     श्लोक 
यावदेतान्निरीक्षेsहं योद्धुकामानवस्थितान् /
             कैमर्या     सह   योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे  //२२/                                        चौपाई 
बोले   सुहृद   पार्थ   मृदुभाषी / योधा  कौन  युद्ध  अभिलाषी //
युध व्यापारी कितने नृप जन / जब तक देखूँ नहिं मधुसूदन // 
युद्धउचित किन किन से करना/समझूँ जब तक थिर ही रहना//
                                   श्लोक 
         योत्स्यमानानवेक्षेsहं य एतेsत्र समागताः/ 
         धार्तराष्ट्रस्य    दुर्बुद्धेर्बुधे     प्रियचिकीर्षवः//२३//
                                  चौपाई 
दुर्मति दुर्योधन शुभ चिंतक / आये नृप लै सेन , विनिंदक //
सम्मुख दुश्मन को रिपु मोरा / एक  झलक देखूँ उन ओरा //
संजय उवाच 
श्लोक
           एवमुक्तो   हृषीकेशो    गुडाकेशन    भारत /
           सेनयोरुभयोर्मध्ये  स्थापित्वा   रथोत्तमम्//२४//
           भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् /
           उवाच पार्थ पश्यैतान् समवेतान् कुरूनिति //२५ //
                                  चौपाई 
बोले संजय  सुनहु  महीशा / पार्थ  विनय  सुनकर  वृजधीशा //
श्वेत अश्व  रथ  हाँक  बढ़ाये / गुडाकेश  कुरु  दल  बिच  आये //

विजय  नींद  पर  पाई जबसे  / गुडाकेश  भये  अर्जुन  तबसे //
 
दोहा
        उभय  सेन  के  मध्य  में  ,  तनमहि   स्थित  भूप /
        तथा भीष्म  गुरु  द्रोण  के , सम्मुख  दिव्य  अनूप //
        रथ  रोका  श्रीकृष्ण  ने  , सब  नृप  झलक दिखाय /
        थकित हुये  अर्जुन निरखि ,निज परिजन समुदाय //
        बोले    केशव    पार्थ    से  ,  सम्मुख    रहे   परेख /
        जुड़े   हुये   रण  भूमि   में  ,  कौरव   दल  को  देख//

चौपाई 
   जब  मन आतम में रम जाये / यह तन उत्तम रथ कह लाये //
श्लोक
         तत्रापश्यत्स्थितान्   पार्थः पितृनथ  पितामहान् /
         आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा// २६ //
         श्वशुरान्सुहृदश्चैव                    सेनयोरुभयोरपि/
         तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् //२७//
         कृपया        पर्याविष्टो        विषीदन्निदमब्रवीत् / 
अर्जुन उवाच 
        दृष्ट्वेमं  स्वजनं  कृष्ण  युयुत्सुं समुपस्थितम् //२८//
चौपाई 
उभय पक्ष जब दृष्टि फिराई /सब निज परिजन दिये दिखाई//
पृथापुत्र   अर्जुन   ने    देखे   /  चाचा ,  ताऊ ,  दादा   लेखे//
मामा, बाँधव, सुत ,पौत्रों  को/ गुरुवर, ससुर,सुहृद,मित्रों को//
रण में स्वजन बन्धु लख डोले / करुण भाव  शोकातुर  बोले//
हे  केशव  आनँदघनरासी / देख  स्वजन  सब  युद्ध  पिपासी//

