Monday, January 5, 2015

                   अथ द्वादशोsध्यायः 

  दोहा;-
निराकार साकार  में , कौन  उपासक  श्रेष्ठ /
तथा ब्रह्म को प्राप्त नर ,लक्षण सुनहु यथेष्ठ // 

                     अर्जुन उवाच
दोहा;-
एवं  सततयुक्ता ये  भक्तस्त्वां  पर्युपासते /
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः //१//

दोहा;-
पूछत  अर्जुन   कृष्ण   से , हे   केशव   सर्वज्ञ /
मुझे  कहें  विस्तार  से , मैं  हूँ  प्रभु  अनभिज्ञ //
जो  अनन्य  तव  भक्तगण , पूर्व कहे अनुसार /
रहहिं निरंतर  ध्यान  में ,भजहिं  रूप  साकार //
अन्य भजहिं प्रभु आपको ,अव्यय अक्षर जान /
उन  भक्तों  में  योग  का,  ज्ञाता  कौन  महान //  
                  श्रीभगवानुवाच 
श्लोक;-
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते /
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे नियुक्ततमा  मताः//२//

चौपाई ;-
अति प्रिय भाव पार्थ के सुन कर / बोले अमिय वचन योगेश्वर//
मुझ में मन को करके स्थिर /भजन  ध्यान में  लगे  निरन्तर//
सगुण  रूप ही  मेरा  भजते / अतिशय  श्रद्धा  मुझ  में  रखते//
सब  योगी  में  वे  अतिउत्तम / मुझको  मान्य  भक्त सर्वोत्तम//

श्लोक;-
ये   त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं    पर्युपासते /
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् //३//
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र सम बुद्धयः /
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः //४//

चौपाई;-
किन्तुपार्थजोपुरुषजितेन्द्रिय/सबविधिकीन्हें निजवशइन्द्रिय//
मनस बुद्धि से  परे  अनूपा / अकथनीय  जग  व्याप्त  स्वरूपा //  
सदा एकरस अज, अविनासी/ अरु, अव्यक्त, अचल  सुखरासी //
परमब्रह्म  को  भजहिं   निरंतर  / एकभाव  में  स्थित  रहकर //
वे  सब भूतों  के  हित  में  रत /  समभावी  योगी   धारे  व्रत //
अविरल  मेरा  ध्यान  लगाते / अन्त समय मुझको  ही पाते //

श्लोक;-
क्लेशोसsधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् /
अव्यक्ता    हि   गतिर्दुःखं    देहवद्भिरवाप्यते //५// 

चौपाई;-
जो अव्यक्त  रूप  नर  ध्यावें / परमब्रह्म  में  ध्यान  लगावें //
उस साधन में क्लेश विशेषा / निर्गुणब्रह्म व्यक्त नहिं देखा //
तन अभिमानी नर हैं याते / निर्गुण गति दुःख से ही पाते //
देह भान जबतक है अर्जुन /सिद्धि न पावें योगी सच सुन //      

श्लोक;-
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्पराः /
अनन्येनैव  योगेन    मां   ध्यायन्त   उपासते //६// 

दोहा;- 
मुझ आश्रित जो भक्त जन ,कर अर्पण निज कर्म /
सगुण  रूप  ही  को  भजें , अन्य  न  जाने  मर्म // 
चौपाई;-
नित्य अनन्यभक्ति से चिंतन / करता है जिनका निर्मल मन //

श्लोक;-
तेषामहं    समुद्धर्ता    मृत्युसंसारसागरात् /
भवामि नचिरात्पार्थ मध्यवेशितचेतसाम् //७// 

चौपाई;- 
रहहिं समर्पित तन मन  धन से / उन्हें मृत्युभवरूप गहन से //
शीघ्र   पार्थ   मैं   पार   लगाऊँ /  सबका   तारनहार  कहाऊँ //

 श्लोक;-
मध्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय /
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः //८//

चौपाई;- 
मुझ में जब निज बुद्धि लगाये / अरु स्थिर मन कर रम जाये //
फिर मुझ में ही  करे  निवासा / इसमें  संशय  नहीं  ज़रा  सा //

श्लोक;-
अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि  स्थिरम् /
अभ्यासयोगेन   ततो   ममिच्छाप्तुं   धनञ्जय //९//

चौपाई;- 
यदि मुझ में मन थिर स्थापन /करने में समर्थ नहिं  अर्जुन //
तो जहँ चित्त भटक कर जाये / मम चिंतन में  पुनः  लगाये //
इस अभ्यास योग में लग कर / मुझको पाने की इच्छा कर //
  
श्लोक;-
अभ्यासेsप्यसमर्थोsसि मत्कर्मपरमो भव /
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि //१०//

चौपाई;- 
यदि अभ्यास नहीं करपाये / उसमें  भी  अयोग्य  हो  जाये //
तो  केवल मुझमें हो तत्पर / कर आराधन भजन निरन्तर // 
एहि विधि से जब चित्त रमाये / मेरी प्राप्ति, सिद्धि  पाजाये //

श्लोक;-
अथैतदप्यशक्तोsसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः /
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् //११//

