Thursday, January 22, 2015

                   अथैकादशोsध्यायः
दोहा;- 
एकादश  अध्याय में , दिव्य  विराट   स्वरूप /
प्रगट दिखाया पार्थ को , अद्भुत अनुपम रूप // 

                      अर्जुन उवाच
श्लोक;- 
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसञ्ज्ञितम् /
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोsयं विगतो मम //१//

दोहा;-
मोहिं अनुग्रह करन हित , कृपासिन्धु देवेश /
परमगुप्त अध्यात्म का , दिया मुझे  उपदेश //
चौपाई;- 
उससे मम अज्ञान  नशाया / हे त्रिभुवन सचराचर राया //

श्लोक;- 
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ  विस्तरशो  मया /
त्वत्तः कमलपत्राक्ष महात्म्यमपि चाव्ययम् //२//

चौपाई;-
अबतक हे कमलाक्ष तुम्हारे/ मुख से उतपति लय  के सारे //
विस्तृतवर्णन,महिमा न्यारी / अविनाशी, मैं सुनी तुम्हारी // 

श्लोक;- 
एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर /
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम //३//

चौपाई;-
आपकहहिं प्रभु निज को जैसा / है सच यह बिलकुल ही वैसा //
अदभुत अनुपम रूप विशेषा / श्रवणनसुना किन्तु नहिं देखा // 
सब  ऐश्वर्य , तेज , बल   युक्ता / विश्वस्वरूप  शक्ति   संयुक्ता //
वह   प्रत्यक्ष   रूप  सर्वोत्तम  /  देखन   चाहूँ   हे   पुरुषोत्तम //
      
श्लोक;-
मन्यसे यदि तच्छक्यं माया द्रष्टुमिति प्रभो /
योगेश्वर ततो में  त्वं  दर्शयात्मानमव्ययम् //४//

चौपाई;-
प्रभु  देवाधिदेव  सुरभूपा /  देख  सकूँ   यदि   मैं   वह रूपा //
योग्य पात्र  जो  मानहु  स्वामी /  हे  योगेस्वर  अन्तर्यामी //   
तो प्रभु वह वह अविनाशी रूपा / मोहिं दिखायें हे  सुरभूपा //
अस सुन हर्षित रूप दिखावा /देख पार्थ !कह वचनसुनावा //

                           श्रीभगवानुवाच  
 श्लोक;-
पश्य  में  पार्थ  रूपाणि  शतशोsथ सहस्त्रशः /
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च //५//

दोहा;-
सत, सहत्र, नाना विधिहिं ,नाना वर्ण  अनूप /
नाना  आकृति  भेष  में, देख अलौकिक रूप //

श्लोक;-
पश्यादित्यान्वसून् रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा /
बहून्यदृष्टपूर्वाणि     पश्याश्चर्याणि    भारत //६//               

चौपाई;-
द्वादस  अदिति पुत्र  सब  देखो /  ग्यारह  रूद्र, अष्टवसु  पेखो // 
अश्विनि के कुमार लख दोऊ/ अरु  उन्चास  मरुद् गण  सोऊ //
अन्य जिन्हें पहले नहिं देखा /वे विस्मय युत अद् भुत भेखा //
मुझमें  देखो  भारत  ज्ञानी  /  गदगद  हुये  पार्थ सुन वाणी // 

श्लोक;-
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् /
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि //७//

चौपाई;-
एकजगह मम तनमें स्थित / सब सचराचर जग आलोकित//
देख पार्थ जो जो रूचि तेरी/ अलख अलौकिक वह छवि मेरी// 

श्लोक;-
न  तु  मां  शक्यसे   द्रष्टुमनेनैव   स्वचक्षुषा /
दिव्यं ददामि  ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् //८ // 