फिर पार्थिव  तन रथ असवारी / लक्ष्य  अचूक  धनुर्धर भारी //
अर्जुन ने जब कुरुदल  देखा  / उपजा  मन  में  मोह विशेखा //
पितृ,भ्रात गुरु और पितामह  / ससुर, प्रपुत्र , पौत्र सेना मह //
ह्रदय  देश  का  चित्रण सारा  / यह जग मोहमयी  परिवारा //   
श्लोक  
 सीदन्ति  मम  गात्राणि   मुखं   च  परिशुष्यति /
 वेपथुश्च     शरीरे     मे      रोमहर्षश्च     जायते //२९ //
चौपाई 
युद्ध कल्पना छवि  उर  आनी / मुख  सूखे  आवे  नहिं बानी //
शिथिल हुआ तन होय कुरंगा /तन कम्पित रोमांचित अंगा // 
श्लोक 
गाण्डीवं  स्त्रंसते  हस्तात्त्वक्चैव  परिदह्यते /
         न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः//३०//
चौपाई 
भ्रमित हुआ मन त्वचा जलानी/धनु गांडीव गिराअब जानी // 
अब इक पल रह सकहुँ न ठाढ़े/ बिन परिणाम नेत्र जल बाढे //
 श्लोक 
            निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव /
            न च  श्रेयोsनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे//३१ //
                                    चौपाई 
हे  केशव मन  भयो सभीता / मैं   लक्षण   देखौं  विपरीता//
निज जन  युद्ध  करूँ  संहारा / होय  नहीं  कल्याण  हमारा//
श्लोक 
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च/ 
किं नो राज्येन  गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा//३२//
                                      दोहा 
           नहीं चाहिये  विजय श्री,नहीं राज्य सुख भोग /  
           क्या  गोविन्द  बताइये, लाभ बिना सब लोग//
                                     श्लोक  
          येषामर्थे काङ्क्षितं  नो राज्यं भोगाः सुखानि च/
          त इमेsवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च//३३//  
                                      दोहा 
           हैं वांछित जिनके लिये ,राज्यादिक उपभोग /
           धन जीवन की आश  तज ,खड़े युद्ध में लोग //

          ऐसा सुख नहिं चाहिये ,नहीं परमपद शान्ति /
          जहँ सँग में परिजन नहीं ,सारे सुख हैं भ्रान्ति // 
                                   चौपाई 
जब तक है परिवार  बसेरा /रहता  इच्छाओं का डेरा //
श्लोक 
आचार्याः   पितरः    पुत्रास्तथैव    च    पितामहाः/
मातुलाःश्वसुराःपौत्राःश्यालाःसम सम्बन्धिनस्तथा// ३४//
                                  चौपाई 
गुरुजन पुत्र पिता अरु ताऊ / दादा मामा श्यालक दाऊ //
पौत्र ससुर सब ही संबंधी/मति सब की स्वारथ में अंधी//
                                   श्लोक  
       एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोsपि मधुसूदन /
       अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते //३५//
                                   चौपाई 
मारहिं स्वजन मोहिं मिल सोऊ/तिहुँपुर राज तिलक करकोऊ//
तबहूँ वध नहिं चाहूँ करना / फिर पृथ्वी तल की क्या  गणना//

भजन पूर्व में सब अनुरागी  / जिनकी  प्रीति  ब्रह्म  में  जागी //
मोह त्याग बिन कर सतसंगा / चाहहिं  ब्रह्मतत्त्व  रस  गंगा //
जब  यह  ज्ञान  उसे  हो जाये /  संग   दोष  से सत्य न पाये //
तब  साधक हो जाय अधीरा / भये  द्रवित  ज्यों पारथ  धीरा //  
स्वजन मोह वह त्याग न  पाये  / वृत्तियुद्ध  से फिर हट जाये //
भू  , पाताळ  और  सुरलोका  / इनसे  परे  और  इक  लोका //
 ताहि न अब तक अर्जुन जाने / देव लोक  तक  सीमा माने //
श्लोक 
      निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन /
      पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः          //३६//
 चौपाई 
कुरु राजन धृतराष्ट्र सुतन्ह को /मारे क्या प्रसन्नता हमको //  
यदि मैं इन  दुष्टों को  मारूँ / पाप गठरिया निज सिर धारूँ//

राज्य  धृष्टता का जब  आये  / दुर्मति  दुर्योधन   उपजाये //
काम,क्रोध,मद,लोभ,अनीती / मोह  बढे त्यागे सब नीती //
अधम  कर्म  लेता  अपनाई  /   हो जाये  वह   आताताई //
मत्सर काम क्रोध मद लोभा /मन में ये उपजावहिं छोभा //
आतम  दर्शन  के ये बाधक / जाने  ज्ञानी  योगी  साधक //

श्लोक 
       तस्मान्नार्हा वयं  हन्तुं धार्तराष्ट्रान् स्वबान्धवान् /
       स्वजनं  हि  कथं  हत्वा  सुखिनः  श्याम  माधवः//३७//
चौपाई 
हे  यशुदानन्दन   हे  माधव / ये  सब हैं  अपने  ही   बांधव //
गाँधारी माँ  के  चित  चन्दन / कौरवनृप  के सब हैं नन्दन //
ये नहिं वध के योग्य हमारे / सुख किमी पावें स्वजन सँहारे //
 
