Monday, January 5, 2015

                        ॐ श्री परमात्मने नमः 

                           अथ पञ्चदशोsध्यायः  

 दोहा;-
जगपीपल  के  वृक्ष  की, जड़ें  ऊर्ध्व आकाश /
शाखायें   सबलोक  में , पत्ते  करहिं  प्रकाश //
फल आकांक्षी पुरुष सब ,इससे हैं अनभिज्ञ / 
फल लागें  भूलोक  में , जानहिं  स्थितप्रज्ञ //
                       श्रीभगवानुवाच  
श्लोक;-
उर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं       प्राहुरव्ययम् /
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् //१//

दोहा;-
परम   पुरुष   परमात्मा , ऊर्ध्वमूल  आधार  /
जिसकी प्रकृति स्वरूप में , नीचे  फैलीं  डार //
उस जगपीपल वृक्ष को, अविनाशी  तू  जान /
ऋग,यजु,साम,अथर्व ये जिसके पात महान //
चौपाई;-
मूल समेत इसे जो जाने / उसे वेद ज्ञात तू माने //

श्लोक;-
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा 
         गुणप्रवृद्धा    विषय     प्रवालाः /
अधश्च    मूलान्यनुसन्ततानि 
          कर्मानुबन्धीनि    मनुष्यलोके //२//

चौपाई;-
इस जगतरु की तिर्गुण रूपी /सभी विषय अरु भोग स्वरूपी //
कोंपल  युक्त  योनि  शाखायें / नीचे  ऊपर  सब दिशि  जायें //
नीचे  भिन्न  जीव  मनुजादिक / ऊपर  ब्रह्मा अरु इन्द्रादिक //
सभी  योनियाँ  नीचे  ऊपर / व्याप  रही  हैं  सब  लोकों पर //
मनुज  योनि  कर्मन  आधारा / बँधे  चराचर यह जग सारा //

कर्मयोनि मानव की देही / अरु सब योनि  भोग की गेही //
आत्मापुरुष प्रकृति में आये / तब ही भवबंधन कट पाये //
इस कारण सब वेद ऋचायें / मानव तन दुर्लभ  बतलायें //   

श्लोक;-
न रूपमस्येह      तथोपलभ्यते 
         नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा /
अश्वत्थमेनं          सुविरूढ़मूल-
         मसङ्गशस्त्रेण   दृढेन    छित्त्वा //३//

चौपाई;-
कहा  गया जगतरुवर  जैसा / यहाँ   न  पाया  जाता  वैसा //
इसका आदि न कोई  जाने / कहाँ  अंत  है  नहिं   अनुमाने //
और न अच्छी ही स्थिति है /क्योंकिविनाशी इसकी गतिहै //
इससे जगतरु मूल , विमोहा / दम्भ  कामनायेँ  अरु  कोहा //
इन्हें विराग स्वरूप अस्त्र से / काट अलग हो जगत वृक्ष से //  

श्लोक;-
ततः   पदं    तत्परिमार्गितव्यं-
          यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः /
तमेव    चाद्यं     पुरुषं     प्रपद्ये 
          यतः   प्रवृत्तिः   प्रसृता   पुराणी //४//

चौपाई;-
फिर जो मोक्ष रूप परमेश्वर / उसको खोजे ध्यान लगाकर //
जहाँ पहुँच नर रम रह जाते / मृत्युलोक नहिं वापस आते //
दोहा;-
पुरा  'जगततरु' प्रवृति का,है जिससे विस्तार /
आदि पुरुष की मैं शरण, जो  जग पालन हार //
चौपाई;-
इस प्रकार से दृढ़ निश्चय कर /करे ईश का ध्यान निरन्तर //
    
श्लोक;-
निर्मानमोहा     जितसङ्गदोषा-
          अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः / 
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः       सुखदुःखसंज्ञै-
          र्गच्छन्त्यमूढ़ाः पदमव्ययं  तत् //५//

चौपाई;-
जासु  मान अरु मोह नशाये / संगदोष  जीते  जय  पाये //
ईश ध्यान में रहते स्थित / हुईं कामना सकल विसर्जित //
सुख-दुख द्वन्द्व मुक्त वे ज्ञानी /पावहिं अव्यय पद निर्वानी //

श्लोक;-
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः /
यद् गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम //६//

दोहा;-
स्वयम प्रकाशित परमपद , जहँ रवि चन्द्र ,कृशानु /
जाय प्रकाश न कर सकहिं , सुन पाण्डव कुल भानु //
चौपाई;-
उस पद को जो योगी पाते / फिर जग में वापस नहिं आते //
वह मम धाम परमपद नामा / मुक्त पुरुष  पावहिं विश्रामा //
  
श्लोक;-
ममैवांशो   जीवलोके   जीवभूतः   सनातनः /
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि  प्रकृतिस्थानि कर्षति //७//

चौपाई;-
बसे  लोक रूपी मानुष तन / सो मम अंशी  जीव  सनातन //
प्रकृति सुस्थित सर्वेंद्रिय मन / इनका वह करता आकर्षण // 
श्लोक;-
शरीरं   यदवाप्नोति  यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः /
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् //८//

चौपाई;- 
सुमनकुंज जिमि मरुत समाये / संग  सुगंध  उड़ा ले जाये //
वैेसइ जीव देह जब त्यागे / सकल इन्द्रियाँ,मन सँग लागे //  
फिर वह जो भी नव तन पाये / उसमें उनके सहित समाये //

श्लोक;-
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च /
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते //९//