चौपाई;- 
अबतक जो विभूति दरशाई  / पारथ दृष्टि  देख नहिं पाई // 
तब  भगवन बोले हे अर्जुन / दृष्टि न सक्षम देखन में सुन //   
भौतिक दृष्टि परे मम ज्ञाना/ दिव्य चक्षु निज करूँ प्रदाना //
इससे देख अलौकिक रूपा / यौगिक शक्ति  प्रभाव अनूपा //

                          संजय उवाच
श्लोक;-
एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः /
दर्शयामास  पार्थाय   परमं   रूपमैश्वरम् //९//  

चौपाई;- 
हे  कुरुराज !  महायोगेश्वर /  कुन्तीसुत   से   ऐसा   कहकर // 
अदभुत,अनुपम,दिव्य, अनूपा /  परमेश्वर्य  युक्त  निज रूपा //
अर्जुन सम्मुख प्रगट दिखाया / देख पार्थ  ने शीश  झुकाया // 

श्लोक;-
अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् /
अनेकदिव्याभरणं    दिव्यानेकोद्यतायुधम् //१०//
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् /
सर्वाश्चर्यमयं    देवमनन्तं   विश्वतोमुखम् //११// 

सवैया;-
बहुतेरे  आनन  औ  बहु  नेत्र , अनेकाद्भुत  छवि दर्शन वारे /
दिव्य अनेकाभूषण से  युत ,हाथों में बहु दिव्य अस्त्र सँवारे // 
दिव्य सुगन्धनुलेपन कीन्हें, दिव्य सुवस्त्र औ मालायें धारे /
सर्वाश्चर्य से युक्त असीम अरु , विश्वमुखी  प्रभु पार्थ निहारे //
  
श्लोक;- 
दिवि        सूर्यसहस्त्रस्य       भवेद्युगपदुत्थिता /
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः //१२//

दोहा;- 
एक साथ मिल सहस रवि , यदि हों उदित अकाश /
विश्वरूप   परमात्मा , सम  किमि   होय   प्रकाश //  

श्लोक;- 
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा /
अपश्यद्देवदेवस्य    शरीरे   पाण्डवस्तदा //१३//

दोहा;- 
पाण्डुपुत्र ने ताहि क्षण , उस  तनमें  इक  बार /
पृथक पृथक सम्पूर्ण जग, देखे विविध प्रकार //

चौपाई;-
परमदेव में बहु जग लेखे ,एकजगह सब स्थित देखे //

श्लोक;-
ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः /
प्रणम्य  शिरसा   देवं  कृताञ्जलिरभाषत //१४//

चौपाई;- 
पुनि अचरजमय चक्रितअर्जुन/रोम रोम हर्षित पुलकित तन /
शीश  झुकाय  जोरि   जुगपाणी / विश्वरूप   से   बोले  वाणी //
                             अर्जुन उवाच 
श्लोक;- 
 पश्यामि देवांस्तव देव देहे 
               सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् /
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ-
               मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् //१५//

चौपाई;-
तव तन स्थित सब देवों को / बहु  भूतों  के  समुदायों  को //
कमल सुशोभित ब्रह्मदेव को/ सब ऋषियों अरु महादेव को //
तथा  दिव्य  सर्पों  को  देखूँ / परमदेव  सब  तुम  में  लेखूँ //

श्लोक;-
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं-
          पश्यामि त्वां सर्वतोsनन्तरूपम् /
नान्तं न  मध्यं न  पुनस्तवादिं 
                 पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप //१६//

चौपाई;-
लहूँ तुमहिं लखि लोचन लाहू /बहु मुख, नयन, उदर अरु बाहू //
विपुलरूप  नहिं  पाऊँ  अन्ता / सबही  ओर  लखूँ  भगवन्ता //
हे  विश्वेश्वर जहँ लगि  पेखूँ / अन्त,  मध्य अरु आदि न देखूँ //

श्लोक;-
किरीटिनं गदिनं  चक्रिणं च 
            तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् /
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ता-
                 द्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् //१७//