जब  तक  मन  अज्ञान   हमारे / तन  से  जुड़ते  रिश्ते सारे //
तन नश्वर तो कहँ लगि नाते /अमर रहहिं सँग  में मिटजाते //  
मोह रहे तो सब जग प्यारा / स्वजन  बन्धु परिवार  हमारा //    
जब अज्ञान मोह मन घेरे / दुश्मन लगहिं  स्वजन सब  मेरे //
ऐसे  ही  अर्जुन  ने  सारा / रिपुदल  परिजन  मित्र   निहारा //
मोह भंग  जिस  दिन  हो  जाये  / सब संबंधी लगहिं पराये //  
मन   अज्ञान   प्रेरणा  पाई /  ज्ञान   पंथ   में  प्रविसे  जाई // 
श्लोक 
           यद्यप्येते   न    पश्यन्ति    लोभोपहतचेतसः /
              कुलक्षयकृतं   दोषं   मित्रद्रोहे   च   पातकम् //३८//
           कथं न ज्ञेयमस्माभिःपापादस्मान्निवर्तितुम् /
           कुलक्षयकृतं        दोषं       प्रपश्यद्भिर्जनार्दन //३९//
 चौपा
यद्यपि भृष्ट चित्त ,निज रोषा / कुल विनाश नहिं देखहिं दोषा//मीत विरोध, पाप  नहिं  पेखें / तदपि दोष  हम  ज्ञानी  देखें//
कुल विनशे उपजे जो  दोषा / हम जानहिं  तव ज्ञान विशेषा// 
अघ से बचने केशव कहिये / क्यों विचार नहिं करना चहिये//   

जिमि नव साधक गुरु पहिं जाई  / तर्क करे अज्ञान न जाई //
वैसइ अर्जुन मति भरमानी /माने नहिं निज को कम ज्ञानी //
कुल विनाश के दोष  विचारी  / गिरिधर से बोले  धनुधारी // 
                                     श्लोक 
            कुल क्षये  प्रणश्यन्ति कुलधर्माःसनातनः /
            धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोsभिभवत्युत //४०//  
 
 दोहा 
            कुल के महाविनाश से ,नाशे सब कुल धर्म /
            धर्म  गये  सब वंश  में , फैले  पाप  अधर्म //

                                    चौपाई 
कुलाचार अरु निज कुल कर्मा /इनहिं पार्थ जानहिं कुल धर्मा //
इन्हें  सनातन   अर्जुन   माने / केशव  का   संकेत  न  जाने //
                                     श्लोक 
          अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः /
          स्त्रीषु  दुष्टासु   वार्ष्णेय  जायते  वर्णसङ्करः//४१//
                                     दोहा 
             दूषित  हों  कुल  नारियाँ , वर्णसंकरी पुत्र /
             जन्म लेहिं उस वंश में,केशव  महा कुपुत्र//
                                  चौपाई  
बाढ़हिं पाप जाहिं नहिं हेरी / दूषित नारि  होहिं  कुल  केरी //
होहिं   वर्णसंकर  संतानें  / ऐसा  अर्जुन  अब   तक   जानें //
आगे केशव ने समझाया / इससे  निज मत भिन्न बताया //
मैं  अथवा  स्वरुप  में  वासी  / महापुरुष या गुरु सन्यासी // 
आराधन  में   भ्रम   उपजाये  / वहीँ   वर्णसंकर   आजाये // 
                                  श्लोक 
            सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च /
            पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः//४२//
                                   चौपाई 
वर्णसंकरी   सुत   जो   होवे  / कुलघाती  कुल नरक  डुबोवे// 
तर्पण श्राद्ध बिना सब पुरखे/ पाय अधोगति भटकत निरखे//

