Monday, January 5, 2015

                    * अथ चतुर्दशोsध्यायः *  

दोहा;-
प्रकृति जनित गुण,सत्त्व,रज,अरु तम,बाँधहिं जीव /
जड़ ,  चेतन    संयोग    से ,   पावे    रूप   सजीव //  

                       श्री भगवानुवाच
श्लोक;-
परं भूयः  प्रवक्ष्यामि  ज्ञानानां  ज्ञानमुत्तमम् /
यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः//१//

दोहा;-
सर्व ज्ञान में श्रेष्ठ अति ,परमोत्तम जो ज्ञान /
उसे सुनाऊँ पार्थ फिर ,सुन वह देकर ध्यान //
चौपाई;-  
जिसे जान कर सब मुनि,ऋषिगण/ मुक्त हुये छूटे भव बंधन//
वे सब मुझ में आन समाये / परम  सिद्धि जो जो ऋषि पाये//
  
श्लोक;-
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य  मम  साधर्म्यमागताः / 
सर्गेsपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च //२//

चोपाई;- 
इसी ज्ञान का आश्रय पाकर / मुझ  में आन  समय  जो  नर //
आदिश्रष्टि में फिर नहिं जन्में/और न व्याकुल होहिं प्रलय में //

श्लोक;-
मम योनिमर्हद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् /
सम्भवः सर्वभूतानां   ततो   भवति   भारत //३//

चौपाई;-
'महद ब्रह्म' ही मूल प्रकृति है / जीव योनि ही वह स्थिति है //
उसी योनि में यह जग चेतन / गर्भ स्थित करता मैं अर्जुन //
उस जड़ चेतन के संयोगा / जन्में  जगत  प्राणि सब लोगा //

 श्लोक;- 
सर्वयोनिशु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः /
तासां   ब्रह्म   महद्योनिरहं   बीजप्रदः  पिता //४//

चौपाई;-
कौन्तेय सुन सभी योनि में / जितने तन धारी जग जन्में // 
उनकी गर्भधारणी माता / है यह  योनि  प्रकृति विख्याता //
और बीज  स्थापन  कर्त्ता / मैं  ही  जनक  विश्व  का  भर्ता //

श्लोक;-
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः /
निबध्नन्ति महाबाहो देहे  देहिनमव्ययम् //५//

चौपाई;-
महाबाहु अर्जुन आगे  सुन / सत्त्व  रजो  तम  ये  तीनों  गुण //
प्रकृति जनित ये गुण जग साधें/अव्यय जीवहिं तन में बाँधें //

श्लोक;-
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् /
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ //६//

दोहा;-
तीनों गुण  में सत्त्व गुण ,है प्रकाश से युक्त /
निर्विकार निर्मल परम,सुन हे  पापविमुक्त //
जो सुख,ज्ञानासक्ति से,नर नहिं हुये विरक्त /
सतगुण जीवहिं बाँधता,जो उससे  आसक्त //  

श्लोक;-
रजो रागात्मकं विद्धि  तृष्णासङ्गसमुद्भवम् /
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् //७//

चौपाई;-
रागरूप रजगुण पहचानो / कामासक्ति जनित यह जानो // 
यह गुण कर्म फलों के बंधन / बाँधे जीवहिं कुन्तीनन्दन //

श्लोक;-
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि  मोहनं  सर्वदेहिनाम् /
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत //८//

चौपाई;-
सब तनधारी मोहे तमगुण / वह अज्ञान जनित है अर्जुन // 
आलस , नींद, प्रमाद बढ़ावे / हो  आसक्त  जीव बँध जावे //

श्लोक;-
सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत /
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत //९//

चौपाई;-
सतगुण सुख  के  पंथ  लगाये / रजगुण  कर्म  प्रयुक्त  कराये //
भारत !तमगुण ज्ञानहिं ढँक कर /फिर प्रमाद में करे अग्रसर //

श्लोक;-
रजस्तमश्चाभिभूय  सत्त्वं  भवति  भारत /
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमःसत्त्वं  रजस्तथा //१०//