चौपाई;-
मुकुट गदा अरु चक्र सुशोभित / तेज पुंज सब ओर प्रकाशित //
ज्वलितअग्निअरुरविसमज्योतीदुरनिरीक्ष्यद्युतिचहुँदिशिहोती/
सबहिं  ओर  अप्रमेय  स्वरूपा / देखूँ  सब विधि  हे सुरभूपा//

श्लोक;-
त्वमक्षरम् परमं वेदितव्यं- 
              त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् /
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता 
                  सनातनस्त्वं पुरुषो मतो में //१८//

दोहा;-
ज्ञातव्याक्षर तुम परम ,तुमही  जगत निधान /      
 शाश्वत   धर्मसुरक्षक ,  अविनाशी   भगवान //

चौपाई;- 
अस मम मत तुम आदि सनातन/परमपुरुष जगके हे स्वामिन //

श्लोक;- 
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य-
            मनन्तबाहुं  शशिसूर्यनेत्रम् /
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं-
        स्वजेतसा विश्वमिदं तपन्तम् //१९//

चौपाई;-
आदि,मध्यअरु नहिं तवअन्ता / सब समार्थ्ययुक्त भगवंता //
भुजा अनन्त चन्द्र,रवि रूपा / नयन सुशीतल, तेज अनूपा //
 दीप्त अग्नि   सम आनन पेखूँ / जग  संतप्त तेज  से  देखूँ //

श्लोक;- 
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि 
            व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः /
दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं-
           लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् //२०//

चौपाई;- 
हे महात्मन परमप्रकाशा/ अवनि,स्वर्ग ,बिच जो आकाशा//
 सब दिशि जहाँ दृष्टि  निज फेरूँ / तुमसे ही  परिपूरण हेरूँ //
अदभुतरूप महा  भयकारी / देख  भयातुर  त्रिभुवन  भारी //
     
श्लोक;-
अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति 
              केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति /
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः 
       स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः //२१//

चौपाई;-
वे  ही  सब  सुरदेव  समूहा /  प्रविशहिं  तुममें  बिन  प्रत्यूहा //
कुछ भयभीत जोरिजुगहाथा / गावहिं हे  प्रभु तव गुणगाथा //
सकल महर्षि सिद्ध के वृन्दा / मंगल हो कह  गावहिं  छन्दा //
परमोत्तम   स्तोत्रों    द्वारा /  तव   स्तुति    करते   करतारा //

श्लोक;-
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या-
             विश्वेsश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च /
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा-
         वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे //२२//

दोहा;-
जो   द्वादस   आदित्य    अरु  ,   एकादश    हैं    रूद्र /
तथा    अष्टवसु   ,   साध्यगण  ,   विश्वदेवता    भद्र //           
अश्वनिसुत   औ  मरुदगण  , तथा   पितर  समुदाय /
सब   गन्धर्वा,   यक्ष   अरु ,राक्षस ,  सिद्ध   निकाय //     
वे  सब   ही   आश्चर्य   से, तुमहिं   लखहिं   भगवंत /
जय जय जय सुर कहहिं तव, लख नहिं पावहिं अंत //

श्लोक;-
रूपं  महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं-
      महाबाहो              बहुबाहूरुपादम् / 
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं-
      दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् //२३//   

चौपाई;-
महाबाहु  लख रूप तुम्हारा / बहुमुख, नयना,  बाहु अपारा //
पद,जंघा बहु उदर विशाला / अतिविकरालदाढ़ जनु काला //    
सर्वलोक हैं भय से व्याकुल / दृश्य  देख  मैं  भी हूँ आकुल //

श्लोक;-
नभःस्पृशं                दीप्तमनेकवर्णं-
            व्यत्ताननं            दीप्तविशालनेत्रम् /
दृष्ट्वा हि  त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा 
           धृतिं न  विन्दामि  शमं  च  विष्णो //२४//