चौपाई;-
श्रवण,नयन,रसना अरु घ्राणा / मन विषयों के आश्रय नाना //
जीव सहारा इन्हें बनाये / इन्द्रिय  जनित  विषय  रस  पाये //   
किन्तु न ऐसा देत  दिखाई / देखहिं  दिव्य  दृष्टि  जिन पाई //

श्लोक;-
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् /
विमूढ़ा    नानुपश्यन्ति    पश्यन्ति    ज्ञानचक्षुषः //१०//

चौपाई;-
तनस्थित या तनको त्यागत/विषयभोग,तिर्गुणरस चाखत//
गुण  संयुक्त  जीव  वह  गूढ़ा / उसे  न जाने  मनुज  विमूढ़ा //
ज्ञान चक्षु जिनके खुल जायें / वे जन ही  उसको  लख पायें //

श्लोक;-
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् /
यतन्तोsप्यकृतात्मानो   नैनं   पश्यन्त्यचेतसः//११//

दोहा;-
हिय  स्थित  वह  आत्मा , यतनी   योगी वृन्द /
लखहिं  तत्त्व  से  ध्यान  में , जो  रत ब्रह्मानन्द //
किन्तु जासु अंतःकरण कलिमल ग्रसित विमूढ़ /
कर  प्रयत्न  नहिं  जानते / उस आत्मा  को  मूढ़ // 
   
श्लोक;- 
यदादित्यगतं     तेजो    जगद्भासयतेsखिलम् /
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् //१२// 

चौपाई;-
रवि स्थित जो तेज अकाशा / अखिल  विश्व  में  करे प्रकाशा //
अरु द्युति चन्द्र ,अग्नि में दमके / पार्थ !तेज वह मेरा चमके //

 श्लोक;-
गामाविश्य   च   भूतानि   धारयाम्यहमोजसा /    
पुष्णामि चौषधीः सर्वाःसोमो भूत्वा रसात्मकः//१३//

चौपाई;-
स्वयं शक्ति से भुवि में आकर / धारण करूँ भूत सचराचर //
मैं बन शशि अमृत गुण धारी / पुष्ट  करूँ औषधियाँ सारी //

श्लोक;-
अहं विश्वानरो भूत्वा  प्राणिनां  देहमाश्रितः /
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् //१४//

मैं ही चर  जीवों  के  अन्दर / प्राण , अपान  युक्त  वैश्वानर //
सब की जठर अग्नि कहलाऊँ / चार भाँति के अन्न पचाउँ //
हैं ये चार पेय  अरु  भोज्या / लेह्य  और  रस  रूपी शोष्या //

श्लोक;- 
सर्वस्य चाहं ह्रदि सन्निविष्टो-
          मत्तः  स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं   च /
वेदैश्च      सर्वैरहमेव      वेद्यो-
          वेदान्तकृद्वेदविदेव      चाहम् //१५//

चौपाई;- 
मैं ही इस त्रिभुवन का स्वामी /सब हिय स्थित अन्तर्यामी //   
मैं  ही  स्मृति ,ज्ञान  प्रदाता / तथा  अपोहन  दोष नशाता //
मैं  हूँ  ज्ञेय   वेद  के   द्वारा /  अरु   वेदज्ञ , वेद   करतारा // 
           
 श्लोक;-
द्वाविमौ  पुरुषौ   लोके  क्षरश्चाक्षर  एव  च /
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोsक्षर उच्यते //१६//

क्षर ,अक्षर दो पुरुष सजीवा / तन नाशी अविनाशी जीवा //
एक  और  भी  उत्तम  इनमें / ऐसा कहा  गया  वेदन  में //
   
श्लोक;-
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः /
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः //१७//
   
दोहा;-
इन दोनों से भी परे , श्रेष्ठ  पुरुष को जान /
जो तिहुँलोक प्रवेश कर, धारे सृष्टि महान // 
चौपाई;-
वह सच्चिदानन्दघनरासी / कहा गया जिसको अविनाशी //

श्लोक;-
यस्मात्क्षरमतीतोsहमक्षरादपि    चोत्तमः /
अतोsस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः //१८//

चौपाई;-
मैं वह ,नश्वरजगत अतीतम् / अविनाशी,जीवों से उत्तम //
इससे वेद , विश्वविख्याता /  पुरुषोत्तम कह जाना जाता //
   
श्लोक;-
यो  मामेवमसम्मूढो  जानाति पुरुषोत्तमम् /
स  सर्वविद्भजति   मां   सर्वभावेन   भारत //१९//

मुझको  तत्त्व रूप  पुरुषोत्तम / जो  जाने  ज्ञानी  सर्वोत्तम //
सो सर्वज्ञ पुरुष नित भजते / अर्जुन ! मुझमें ही रत रहते //

श्लोक;-
इति     गुह्यतमं      शास्त्रमिदमुक्तं    मयानघ /
एतद् बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत //२०//

दोहा;-
एहि विधि परम रहस्यमय ,गोपनीय यह शास्त्र /
तुझे   सुनाया   पार्थ   यह , तू  निष्पाप  सुपात्र //
इसे  जानकर   तत्त्व   से , होते   मनुज  कृतार्थ /
सफल होय नर तन जनम, पाकर ज्ञान  यथार्थ //

त्रिभुवन  पति  योगेश्वरः , तत्त्वामृत  रस  पाय /
पूर्ण  हुआ   पुरुषोत्तमः,  योग   नाम   अध्याय //   

इसप्रकार श्री मद् भगवद् गीता रूपी उपनिषद एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण  और  अर्जुन  के  संवाद  में  उदयभानु  तिवारी  'मधुकर'  कृत  महाकाव्य ''गीता मानस''में पुरुषोत्तम योग नामक पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ /  
  

                          हरि ॐ तत्सत् 

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