चौपाई;-
रज ,तम, दाब सतोगुण बाढ़े / सत , तम  नीचे कर रज काढ़े //
उसीभाँति भारत! रज,सतगुण/इन्हें दमनकर बढ़ता तमगुण //

श्लोक;-
सर्वद्वारेषु   देहेsस्मिन्प्रकाश   उपजायते /
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत //११//

चौपाई;-
अन्तःकरण , देह , इन्द्रिय में / जबहिं विवेक  चेतना  जन्में //
तब सत गुण प्रधान है जानो / रज,तम शान्त हुये अस मानो//

श्लोक;-
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा /
रजस्येतानि   जायन्ते   विवृद्धे  भरतर्षभ //१२//

चौपाई;- 
भारत रजगुण के बढ़ने पर / बाढ़े  लोभ वृत्ति अरु मत्सर //
स्वार्थ बुद्धि हो मन में दम्भा / कर्म सकाम करे आरम्भा //
विषय भोग के पीछे भागे /  बढ़े अशान्ति लालसा जागे //

श्लोक;-
अप्रकाशोsप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च /
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन //१३//

दोहा;-
कुरुनन्दन तामस बढे ,मोह ,प्रमाद ,प्रवृत्ति /
आलस ,निद्रा आदि में, हो  जाये  आसक्ति //
चौपाई;-
अन्तर्मन नहिं होय प्रकाशित/ विषय इन्द्रियों के हों जाग्रित//
 
श्लोक;- 
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् /
तदोत्तमविदां   लोकानमलान्प्रतिपद्यते //१४//

चौपाई;-    
सत गुण की विवृद्धि में जो नर /हो तन मुक्त मृत्यु को पाकर //
श्रेष्ठ   कर्म  कर्ता   के  लोका  /  दिव्य  स्वर्ग  पावे  देवों  का //

श्लोक;- 
रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते /
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिशु  जायते //१५//

चौपाई;-
रज विवृद्धि  में  मृत्युहिं  पाये / कर्मासक्त  पुरुष  गृह  जाये //
तमो गुणी नर तन को तज कर / मूढ़ योनि में जन्में आकर //

श्लोक;-
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् /
रजसस्तु  फलं   दुःखमज्ञानं   तमसः  फलम् //१६//

चौपाई;- 
सात्विककर्मों के सात्त्विकफल/ज्ञान विराग और सुख निर्मल//
ऐसा कहा गया है अर्जुन / किन्तु  शेष गुण  के  फल भी सुन//
राजसफल  को दुःख ही जानो / तामस  फल अज्ञानहिं मानो//

श्लोक;-
सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च /
प्रमादमोहौ   तमसो   भवतोsज्ञानमेव  च //१७//

चौपाई;- 
सतगुण ज्ञान  प्रकाश दिखाये / रजगुण लोभासक्त  कराये  //
तमगुण मोह ,प्रमाद बढ़ाता / अरु अज्ञान ह्रदय  उपजाता //

श्लोक;-
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः /
जघन्यगुणवृत्तिस्था   अधो   गच्छन्ति   तामसाः //१८//

चौपाई;-
उच्चलोक में सात्त्विक जाते / सत्य  लोक देवों का पाते //
राजस पुरुष मध्य रह जायें /मृत्युलोक में भटक भुलायें //
दोहा;-
निन्दित तमगुण युक्त नर ,वृत्ति तामसी पाय /
जन्में पशु अरु कीट की,अधम योनि में जाय //

श्लोक;-
नान्यं  गुणेभ्यः कर्तारं यदा दृष्टानुपश्यति /
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोsधिगच्छति //१९//

दोहा;-
जिस  क्षण   दृष्टा  आत्मा , एकीभाव   विरक्त /
करता लखे न अन्य को, तिर्गुण  के अतिरिक्त //
अरु तीनों गुण से  परे , परम  तत्त्व  ले जान /
उस क्षण ब्रह्म स्वरूप को , पाकर होय महान //
   
श्लोक;-
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् /
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोsमृतमश्नुते  //२०//