चौपाई;-
हे   प्रभु   विष्णुरूप    समदर्शी /  हे योगेश्वर   नभ   स्पर्शी //
दीप्त  अनेकवर्ण  संयुक्ता / विस्तृत  बहु   आनन   से  युक्ता //
लख  दीपित  बहुनेत्र  विशाला / मायासंवृत   रूप  निराला //
भयाक्रांतमन अति गंभीरा / पाऊँ नहिं प्रभु शान्ति न धीरा // 

श्लोक;-
दंष्ट्राकरालानि    ते    मुखानि 
              दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि /  
दिशो न जाने  न लभे च शर्म 
               प्रसीद   देवेश   जगन्निवास //२५//

चौपाई;-
रूप कराल दाढ़ विकराला / काल अनल सम मुख की ज्वाला // 
उस ज्वाला में भटक भुलाऊँ / भ्रमवश दिशा जान नहिं पाऊँ //
यह  स्वरूप  लख  हे  देवेशा /  सुख  नहिं  पाऊँ  हे  योगेशा //
हों प्रसन्न हे जगन्निवासा/ लखहुँ रूप जेहि कर हिय वासा //

श्लोक;-
अमी च  त्वां   धृतराष्ट्रस्य  पुत्राः 
              सर्वे       सहैवावनिपालसङ्घैः/
भीष्मो   द्रोणः  सूतपुत्रस्तथासौ 
              सहास्मदीयैरपि   योधमुख्यैः //२६//
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति 
            दंष्ट्राकरालानि    भयानकानि /
केचिद्विलग्ना      दशनान्तरेषु 
            सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः //२७//

दोहा;- 
वे  कौरवनृपसुत सकल, सहित नृपन्ह समुदाय /
तुममें करहिं प्रवेश प्रभु , भीष्म , द्रोणगुरु जाय//
कर्ण  सहित  मम पक्ष के , वीर प्रमुख समुदाय /
कालदाढ़ विकराल बहु , मुख में प्रविशहिं धाय //
सहित  अनेकों वीर  के , चूर्ण  हुये   बहु  शीश /
फँसे   दाँत  के   बीच   में ,  देखूँ   हे  जगदीश //
   
श्लोक;-
यथा     नदीनां     बहवोsम्बुवेगाः 
             समुद्रमेवाभिमुखा           द्रवन्ति /
तथा       तवामी     नरलोकवीरा-
             विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति //२८//

चौपाई;-
ज्यों सब सरिताओं की धारा / जलनिधि ओर बहे भरतारा //
उसीतरह भुवि  वीर  नरेशा / तव जलते  मुख   करहिं   प्रवेशा // 

श्लोक;-
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा-
             विशन्ति  नाशाय  समृद्धवेगाः/
तथैव नाशाय विशन्ति लोका-
             स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः//२९//

चौपाई;-
मोहासक्त   पतंग   नशावें / दीप्त  अनल   लख   जैसे  धावें // 
ताहिभाँति सब लोग सचेता / तव मुख माहिं मृत्यु के हेता //
बड़े  वेग  से  करहिं  प्रवेशा / निज   नैनन   देखहुँ   देवेशा //

 श्लोक;-
लेलिह्यसे   ग्रसमानः  समन्ता -
             ल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः /
तेजोभिरापूर्य         जगत्समग्रं-
           भासस्तवोग्राःप्रतपन्ति विष्णो //३०//

चौपाई;-
सर्वलोक दीपित मुख द्वारा / ग्रसि चाटत चहुँ ओर निहारा //
हे  विष्णो  तव  पूर्ण  प्रभायें / तेजोमय  हो  जगत तपायें //

श्लोक;-
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो- 
            नमोsस्तु   ते   देववर   प्रसीद /
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं- 
            न हि प्रजानामि तव  प्रवृत्तिम् //३१//

