Friday, September 26, 2014

​            //श्री योगेश्वराय नमः//
   
 //अनन्त श्री विभूषित योगीराजश्री स्वामी जगमित्रानन्द जी महाराज //  
                                  वंदना 
                   दोहा 
          रेवातट  तपस्थली , जिनका   पावन  धाम /
          सो जग मित्र नन्द गुरु,स्वामी करहुँ प्रणाम//

वचन कहे अस त्रिभुवन भूपा,योगी मम प्रत्यक्ष स्वरूपा //
सो हे प्रभु  योगेश्वर  देवा / विनवहुँ  कर  पद पंकज सेवा//
मागहुँ योगिराज  कर  जोरे  /  कीजै  सिद्ध  मनोरथ मोरे//
सर्व शास्त्र रस भगवत गीता/ चाहौं ब्रह्मज्ञान नवनीता//            
मोपर कृपा  करहु  हे स्वामी / ध्यानगम्य  हे  अन्तर्यामी//
गीताज्ञान विमलअति गूढ़ा/करत काव्यमय यह मनमूढ़ा//
मानस कृति की धुन मन भाई / सो तरंग हिय गई समाई//
ज्ञान प्रकाश  ह्रदय  में  कीजै / कृति में गीतामृत भर दीजै//
सुनत ह्रदय उपजै अनुरागा / जाय मोह ,तम होय विरागा//
जो अनुकंपा गुरु की  पाऊँ / तो हरि  कृपा अवस पा जाऊँ//   
होय विमलमति हरिगुण गावे/ सुमिरतशारद हिय मेंआवे//
उदयभानु मानस कवि जागे / हिय  शाश्वतरस में अनुरागे//

                                दोहा 

       स्वर तरंग में गूँजती , रागिनि  रहीं समाय/                          
       गुरुवर आशिष दीजिये,ज्ञानकलश भर जाय//
पं० उदयभानु तिवारी "मधुकर"          

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