यथा अर्थ विवेचन
दोहा
पूज्य अड़गड़ानन्द गुरु, गीता ज्ञान निधान /
जिनके गीताभाष्य को,मिला विश्व सम्मान //
दे यथार्थ गीता किया ,गुरु ने जन कल्याण /
भगवत गीता ज्ञान का , करूँ छंद में गान //
श्री कृष्ण ,सत्य, सनातन
योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं , आत्मा ही है सत्य /
परमात्मा अरु आत्मा,उभय सनातन नित्य //
सनातनधर्म
परमब्रह्म से जो क्रिया , करवाये संलग्न /
वही ''सनातनधर्म'' है,साधक रहहिं निमग्न //
युद्ध
दैव आसुरी वृतियाँ , जब करतीं संघर्ष /
''युद्ध'' उसे ही जानिये , रहिये रहितअमर्ष //
युद्धस्थल
सर्वेंद्रिय अरु मन सहित ,मनुज रूप यह देह /
कुरुक्षेत्र की भूमि है , करहु न मन संदेह //
ज्ञान
जासु काम,मद,मोह नशाये / अन्तर्मन हरि में रम जाये //
प्रभु व्यापक देखे निज ध्याना/तब जानो हिय उपजाज्ञाना//
योग
भवसंयोग,वियोग विहीना / वह अव्यक्त ब्रह्म अविछीना//
वेद न थकहिं जासु गुण गाये/तासु मिलन ही योग कहाये//
ज्ञानयोग
ब्रह्म भजन जप तप आराधन/ ये भव मुक्ति कर्म संसाधन//
जब निज पर ही निर्भर रहकर /कर्म प्रवृत्त होय जो भी नर//
''ज्ञानयोग''वह मार्ग कहाये /निज आश्रित जब सिद्धी पाये//
निष्काम कर्मयोग
अर्पण कर तन मन अरु वाणी/प्रभु आश्रितहोकर जो प्राणी//
करे कर्म जब निस्पृह रह कर/कहहिं उसे ''निष्कामकर्म''नर//
श्रीकृष्ण द्वारा प्रदर्शित सत्य
तत्त्वदर्शियों ने जो देखा / आगे देखेंगे मुनि भेखा//
वही सत्य श्रीकृष्ण ने , पार्थहिं कहा सुनाय /
ब्रह्म अनुरागी ध्यान में, तत्त्व ज्ञान पा जाय //
यज्ञ
परमब्रह्म साधन विधि , जहाँ चित्त रमजाय /
उस विशेष को कहहिं ,''यज्ञ''विज्ञ समुदाय //
कर्म
जब यह यज्ञ क्रिया में आये /तब वह क्रिया''कर्म''कहलाये//
वर्ण
''वर्ण'' कर्म श्रेणी चत्वारा / साधक की स्थिति अनुसारा//
परमोत्तम, उत्तम, अरु मध्यम/साधक सेवा कर्म निम्नतम//
वर्णसंकर
जब साधक मति में भ्रम आये/साधन पथसे च्युतहोजाये//
वही ''वर्णसंकर'' जिय जानो / शाश्वत सत्य इसे ही मानो//
मनुष्य की श्रेणी
अंतःकरण स्वाभाव अनुसारा / दो मानव स्तर संसारा//
एक मनुज हैं देव समाना / दूजे आसुरवृत्ति प्रधाना//
ये दो मनुज जातियाँ जानो/इन्हें स्वभावों से पहचानो//
देवता
प्रभुता जो निज इष्ट की ,हिय में करे प्रदान /
गुण के उस समुदाय को,उदय ''देवता''जान //
अवतार
जो ज्ञानी निज में जग पेखे /हरि ''अवतार''ह्रदयमें देखे//
भौतिक दृष्टि न दर्शन पाये/देखहिं योगी ध्यान लगाये//
विराट दर्शन
दिव्यदृष्टि जिसको मिल जाये/ वह ''विराटदर्शन''पाजाये//
नेत्रज्योति जब प्रभु बनजायें/हियअनुभूति भक्त करपायें//
पूज्यनीय देव
परमपूज्य वह ब्रह्म अनूपा / वही इष्ट है देव स्वरूपा//
खोजहु तेहि कर ह्रदय प्रवेशा / बसे नित्य सबके हियदेशा//
जो अव्यक्त रूप में स्थित / उस योगी में ब्रह्म प्रतिष्ठित//
श्रीहरि प्राप्तिस्रोत वह ध्यानी/जेहि सदगुरु कहते सबज्ञानी//
इससे जितने योगिजन , करके सबहिं प्रणाम /
पुनि ''मधुकर''योगेश्वरहिं, भजहु भाव निष्काम //
पं० उदयभानु तिवारी "मधुकर"
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