चौपाई;-
को   तुम   उग्ररूप   में   स्वामी /  मोहिं   बतायें  अन्तर्यामी //
हे   देवाधिदेव   सिर   नाउँ /  होहु  प्रसन्न   भेद   नहिं  पाऊँ //
हे प्रभु आदिपुरुष  भगवन्ता / जानन  चाहूँ  तुमहिं  अनन्ता //
अमितस्वरूप दिव्य जिमिभानू/ तवप्रवृत्ति प्रभु मैं नहिं जानूँ //
ऐसा कह पुनि  शीश झुकावा / विश्वरूप  तब वचन सुनावा  //

                           श्रीभगवानुवाच
श्लोक;-
कालोsस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो-
             लोकान्समाहर्तुमिह       प्रवृत्तः /
ऋतेsपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे 
           येsवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः //३२// 

दोहा;-
लोक विनाशक काल मैं, बढा  हुआ विकराल / 
प्रवृत हुआ इन लोक के, नाश हेतु बन ज्वाल //       
हैं  प्रतिपक्षी   सेन  में , जो   योधा  बलवान /
बिना युद्ध के भी नहीं , बचें  पार्थ  सच जान //

श्लोक;-
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ     यशो     लभस्व
जित्वा शत्रून्भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् /
मयैवैते        निहताः       पूर्वमेव 
निमित्तमात्रं    भव   सव्यसाचिन् //३३//

दोहा;-
इससे उठ यश प्राप्त कर / जीत सकल रिपुराज /
भोग अकंटक विश्व का , सुख समृद्धिमय राज //
मारे   मैंने   वीर   ये , प्रथमहिं  जान  यथार्थ /
केवल  इस  कुरुक्षेत्र  में , तू निमित्त बन पार्थ //     

श्लोक;- 
द्रोणं  च  भीष्मं  च  जयद्रथं  च 
          कर्णं   तथान्यानपि  योधवीरान् /
मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा-
          युध्यस्व  जेतासि  रणे  सपत्नान् //३४// 

चौपाई;-
भीष्महिं ,द्रोण ,कर्ण अरु जयद्रथ / हते और बहु वीर महारथ //
इन्हें मार  तू   होकर   निर्भय /  जीतेगा   रन   वैरी    दुर्जय //

                               संजय उवाच
श्लोक;-
एतच्छ्रुत्वा   वचनं  केशवस्य 
              कृताञ्जलिर्वेपमानः  किरीटी /
नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं-
              सगद्गदं   भीतभीतः  प्रणम्य //३५//

चौपाई;- 
सुनि योगेश्वर की यह वाणी / संजय निज नृप कहेउ बखानी//  
शीश मुकुटशोभित अबअर्जुन / युगलपाणिजोरे कम्पिततन//
करके नमस्कार, भयभीता / प्रभु को  करत  प्रणाम  सप्रीता//
पुनि धरि  धीरज रदपट खोले / गद गद  वाणी  से यह बोले//

                               अर्जुन उवाच 
श्लोक;-
स्थाने हृषीकेश   तव  प्रकीर्त्या 
            जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते       च /
रक्षांसि भीतानि दिशो  द्रवन्ति 
            सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः//३६//

चौपाई;-
ह्रषीकेश  हे  अंतर्यामी / यह अति  उचित  जगत  के  स्वामी//
प्रभु तव नाम सुकीरति को कह/ अतिहर्षित होरहा जगतयह// 
असुर  सभीत  चतुर्दिशि  भागें / सिद्ध प्रणाम करहिं अनुरागें//

श्लोक;-
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् 
            गरीयसे       ब्रह्मणोsप्यादिकर्त्रे /
अनन्त    देवेश    जगन्निवास 
            त्वमक्षरं    सदसत्तत्परं     यत् //३७//

चौपाई;-
हे  महात्मा  जगत  प्रणेता / ब्रह्मा  के  भी  तुम्ही  रचेता //
सबमें श्रेष्ठ आप प्रभु ऐसे/सिद्ध  नमन फिर करहिं न कैसे // 
हे  अनंत  प्रभु हे  देवेशा / जगन्निवास  स्वरूप  दिनेशा //
सत अरु असत पर जो अक्षर / आप वही  हैं हे  योगेश्वर //
हे  सच्चिदानंदघन   स्वामी / त्रिकालज्ञ  हे  अन्तर्यामी //

