Monday, January 5, 2015

                   अथ त्रयोदशोsध्यायः
दोहा;-  
विषय  क्षेत्र , क्षेत्रज्ञ  का , श्रीहरि  करत  बखान /
सुनहिं पार्थ जिज्ञासु बन,कर स्थिर निज ध्यान // 

                       श्रीभगवानुवाच 

श्लोक;-
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते /
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः //१//

दोहा;-
कौन्तेय तन क्षेत्र है ,तन ज्ञाता क्षेत्रज्ञ /
कहते हैं इस तत्त्व के,जानकार मर्मज्ञ //

 श्लोक;-
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत /
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञनं  यत्तज्ज्ञानं मतं  मम //२//

दोहा;-
हे भारत  सब  क्षेत्र  का , जान   मुझे   क्षेत्रज्ञ /
यह सविकारी प्रकृति अरु, परम  पुरुष सर्वज्ञ // 
इनका   तत्त्वभास   ही , ज्ञान   कहाये   पार्थ /
यह मम  मत हे परंतप,तव हित  कहूँ यथार्थ //

श्लोक;-
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि एतच्च यत् /
स  च  यो  यत्प्रभावश्च  तत्समासेन मे श्रृणु //३//

चौपाई;-
जो  वह  क्षेत्र  और  है  जैसा / कौन  विकार  युक्त  वह  कैसा //
जिस कारण से उसकी उतपति /ज्ञान कराऊँ अब उसके प्रति //
वह   क्षेत्रज्ञ   पार्थ   जो  जैसा / उसका  भी  प्रभाव  है  कैसा //
यह सारांश तुझे समझाऊँ / मुझसे  सुन  सब  तोहि  जनाऊँ //

श्लोक;-
ऋषिभिर्बहुधा गीतं  छन्दोभिर्विविधैः पृथक् /
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव             हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः //४//

चौपाई;-
यह  जो  क्षेत्र  स्वरूपी  काया / अरु  क्षेत्रज्ञ  जीव  कहलाया //
इनका  तत्त्व ऋषिन्ह के द्वारा / कहा गया कर बहु विस्तारा //
विविध   वेद   मंत्रो   के   द्वारा / पृथक  भी  किया   प्रचारा //
सब विधि निश्चय युक्त कहाया / ब्रह्मसूत्र  के  पद  में  गाया //  

श्लोक;-
महाभूतान्यहङ्कारो     बुद्धिरव्यक्तमेव  च /
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः //५//

चौपाई;-
छिति,जल,पावक,गगन, समीरा / महाभूत ये  पारथ  धीरा //
शामिलबुद्धि अहं  के सँग में / परा प्रकृति मन भी है जिनमें //
मन चेतन  संयुक्त  बताया / आठों  मूल  प्रकृति  समझाया //
दशौइन्द्रियाँ अरु मन एका / पंचविषय सुन सहित विवेका //

रसना,नयन,नाक अरु काना /वाक्,हस्त,पद,त्वचा बखाना //
नवम उपस्थ,गुदा दश जानो / इन्हें इन्द्रियाँ कह  पहचानो //
रस, स्पर्श,गंध  अरु  रूपा / शब्देंन्द्रिय  के  विषय  स्वरूपा //   

श्लोक;-
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः /
एतत्क्षेत्रं     समासेन    सविकारमुदाहृतम् //६//

दोहा;- 
सुख, दुख, इच्छा,द्वेष युत ,पिंड रूप यह देह /
तथा बुद्धि ,धृति,चेतना ,सहित विकारी गेह //
चौपाई;-
कहेउँ क्षेत्र संक्षेपहिं सारा / स्थित जबतक सकल विकारा //   

श्लोक;- 
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा  क्षान्तिरार्जवम् /
आचार्योपासनं   शौचं   स्थैर्यमात्मविनिग्रहः //७//

चौपाई;-
अब क्षेत्रज्ञ स्वरूप सुनाऊँ / इसके  नौ  गुण  कह  समझाऊँ //
दम्भहीन ,अभिमान विहीना / क्षमा,अहिंसा, सुहृद ,प्रवीना // 
मृदु मन, वाणी,गुरुपद सेवा / शुचिता ,ध्यावे  निर्गुण  देवा //
अन्तःकरण सुस्थिर रहना/ मन,इन्द्रियसँग तन वशकरना //

श्लोक-
इन्द्रियार्थेषु   वैराग्यमनहङ्कार   एव  च /
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् //८//

