//श्री योगेश्वराय नमः//
//अनन्त श्री विभूषित योगीराजश्री स्वामी जगमित्रानन्द जी महाराज //
वंदना
दोहा
रेवातट तपस्थली , जिनका पावन धाम /
सो जग मित्र नन्द गुरु,स्वामी करहुँ प्रणाम//
वचन कहे अस त्रिभुवन भूपा,योगी मम प्रत्यक्ष स्वरूपा //
सो हे प्रभु योगेश्वर देवा / विनवहुँ कर पद पंकज सेवा//
मागहुँ योगिराज कर जोरे / कीजै सिद्ध मनोरथ मोरे//
सर्व शास्त्र रस भगवत गीता/ चाहौं ब्रह्मज्ञान नवनीता//
मोपर कृपा करहु हे स्वामी / ध्यानगम्य हे अन्तर्यामी//
गीताज्ञान विमलअति गूढ़ा/करत काव्यमय यह मनमूढ़ा//
मानस कृति की धुन मन भाई / सो तरंग हिय गई समाई//
ज्ञान प्रकाश ह्रदय में कीजै / कृति में गीतामृत भर दीजै//
सुनत ह्रदय उपजै अनुरागा / जाय मोह ,तम होय विरागा//
जो अनुकंपा गुरु की पाऊँ / तो हरि कृपा अवस पा जाऊँ//
होय विमलमति हरिगुण गावे/ सुमिरतशारद हिय मेंआवे//
उदयभानु मानस कवि जागे / हिय शाश्वतरस में अनुरागे//
दोहा
स्वर तरंग में गूँजती , रागिनि रहीं समाय/
गुरुवर आशिष दीजिये,ज्ञानकलश भर जाय//
पं० उदयभानु तिवारी "मधुकर"
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