श्लोक;-
त्वमादिदेवः     पुरुषः      पुराण-
            स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् / 
वेत्तासि   वेद्यं   च  परं   च  धाम 
            त्वया     ततं     विश्वमनन्तरूप //३८//

दोहा;-
आदि सनातन  पुरुष तुम ,जग आश्रय विश्वेश /
ज्ञाता अरु ज्ञातव्य हे,   परमधाम      योगेश //
चौपाई;-
तुमसे यह जग पूर्ण अनंता / चहुँ दिशि व्याप्त लखूँ भगवंता //

श्लोक;-
वायुर्यमोsग्निर्वरुणः शशाङ्कः 
            प्रजापतिस्त्वं     प्रतितामहश्च/ 
नमो  नमस्तेस स्तु  सहस्रकृत्वः 
            पुनश्च  भूयोsपि  नमो  नमस्ते //३९//

चौपाई;-
शशि,यम वरुण मरुत अरु पावक/तुम्हींप्रजापतिअरु अभिभावक //
ब्रह्मा के भी आप जनक हो / पुनि  पुनि  प्रभु  को सहस नमन हो //
आप    हेतु    पुनि    जगदाधारा  /  नमस्कार     है    बारम्बारा  //
श्रद्धा भक्ति  न  ह्रदय  समाये / नमन  करत  मन  तृप्ति  न  पाये // 

श्लोक;-
नमः   पुरस्तादथ    पृष्ठतस्ते 
            नमोsस्तु   ते  सर्वत  एव  सर्व /
 अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं- 
            सर्वं समाप्नोषि ततोsसि  सर्वः //४०//

चौपाई;-
जयतिजयति जय जय भगवंता/ अतुलनीय सामर्थ्य अनंता//
सम्मुख , पीछे  करूँ  प्रणामा  /  सर्व  आत्मा  हे  घनश्यामा//
तुम्हें  नमन  सब ओर हमारा / अमित  पराक्रम युत कर्तारा//
व्यापे  सब  जग  अन्तर्यामी / इससे  सर्वरूप  तुम  स्वामी//    

श्लोक;-
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं-
            हे  कृष्ण  हे यादव  सखेति /
अजानता महिमानं  तवेदं-
            मया प्रमादात्प्रणयेन वापि //४१//
यच्चावहासार्थमसत्कृतोsसि
              विहारशय्यासनभोजनेषु
एकोsथवाप्यच्युत त्समक्षं-
          तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् //४२// 

चौपाई;-
तवप्रभाव महिमा नहिंजाना/अबलगि तुमहिं सखानिज माना //
कह  कर  प्रेम   प्रमादिक  द्वारा  / हे  यादव  हे  कृष्ण  पुकारा //
अनजाने   हठवश  सुरसाईं /  बोलेहुँ  वचन  सखा   की  नाईं //

दोहा;-
हे  अच्चुत   एकान्त   में ,  अथवा  मित्रों  संग /
भोजन ,शयन ,विहार में,किये हास्य बहु व्यंग //
उस  विनोद  में  भूल  से , किया  अनादर  देव /
वे सब मम अपराध प्रभु, क्षमहु न जानिहुँ भेद //
चौपाई;-
 हे  केशव अप्रमेय स्वरूपा / क्षमा करें  हे त्रिभवन भूपा //

श्लोक;-
पितासि        लोकस्य      चराचरस्य 
               त्वमस्य पूजयश्च गुरुर्गरीयान् /
न त्वत्समोsस्त्यभ्यधिकः कुतोsन्यो-
                    लोकत्रयेsप्यप्रतिमप्रभाव //४३//