चौपाई;-
भू ,परलोक  भोग  परित्यागी / अहंकार  से  रहित  विरागी//
जन्म,मृत्यु अरु व्याधि,बुढ़ापा/ दुखदोषों का पुनि पुनिजापा// 

श्लोक;-
असक्तिरनभिष्वङ्गः     पुत्रदारगृहादिषु /
नित्यं च समचितत्त्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु //९// 

चौपाई;-
गृह,धन,सम्पति,सुत अरु दारा/तज ममत्व, आसक्तिविकारा // 
वस्तु अप्रिय,प्रिय जो भी पाये / उसमें चित समभाव दिखाये//

श्लोक;-
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी /
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि       //१०//

चौपाई;-
अचल,अनन्ययोगस्थिर मन/ मुझबिन और करे नहिं चिंतन//
मन एकान्त  वास में  लागे /  जन  समूह  में  नहिं  अनुरागे//
इष्ट बिना कुछ ध्यान न आये/ अव्यभिचारिणि भक्ति कहाये // 

श्लोक;-
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं  तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् /
एतज्ज्ञानमिति  प्रोक्तमज्ञानं   यदतोsन्यथा //११// 

चौपाई;-
नित आध्यात्मज्ञान में स्थित / हिय में समता भाव प्रतिष्ठित // 
तत्त्वज्ञान  के   अर्थ   स्वरूपा / परमब्रह्म    का   दरश  अनूपा //

दोहा;-
यह सब अर्जुन ज्ञान है ,जिसे सुना धर ध्यान /
जो  इनके   विपरीत  है ,  वह सब  है अज्ञान //

श्लोक;-
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते /
अनादिमत्परं   ब्रह्म  न  सत्तन्नासदुच्यते //१२//

दोहा;-
अब जो जग में ज्ञेय है ,जिसे जान नर ! पार्थ /
तत्त्वामृत को प्राप्त हो ,वह  सब  कहूँ  यथार्थ //
चौपाई;-
वह अनादि जो प्रकृति रचाये/ भारत असत न सत कहलाये//
श्लोक;-
सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोsक्षिशिरोमुखम् /
सर्वतःश्रुतिमल्लोके   सर्वमावृत्य  तिष्ठति //१३//

चौपाई;-
सबदिशिव्याप्त पाणि,पदशीशा/श्रवण,नयन,मुखयुतजगदीशा //  
जगत व्याप्त नहिं  परत  लखाईं / सब  में स्थित सो सुर साईं //     

श्लोक;-
 सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् /
असक्तं सर्वभृच्चैव  निर्गुणं  गुणभोक्तृ  च //१४//

चौपाई;-
सर्वेन्द्रिय विषयों का ज्ञाता / इन्द्रिय  रहित कहा वह जाता //
अनासक्त सब जग का धाता / निर्गुण है  पर गुण रस पाता //

श्लोक;-
बहिरन्तश्च     भूतानामचरं      चरमेव    च /
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् //१५//

चौपाई;-
सब भूतों के बाहर  भीतर / है  चर, अचर  रूप  जगदीश्वर //
वह अति सूक्ष्म न कोई जाने / अविज्ञेय सो नहिं पहचाने //
मन इन्द्रिय से पर प्रतिष्ठित / निकट दूर भी वह है स्थित // 

श्लोक;-
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् /
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु  प्रभविष्णु  च //१६//

चौपाई;-
वहअविभाज्य अकाश स्वरूपा / भिन्न भिन्न सचराचर रूपा //
अलग अलग  सा  देत दिखाई / यह  प्रतीति  माया  कहलाई //
वही ज्ञेय निज सगुण स्वरूपा / प्रगट  करे त्रिभुवन कर भूपा //
ब्रह्मदेव  बन  सृष्टि  रचाये  /  विष्णु  जगत  धाता  कहलाये //
रुद्ररूप   धर   करे  सँहारा / तत्त्व  न  जाने  यह  जग  सारा //

श्लोक;-
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते /
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं ह्रदि  सर्वस्य  विष्टितम् //१७//

दोहा;-
परमज्योति सबज्योति की,तिमिर निकट नहिं जाय //
ज्ञान  रूप   ज्ञातव्य    वह  ,   ज्ञानगम्य    कहलाय //
चौपाई;-
सर्वरूप  वह जग का स्वामी / सब हिय स्थित अन्तर्यामी //  

श्लोक;-
इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः /
मद्भक्त    एतद्विज्ञाय    मद्भावायोपपद्यते //१८//