दोहा;- 
यदि   तू   मेरी  प्राप्ति  के ,  योगाश्रित  अनुरूप /
साधन में असमर्थ  है , तो  हिय  धर  मम  रूप //
कर निज मन अरु बुद्धि से,कर्म फलों का त्याग /
हो  शरणागत  सिद्ध  के , तब   उपजे  अनुराग //
  
श्लोक; -
श्रेयो  हि  ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते /
 ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् //१२//

दोहा;- 
श्रेष्ठ ज्ञान अभ्यास से , उससे उत्तम ध्यान /
कर्म  फलों  का  त्याग  है , उससे  महान //

चौपाई;- 
त्याग विराग ह्रदय उपजाये / तत्क्षण परम शान्ति नर पाये//
  
श्लोक;-
अद्वेष्टा  सर्वभूतानां  मैत्रः  करुण  एव   च /
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी //१३//
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढ़निश्चयः /
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः //१४//

सवैया;-
भारत जो नर प्राणिन में , तज  द्वेष  रहे  सब  स्वारथ हीना / 
है सबके प्रति मीत  दयालु, ममत्व से हीन  अहं से विहीना //
जो सुख औ दुख में सम है, क्षम भाव रहे मुझमें  लवलीना /
और निरंतर तुष्ट रहे न, तन के सँग इन्द्रिय को वश कीना //
    
दोहा;- 
एहिविधि तन ,मन,बुद्धि से , मुझमें है अनुरक्त /
पार्थ मुझे वह परम प्रिय ,दृढ़ निश्चय युत भक्त //

श्लोक;-
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः /
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो   यः   स   च   मे  प्रियः //१५//

चौपाई;-
हों  उद्विग्न न जिससे प्राणी / ना  उद्विग्न स्वयं हो  ज्ञानी //
जो है हर्ष , अमर्ष  विहीना / भय, उद्वेग  आदि  से  हीना //
ऐसा  भक्त  मुझे  है  प्यारा / भेद  सुनाऊँ  तुझको  सारा //
पर उन्नति जब दुख पहुँचावे /वही अमर्ष भाव कहलावे //  

श्लोक ;- 
अनपेक्षः   शुचिर्दक्ष   उदासीनो  गतव्यथः /
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः //१६//

चौपाई;- 
जो नर सर्व  कामना  हीना / अन्तर , बाह्य  पुनीत , प्रवीना //
आराधन की विधि का ज्ञाता / साधकजन में  दक्ष  कहाता //
पक्षपात से  रहित विरागी / सब  दुख  मुक्त  भक्त अनुरागी //
कर्म श्रेय को जो परित्यागे / भक्त मुझे वह अति प्रिय लागे // 

श्लोक;-
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति /
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स  मे  प्रियः//१७//

चौपाई;- 
मन में  हर्ष , द्वेष  नहिं  आये / शोक  कामना   नहीं  सताये //
शुभअरुअशुभ कर्म फल त्यागे/ मोहिं भक्त में वह प्रिय लागे//

श्लोक;-
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः/
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः //१८//

दोहा;-
जिन्हें मान , अपमान  अरु , बैरी , मीत समान /
सुख ,दुख ,सर्दी ,उष्ण का ,द्वन्द्व होय नहिं भान //

चौपाई;-
संगदोष से रहहिं विवर्जित/ अरु आसक्ति रहित हैं अर्पित //
   
श्लोक;- 
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी संतुष्टो येन केनचित् /
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे  प्रियो  नरः//१९//

चौपाई;- 
निंदा स्तुति जिनहिं समाना / स्थिरचित्त करहिं  नित ध्याना //
मननशील नहिं सुधि तन येहा/ ममता रहित बसे  निज गेहा //
येन  केन  विधि  करे निबाहू / नित्य  तुष्ट  लह  जीवन लाहू //
भक्तियुक्त थिरबुद्धि गँभीरा / मोहिं परमप्रिय सो  मति  धीरा //

श्लोक;-
ये तु  धर्म्यामृतमिदं  यथोक्तं   पर्युपासते /
श्रद्दधाना  मत्परमा भक्तास्तेsतीव मे प्रियाः//२०//

दोहा;-
प्रवृत होय  श्रद्धा  सहित , मुझमें  हो  अनुरक्त /
उपर्युक्त यह धर्ममय ,अमिय पियहिं जो भक्त //
मुझको  हैं  परमप्रिय ,  श्रेष्ठ  भक्त   में  जान /
तू अनन्य मम भक्त है , तेहि ते कहा बखान //

निर्गुण सगुण उपासना,महिमा कही सुनाय /
भक्त श्रेष्ठ गुणगान  कर,पूर्ण  हुआ  अध्याय // 

इस प्रकार श्रीमद् भगवद् गीता रूपी उपनिषद एवं ब्रह्म विद्या तथा   योगशास्त्र विषयक  श्रीकृष्ण  और  अर्जुन  के   संवाद   में  उदयभानु  तिवारी''मधुकर''  कृत  महाकाव्य ''गीतमानस'' में भक्ति  योग नामक बारहवाँ  अध्याय पूर्ण हुआ /
                            हरि ॐ तत्सत् 


     

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