चौपाई;- 
आपजनक सचराचर जग के / गुरुवर परमपूज्य प्रभु सबके // 
अमितप्रभावअप्रतिम तुम्हारा/ त्रिभुवन कोई न जाननहारा //
नहिं कोई जब प्रभु तुम जैसे / अधिक श्रेष्ठ फिर होगा  कैसे //    
  
श्लोक;-
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं-
            प्रसादये  त्वामहमीशमीड्यम् /
पितेव  पुत्रस्य  सखेव  सख्युः 
            प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् //४४// 

चौपाई;- 
इससे हे  प्रभु , हे सुरराया /तव पद  अर्पित कर निज  काया //
स्तुति योग्य तुमहिं घनश्यामा /भलीभाँति कर दण्डप्रणामा //
करने  तुमहिं   प्रसन्न   सुरेश्वर / करूँ  प्रार्थना  हे  योगेश्वर //
हे देवेश पिता ज्यों सुत  के / पति, प्रियतमा  और पत्नी  के //
सखा,सखा के सब अपराधा / क्षमा करें  हे  प्रभु  बिन बाधा //
उसी  तरह  अपराध  हमारा / तुमही  सहन  योग्य  करतारा // 

श्लोक;-
अदृष्टपूर्वं हृशितोsस्मि दृष्ट्वा /
            भयेन च  प्रव्यथितं  मनो  मे /
तदेव    मे    दर्शय    देवरूपं- 
            प्रसीद   देवेश   जगन्निवास //४५//

चौपाई;- 
पहले जाहि कबहुँ  नहिं  देखा / वह  आश्चर्ययुक्त तव भेखा //
लख हर्षित हूँ त्रिभुवनराया / पर व्याकुल हो मन घबराया //
दोहा;-
इससे हे  देवेश  निज , विष्णु  चतुर्भुज  रूप /
मुझको वही दिखाइये ,लोचन ललित अनूप //
चौपाई;-
हों प्रसन्न हे जगत नियंता / जगन्निवास स्वरूप  अनंता //
    
श्लोक;-
किरीटिनं   गदिनं   चक्रहस्त-
            मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव /
तेनैव     रूपेण     चतुर्भुजेन 
            सहस्त्रबाहो    भव   विश्वमूर्ते //४६//

चौपाई;-
तुमहिं किरीट शीश पर धारे / हाथ चक्र अरु गदा सम्हारे //
देखन   चाहूँ   हे  सुरभूपा /  हे  प्रभु  विश्वस्वरूप  अनूपा // 
रूप  चतुर्भुज  देवन्ह  प्यारा /  प्रगट  करें  हे  विश्वाधारा //

                             श्री भगवानुवाच 
श्लोक;-
मया   प्रसन्नेन    तवार्जुनेदं-
            रूपं  परं दर्शितमात्मयोगात् /
तेजोमयं    विश्वमनन्तमाद्यं-
            यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् //४७//

चौपाई;-
पार्थ विनय सुन हर्षित होकर / अर्जुन  से  बोले करुणाकर //
मैं प्रसन्न हो पारथ तुझ  पर / योगशक्ति  से  विश्वरूप धर //
सबका आदि , तेजमय रूपा / परम विराट  अनंत  अनूपा //
तुझे दिखाया पारथ ज्ञानी / सखा,अनन्यभक्त निज जानी //
तुमसे पहले यह मम भेखा / कबहुँ  न अन्य काहु ने देखा //

श्लोक;-
न    वेदयज्ञाध्ययनैर्न    दानै-
            र्न   च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः /
एवंरूपः  शक्य  अहं  नृलोके 
            द्रष्टुं    त्वदन्येन     कुरुप्रवीर //४८//

सवैया;-
तेरे अलावा नहीं भुवि में कोई, देख  सके  मम  विश्वस्वरूपा /
नाहिं लखै कोई वेदकेपाठ अरु,यज्ञोंके अध्ययन से यह रूपा //
ना हि किये बहुदान क्रियायें, उग्र  तपस्या विधान अनुरूपा /
कुरूप्रवीर न तुम बिन सक्षम,अन्य जो  देखे ये  रूप अनूपा //
       