चौपाई;-
एहि विधि पार्थ क्षेत्र रु ज्ञाना / ज्ञेय तत्त्व संक्षेप बखाना //
जो भी भक्त तत्त्व यह पाये / मम स्वरुप में आन समाये // 

श्लोक;-
प्रकृतिं  पुरुषं  चैव   विद्ध्यनादी   उभावपि /
विकारांश्च  गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् //१९//

चौपाई;-
कह योगेश्वर अब  आगे सुन / यह तन क्षेत्र प्रकृति है अर्जुन //
जो क्षेत्रज्ञ  क्षेत्र  का   ज्ञाता / वही  जगत  में  पुरुष  कहाता //
पुरुष प्रकृति को जान अनादिः / इनसे अचरसचर मनुजादिः//
राग द्वेष अरु सकल विकारा / तिरगुण   युक्त  पदारथ  सारा //
इन्हें प्रकृति से उपजत जानो / दृश्य जगत सब माया मानो //

श्लोक;-
कार्यकरणकर्तृत्वे  हेतुः   प्रकृतिरुच्यते /
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते //२०//

चौपाई;-
कारजऔर करण का कारन / यही मनुजतन कहते मुनिजन //
सुख अरु दुख के भोक्तापन में / कारण पुरुषहिं जानो मन में //

कार्यकहहिं जिसको नरज्ञानी / सो सुनिये अब कहहुँ बखानी //
पंचतत्त्व, छिति,नभ अरु नीरा / तथा अनल अरु महासमीरा // 
गंध, स्पर्श, शब्द , रस  रूपा / ये   दश    हैं   कारज  प्रारूपा //
करण  बखानहुँ  सुनहु  सचेता / अहंकार, मन , बुद्धि समेता //
त्वचा,घ्राण, रसना,श्रवणेंद्रिय / वाणी सहित पाँचज्ञानेन्द्रिय // 
वाक्य,हस्त,पद,गुदा गिनाये /सहित उपस्थ करण कहलाये // 

श्लोक;-
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् /
कारणं    गुणसङ्गोsस्य    सदसद्योनिजन्मसु //२१//

दोहा;-
प्रकृति बीच स्थित पुरुष,प्रकृतिजनित गुणभोग /
भोगै  तिर्गुण  युक्त   सब ,  पाकर   तन  संयोग //
गुण संगति ही  जीव  का , जन्म  हेतु  कहलाय /
भटकत  नाना  योनि  में , कर्मों  के  फल   पाय // 

श्लोक ;-
उपद्रष्टानुमन्ता  च   भर्ता   भोक्ता   महेश्वरः /
परमात्मेति चाप्युक्तो  देहेsस्मिन्पुरुषः परः //२२//

चौपाई;-
यह आत्मा जो देह प्रतिष्ठित / जिसे पुरुष कह करते इंगित // 
परमब्रह्म   परमेश   यही   है  /  सबदर्शी   उपद्रष्टा   भी   है //
यह यथार्थ सम्मति का दाता / अनुमन्ता कह जाना जाता //
सबका धारण पोषण कर्ता / इससे यह सब जग  का  भर्ता //
जीव रूप में सब  रस  भोगी / यही  महेश्वर  स्वामी  योगी //
योग सिद्ध जिसका हो जाये / वह  अमरत्त्व  परमपद पाये //
शुद्ध  सच्चिदानन्द  कहाये / परमात्मा  कह  जाना  जाये //

 श्लोक;-
य   एवं  वेत्ति  पुरुषं  प्रकृतिं च  गुणैः सह /
सर्वथा वर्तमानोsपि न स भूयोsभिजायते // २३//

चौपाई;-
इसप्रकार उस पुरुष सुकृतिको /और सर्वगुणसहितप्रकृतिको//
परमतत्त्व से जाने  जो  नर / सब  कर्मों  में  भी  रत रह कर//  
पुनर्जन्म   सो   पुरुष   न   पावे / ब्रह्मलीन  हो  ब्रह्म  कहावे//

श्लोक;-
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना /
अन्ये   साङ्ख्येन   योगेन  कर्म  योगेन  चापरे //२४//

चौपाई;-
उस परमात्मा को कितने जन / सूक्ष्म बुद्धि से करके चिंतन //
ध्यान योग से  हिय  में  देखें / कितने  ज्ञान  योग  से  पेखें // 
दोहा;-
कर्म  योग  से  देखते , कुछ  निष्कामी  भक्त /
मम गति पावहिं अन्त में,मुझमें हो अनुरक्त //
 
