Wednesday, September 24, 2014

                         जीवन ही महाभारत           

महाभारत के समय कुरुक्षेत्र में  भगवानश्रीकृष्णके द्वारा  प्रियसखा अर्जुन को दिए गए गीता  उपदेश का जो तात्विक विवेचन पूज्य  स्वामी श्री अड़गड़ानन्द जी महाराज ने किया है उस व्याख्यानुसार यदि चिंतन किया  जाये तो  दैहिक जगत में सभी महाभारत के पात्रों की अनुभूति योग साधना में रत योगी पुरुष को दैव और आसुरीवृत्ति के अन्तर्द्वन्द्व से परिलक्षित होती है/
                                दोहा    
        कुरुक्षेत्र  के  युद्ध  के  ,  महारथी  बलवान /
        निजअन्तरपट खोलिये,लीजै सब पहचान//
        मानुष तन कुरुक्षेत्र है , कौरव  असुरपृवृत्ति/
        पाण्डव दैवी सम्पदा , पाण्डु पुण्य की वृत्ति//
        कुन्ती है कर्तव्य अरु, भ्रमही भीष्म महान/
        धर्म युधिष्ठिर जानिये ,भाव भीम बलवान//  
                              चौपाई
अर्जुनहै मनकर अनुरागा/ब्रह्मज्ञान जेहि रुचिकर लागा//
नियम नकुल सत्सँग सहदेवा/द्विताचार द्रोण गुरु देवा //
मनःशक्तिहीअश्वत्थामा/सात्विकताकासात्यकिनामा//
नृप धृतराष्ट्र ह्रदय अज्ञाना / दुर्योधन है मोह प्रधाना//
नरप्रवृत्ति इन्द्रिय आधारी /कुरुनृपसहचारिणिगाँधारी// 
जो कर्तव्य कर्म के द्वारा /जीते यह भवसिंधु अपारा//
कुन्तिभोज सोई नृपज्ञानी/विदुरजीव कायालिपटानी//
इतरकर्महीकर्ण  स्वरूपा/अरुकुबुद्धिदुश्शासनरूपा//
शाश्वतपदकाजोअनुरागी/सो मनधृष्टद्युम्नबैरागी//
पुण्यवृत्तियोंकावहनायकधर्मयुद्धसेनाअधिनायक//
इन्द्रियविषयरागपरित्यागासोईकपिध्वजप्रगटविरागा//
                                 दोहा
       काशीनृप तन शक्ति अरु ,वीर विकर्णविकल्प/
       कृपाचार्य  वह कृपाचरण,जासु साधना अल्प//   
                                चौपाई
दिव्यदृष्टि जिससे मिल जाये/ वहसंयम संजय कहलाये// 
परमब्रह्म  में चित्त  रमाये  / महेश्वास  नृप स्थिति  पाये//
व्याप्त ब्रह्म जग में धृतिधारे/वहविराटनृप भावनिहारे//    
अचल सुस्थिति जब नर पाये / महारथीनृपद्रुपद कहाये//
दृढ़ कर्त्तव्य कर्मरत ध्यानी / धृष्टकेतु नृप सम सो ज्ञानी//
मन को खींच  इष्ट में लाये / चेकितान  नृप पदवी पाये// 
कारण,सूक्ष्म,स्थूलशरीरा / विजयकरे सो पुरुजित वीरा//
सत्य आचरण युक्त अमानी / नर मेंश्रेष्ठ शैव्यनृप ज्ञानी//
भ्रममयभूरिश्रवा निजश्वासा / बहिर्प्रवाह प्रधान सुपासा//
शिखासूत्रपरित्याग शिखण्डी/ लक्ष्य प्रतीक महाबरबंडी//
युध अनुरूप विचार बनाये / युधामन्यु की स्थिति पाये//
शुभ की मस्ती कर्म  कराये/ उत्तमौजनृप छवि दिखलाये//
जबवहशुभ बनजाय अधारा/होअभिमन्युअभयबरिआरा//
वही सुभद्रासुत सम वीरा / ध्यान योग स्थित मतिधीरा//
                                 दोहा
        ध्यानरूप   है  द्रोपदी  ,   पांच  पुत्र  ये  जान /
        सुह्रद ,सौम्य,लावण्यता,दृढ़,वात्सल्य महान//                     
        
                        पं० उदयभानु तिवारी "मधुकर"

No comments:

Post a Comment