श्लोक;-
मा ते व्यथा मा च विमूढ़भावो-
             दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ् ममेदम् /
व्यपेतभीः  प्रीतमनाः पुनस्त्वं-
            तदेव   मे    रूपमिदं     प्रपश्य //४९// 

दोहा;- 
देख महा विकराल अति , यह  स्वरुप  अतिगूढ़ /
तुझे  न   होना   चाहिए , व्याकुल    भावविमूढ़ //   
मन प्रसन्न कर त्याग  भय,वह दुर्लभ मम भेख /
शंख चक्र , गद , पद्म  से  युक्त  पार्थ  फिर  देख //
         
                     संजय उवाच
श्लोक;-
इत्यर्जुनं   वासुदेवस्तथोक्त्वा 
            स्वकं  रूपं   दर्शयामास   भूयः /
आश्वासयामास  च  भीतमेनं-
            भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा //५०//

चौपाई;-
यह कह विश्वरूप  सुरराया / रूप  चतुर्भुज  प्रगट  दिखाया //
पुनि महात्मा श्री योगेश्वर / सौम्य मूर्ति श्रीकृष्ण रूप धर //
सभय पार्थ को धैर्य बँधाया / दिया ज्ञान  हरलीन्हीं माया //

                           अर्जुन उवाच 
 श्लोक;-
दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं  तव  सौम्यं  जनार्दन /
इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः //५१//

चौपाई;-
हे  जनार्दन   त्रिभुवन  भूपा / देख  सौम्य  यह  मानुष  रूपा //
अब प्रसन्न मैं मोह नशाया / स्वाभाविक  स्थिति  में आया //

                          श्री भगवानुवाच
श्लोक;- 
सुदुर्दर्शमिदं     रूपं     दृष्टवानसि     यन्मम  /
देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः //५२ //

चौपाई;-
जो तुम रूप चतुर्भुज देखा / पार्थ सुदर्शन  वह  मम भेखा //
उस स्वरुप को देव तरसते / दर्शन की नित  इच्छा करते //

श्लोक;-
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन  न  चेज्यया /
शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा //५३// 

चौपाई;-
सोइ चतुर्भुज दुर्लभ भेखा / जेहिविधि  अर्जुन तुमने देखा //     
वेद,यज्ञ,जप,तप अरु दाना / किये न देख सके नर आना //
      
श्लोक;-
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोsर्जुन /
ज्ञातुं द्रष्टुं   च   तत्त्वेन   प्रवेष्टुं   च   परन्तप //५४// 

चौपाई;-
किन्तु अनन्य भक्ति के द्वारा / तत्त्वज्ञान अरु दरश हमारा //
संभव सुनो परंतप अर्जुन / पावहिं मोहिं अनन्य भक्तजन //

श्लोक;-
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः /
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः  स  मामेति  पाण्डव //५५//

दोहा;-
वैरभाव  तज  प्राणि  से , जग  में  रहे विरक्त /           
कर्म  करे  मम  हेतु  जो , पारथ  तत्पर भक्त //
संगदोष   से   हीन   है , मुझमें  रहता  लीन /
वह अनन्य मम भक्त ही,मुझमें होय विलीन //

विश्वरूप  चिंतन  करत , हुआ  पूर्ण  अध्याय /
पढ़ें सुनें जो भक्त नित ,अवस मुक्ति पा जाय //         
  
इस प्रकार श्रीमद् भगवद् गीता  रूपी  उपनिषद  एवं  ब्रह्म  विद्या  तथा   योगशास्त्र  विषयक   श्रीकृष्ण  और  अर्जुन  के  संवाद   में  उदयभानु  तिवारी''मधुकर'' कृत महाकाव्य ''गीतमानस''में विश्वरूप दर्शन योग नामक  ग्यारहवाँ  अध्याय पूर्ण हुआ /  


                                   हरिओम तत्सत् 



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