श्लोक;-
अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते /
तेsपि चातितरन्त्येव  मृत्युं  श्रुतिपरायणाः //२५//

चौपाई;-
किन्तु नहीं जो इसविधि जाने / भ्रमित बुद्धि माया लिपटाने // 
वे तत्त्वज्ञ  पुरुष  से  सुन  कर / वैसा  ही  प्रभु  आराधन कर //
श्रवण परायण भी  तर  जाते / मुक्ति  मृत्यु  सागर  से  पाते //
  
श्लोक;-
यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् /
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि                   भरतर्षभ //२६//

चौपाई;-
हे भारत इस श्रष्टि सृजन में / जितने भी तनुधारी जन्में //
प्रकृति पुरुष संयोगों द्वारा / उपजे  जगत  चराचर सारा //

श्लोक;-
समं    सर्वेषु     भूतेषु    तिष्ठन्तं    परमेश्वरम् /
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति //२७//

चौपाई;-
विनशत जीवों में भी जो नर / अविनाशी सम स्थित ईश्वर //    
देखे   वही   सत्य  लख  पाये / सत्यदर्शि  योगी  कहलाये // 

श्लोक;-
समं    पश्यन्हि     सर्वत्र    समवस्थितमीश्वरम् /
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् //२८//

चौपाई;-
समता दृष्टि पुरुष जो जग में / व्याप्त  ब्रह्म  को  देखे  सब में //  
निज से निज को नहीं नशाता / इससे वही परम गति पाता // 

श्लोक;-
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः /
यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति //२९//

दोहा;-
रहे अकर्ता आत्मा ,प्रकृति करे  सब  कर्म /
यह यथार्थ जो देखता , वह नर जाने मर्म //

श्लोक;-
यदा   भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति /
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा //३०//

दोहा;-
जिस क्षण पारथ पुरुष यह ,भिन्न भिन्न सब जीव /
एक  मात्र   उस   ब्रह्म   में ,  स्थित   लखै   सजीव //
उससे   ही   चर, अचर  सब , भूतों   का   विस्तार /
देखे,  तत्क्षण   ब्रह्म   को ,  प्राप्त   होय   भव  पार //

श्लोक-
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः /
शरीरस्थोsपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते //३१//

चौपाई;-
निगुण,अनादि करे जगधारण / अव्यय ब्रह्म पार्थ तेहिकारण // 
सब तन में स्थित होकर भी / रहे न लिप्त करे नहिं  कुछ  भी //

श्लोक-
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते /
सर्वत्रावस्थितो देहे  तथात्मा  नोपलिप्यते //३२//

चौपाई; 
सर्वव्याप्त जिमि  सूक्ष्मअकाशा / हो संलग्न न लखहु सकाशा //
ताहि  भाँति स्थित इस तन में /आत्मा लिप्त न जानहु मनमें //

श्लोक;-
यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः /
क्षेत्रं क्षेत्री  तथा  कृत्स्नं  प्रकाशयति भारत //३३//

चौपाई;- 
एकहिंरवि जिमि प्रगट अकाशा / अखिल विश्वमें करे प्रकाशा //
वैसहिं  एक   आत्मा  द्वारा / होय  प्रकाशित  यह  तन  सारा //

श्लोक;-
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं          ज्ञानचक्षुषा /
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् //३४//

दोहा;-
इस प्रकार क्षेत्रज्ञ  अरु , क्षेत्र  भेद  का  ज्ञान /
अरु सविकारी प्रकृति से,मुक्ति उपाय महान //
ज्ञान   चक्षु   से   देखते , जो  ज्ञानी  मर्मज्ञ / 
वह  महात्मा  परमपद , पाय  होय   सर्वज्ञ //

क्षेत्र   और   क्षेत्रज्ञ  का , तेरहवाँ   अध्याय /
हुआ पूर्ण प्रभु की कृपा ,सदगुरु दर्शन पाय //  

इस प्रकार श्रीमद् भगवद् गीता रुपी उपनिषद एवं ब्रह्मविद्या तथा योग शास्त्र विषयक
श्रीकृष्ण  और  अर्जुन  के  संवाद  में  उदयभानु  तिवारी  'मधुकर '  कृत  महाकाव्य गीता मानस में  क्षेत्र -क्षेत्रज्ञ विभाग योग नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ / 


                                       हरि ॐ तत्सत्    
        

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