Friday, September 26, 2014

                    विषय प्रणयन 

                                  दोहा

       कुरुक्षेत्र रण  भूमि में , निज  मुख  श्री भगवान / 
       भक्त जानि अतिपरमप्रिय,दिया पार्थ को ज्ञान//
       जेहि पुराणमुनि व्यास ने,अन्तः में कर ध्यान /
       लिखा  लोक कल्याण हित,गीता शास्त्र महान //
       सो   अद्वैत   विवेचनी  ,  सुधा  वर्षिणी  अम्ब /
       अष्टादश  अध्याय   से  , युक्त  योग  अवलम्ब //
       हे जग तारिणि भगवती , गीता मन अभिराम /
       तव चिंतनकर ध्यानमें,पुनि पुनि करहुँ प्रणाम//
        
                                 चौपाई 
सुरभित सरसिज नयन विशाला / श्रेष्ठबुद्धि  हे व्यास कृपाला// 
पुनि पुनि बन्दहुँ पद मुनि राया/नमन करत मन अतिहर्षाया//
तेलपूर्ण दीपक भारत में  / ज्ञान  प्रकाश  किया जन हित  में//
भक्त   कल्पतरु   अन्तर्यामी /  ज्ञान भाव  स्थित  हे  स्वामी//
गीता   अमृत   दोहन  कर्ता  / करहुँ  प्रणाम  कृष्ण जगभर्ता//
हे   वसुदेवपुत्र   यदुनंदन  /   कंस   और   चाणूर   निकन्दन//
मातु    देवकी   आनँद   दाता / जगदगुरु  हे   त्रिभुवन  त्राता//
जयजयजय तिरुपति योगेस्वर/तुमहिं प्रणाम करहुँ विश्वेश्वर//
भीम,द्रोण तट रण सरिता के/अति अगाध जल जयद्रथ जाके//
कुटिल मीन  गाँधार  नरेशा / शल्य  ग्राह  रण सरित  प्रदेशा//
कृपाचार्य तेहि  सरि की धारा /  कर्ण  उफान  महा  बरिआरा//
घोर मकर जिमि अतिबलधामा/ जहँ विकर्णअरु अश्वत्थामा//
दुर्योधन   है  भवँर  विशाला  /  डूबे  जिसमें  सकल  नृपाला//
सो  रण  सरिता  दुर्गम भारी  / नाविक जिसके कृष्ण मुरारी// 

                                      दोहा
        निश्चय सो सरि  लाँघेउ , सहजहिं  पाण्डु  प्रवीर /      
        करहिं  सुरक्षा  भक्त  की , नित्य  कृष्ण  यदुवीर//
        शब्द व्यास के अति विमल , पद्म समान सुगंध/
        जिससे गीता तत्त्व  की, निकले अति शुचि गंध//    

                                     चौपाई
भिन्न भिन्न अति सरस प्रसंगा/जिसके केशर,हरिरसरंगा//
कथा ब्रह्म की ज्ञान विकाशा/ श्रवण करत हिय करेप्रकाशा//
मुदमंगलमन सज्जनवृन्दा/पियहिं  मधुप बन रस स्वच्छन्दा//
सो   भारत-पंकज   अघहारी /  है   कल्याणी   मंगलकारी// 
मूक कृपा से जिसकी बोले /  पंगु  चढें  गिरिवर बिन डोले//
ऐसे परमानन्द  प्रदायक / श्रीकृष्ण प्रभु  त्रिभुवन नायक//  

                                     दोहा

      उन्हें करूँ पुनि पुनि नमन,चरण कमल धरि शीश/
      कृपादृष्टि   प्रभु   कीजिये ,  विनय  करूँ  जगदीश//        

पं० उदयभानु तिवारी "मधुकर"

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