दोष वर्णसंकर  कुल आये / भूत  भविष्य  आज  मिट जाये //
लोक रीति  कुलधर्म  बिहाई  /  श्राद्धकर्म सब  देहिं  भुलाई // 
पिंडक्रिया बिन पुरखे सारे /पुनि महिगिरहिं पार्थ मन धारे //  
                                     श्लोक
        दोषैरेतैः     कुलघ्नानां    वर्णसङ्करकारकैः/
        उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः//४३// 
                              चौपाई 
वर्णसंकरी   वंशज  दोषा  /  विनशे   जातिधर्म   कुल  कोषा //
जातिधर्म  कुलधर्म  सनातन / जान  रहे अर्जुन  अपने  मन //
रूढ़ि भवँर  में  फिरत भुलाने  / शाश्वत  सत्य  उसी को माने //
आगे   यह   मत   करके  खंडन  /  बोले   वासुदेव  यदुनंदन //
 आतम सत्य सनातन अव्यय /ऐसा निजमन जान धनंजय //  
                                श्लोक 
 उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन /
 नरकेsनियतं   वासो    भवतीत्यनुशुश्रुम//४४//
                                 चौपाई 
जो  कुलधर्म  नशाये  केशव / रहे  अनंत  काल  तक  रौरव//
ऐसा अब तक सुनते आये /यही सोच मन अति दुःख  पाये// 
                                  श्लोक 
अहो बात महत्पापं कर्तुम व्यवसिता वयम्/
यद्राज्यसुखलोभेन     हन्तुं   स्वजनमुद्यताः//४५//
                                 चौपाई 
हाय शोक  कितना   दुखदाई / हम सब विज्ञ बुद्धि निपुनाई //
तदपिराज,सुख,लोभ निकेता / इन वश उद्यत कुल वध हेता //

तर्क  बुद्धि तक  ज्ञान अधूरा  / दिखता  मूरख  जब हो पूरा //
अर्ध ज्ञान घट छलकत  जाये  / शान्ति  पूर्ण होने  पर पाये // 
अर्जुन केशव को समझाता /माने नहिं निज को कम ज्ञाता //  
गूढ़ तत्त्व  का  भेद न  जाने / तर्क करहिं जनु  परम सयाने //
हम तो बुद्धिमान अरु ज्ञाता  / तबहुँ करन चाहहिं कुलघाता //
राज्य भोग  सुख  में ललचाने / आपहुँ  केशव नीति भुलाने // 
ऐसा  कह फिर करके  निर्णय / अपना  मत दे  रहे धनंजय //
                                 श्लोक 
यदि    मामप्रतीकारमशस्त्रं   शस्त्रपाणयः/
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् //४६//
                                चौपाई 
मुझ निशस्त्र अरु बिन  प्रतिकारी/ अर्जुन को  सर्वायुधधारी //
कौरव सुत यदि मारहिं रण में/वह भी हितकर मानहुँ मनमें//

कहिहै जगत  पार्थ  थे  ज्ञानी / युद्ध  बचाय  दीन्ह  कुर्वानी // 
निजकुल अरु परिवार सनेही / सुख हित जन प्राणाहुति देहीं //
जब गृह तज कोई जाय विदेशा / वैभव पाय रहे बिन क्लेशा //
चार दिवस  भी  बिता  न  पाये  /याद  उसी कुटिया की आये // 
ऐसा  प्रबल  मोह  का  फन्दा  / मुक्ति  लहै सो हो  स्वच्छन्दा //
                            संजय उवाच 
                                श्लोक  
एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् /
विसृज्य    सशरं     चापं   शोकसंविग्नमानसः//४७ //
दोहा 
कह संजय  धृतराष्ट्र से ,सुनिये  कुरु  महिपाल/
केशव  के  सम्मुख   हुये , अब  अर्जुन  बेहाल //
शोकमयी उद्विग्न मन ,  अपनी  व्यथा  सुनाय /
     धनु  गाण्डीवहिं  त्याग के ,  रथ  में  बैठे जाय //    

क्षेत्र   और   क्षेत्रज्ञ   का  ,  युद्ध  क्षेत्र  तज  पार्थ /
हटे  ज्ञान   के  मार्ग  से , निज  कुल  के  रक्षार्थ //
कृष्णार्जुन   संवाद   का ,  पूर्ण   प्रथम   अध्याय /
 पढ़हिं सुनहिं जो नित्य जन,शोक मोह भ्रम जाय /

इस प्रकार श्रीमद् भगवद्गीता रूपी उपनिषद एवं ब्रह्मविद्या तथा  योगशास्त्र  विषयक   श्री कृष्णऔर अर्जुन के संवाद में पं उदयभानु तिवारी "मधुकर "कृत महाकाव्य श्री   गीता मानस में शंसय ''विषादयोग'' नामक प्रथम अध्याय पूर्ण हुआ /   
 

हरि ॐ तत्सत् 

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