चौपाई;- 
तन  उत्पत्ति  मात्र  में अर्जुन  /  कारण  रूपी   ये  तीनों गुण //
इनका जो करते उल्लंघन / जन्म , बुढ़ापा , मृत्यु  रूप  तन // 
इन सब दुख से मुक्त हुआ नर / पावे अमिय तत्त्व परमेस्वर //                 
अर्जुन उवाच 

श्लोक;-
कार्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो /
किमाचारः   कथं  चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते //२१//

चौपाई;-
तत्त्वामृतमय प्रभु की वाणी / सुनि पुनि  बोले अर्जुन ज्ञानी //
गुणातीत जो नर  हो  जायें / प्रभु  उनके  लक्षण  समझायें //
किस प्रकार करते आचारा / गुणातीत हों किस विधि द्वारा //
उपर्युक्त   प्रश्नों   को   सुन  कर /  बोले   श्रीकृष्ण  योगेश्वर //

                         श्रीभगवानुवाच  

श्लोक;-
प्रकाशं   च  प्रवृत्तिं  च  मोहमेव  च  पाण्डव /
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न  निवृत्तानि काङ्क्षति //२२//

दोहा;-
तम,सत, रज ये तीनगुण ,मायावी  आसक्ति /
इनके कार्य  स्वरुप हैं ,मोह ,प्रकाश , प्रवृत्ति //   
इनकी प्रकट परिस्थिति , करे न द्वेष सयुक्त /
अरु निवृत्ति के काल में , रहे  कामना  मुक्त //

श्लोक;-
उदासीनवदासीनो   गुणैर्यो  न  विचाल्यते /
गुणा वर्तन्त इत्येव  योsवतिष्ठति नेङ्गते //२३//

चौपाई;-
उदासीन सम जो जग स्थित/तिर्गुण से नहिं होता विचलित //
सारे गुण बरतत हैं गुण में/ यह समझे जो  नर निज मन मेंं //
एकभाव में रहकर स्थित/ उस स्थितिसे  हो नहिं  विचलित//
      
श्लोक;-
समदुःखसुखः  स्वस्थः   समलोष्टाश्मकाञ्चनः /
तुल्यप्रियाप्रियो   धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः//२४ //

चौपाई;- 
सुख, दुख समताभाव दिखाये / मन आत्मा  में ध्यान रमाये// 
मिट्टी ,कंचन अरु पाषाणा / इनहिं धीर जो लखहिं  समाना//
अप्रिय और प्रिय को  सम  माने / निंदा  स्तुति  भेद न जाने//

श्लोक;-
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः /
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्च्यते //२५ //

चौपाई;- 
मानापमान धरे नहिं ध्याना / लखे शत्रु  अरु  मीत  समाना //
सब कर्तापन भाव रहित जन / गुणातीत कहलावहिं अर्जुन //

श्लोक;-
मां च योsव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते /
स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते //२६//

चौपाई;-
अव्यभिचारिणि भक्ति सँयोगी/मोहिं भजहिं जो होकर योगी //
तिरगुण लाँघे सब विधि ज्ञाता / ब्रह्म प्राप्ति के योग्य कहाता //
  
श्लोक;-
ब्रह्मणो    हि   प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य  च /      
शश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च //२७//

दोहा;-
अविनाशी  परब्रह्म अरु,  अमिय , नित्य  सद्धर्म /
अरु  अखण्ड  आनन्द का , मैं  ही  आश्रय ,मर्म //

तिर्गुण  युक्त  प्रभाव अरु ,गुणातीत विधि गाय /
पूर्ण   हुआ   इस  योग  का , चतुर्दशो  अध्याय //   

इस प्रकार श्रीमद् भगवद् गीता रुपी उपनिषद एवं ब्रह्मविद्या तथा योग शास्त्र विषयक
श्रीकृष्ण  और  अर्जुन  के  संवाद  में  उदयभानु  तिवारी  'मधुकर '  कृत  महाकाव्य गीता मानस में गुण त्रय विभाग योग नामक चतुर्दशो अध्याय पूर्ण हुआ /


                                हरि ॐ तत्सत्

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